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Showing posts from October, 2011

जीवन के रंग

जिंदगी के हर कदम हर पड़ाव हर मोड़ पर ,घटनाओं को अलग अलग कोण से देखते हुए बहुत कुछ सीखा जा सकता है.सच तो यही है की हर घटना कुछ सिखाने के लिए ही होती है ओर अगर थोडा रुक कर चीज़ों  को देखा जाये उन्हें महसूस किया जाये तो जिंदगी  जीने का एक नया नजरिया मिलता है या आपके नज़रिए में  बेहतरी के लिए कुछ न कुछ तबदीली जरूर आती है .पिछले १० दिन पर नज़र डालती हूँ तो यही महसूस होता है.एक छोटा सा निर्णय कहीं बहुत आत्मविश्वासी बना देता है तो उस डगर पर जब आत्मविश्वास डिगता है जो डर लगता है वह मजबूत ही बनाता है. वैसे भी मेरा यह मानना है की जीवन की हर घटना को सकारात्मक ढंग से लेने से हर काम सरल हो जाता है वहीँ अगर उनमे कमियां ढूँढने बैठ जाएँ तो चीज़ें कठिन हो जाती है. 
करीब १० दिन पहले फ़ोन आया की मम्मी (सासु माँ )की तबियत ठीक नहीं है उन्हें अस्पताल  ले गए है उम्र का तकाजा है कमजोरी भी रहती है सोचते हुए में अस्पताल  पहुंची. इसके पहले पतिदेव का फ़ोन आया की क्या हुआ वो शहर से बाहर थे मैंने कहा की अभी बताती हूँ अस्पताल  पहुँच कर .पता चला की उन्हें हार्ट अटक आया है.आई सी यु में है .उन्हें बहुत तेज़ दर्द हो रहा…

धनतेरस

कल यानि २४ अक्तूबर यानि धन तेरस ....ठीक ग्यारह साल पहले भी धनतेरस २४ तारिख को ही थी ठीक ग्यारह साल पहले अपने नए बने आशियाने में हम रहने आये थे. जी हाँ कल हमारे मकान जो अब हमारा घर है उसकी ग्यारहवी सालगिरह है. समय कब कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता. बीच में कई साल बिना इस सालगिरह को याद किये भी निकल गए. लेकिन इस बार ये सालगिरह बहुत याद आ रही है.शायद इसलिए भी क्योंकि अब फिर से मकान का काम चल रहा है ओर हम पल पल उसके पूरे होने का इंतजार कर रहे है. 
आज भी याद है हमारे नए बने मकान की वास्तु शांति के पहले वाला दिन सारा दिन हम अपनी छोटी गाड़ी से सामान ढोते रहे. उस समय यहाँ का रास्ता भी बहुत उबड़ खाबड़ था गाड़ी दायें चलाओ तो पत्थरों पर लुदकती  हुई बाएं पहुँच जाती थी. दूर दूर तक कोई पंचर वाले की दुकान नहीं थी हमारे घर से लगभग ३ -४ किलोमीटर दूर तक कुछ भी नहीं था. वास्तु शांति के बाद रात में नए घर में ही सोना था. उस समय तक मकान में दरवाजे भी नहीं लगे थे. आज भी याद है रात में बिस्तर के साथ मच्छरदानी लाना नहीं भूले थे ओर बच्चों को बड़े ध्यान से सुलाया था क्योंकि उस समय यहाँ बिच्छू ओर सांप बहुत थे…

.पचमढ़ी यात्रा ४

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शरद पूर्णिमा आने वाली थी आसमान में चाँद बादलों के साथ अठखेलियाँ कर रहा था.ठंडी हवा के झोंके कह रहे थे की थोड़ी देर हमारे साथ भी बतकही कर लो. पचमढ़ी एक छोटा सा शहर है. यहाँ के मूल निवासी भोले भाले हैं .पचमदी  की आबादी लगभग ३००० है ,यहाँ सेना,पोलिसे ओर स्काउट के ट्रेनिंग सेण्टर है जिसमे सरकारी अधिकारी ओर कर्मचारी की स्थापना मिला कर यहाँ की आबादी लगभग ५००० है. इस लिहाज से यह एक सुरक्षित शहर है.रात लगभग १२ बजे में ओर मेरी एक कलीग बाहर घूमने गए . यहाँ की मेन रोड पर लगभग आधे घंटे चहलकदमी करते रहे. एक बार ख्याल भी आया की ये बहादुरी कहीं महँगी न पड़ जाये लेकिन एक तरह से ये ठीक ही हुआ. लगातार उबड्खाबाद रास्ते पर चलते ओर बस ओर जिप्सी में बेठे  घुटने चलते हुए लोंक  हो रहे थे. इससे ये समझ आ गया की कल रजत प्राप्त की कठिन चढाई उतरना ओर चदना संभव नहीं है.इसका कोई इंतजाम करना ही होगा. जब वापस लौटे तो पता चला की होटल का मेन डोर बंद हो चुका है ओर सब लोग सो चुके है. बाहर खड़े हो कर आवाज़ लगाई लेकिन दिन भर के थके हारे वर्कर ,मेरी कलीग के पास मोबाइल था लेकिन यहाँ  सिग्नल आसानी से नहीं मिलते. एक ओर तरीका थ…

पचमढ़ी यात्रा ३

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पता नहीं बच्चों में इतनी ताकत कहाँ से आती है?? सारे समय बच्चे कोरिडोर में चक्कर लगाते रहे कुछ ने तो दरवाजा खटखटा कर बता भी दिया मम हम तैयार है कब निकलना है?? खैर आधे घंटे में क्या तो नींद आनी थी? तैयार हो कर नीचे आ गए. हमारा अगला पड़ाव था जटा शंकर. जटा शंकर  गहरी घाटी में  शिव मंदिर है. जहाँ जाने के लिए सीढियां बनी है. कहीं कहीं घाटी इतनी संकरी है की दोनों तरफ के पहाड़ सर मिलाते से लगते है. यह लगभग ३ किलो मीटर  लम्बी घाटी है.यहाँ एक बड़ी गुफा है जिसमे एक पानी का कुण्ड है .जब आसपास की पहाड़ियों से बहता हुआ पानी यहाँ आता है तो वह आगे घाटी में नहीं बहता बल्कि  इस कुण्ड के नीचे से ही जमीन में समां जाता है ओर लगभग १४ किलो मीटर दूर एक अन्य घाटी में निकालता है. रास्ते में जड़ी बूटियों की दुकाने है लेकिन ये जड़ी बूटियाँ कितनी असली है ये तो पहचानने वाले ही बता सकते है. सालों से बहने वाले पानी के साथ  कचरा प्लास्टिक ओर रेत कुण्ड में जमा होते गए .तब एक साधू ने इस कुण्ड की सफाई करवाई ओर टनों कचरा ओर रेत यहाँ से निकली गयी. प्लास्टिक तो खैर आजकल सर्वत्र है.जहाँ भगवन नहीं पहुँच सकते शायद वहां भी प्ल…

पचमढ़ी यात्रा २

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हम टीचर्स भी गप्पें मारने बैठ गए. अभी सो पाना तो संभव नहीं था. बच्चों के सो जाने के बाद उनके कमरों का चक्कर लगाना था .रात करीब १२ बजे हमने चक्कर लगाया ,तो पता चला २-३ कमरों में टी वी चल रहा है  ओर बच्चे सो चुके है २ कमरों में अंदर से सांकल नहीं लगी है ओर बच्चे बेसुध पड़े है . धीरे से एक बच्चे को जगाकर उससे कहा की अंदर से बंद कर ले.जब सारे कमरे चेक हो गए तब करीब १ बजे हम अपने कमरों में पहुंचे. सुबह ६ :३० पर बच्चों को जगाना था. 
सुबह  चाय  आने से १५ मिनिट पहले ही नींद खुल गयी. चाय आयी तब तक फ्रेश हो कर हम फिर अपने राउंड के लिए तैयार थे. कई बच्चों को तो खूब देर तक उठाना पड़ा तो एक दो उत्साही लाल तो उठ चुके थे. जिसको भी जो पीना था चाय दूध कॉफ़ी ओर ८  बजे  तैयार हो कर नाश्ते के लिए ऊपर पहुँचने के लिए कहा. नीचे  पहुंचे  तो  जिप्सी  आ  गयी  थी . अब  दो  दिन  हमें  जिप्सी  से  घूमना  था . करीब ९ बजे हम जिप्सी से रवाना हुए .  हमारा  पहला स्पोट था हांड़ी खोह.हांड़ी खोह पचमढ़ी की सबसे गहरी घाटी है. ये इतनी गहरी है की आप इसका तल नहीं देख सकते. इस घाटी में घना जंगल है जिसमे कई ओषधिय  वनस्पतियाँ  पाई…

पचमढ़ी यात्रा.१

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स्कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर पचमढ़ी जाना था..मन तो बिलकुल नहीं था चार दिन की छुट्टी शहीद करना. कब से इंतजार में थी इन चार दिनों में ये काम करना है वो करना है ओर सबसे बड़ी बात की थकान उतरना है.कुछ कहानियां अधूरी है उन्हें पूरा करना है लेकिन ...खैर ५ तारिख को रात में बस से रवाना होना था करीब ९ बजे बस चल पड़ी .सच कहूँ तो आँखों में आंसू भरे थे जिन्हें अँधेरे में आसानी से छुपाया जा सका बार बार छोटी बिटिया की बात ही मन में गूंजती रही आप पिछले ३ सालों से हर बार दशहरे  पर घर से बाहर रहती हो दिवाली पर पापा नहीं रहते घर पर. हमारे सारे त्यौहार तो ऐसे ही चले जाते है .सोचती हूँ इन छोटी छोटी खुशियों को पाने के लिए इस नौकरी से छुटकारा पा लूं.लेकिन अब तो ये हाल है की एक दिन की छुट्टी भी  लो तो दिन ख़त्म नहीं होता..दिन भर यही सोचते निकल जाता है की कोर्स  पूरा करना है आज के कितने पीरियड चले गए .टीचिंग  जैसे दिनचर्या में समां गयी है. खैर अब तो बस रवाना हो गयी थी अब बेकार की बातें सोचने से क्या होना था तो यही सोचा की बस अब काम पर ध्यान दिया जाये. रास्ता लम्बा था ओर बहुत ख़राब.. नवमी का दिन था इंदौर स…