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Showing posts from June, 2011

कुछ ....

.सूरज की सुनहरी धुप  छूती  है जो गालों को   पर कुनकुनी नहीं लगती  कुछ सर्द सा है. 
बारिश की रिमझिम बूँदें  पड़ती जो तन पर  पर मन को नहीं भिगोती  कुछ सूखा सा है. 
भीड़ भरे बाज़ार में  चीखती आवाजें  कुछ सुनाई नहीं देता  कुछ सूना सा है. 
दोस्ती प्रेम प्यार के  एहसासों से भरे जीवन में  नहीं होता कोई एहसास  कुछ रीता सा है. 
एक तुम्हारा स्पर्श  एक  तुम्हारी नज़र   जो मिल जाये मुझे फिर सब अपना सा है.

किन्नर

कल दो खबरे सुनी और पढ़ीं उनसे  मन  विचलित हो गया .
एक  घटना हमारे घर के पास ही हुई ,किसी के नए मकान का गृहप्रवेश था मेहमान खाना खा रहे थे तभी वहां किन्नर आ गए और नेग के रूप में ११,००० रुपये माँगने लगे. स्वाभाविक ही था की इतनी बड़ी रकम सिर्फ नेग के नाम पर देना किसी को भी नागवार गुजरता सो गृह स्वामी ने मना कर दिया और कुछ कम का प्रस्ताव रखा .लेकिन वह राशी उन किन्नरों  को बहुत कम लगी और फिर उन्होंने सभी मेहमानों के सामने हील हुज्जत और अपनी चिर परिचित आखरी धमकी के रूप में अश्लील हरकते शुरू कर दी.आखिर गृह स्वामी को ८,००० रुपये दे कर उन्हें विदा करना पड़ा. पैसे गए बिना बात का मेहमानों के सामने नाटक हुआ और गृह प्रवेश जैसी एक ख़ुशी का क्षण हमेशा के लिए एक कड़वी याद के लिफाफे में बंद हो गया.  दूसरी  खबर अख़बार( नईदुनिया १८ जून  )  में पढ़ने को मिली की राउरकेला में  एक व्यक्ति से किसी किन्नर ने शादी का प्रस्ताव रखा जिसे उसने मना कर दिया तो उस किन्नर ने उस व्यक्ति पर कांच की बोतल से हमला कर दिया. जब उसने इसकी रिपोर्ट पुलिस में की तो उस किन्नर को पकड़ा गया लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया की किन्नर को जेल म…

.कान्हा

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""कान्हा" मंडला जिले में जबलपुर से १६० किलो मीटर दूर टाइगर प्रोजेक्ट के तहत रिजर्व  फोरेस्ट है डिस्कवरी चेनल पर टाइगर देखते देखते असल में देखने की इच्छा हो आयी. बस नेट से वहां के कान्हा रेसोर्ट में बुकिंग करवाई और चल पड़े.इंदौर से कार से .इंदौर से सुबह साढ़े पांच बजे निकल गए ९ बजे भोपाल और १२ बजे पिपरिया पहुँच गए. भोपाल में ही भरपेट ब्रंच किया ताकि बार बार रुकना न पड़े. लेकिन पिपरिया से पचमढ़ी का रास्ता बिना रुके आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा था.

रास्ते के दोनों और बड़े बड़े हरे भरे पेड़ ऐसा मनोरम दृश्य बना रहे थे की हम इंदौर वासी तो सच में अब ऐसे  दृश्य को तरस जाते है.इंदौर में विकास के नाम पर पर्यावरण का जो विनाश हुआ है की दिल रो देता है. इंदौर शहर के लगभग ९० % पुराने पेड़ विकास की भेंट चढ़ गए है.शहर अब तो हालत ये है की कही छाँव के लिए ढूंढें से एक पेड़ नहीं मिलता .ऐसा लगता है शहर अनाथ हो गया  सब बुजुर्गों का साया उठ गया. सारे रास्ते  पेड़ों से आच्छादित सड़क की फोटो लेते रहे.कार रोक कर फोटो खींची. तभी तेज़ आंधी के साथ बारिश शुरू हो गयी ,बस फिर क्या था तड़ा तड  कच्चे आम(के…

यादें

कभी सोचती हूँ
दिमाग जो होता एक डिबिया
निकाल कर देखती उसमे पड़े
विचार,भाव रिश्ते-नाते ,
यादें ,एहसास,घटनाएँ
हौले से छूकर सहलाती
संचेतना भरती उनमे
हंसती, रोती, खिलखिलाती
फिर महसूसती उन्हें

करीने से फिर रखती
छांट बाहर करती
अगड़म -बगड़म विचार
टूटे बेजान रिश्तों के तार
टीसते एहसास

खाली पड़े कोनों को भर देती
किसी सुंदर विचार से
सुनहरी यादों की गोटी किनारी से
सजा लेती डिबिया

लेकिन,
उस एक अनाम से रिश्ते
जाने अनजाने से नाम
कुछ अनबूझे से भाव ,
कुछ कसकती बातें, यादें
झाड़ पोंछ कर फिर सहेज देती
छुपा देती फिर किसी कोने में
चाह कर भी न निकाल पाती
निकाल कर भी न भुला पाती
वो बसी है दिल में कहीं गहरे
बहुत गहरे .

"बचपन और हमारा पर्यावरण"

क्याखेले ?क्याखेले?सोचतेसोचतेआखिरयेतयहुआनदीपहाड़हीखेलतेहै। तेरीनदीमेंकपडेधोउं, तेरीनदीमेंरोटीपकाऊ, चिल्लातेहुएबच्चेनिचलीजगहकोनदी औरऊँचेओटलोकोपहाड़समझकरखेलरहेहै , नदीकामालिकअपनीनदीकेलिएइतनासजगहैकीउसमेकपडेधोने ,बर्तनधोनेसेउसे तकलीफहोतीहै।गर्मियोंकीचांदनीरात ,लाइटनहींहैअबअँधेरेमेंक्याकरे? एकजगहबैठे तोमच्छरकाटतेहै ,नानीकहतीहै ,अरे ! जाओधुपछाँवखेलो ,कितनीअच्छीचांदनीरातहै, औरबच्चेमेरीधूपऔरमेरीछाँवकेमालिकबनजातेहै।इत्ताइत्तापानीगोलगोलरानीहोया अमराईमेंपत्थरपरगिरीकेरीयोंकीचटनीपीसना ,खेलतेहुएकिसीकुए,कीजगतपरबैठना, प्यासलगेऔरपानीनहोतोकिसपेड़कीपत्तियांचबालेना ,यारंभातीगायभैससेबातेकरना, इससालकिसआमपरमोरआएगाकिसपरनहीं ,गर्मीमेंनदीसूखेगीयानहीं,टिटहरीजमीन परअंडे देगीयानहीं ?हमाराबचपनतोऐसीहीजानेकितनीबातोंसेभरापड़ाथा। खेलखेलमें बच्चेअपनेपरिवेशसे कितनेजुड़जाते