Tuesday, May 3, 2011

इंतजार ६

(मधु और मधुसुदन मंदिर में अचानक मिले देखते ही बरसों पुरानी बातें ताज़ा हो गयी. थोड़ी देर साथ बैठ कर एक दूसरे के बारे में जानकारी ली एक दूसरे का पता फोन नंबर लिया .मधु के जाने के बाद में वही बैठ कर पुरानी यादों में खो गया .पता नहीं कैसे पर घर में मधु के बारे में पता चल गया घर पहुंचते ही माँ पिताजी और दादी के सवालात शुरू हो गए.जब मधु के बारे में बताया तो घर में बवाल मच गया. माँ ने अनशन की धमकी दे दी. उस दिन मधु से नहीं मिला जब घर पहुंचा ..)अब आगे

पूरी शाम में आफिस में फाइलों में सर घुसाए बैठा रहा .रात करीब आठ बजे घर पहुंचा घर के सामने रिक्शा खड़ा था .कई सारे पास पडोसी जमा थे .तभी भैया माँ को गोद में उठाये बाहर आये और उन्हें रिक्शे में बैठा दिया .दूसरी तरफ से भाभी ने आकर माँ को संभाला और उनके साथ रिक्शे में बैठ गयी. क्या हुआ माँ को ?दरवाजे पर छुटकी दिखाई दी ,मुझे देखते ही बिलखने लगी -भैया माँ .
कुछ समझने का समय नहीं था मैंने साईकिल उठाई और रिक्शे के पीछे हो लिया.

माँ वैसे ही दो दिन की उपवासी थी उस पर तीसरे दिन का उनका अनशन .में गलियारे में हतप्रभ खड़ा था .
भैया तुम ये जिद छोड़ दो .माँ नहीं मानेगी .कल से सिर्फ रोये जा रही है बस यही कह रही है मेरी बेटी का जीवन नरक हो जायेगा .मेरी ममता का ऐसी कठिन परीक्षा क्यों ले रहे है भगवान .बेटे का सुख देखूं तो बेटी का जीवन ख़राब और बेटी को देखूं तो बेटे को जीवन भर का संताप.एक ब्राह्मण के घर पंजाबी बहु .भैया फिर कौन ब्राह्मण इस घर की लड़की लेगा .भाभी ने कहा .
माँ को होश आ गया था उनसे मिलने गया तो मुझे देख कर हाथ जोड़ लिए उन्होंने और झर झर आंसू रोने लगी .अपने को रोक नहीं पाया में भी .माँ के कमजोर हाथों को अपने हाथ में लेकर देर तक रोता रहा .
माँ की तकलीफ तो महसूस ही नहीं की मैंने सिर्फ अपने बारे में सोचता रहा .उस रात में अस्पताल में ही रुका और सारी रात माँ और कुसुम के बारे में सोचता रहा.
दूसरे दिन माँ घर आ गयी .मैंने उन्हें वचन दिया में ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिससे कुसुम का जीवन ख़राब हो पर मुझे मधु से मिलना तो होगा. माँ कुछ न बोली पर उनकी आँखे कहती रही बेटा मैंने तुझ पर विश्वास किया है तू इसे न तोड़ना.
आफिस के काम से किसी को दिल्ली भेजना था मैंने झट से इस मौके को झपट लिया .शायद यहाँ से दूर रह कर में ठीक से कुछ सोच और समझ सकूं.

मधु के यहाँ फिर एक चिठ्ठी पहुंचाई -आफिस के काम से बाहर जा रहा हूँ ,४-५ दिन बाद लौटूंगा .
जब से मधु से मुलाकात हुई थी ये पहला मौका था जब लगातार इतने दिन उससे नहीं मिला था.
आज सोचता हूँ कैसा लगा होगा मधु को ??
रात गहरा गयी थी. मंदिर बंद होने को था.में भी उठ कर घर की और चल दिया. क्रमश

7 comments:

  1. आगे इन्तजार है...रोचक मोड़ पर खड़ी है कहानी...

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  2. पिछली कडियाँ पढ कर आयी हूँ बहुत रोचव्क कहानी है अगली कडी का इन्तजार। शुभकामनायें।

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  3. कविता जी ,
    यह तो बिलकुल मेरी आपबीती सी है.अंतर बस इतना सा है कि तब मैं छात्र था और आत्मनिर्भर नहीं था.एक-एक द्वंद्व बिलकुल वैसा ही.परिस्थितियां भी वैसी ही. उन सभी मनोभावों का इतना बारीक और संश्लिष्ट विवरण सिहरन पैदा कर जाता है.बस.लाजवाब!

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  4. आस पास के बिखरे पात्रों को ले कर रची गयी कहानी है ... पर फिर क्रमश: ...

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  5. अच्छी लग रही है,क्रमशः से उत्सुकता बढ़ जाती है.

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