Wednesday, February 2, 2011

सजा

खता जो तुमने की,
सजा क्यूँ हमको दी...
चुप से सह लेते हम सजा भी।
फिर क्यूं तुमने शिकायत की ,
सह लेंगे सभी शिकवे भी
पर जो सजा तुमने खुद को दी
सह न सकेंगे ........

2 comments:

  1. सह लेंगे सभी शिकवे भी
    पर जो सजा तुमने खुद को दी
    सह न सकेंगे ........

    प्रेम की इन्तहा...बहुत सुन्दर अहसास और उनकी अभिव्यक्ति ...

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  2. हा हा हा इसे प्यार कहते हैं. प्यार यानि अपनों की खुशी,अपनों के लिए जीना फिर....वो दुखी हो कैसे सहन हो सकता है भला?
    यही तो है न् इस कविता में?
    मेरे लिए प्यार ईश्वर है इसीलिए इस शब्द का ज़िक्र भर मुझे डूबा देता है किसी रचना में और.....मैं डूब गई इन चार पंक्तियों में.
    प्यार
    इंदु

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