Wednesday, February 2, 2011

सिलसिला

हम हंस हंस के भुलाते गए उनकी ख़ताओं को
और उन्होंने हमें ही कसूरवार ठहरा दिया.....
ख़ताओं का इल्जाम ही क्या कम न था
जो सरे आम हमें रुसवा किया।
जो तुम को हो सुकून तो हम क्या गिला करे
आओ फिर ख़ताओं का सिलसिला शुरू करे....

10 comments:

  1. वाह! बहुत बढिया।
    खताओं के सिलसिले के सहारे सिलसिला शुरु हो खताओं का।
    हा हा हा

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  2. कविताओं का सुन्दर सिलसिला... बहुत उम्दा...

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  3. बहुत खूब...ठीक है खताओं का सिलसिला फिर शुरू करें. बहुत भावपूर्ण

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  4. हम हंस हंस के भुलाते गए उनकी ख़ताओं को
    और उन्होंने हमें ही कसूरवार ठहरा दिया.....
    ekdam theek baat...kayee baar yahi hota hai.

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  5. वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

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  6. कविताओं का सुन्दर सिलसिला

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  7. खताऑ के सिलसिले जो एक बहाना दे बात करने का तो.....मैं तो जिंदगी भर खताए करने को ईश्वर का दिया तौहफा मानू .हा हा हा
    छोटी सी पर दिल को छू जाने वाली बात की है इन चंद पंक्तियों में.
    प्यार

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