अरे मैडम.....

कहते है जिंदगी हर कदम पर कुछ न कुछ सिखाती है,और ये पाठ हमें अपनी या दूसरों द्वारा किये गए भूलों ,कामों से तो मिलती ही है जीवन में मिलने वाले लोगो के सानिध्ध्य से भी मिलती है। अपने शैक्षणिक जॉब के दौरान सबसे ज्यादा सानिध्ध्य तो बच्चों का ही रहता है और बच्चे बहुत अच्छे शिक्षक होते है बस जरूरत है उनके काम, व्यवहार, बातों को उस सकारात्मक नज़रिए से देखने की।

कुछ ही दिन पहले की बात है। दोपहर भोजन के दौरान क्लास ५ की कुछ लड़कियों को रोते हुए देखा। कारण पूछने पर पता लगा उनकी क्लास की ही किसी लड़की से लड़ाई हो गयी है ,उसने कुछ कहा है और इस वजह से एक दो नहीं पूरी ५ लड़किया हिलक हिलक कर रो रही है। अब एक लड़की लड़ाई में ५-५ लड़कियों को रुला दे तो पहला ख्याल मन में आता है ,जरूर उसने कुछ किया ही होगा...खैर उन लड़कियों को किसी तरह चुप करवा कर खाना खिलाया और में बात करूंगी इस बात का आश्वासन दिया ।

खाने के बाद उस लड़की को देखा तो अपने पास बुलाया...अभी हम उसे दिव्या कहे? इससे बात करने में आसानी होगी। खैर मैंने पूछा दिव्या क्या हुआ?
मैडम कुछ नहीं ,उसने भोले पन   से जवाब दिया ।
firनीसारी सारी साऱी  लड़कियाँ क्यों रो रही है।
अरे मैडम वो ,अरे मैडम कुछ नहीं एक ने मुझसे कहा की मैंने दूसरी लड़की को चिडचिडी कहा और जब मैंने दूसरी लड़की को बताया तो पहली वाली ने मना कर दिया अब सब मेरे पीछे पड़ गयी है।
मुझे समझ तो कुछ नहीं आया ,फिर भी मैंने कहा ,लेकिन इस बात के लिए इतने सारे लोग क्यों रो रहे है?

अरे मैडम कुछ नहीं,ये सब कहते है की में बहुत चिडचिडी हूँ ,मैंने कहा ठीक है में मान लेती हूँ की चिडचिडी हूँ ,तो क्या बहुत सारे लोग होते है। पर मैडम मैंने कहा की में अपने को बदल लूंगी । अब मैडम एक दिन में तो सब नहीं बदल जायेगा न? मैंने कहा है में अपने को बदल लूंगी...
मैडम सब पता नहीं क्यों मेरे पीछे पड़  जाते है ...में ऐसी हूँ वैसी हूँ ...तो क्या हुआ मैडम ,मैंने कह तो दिया में बदल लूंगी खुद को। अब रोना तो मुझे चाहिए इस बात पर ,और देखिये में तो रो नहीं रही हूँ और ये सब रो -रो कर तमाशा कर रही है।
में अवाक् उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रही...किसी भी परिस्थिति को स्वीकार करने का उसका नजरिया किसी अनुभवी प्रोफेशनल से कम  न था।
दिव्या ,ये तो बहुत अच्छी बात है की तुम उनकी बातों को सकारात्मक तरीके से लेती हो और खुद को बदलने के लिए तैयार हो ,तो क्यों नहीं तुम उनसे जाकर बात करती हाथ मिलाओ और फिर से दोस्त बन जाओ।
अरे मैडम आज नहीं अभी जरा उन सबको ठंडा हो जाने दो ,आज में बात करूंगी भी न, तो कोई सुनेगा नहीं। में बाद में उनसे बात कर लूंगी। वैसे भी मैडम अगले हफ्ते मेरा बर्थ डे आने वाला है ,देखना में कार्ड दूँगी न तो सब पार्टी में आ जायेंगे।
में उस लड़की का आत्म विश्वास देखती रह गयी.उस कक्षा ५ की १० साल की लड़की का परिस्थितिओं को देखने का नजरिया ,उन्हें अपने हिसाब से ढाल लेने का विश्वास मुझे जिंदगी को नए तरीके से देखने का सबक सिखा गया।
और हम है की किसी ने कुछ कहा दिल से लगा लिया। उसने बात नहीं की सोच में डूब गए , हमसे क्या गलती हुई या दूसरों की गलती ढूँढने में लग गए ,हर बात में खुद को या दूसरों को ही दोषी मानाने लगे। जो है उसे अभी इसी वक्त सुलझाने की उधेड़बुन बात को और और उलझा जाती है और हम समझ ही नहीं पाते गलती आखिर हुई कहा?
कुछ भी कहिये इसे आप अपने नज़रिए से लीजिये पर मैंने तो भाई बहुत कुछ सीखा..और आपने?????

Comments

  1. इतनी छोटी उम्र में इतनी सार्थक और व्यावहारिक सोच काबिले तारीफ़ है...

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (21-2-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. सकारात्मक सोच व्यक्ति के समग्र विकास की धूरी होती है।
    ऐसे लोग हमेशा सफ़ल होते हैं।

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  4. वाकई सही है हमेशा जीवन को सकारात्मकता से देखने का नजरिया पर यदि बात को वहीँ का वहीँ ख़तम कर दिया जाये तो और अच्छा होता है यह उस उम्र की बच्ची के लिये तो संभव नहीं है पर हम सब किसी भी बात को तत्काल अनुकूल कदम उठा कर सामान्य कर सकते है ....

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  5. परिस्थिति के अनुकूल जो स्वयं को ढाल ले उसे जीने का तरीका आता है ...अच्छी प्रस्तुति

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  6. बहुत ही प्रेरणादायी प्रसंग । शिक्षा तो हम बड़ों कों लेनी चाहिए इन बच्चों से जो सहज ही बातों का हल ढूंढ लेते हैं।

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  7. सचमुच आज के बच्चों का आत्मविश्वास अधिक है.. परिश्तिथियों से वे बेहतर ढंग निपटते हैं.. रोचक संस्मरण..

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  8. जीने के दो ही तरीके हैं ...या परिस्थिति अपने अनुकूल बना ली जाए , या परिस्थितियों के अनुकूल ढला जाए ..
    छोटी सी बच्ची मगर सूझबूझ में बहुत बड़ी !

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  9. बडी गहरी नजर और सोच है तुम्हारी कविता! वरना अक्सर टीचर इस तरह की बाते सुन कर बच्चों को झिडक देते हैं.
    गुस्सा या नाराजगी शांत होने के बाद अपनी बात कहनी चाहिए.
    वाह! क्या खूब है वो बच्ची !
    जैसी मेडम वैसी उनकी स्टूडेंट प्यारी प्यारी..
    ऐसे ही अपने अनुभव का मुझे पढ़ने का इंतज़ार रहेगा.लिंक भेज दिया करो बेटा ! मैं भूल जाती हूँ मेरी अपनी दुनिया है ही इतनी प्यारी औए खूबसूरत.
    हा हा हा
    क्या करू?सचमुच ऐसिच हूँ मैं और मेरी दुनिया

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