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Showing posts from July, 2011

तसल्ली

अरे बेटा यहाँ  आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी   ने मिनी को अपनी गोद मे खींच  लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बान्धेगी . मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इन्त्जार था.
"बेटी हुई है" नर्स ने कहा,तो मांजी का चेहरा बुझ गया.नेहा से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनके हाव-भाव ने काफी कुछ कह दिया. मिनी से उनका बात करना बन्द हो गया. नेहा अनजाने ही अपराधबोध से ग्रस्त हो गयी.विनय ने भी तो कुछ नही कहा,बस चुपचाप उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते रहे.मांजी  की चुप्पी देखकर विनय की चुप्पी तुड्वाने का उसका साह्स नही हुआ.
अस्पताल से घर आकर दरवाजे पर ठिठकी कि शायद मांजी  घर की लक्ष्मी की आरती उतारे,पर घर मे पसरी निशब्दता देखकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गयी. मिनी छोटी बहन के आने से अचानक बडी हो गयी. उसने अपने आप को गुडियो के सन्सार मे गुम कर दिया,वहां  बोझिलता कम थी.
विनय आजकल अपने काम मे ज्यादा ही व्यस्त थे, उनसे बात करने का समय ही नही मिलता था.घरवालो की खामोशी ने उसके दिल-दिमाग को अजीब सी बॆच…
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नईदुनिया  (नायिका  )दिनांक 20th जुलाई ....को  प्रकाशित

गुम

कुछ ढूंढती है    मेरी आँखें     मन चकित सा  देखता है        कुछ जो खो गया   कुछ जो ढूँढना है     कुछ जो रीत गया     कुछ जो अनजाना है     डोलती हूँ  बौराई     टटोलती अलगनी     अलमारी किताबें     तकिये के नीचे टटोलते हुए     कहीं नहीं है    कुछ नहीं है     हताश सोचती हूँ       क्या ढूंढ रही हूँ में ?  क्यूँ हूँ अकेली ? क्यूँ नहीं मिल रहा  वो तुम्हारे होने का एहसास    गुम सा है   जब से     तुम रूठ गए हो !

ढूंढता हूँ में उसे

यादों की गलियों में     पीछे जाते हुए    पहुँच जाता हूँ उस गेट पर      जिसके उस पार हाथ हिलाते    माँ ने मेरा हाथ  थमा दिया था किसी हाथ में     देख उस अजनबी चहरे      माँ की डबडबाई आँखें     वो बिछड़ने और अकेलेपन का एहसास     धुंधला रास्ता ,कमरे और चहरे    वो डर    

एक कोमल स्पर्श  एक मीठी आवाज़  जब उसने कहा था     रोओं मत में हूँ ना    झपकाकर डबडबाती आँखें   साफ होती वह सूरत   मुस्कराती आँखों में  मेरा डर खो गया    

आज बरसों बाद    नहीं याद आ रहा वह चेहरा     वह नाम वो आँखें     लेकिन जब भी उदास  अकेला  होता हूँ में     होते है सभी अपने आस पास  हर संबल हर सांत्वना  में     वह स्पर्श ढूंढता हूँ   सुनना चाहता हूँ   वही मीठी आवाज़  रोओं मत में हूँ ना !

उन दिनों तुम

जब तुमने    किया था गृहप्रवेश    चूड़ियाँ खनकती थी    बजते थे बिछुए    घर भरा होता था  नवझंकार  से       सर पर पल्लू संभालती    चौंकती  हर आहट पर   एक झिझक, एक ललक     वो ननद के साथ    भरी दोपहर बाज़ार चले जाना     देवर की चाह का पकवान बनाना    बुजुर्गों के  पैर छू लेना  आशीष     एक संतुष्टि की मुस्कान   तुम्हारी आँखों में       वो मेरे देखने पर    लजा कर नज़रें झुकाना    पास आने पर सिहर जाना    तुम आज भी वही हो  खुद में  संबंधों में और   परिपक्व    लेकिन तुम्हारा वह नयापन        याद आता है मुझे     उसे फिर लौटा लाना चाहता हूँ में