Tuesday, June 15, 2010

महेश्वर यात्रा













छुट्टियों में कही जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया तो सोचा चलो एक दो दिन के लिए महेश्वर ही हो आया जाये.वैसे मालवा की गर्मी छोड़ कर निमाड़ की गर्मी में जाना कोई बुध्धिमात्तापूर्ण फैसला तो नहीं कहा जायेगा,पर और कही जाने के लिए सफ़र के लिए ही कम-से-कम २४ घंटे चाहिए,फिर रुकने के लिए समय ही कहा बचा? हमारे पास कुल दो दिन का समय था जिसमे आना-जाना और घर ऑफिस की दिनचर्या से थोडा आराम हमारा लक्ष्य था.इसलिए महेश्वर को चुना.वैसे भी वहा ज्यादा घूमना नहीं था ले दे कर एक घाट ही तो है जहा जाया जा सकता है।
तो हम पहुँच गए महेश्वर। महेश्वर होलकर वंश की महारानी "अहिल्याबाई 'की कर्मस्थली रही है.उन्होंने इंदौर रियासत की बागडोर यही से संचालित की.नर्मदा नहीं के किनारे उनका बहुत साधारण सुविधायों वाला किला बना है.पर उन्होंने यहाँ नदी के किनारे भव्य घाट बनवाये।( हमारे जाने के दो दिन पहले ही किसी फिल्म की शूटिंग के लिए पूरा देओल परिवार यहाँ था)।
दिन तो होटल मे ऐ सी में गुजरा पर शाम को घूमने घाट पर चले गए।वहा शाम की आरती हो रही थी । पंडितजी के साथ कुछ श्रद्धालु आरती और भजन गा रहे थे.कुछ लोग नहा भी रहे थे.पर नहाने के बाद घाट पर दिया जला कर अपनी श्रध्दा समर्पित कर रहे थे। हम लोग भी आरती के ख़त्म होने तक वहा खड़े रहे ,फिर बैठने का स्थान तलाश करने लगे । पत्थर तो गर्म थे पर नदी में पाँव डाल कर बैठना बहुत सुकून दायक लग रहा था।हमारे सामने ही एक परिवार के बहुत सारे सदस्य खाना खा रहे थे,और हम बैठे हुए अनुमान लगाने लगे की गर्मियों की छुट्टियों में सब बहन-बेटियां अपने बच्चों के साथ मायके आयी है और आज यहाँ पिकनिक मनाई जा रही है । घर से लाया खाना ,पानी की बड़ी सी बोतल ,बिछाने के लिए चादर,बर्तन,और ढेर सारी बातें। खाना खा कर बच्चे खेलने लगे पानी में तैरती बड़ी बड़ी मछलियों को देखने लगे,बड़ी उम्र की महिलाये घाट पर घूमने निकल गयी,और बाकियों ने फटाफट सामान समेत लिया। अभी हम उस परिवार की चहल-पहल में ही खोये थे तभी आवाज़ आयी"जय श्री कृष्णा" और हमरी बगल में एक और परिवार आ कर अपनी चादर बिछाने लगा। थोड़ी ही देर में खाने का सामान सज गया । अपने आस-पास नज़र डाली तो पाया की यहाँ कई परिवार है जो अपना शाम का खाना यहाँ आ कर खा रहे है। मन विभोर हो गया इस सहज सरल जीवन शैली को देख कर। दिनभर की तीखी धुप में तो बाहर निकलना संभव नहीं है,शाम को इस छोटी सी जगह में जाये तो कहा जाए ? इसलिए शाम होते ही परिवार की महिलाये बच्चे खाना बना कर नदी किनारे आ कर गपशप करते हुए खाते है और अपनी दुकान या काम से फारिग हो कर घर के पुरुष सदस्य भी यही आ जाते है। एक दो घंटे का समय कट जाता है ,रूटीन से हट कर मन प्रसन्न हो जाता है।
दूसरे दिन शनि जयंती थी ,सोचा जब इतने पावन दिन इस पवित्र नगरी में जीवनदायनी नर्मदा के किनारे है तो क्यों न स्नान किया जाये। घाट पर कपडे बदलने की व्यवस्था संतोषप्रद थीं, सो दूसरे दिन सुबह पहुँच गए नदी किनारे.घाट खचाखच भरे थे,पर कोई चिकचिक नहीं थी ,सभी शांति से जगह मिलाने का इन्तेजार कर रहे थे।ऐसा लग रहा था आज तो सारा महेश्वर ही यहाँ उमड़ आया है। स्नान के साथ लोगो का मिलाना मिलाना ,हालचाल पूछना ,नहा कर साथ लाये लोटे से घाट पर बने शिवलिंग पर जल चढ़ाना ,दीपक लगाना ,सब इतना सुखद लग रहा था,की उसका वर्णन नहीं कर सकती । ऐसा लगा महानगरीय जीवन शैली में जाने कितनी छोटी-छोटी बातों को त्याग कर हम कितनी ही बड़ी-बड़ी खुशियों को अपने जीवन में आने से रोक रहे है । दिन के उजाले में इन भव्य घाटों को देख कर अचम्भित हो गए। उस ज़माने में जब मशीनी सुविधाए नहीं थी ,कैसे बने होंगे ये घाट,कैसे की गयी होगी इनकी परिकल्पना कितना समय लगा होगा इन्हें बनाने में,और कितना संयम रहा होगा उन लोगो में ,ये सोच में ही नहीं समां पाया।
स्नान के बाद घट पर स्थित सहस्त्रबाहु मंदिर दर्शन के लिए गए। यह एक अति प्राचीन मंदिर है जहा सालों से शुध्ध घी के ७ दीपक जल रहे है। यहाँ इन दीपक के लिए घी दान देने की परंपरा है,और यहाँ इतना घी चढ़ावे में आता है .की कई कमरे भरे हुए है।
महेश्वर यहाँ की हाथ की बनी महेश्वरी साड़ियों के लिए प्रसिध्ध है । इन सरियों को हाथ से बने लूम पर बनाया जाता है.जिनकी सुनहरी किनारी अपनी सुन्दरता में बेजोड़ अब घूमने आये और खरीदी न करे ये पत्नीव्रत धर्म के खिलाफ होता है। इसलिए दो साड़ियाँ खरीद कर पतिदेव को उनका धर्म निभाने का पुण्य प्राप्त करने का मौका भी दिया।
इस तरह महेश्वर यात्रा सानंद संपन्न हुई । साथ में कुछ फोटेस है आप अभी इन्ही का आनद लीजिये,और जब भी समय मिले घूम आइये।






Tuesday, June 8, 2010

न्याय........

२ दिसम्बर १९८४ शाम को ५ बजे मम्मी और पास में रहने वाली वैध आंटी के साथ घूमने निकली। सूरज पश्चिम में डूबने को था.आसमान में सुर्ख लाल रंग बिखेर कर आगाह कर रहा था की,पंछियों घर जाओ मुझे जाना है। पंछी भी जैसे सूरज की चेतावनी को समझ कर अपने साथिओं को आवाज़े दे कर तेज़ी से चले जा रहे थे।
मम्मी ने कहा ,कितनी सुंदर शाम है पूरा आसमान लाल हो गया ,"देखो कैसा दिन फूला है"।
आंटी बोली ,हमारी दादी कहती थी ऐसा दिन डूबना अशुभ होता है।
अरे, हम तो समझ रहे थे कितना सुन्दर लग रहा है, मम्मी ने कहा ।
बात आयी गयी हो गई,हम लोग घूम कर कुछ गप्प्पे मार कर वापस अपने -अपने घरो को चले गए।
दूसरे दिन सुबह सामान्य हुई.अपने काम निबटा कर मम्मी आराम कर रही थी, तभी पास वाली आंटी ने आवाज़ दे कर कहा ,:भाभी जल्दी आओ ,वैध भाभी के यहाँ कुछ हो गया।
देखा उनके घर के सामने भीड़ जमा थी.कुछ लोग अंदर थे ,बाहर लोगो से बात करने पर पता चला की कल भोपाल में कुछ हादसा हो गया ,वैध सर वही थे ,उनकी तबियत ख़राब हो गयी है। अभी भोपाल से फ़ोन आया है ,सर के कोलाज में ,वहा से उनके साथियों ने घर आ कर खबर दी । आंटी के कुछ करीबी रिश्तेदार आये है उन्हें भोपाल ले जाने के लिए।
यहाँ आंटी अपने बेटे के साथ रहती थी,अंकल का कुछ दिनों पहले ही भोपाल तबादला हुआ था.उनका बड़ा बेटा कही बाहर रह कर पढ़ रहा है। जब आंटी बाहर आयीं तो सभी ने उन्हें धधास बंधाया ।
सब ठीक हो जायेगा भाभीजी ,आप चिंता मत करो।
उस शाम सूरज भी जैसे आगाह करना भूल गया, बस उदास सा, लालिमा बिखेरे बिना चला गया । लोगो में चर्चा होती रही क्या हुआ होगा, सर तो बिलकुल ठीक थे,वगैरह वगैरह ।
उस समय २४ घंटों के न्यूज़ चैनल्स नहीं होते थे,न ही शाम के अखबार खंडवा जैसी छोटी सी जगह में छपते थे ।
रात ८ बजे के समाचार में पता चला की हादसे की भयावहता क्या है ?पर कौन सी गैस,कितनी नुकसानदेह ये अभी भी समझ नहीं आ रहा था ।
दूसरे दिन अखबारों में छपी ख़बरों ने तो जैसे सब को हिला कर रख दिया। अब सही मायने में सब को वैध सर की तबियत की चिंता हुई।
उस समय मोबाइल जैसे साधन भी नहीं ठ । २-३ दिन बाद किसी लड़के ने कोलेज से ला कर खबर दी ,कि "सर नहीं रहे "।
कोलोनी में सन्नाटा पसर गया ,आंटी की,उनके बच्चो की ,इतनी बड़ी जिम्मेदारियों की चिंता ने सब को व्यथित कर दिया।
१२-१५ दिन बाद जब आंटी वापस आयी ,तब पूरी बात पता चली। अंकल रसायन शास्त्र के प्रोफेसर थे। जब गैस फैली उन्हें उसकी सान्ध्रता का अंदाजा हो गया था। और उसकी मारक शक्ति का भी, पर उन्हें मालूम था की मुह-नाक पर गीला कपडा रखने से इससे बचा जा सकता है। इसलिए वे न सिर्फ उनके परिवार के लोगो को बल्कि हॉस्पिटल में भी और लोगो को मुह पर गीला कपडा रखने की सलाह देते रहे। और बोलने के लिए अपने मुह से गीला कपडा हटाते रहे,और गैस की चपेट में आने से उनकी मौत हो गयी।
इस आकस्मिक आघात से उबरने में आंटी को बहुत समय लगा ,गैस त्रासदी के मुआवजे के रूप में मिलाने वाली रकम उनके बेटों के भविष्य की राह बना सकती थी।
पर आंटी के मन में इस त्रासदी के जिम्मेदार लोगो के लिए जो गुस्सा था ,वह मुआवजे की रकम से ठंडा नहीं हो सकता था।
सालों -साल भोपाल गैस त्रासदी की खबरे पढ़ते रहे ,आन्दोलन होते रहे,दिलासे मिलते रहे ,
"कल मिलेगा न्याय"जब ये शीर्षक पढ़ा तो मन में एक आस बंधी अब आंटी चैन मिलेगा ,उनकी जिंदगी की खुशियाँ छीनने वाले को सजा मिलेगी.शायद और जिम्मेदार लोग इस सजा से सबक सीखेंगे ,और अपने काम के प्रति गंभीर होंगे।
२५ साल के इन्तेजार के बाद जो हाथ आया ,ऐसा लगा अगर ये फैसला आंटी के जाने के बाद आता तो शायद वो इंतजार में ही सही एक आस के सहारे जी तो लेती। इस फैसले के बाद उनके दिल पर क्या गुजारी होगी ......
अब मैं क्या बताऊ आपको........

Saturday, May 15, 2010

बोलिए....ये हमारे सरोकार हैं ..........

कितना पानी ढोलते है,मकान मालिक को तो पता ही नहीं,रोज़ रोज़ पाइप लगा कर नहाते है ,किससे कहे ,कैसे कहे? ये रोज़ ही महिला मंडली की चर्चा का विषय होता था.नयी बसी कालोनी में नित नए मकान बनते थे,जहा सामान की रखवाली के लिए चौकीदार होते थे,उन्हें टूबवेल चलने की आज़ादी होती थी और पानी बर्बाद करने की भी।
एक शाम जब ये चर्चा चल रही थी तभी मैं भी मंडली में शामिल हुई और पूछा माजरा क्या है,तब पता चला की सामने के मकान में रोज़ पानी की बर्बादी हो रही है। अपने अनुभव से ये तो जान ही लिया था कि पानी यदि बरसात के मौसम से ही सहेज कर नहीं रखा तो गर्मी में टूबवेल साथ नहीं देंगे।
दूसरे ही दिन शाम को २-३ लड़के पाइप चालू करके नहा रहे थे.पानी भरपूर बह रहा था। पानी बेकार बहता देख कर पारा चढ़ जाता है,और मुझे याद आ जाते है वो दिन जब मई-जून की गर्मी में सारा दिन बिना पानी पिए गुजारा करती थी .पैसे लेकर भी कोई पानी भरने को तैयार नहीं होता था..क्योंकि पानी का कोई स्त्रोत ही नहीं था।
बस पहुँच गयी वहा और उन लडको से कहा ,कितना पानी बहा रहे ?
बोले आंटीजी नहा रहे है।
ठीक है पर नहाने के लिए बाल्टी में भी तो पानी लिया जा सकता है ।
जी पर यहाँ पानी तो है न ।
हा पानी है पर इस तरह बहावोगे तो एक दिन ख़त्म हो जायेगा । तुम्हे मालूम है गाँवों में लोग कितनी मुश्किल से गुजारा करते है। तुम्हारे ही घर में औरते कितनी दूर से सर पर पानी ले कर आती है। किस गाँव के हो तुम लोग?
आंटीजी,निमाढ़ के।
तो तुम्हे नहीं मालूम वहा पानी की कितनी परेशानी है?
जी मालूम है।
फिर ?? फिर भी यहाँ मिल रहा है तो बेकार में बर्बाद कर रहे हो। अरे जीतनी जरूरत हो वापारो ,ज्यादा हो तो किसी जरूरतमंद को देदो,पर इस तरह बर्बाद तो मत करो।
जी आंटीजी,हम समझ गए ,हमने ये सोचा ही नहीं था,अबसे हम पानी बेकार नहीं धोलेंगे
टूब वेल तो कब से बंद हो गया था। उस दिन के बाद उन लडको ने कभी पानी बर्बाद नहीं किया।
मन को एक संतुष्टि मिली,पर कई प्रश्न भी उठ खड़े हुए ।
*जब लोगो ने देखा तो खुद उन लडको को ऐसा करने को मन क्यों नहीं किया?
*लोग सही बात कहने को बुरा बन्ने का खतरा क्यों समझते ?
*क्या यही बात मैं किसी पढ़े लिखे व्यक्ति को समझती तो वो भी इसे इतनी आसानी से समझ जाता?
तो जब भी आप अपने आस-पास कोई गलत kaam होते देखते है तो कुछ कहते क्यों नहीं? ये हमारा समाज है,हमारे सरोकार है इन्हें हमहें ही सुधारना है.और कई काम तो अक्सर अनजाने में होते है आप को बस एक बार बताना है ये ठीक नहीं है ,पर अधिकतर लोग इतनी भी जहमत नहीं उठाते,क्यों??????

Thursday, May 6, 2010

समय

शादी के चार ही महीने बाद अपनी गृहस्थी ले कर गाँव में जाना पड़ा नेहा को । पति की पहली पोस्टिंग ,हेड ऑफिस पर रहना जरूरी था । छोटा सा गाँव उस पर साहब का तमगा,गाँव की राजनीती,किसी के घर आना जाना नहीं होता था.घर में पड़े पड़े उकता जाती थी नेहा। तभी गाँव के स्कूल में एक अध्यापक की नियुक्ति हुई,घर के पास ही उनका घर था.उनकी भी नयी नयी शादी हुई थी, नेहा को लगा चलो कोई तो मिला जिससे दो घडी बोल-बतिया लेगी.जल्दी ही जान पहचान हो गयी,और कभी कभी रचना के घर आना जाना भी होने लगा.एक शाम नेहा अपनी सखी से मिलने के लिए उसके घर गयी पर न जाने क्या हुआ नेहा को देखते ही रचना पलटी और घर के अंदर चली गयी। अपने को अपमानित सा महसूस कर नेहा उलटे पाँव घर लौट आयी। कई दिनों तक यही सोचती रही की आखिर हुआ क्या ?रचना ने भी इसके बाद कोई सम्बन्ध नहीं रखा.वह समझ गयी जरूर किसी ने कोई गलतफहमी पैदा कर दी है।

दो साल बीत गए,एक बार पति के ऑफिस के एक कर्मचारी को देखने हॉस्पिटल जाना हुआ ,वहा जाने पर पता चला की मास्साब के ससुरजी भी भर्ती है चलती बस से गिर गए है । इंसानियत के नाते उन्हें भी देखने गए,सभी रिश्तेदार इकठ्ठे थे रचना उन्ही के साथ खड़ी थी ,देखा कर पास आयी पर कुछ बात नहीं हुई। मास्टरजी से हाल -चाल पूँछ कर वापस आ गए.अगली सुबह फिर हॉस्पिटल जाना हुआ,तो पता चला की रचना के पिताजी गुजर गए है,वहा जाने पर मास्टरजी नेहा और उसके पति को तुरंत अलग ले गए और बोले अभी रचना और उसकी माँ को कुछ नहीं बताया है आप भी अभी कोई बात नहीं करें। तब तक रचना भी वहां आ गयी,नेहा की और देख कर बोली क्या हुआ ?और नेहा की आँखों में आंसू देख कर नेहा के गले लग कर फफक कर रो पड़ी।

उसकी पीठ सहलाते हुए नेहा ने जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा ,समय बड़ा बलवान है ,कब किस को किस हाल में किसके सामने खड़ा कर दे नहीं पता.

Wednesday, April 14, 2010

यशी

स्कूल में मेरी छवि एक सख्त टीचर की है,उस पर विषय भी गणित ,तो विषय की मांग है विद्याथियों की एकाग्रता ,जो इस छवि में और भी सितारे जोड़ देती है.वैसे भी इतना कुछ होता है विद्यार्थियों को बताने के लिए की फालतू बातों के लिए समय भी नहीं होता, और यहाँ वहां की बाते करना मुझे सुहाता भी नहीं है। पिछले साल की बात है कक्षा ५ की एक लड़की ज्यादातर समय स्कूल से अनुपस्थित रहती थी ,उसकी कॉपी पूरी करवाना और पिछला सबक समझाना बहुत मुश्किल होता था। वैसे भी जो बात क्लास की पढाई में होती है वो एक विद्यार्थी को बैठा कर पढ़ाने में नहीं आती.इस पर जब भी उससे बात करो वो सर झुका कर चुपचाप खडी हो जाती ,न कुछ बोलना, न जवाब देना .काफी दिनों तक वह स्कूल नहीं आयी ,फिर बच्चों से ही पता चला की वो बीमार है ।

एक दिन स्टाफ रूम में बात करते हुए उसकी बात निकली तो मालूम हुआ कि उसकी माँ उसे छोड़ कर चली गयी है और दूसरी शादी कर ली है ,वह अपने दादा-दादी और पापा के साथ रहती है.वो काफी बीमार भी रहती है.सुन कर बहुत अफ़सोस हुआ.जब वह वापस आयी तो मैंने उसका विशेष ध्यान रखना शुरू किया।

इसी बीच स्कूल में परेंट- टीचर मीटिंग थी,जिसमे में उसके पापा आये,और बड़े ही जोश से भरे कहने लगे कि अपनी बेटी को तो मैं हो पढ़ता हू और वह गणित में काफी अच्छी है ,हाँ इस साल कुछ ज्यादा बीमार रही है इसलिए थोडा पिछड़ गयी है। मैंने भी कहा ठीक है आप भी ध्यान रखिये और जो भी कठिनाई उसे होगी मैं भी ध्यान रखूंगी।

एक बार फिर वह दो दिन नहीं आयी ,मैंने पूछा यशी क्यों नहीं आयी ,किसी को पता नहीं था कि क्या हुआ .जब वह आयी तो बहुत खुश थी और पूछने के पहले ही कहने लगी ,मम मेरे पापा शादी कर रहे है मेरे लिए नयी मम्मी लायेंगे .सुन कर और उसे खुश देख कर बहुत ख़ुशी हुई .मैंने पहली बार उसे इतना खुश देखा था।ये बात उसने हर टीचर को बताई ,फिर एक दिन कहने लगी मम मैं भी अपने पापा के साथ घूमने जाउंगी वो बहुत खुश थी । उसके पापा कि शादी के पहले ही उसने बता दिया कि मैं अब १० दिन नहीं आउंगी पहले शादी में हम जयपुर जायेंगे फिर घूमने जायेंगे .मैंने भी कहा ठीक है खूब मजे करना।

४-५ दिन बाद ही वो स्कूल आयी ,चुपचाप सर झुकाए जैसे ही मैं क्लास में पहुंची बच्चे चिल्लाये मम ,यशी आ गयी,सुनकर मैं भी चौंक गयी ,अरे वो तो १० दिन बाद आने वाली थी ,मैंने पूछा शादी कैसी हुई खूब मजे किये ,उसने आँखों में आंसू भर कर कहा यस मम ,फिर?पापा मम्मी को लेकर घूमने चले गए मुझे नहीं ले गए । अरे तो क्या हुआ बेटा , तुम जाती तो तुम्हारी पढाई का कितना नुकसान होता फिर हम सब भी तो तुम्हे रोज़ याद करते थे ,है न बच्चों ?मैंने पूछा सब ने एक स्वर में कहा यस मम ।

अब यशी पहले से भी अधिक गुमसुम रहने लगी ,न उसका पढ़ाने में मन लगता न किसी से बात करती ,एक दिन मैंने उससे बात की तो बोली ,मम पापा अब सिर्फ मम्मी का ध्यान रखते है,हर समय उनके आगे पीछे रहते है, रोज़ शाम को उन्हें घूमने ले जाते है,पर मुझे कभी भी साथ नहीं ले जाते ,मैं कहती हू तो मुझे दांत देते है,मैंने कहा तुम्हारे दादा-दादी कुछ नहीं कहते ,तो उसकी आँखों में आंसू भर आये कहने लगी वो भी मुझे दांत देते है । अब पापा न मुझ से बात करते है न मुझे पढ़ते है। मैंने कहा बेटा मम्मी अभी यहाँ नई है न इसलिए पापा उन्हें घुमाने ले जाते है,फिर अगर तुम रोज़ -रोज़ उनके साथ जाओगी तो पढाई कब करोगी ? इसलिए नहीं ले जाते ,फिर अब तो तुम भी बड़ी हो गयी हो ,थोड़ी पढाई खुद कर सकती हो,और अगर कोई परेशानी आये तो मुझे बताना मैं तुम्हारी मदद करूंगी । कह कर मैंने उसके सर पर हाँथ फेरा .वह थोड़ी आश्वस्त हो कर चली गयी .फिर भी उसका मन न लगा ।

स्कूल ख़त्म होने को आये,आखरी दिन यशी मेरे पास आईए और बोली ,मम मैं जा रही हू,मेरे पूछने से पहले ही उसके साथ आयी लड़कियाँ बोलने लगी मम यशी स्कूल छोड़ रही है ,क्या?? चौंक पड़ी मैं,कहाँ जा रही हो तुम ?किसी और स्कूल में ? नहीं मम इंदौर में नहीं ,पापा मुझे हॉस्टल में भेज रहे है .अंदेशा तो मुझे भी था पर इतनी जल्दी सब इतना बदल जायेगा मालूम न था। मैंने उसे बांहों में भर लिया और कहा बेटा कोई बात नहीं तुम बहुत समझदार हो वहा तुम्हे ढेर साडी सहेलियें मिलेंगी ,तुम ज्यादा मजे करोगी ,और तुम मन लगा कर पढ़ना ,जब भी इंदौर आओ यहाँ जरूर आना हमसे मिलाने .और वो चली गयी

छुट्टियों के बाद पहले दिन वो मुझे फिर मिली ,मम अरे यशी तुम ?कैसी हो बेटा ?बहुत ख़ुशी हुई उसे देख कर,मम मैं ठीक हू.क्या हुआ?मैंने पूछा,मम दादाजी को मालूम नहीं था कि मैं होस्टल जा रही हू जब उन्हें मालूम पड़ा तो उन्होंने पापा को बहुत दांता और कहा कि अब इसे कही भेजने कि बात कि तो मैं तेरी पिटाई करूंगा । पिटाई कि बात कहते हुए ख़ुशी से उसकी आँखे चमक रही थी । मुझे भी बड़ी ख़ुशी हुई ,वह फिर बोली मम नयी मम्मा प्रेग्नेंट है इसलिए पापा उन्ही का ध्यान रखते है , हाँ बेटा इस समय उन्हें ज्यादा जरूरत है न और अब तो यशी बहुत समझदार हो गयी है.यस मम इस साल मैं खुद ही पढाई करूंगी ,और अच्छे मार्क्स लुंगी ,वैरी गुड बेटा और कभी भी कोई भी परेशानी हो मुझे बताना ,यस मम ,और वो चली गयी ।

कल अच्कांक वो आयी और बोली मम ,यशी कैसी हो बेटा ?वो कुछ नहीं बोली उसने मेरी और देखा उसकी आँखों में अजीब सी उदासी थी वो चुपचाप खडी रही,फिर धीरे से उसके हांथों में हरकत हुई जैसे उन्हें ऊपर उठा रही हो मैंने अपनी बाहे फैला कर उसे समेत लिया ,और बहुत देर तक उसे सीने से लगाये रही,उसके सर और माथे पर बहुत सारा प्यार किया वह चुपचाप खडी रही फिर उसमे कुछ हलचल हुई और मैंने उसे धीरे से छोड़ दिया । उसने मेरी और देखा उसकी आँखे अब चमक रही थी उसने कहा मम मेरा games period है bye,और वह चली गयी

Thursday, April 1, 2010

करें गर्मी का सामना

गर्मी की शुरुआत होते ही कूलर ,पंखे,एसी,उसका सामना करने जुट जाते है,लेकिन गर्मी की मार से बचाना आसान नहीं है. उस पर बिजली और पानी की कमी बचे हुए हौसले भी तोड़ देती है। यहाँ गर्मी से लड़ने के कुछ आसान और आजमाए हुए तरीके है ,इन्हें आप भी आजमाइए।

(१० किलो बिना बुझा चूना, १ kg फेविकोल ,छोटी झाडू.)

*घर की छत को साफ़ कर लीजिये.बिना बुझा चुना रात में भिगो दीजिये ,सुबह उसमे फेविकोल मिलाकर साफ़ छत पर झाडू से पोत दीजिये.छत पर सफेदी होने से सूर्य-प्रकाश परावर्तित हो जायेगा ,जिससे छत गर्म नहीं होगी और घर का तापमान २-३ डिग्री तक कम हो जायेगा।

घर की खिड़कियों की दिशा देखिये,यदि उनपर सीधी धूप आती है ,तो उन पर बाहर से सफ़ेद कागज चिपका दें,कांच गर्म नहीं होंगे तो घर का तापमान कम रहेगा,और रोशनी भी आती रहेगी।

रात में घर के खिड़की दरवाजे खोल दीजिये जिससे हवा का प्रवाह बना रहेगा.यदि सीधी घर के अंदर से हो तो छत का दरवाजा खोल दें, गरम हवा बाहर निकल जाएगी.एक्सास्त फैन चालू कर दे जिससे गर्म हवा बाहर निकल जाये घर जल्दी ठंडा होगा।

इन उपायों से बिना बिजली का बिल बढ़ाये या पानी खर्च किये आप घर को ठंडा रख सकते है.

Tuesday, March 30, 2010

नियमो में कैद बचपन

मार्च आ गया इसी के साथ शुरू हो गया नया सत्र। नए सत्र के साथ ही नयी युनिफर्म्स,नए बैग ,नए शैक्षणिक कार्यक्रम के साथ ,कुछ नए और कुछ पुराने नियम । ये नियम बच्चों को कितना अनुशाषित करते है ये तो नहीं पता,पर कई नियम तो बच्चों पर लादे गए से लगते है । इनमे से कुछ नियम जो मुझे परेशान करते है उनका जिक्र यहाँ करती हूँ । (यहाँ बता दूं की जिक्र पब्लिक स्कूलों का हो रहा है )।
* मोटी-मोटी युनिफर्म्स जिनका कोलर बैटन बंद होना जरूरी है।
*कमर पर बेल्ट होना चाहिए जो ढीला या लटका ना हो.( चाहे बच्चे की कमर पसीने से गीली हो जाये।
* गर्मी में भी पूरे दिन जूते -मोज़े पहनना जरूरी है।
*गले में ताई होना जो उन्हें पब्लिक स्कूल का होने की पहचान देती है।
* क्लास में संन्मैका का फर्नीचर जिस पर उन्हें सारा दिन बैठना है,दो पेरिओद के बीच में उठ कर घूम नहीं सकते,
चाहे उनके बम्स पसीने से भीग जाये या दर्द करने लगे।
*दो पेरिओद के बीच-बीच में पानी पीने या बाथरूम जाने की की मनाही,आखिर उन्हें अपने पर नियंत्रण रखना जो सीखना है।
*एक नियम है हाथों को पीछे बांध कर चलाना,मुझे इसका ओउचित्य आज तक समझ नहीं आया .(मुझे तो लगता था की हाथों का मूवमेंट चल को आसान बनता है) ।
*इसी तरह के और भी कई नियम होंगे जो आपके नौनिहालों को परेशां करते होंगे ,उनका जिक्र करके इन्हें बदने की दिशा में कदम बढ़ाये।

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...