Posts

Showing posts from October, 2013

व्यथा

प्रारब्ध ने चुना मुझे  चाहर दीवारी से घिरा बचपन  बिना दुःख क्या मोल सुखका  बिना संग क्या ज्ञान अकेलेपन का।  
तुम रहीं नाराज़ चला गया  बिना कहे  न सोचा एक बार  क्या कह कर जाना था आसन?  मुझे जाना था  क्योंकि प्रारब्ध ने था चुना मुझे।  
ज्ञान प्राप्ति की राह में  किसी कमज़ोर क्षण  हो जाना चाहा होगा  एक बेटा, पिता ,पति  क्यों नहीं समझा कोई ?
मैंने कब चाही थी यह राह आसान  होना चाहा था एक आम इंसान  संघर्ष ,सुख दुःख जिजीविषा जी कर  वंचित किया गया मुझे  क्योंकि प्रारब्ध ने चुना मुझे।  
देवों की श्रेष्ठ कृति इंसान  तभी तो लोभ संवरण नहीं कर पाए  अवतरित होते रहे धरती पर  बन कर मानव अवतार 
फिर क्यों चुना मुझे  बनने को भगवान  मैंने भी कभी चाह होगा  बनना एक आम इंसान।  
कविता वर्मा  

मेला दिलों का …

कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो  डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद  किया।  अपने बचपन  को  याद करते हुए  बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना  कर डाली  उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया। 

उस समय के मेले मतलब बीस पच्चीस साल पहले के मेले जिनमे  हिंडोले थे ,चकरी वाले झूले थे। गुब्बारे चकरी वाले ,प्लास्टिक के मिट्टी के खिलोने वाले ,मिट्टी  के बर्तन , नकली फूल ,छोटे मोटे बर्तनों वाले, सस्ते कपड़ों वाले ,खाने पीने की दुकानों में जलेबी इमरती मालपुए वाले ,गुड़िया के बाल ,सीटी, कार्ड बोर्ड पर रंगीन पन्नी लगा कर बनाये गयीं तलवार ,गदा, धनुष बाण वाले। यही सब तो था।  आज भी कमोबेश वही सब है दूरदराज़ के गावों में तो बहुत कुछ नहीं बदला , बड़े शहरों के पास वाले गाँवों में आधुनिकता का असर पड़ा है लोगों की रुचियाँ बदली हैं इसीलिए मेलों का स्वरुप भी बदला है। यही बात शहरों के मेलों के साथ है।   माल संस्कृति के चलते शहरी बच्चों में मेलों का बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं रह गया है। मॉल में गाहे बगाहे कई इवेंट्स होते रहते हैं जिनमें बच्चे मेलों की तरह ही शामिल होते …

अभ्यस्त

घनघोर अँधेरे पथ पर  कुछ बिखरे काँटे , कुछ  फूलों जैसे पल  अटपटी राह  पर बढ़ते अकेले कदम।  
कठिन राह, घनघोर अन्धकार  संवेदनाओं से रीता संसार  मन ढूँढ रहा एक किरण  एक आस , कोई एहसास  टटोलते हाथ  टकराते सघन निरास  ठोकर खाते गिरते  भीगते जज़्बात। 
नहीं समय करने का  भोर का इंतज़ार  न ही कोई साथ  उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख  हो अभ्यस्त साध अन्धकार  बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  
कविता वर्मा

शक्ति पूजा

नवरात्री शुरू होने वाली हैं सीमा घर की साफ़ सफाई में लगी है। कल शक्ति स्वरूपा  देवी जी की स्थापना का दिन है उनके स्वागत में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 
बचपन से सुनती आयी है नारी ही शक्ति है जो सृष्टि के निर्माण की सामर्थ्य रखती है। शक्ति की उपासना के द्वारा नारी शक्ति को शशक्त किया जाता है जिससे विश्व निर्माण और सञ्चालन सुचारू रूप से चल सके।   फोन की घंटी ने उसके हाथों और दिमाग की गति को रोक दिया।  बाहर उसके ससुर जी फोन सुन रहे थे घर में अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया।  उसके ससुर जी बहुत धीमी आवाज़ में कह रहे थे " बेटी तू ही बता मैं और पैसा कहाँ से लाऊँ ? पहले ही दस लाख रुपये दामाद जी को दे चूका हूँ ,रिटायर आदमी हूँ ,तेरे भाई की तनख्वाह से उसके खर्चे ही जैसे तैसे पूरे हो पाते हैं। तू दामाद जी को समझा न अगर दे सकता तो जरूर दे देता बेटी। "  फोन रख कर ससुरजी निढाल से पलंग पर बैठ गए और दोनों हाथों से माथा थाम लिया।  "क्या करूँ कहाँ फेंक दिया मैंने अपनी बेटी को ,जानती हो सुनील की माँ आज तो वो रो रो कर कह रही थी ,पापा मुझे यहाँ से ले जाओ आप इनका पेट कभी नहीं भर सकोगे ,मुझे जिन…