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Showing posts from October, 2012

लड़कों में आत्मघाती प्रवृत्ति

आज सुबह का अखबार पढ़ते ही मन दुखी हो गया।मेडिकल फाइनल के एक छात्र ने इसलिए फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी प्रेमिका की सगाई कहीं और हो गयी थी।उस छात्र के जीजाजी जो की खुद मेडिकल ऑफिसर है ने एक दिन पहले उसे इसी बारे में समझाइश भी दी थी लेकिन रात  वह होस्टल के कमरे में अकेला था और उसने इसी अवसाद में फांसी लगा ली।  इसी के साथ एक और खबर थी की मेडिकल के जुड़ा के अध्यक्ष ने दो महीने पहले इसी कारण  की उसकी प्रेमिका की किसी और के साथ शादी हो गयी आत्महत्या की कोशिश की थी और वह अभी तक कोमा में है। वैसे भी आजकल आये दिन अखबार में युवा लड़कों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरें आम हो गयीं हैं।ये लड़के अवसाद की किस गंभीर स्थिति  में होंगे की उनके लिए उनके माता पिता भाई बहन परिवार जिम्मेदारी कोई चीज़ मायने नहीं रखती और वे इस तरह का आत्म घाती  कदम उठा लेते हैं। 

अगर इस बारे में गंभीरता से सोचा जाये तो हमारे यहाँ का पारिवारिक सामाजिक ढांचा इस स्थिति के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। हमारे यहाँ लड़कों को बहुत ज्यादा संवेदनशील न समझा जाता है न उनका संवेदनशील होना प्रशंशनीय बात मानी जाती है। बचप…

समझा जो होता

समझा जो होता 
मेरी विवशता और 
उलझनों को 
जाना जो होता 
मेरी सीमा और 
बंधनों को 
थमा जो होता 
मेरी ख्वाहिशों और
अरमानों को 
पाया जो होता 
मेरे मन की
गहराइयों को
सोचा जो होता
मेरी धडकनों और
सांसों को
महसूस जो होता
मेरे प्यार और
भावनाओं को
यूं चले न जाते
इक पुकार के इंतजार में
पलटकर देखते तो पाते
ठिठके पड़े शब्द
विवशताओं के उलझे धागे में फंसे।

कहानी

कहानी  चूल्हे पर चढ़ी खाली हांड़ी से  कुछ दाने पके चावल के  बच्चे को खिलाते  हुए  माँ का मन कसमसाया होगा  भूखे बच्चे को थपक सुलाते हुए  भरे पेट का एहसास कराने  कहानी में रोटी को  चाँद से भरमाया होगा। 
दिला दो नए कपडे माँ  बेटी की जिद पर  माँ को गुस्सा आया होगा  लगा दो चांटे उसे चुप कराया होगा  फटे आँचल से पोंछते आँसू  बिटिया को बहलाया होगा  कात रही है सूत बूढी माँ  तेरी फ्राक बनाने को  बेटी को सुलाते हुए ये  सपना उसके मन जगाया होगा। 
खिलौने,कपडे ,रोटी,मिठाई  झूले,गुब्बारे,दूध की मलाई  पूरे न हो सकें जो कभी  लेकिन बनें रहें उनके ख्यालों में  ताकि उन्हें पाने की आस में  बच्चे करते रहें कोशिशें  ऐसे ही किसी ख्याल ने  माँ के मन में  कहानी को उपजाया होगा। 

आँगन की मिट्टी

कुछ सीली नम सी
माँ  के हाथों के  कोमल स्पर्श  सी
बरसों देती रही सोंधी महक
जैसे घर में बसी माँ की खुशबू
माँ और आँगन की मिट्टी

जानती है 
जिनकी जगह न ले सके कोई और
लेकिन फिर भी रहती चुपचाप
अपने में गुम
शिव गौरा की मूर्ति से तुलसी विवाह तक
गुमनाम सी उपस्थित
एक आदत सी जीवन की
माँ और आँगन की मिट्टी

कभी खिलोनों में ढलती
कभी माथा सहलाती
छत पर फैली बेल पोसती
कभी नींद में सपने सजाती
कभी जीवन की धुरी कभी उपेक्षित
माँ और आँगन की मिट्टी

उड़ गए आँगन के पखेरू
बन गए नए नीड़
अब न रही जरूरी
बेकार, बंजर, बेमोल
फिंकवा दी गयी किसी और ठौर
माँ और आँगन की मिट्टी।