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Thursday, April 26, 2012

खुशियों का खज़ाना.

आज एक शादी में अपनी एक कलीग की बेटी से मिली. नाम सुनते ही वह पहचान गयी अरे आप वही है ना जो ब्लॉग लिखती है.में आपको पढ़ती हूँ .सच कहूँ अभी कुछ समय से लेखन से खास कर ब्लॉग लेखन से एक दूरी सी बन गयी थी.वैसे लेखन जारी है .आजकल कुछ कहानियों पर काम कर रही हूँ.सोचती हु उन्हें ही धारावाहिक के रूप में ब्लॉग पर डालूँ लेकिन खैर ये सब समय की बात है .आज सच में मन हुआ की कुछ लिखू.पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ .जब भी लेखन की एक विधा छोड़ दूसरे पर जाती हूँ पहली विधा कहीं पीछे छूट जाती है. बहुत दिनों से कोई संस्मरण लिखने की सोच रही थी लेकिन क्या ??
कल अलमारी जमाते हुए एक पुरानी डिब्बी खोल के देखी तो उसमे एक छल्ला निकला.उसे उंगली में डालते मन २५ साल पीछे पहुँच गया .ये छल्ला मेरी बुआ की बेटी का था.बस यूं ही बात करते करते उसकी उंगली से निकाल लिया ओर कह दिया मुझे बहुत पसंद है उसने भी कह दिया तो आप रख लो. जिस प्यार ओर अपनेपन से उसने दे दिया था उसे उतने ही प्यार ओर सम्हाल के साथ मैंने बरसों उंगली में डाले रखा. यहाँ तक की जब उतार कर रखा तब भी उसे अपने प्यार में लपेट कर रख दिया. कल उसे उंगली में डालते हुए मन भीग सा गया. हमने अपनी बहुत सारी बातें एक दूसरे से शेयर की हैं.एक दूसरे को लम्बे लम्बे पत्र लिखते थे जिसमे अपने मन की सारी बाते उंडेल देते थे.मुझे याद है वह हमेशा लिखती थी "ह्रदय की अंतरिम गहराइयों से प्यार"उस समय तो उसे कभी नहीं कहा लेकिनये शब्द सच ह्रदय की उसी गहराई में जाकर उसके प्यार का एहसास करवाते थे.

कभी  कभी चीज़ें छोटी होते हुए भी उनका असर बहुत गहरा होता है. ऐसे ही एक बहुत पुराने डब्बे में एक छोटे से लाल कागज़ में लिपटी रखी है शमी की दो पत्तियां जिन्हें हायड्रोजन पर oxaid में सुनहरा बनाया था .ये मेरी उस सहेली की प्यार की निशानी है जिसके साथ लगभग हर शाम गुजरती थी.बस साथ साथ कहीं घूमना ओर ढेर सारी बाते करना उस साल दशहरे पर में शहर के बाहर थी जब लौटी उसने कहा ये ले तेरा सोना कब से संभाल के रखा है .आजकल के बच्चे जो बाते समस या चाट पर करते है हम वो बाते रूबरू करते थे .उन बातों का असर देखते थे.ओर क्या कहना है क्या नहीं ये सीख जाते थे.समस की बातों से बाते तो होती है लेकिन उससे किसी की भावनाओ को समझने में उतनी मदद नहीं मिलती है ऐसा मुझे लगता है. 
जब में १० वीं में थी मेरे छोटे भाई ने मुझे एक पेन गिफ्ट किया था .सालों लिखते लिखते उसकी निब घिस कर इतनी चिकनी हो गयी थी ओर उससे राइटिंग बहुत बढ़िया आती थी. कई बरसों वह पेन मेरे पास रहा फिर जाने कहाँ गुम हो गया. लेकिन अभी भी जब एक पेन लेने की सोचती हूँ ओर दुकान पर देखती हूँ हर पेन में वही ग्रिप ओर वही स्मूथ्नेस ढूंढती हूँ लेकिन नहीं मिलती तो पेन छोड़ कर बाहर आ जाती हूँ. लेकिन वह पेन मन से नहीं निकल पता ओर उसकी याद पर किसी ओर पेन को हावी नहीं होने देना चाहती. 
ऐसा ही एक तोहफा दिया था पति देव ने. शादी के बाद के वो दिन जब जेब खाली थी एक दिन ऐसे ही कह दिया था मैंने, मेरे पास नेल कटर नहीं है .पता नहीं कैसे जबकि मुझे पता था की एक एक पैसा हिसाब से खर्च करना जरूरी है एक शाम घर लौटते मेरे हाथ पर नेल कटर रख दिया था उन्होंने. कहने को जरूरत की एक छोटी सी चीज़ लेकिन कैसे किया होगा नहीं जानती.आज वो नेल कटर काम नहीं करता लेकिन अगर अपनी तय जगह से जरा इधर उधर हो जाये तो ऐसा लगता है मानों सब कुछ खो गया. इसके बाद अनगिनत उपहार उन्होंने दिए लेकिन वह एक नेल कटर आज भी हाथ में आते मन को भिगो देता है .

ऐसे ही कुछ उपहार बहुत भावनात्मक होते है जो ऐसे संभाल के नहीं रखे जाते लेकिन उनका एहसास कभी मरता नहीं. फिर वो चाहे पहली बार हाथों में हाथ लेना हो या फिर चेहरे पर आये बालों को पीछे कर माथे पर प्यार की मोहर अंकित करना एक छोटा सा हग हो या प्यार भरी पहली नज़र.
जिंदगी की आपाधापी में जब आप थक जाये या सब होते हुए भी मन कहीं उदासी की गलियों में पहुँच जाये एक छोटा सा छल्ला ,एक साड़ी पिन ,किसी के कहे कोई शब्द कोई स्पर्श घर का कोई एक खास कोना या मन के किसी खास कोने में जमा बहुत खास पल ,आपको उन उदासी की गलियों से खींच कर बाहर ले आते है ओर खुशियों की गलियों में मुस्कुराने को विवश कर देते हैं. 

खुशियों का खज़ाना. 

Thursday, April 12, 2012

आफरीन



में आई इस जहाँ में 
बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के 
अपनी जिजीविषा के दम पर 

सहा तुम्हारा हर जुल्म निशब्द 
पर तोड़ नहीं पाए तुम मुझे 
ये तुम्हारी हार थी.

अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम 
हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर 
दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो 
बल तुम्हारे पौरुष को 

माँ के आंसुओं ने विवश किया मुझे 
ओर में कर बैठी विद्रोह 
की क्यों दूं में अपनी मुस्कान तुम्हे 
क्यों रोशन करूँ तुम्हारी जिंदगी 
जो ना कम हो सकी सदियों में 
क्या इससे कम होगी तुम्हारी दरिंदगी 

में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे 
धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को 
मेरे जाने के बाद 
शायद तुम महसूस कर सको 
कितने आदिम हो तुम 

ओर रखो हमेशा याद 
आई थी में अपने दम पर ओर 
जा रही हूँ अपनी इच्छा से 
तुम जीवित रहोगे जब तक 
मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी 
पर में तुम्हारी नहीं 
अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ 
ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू 
बेहतरीन तोहफे की तरह .


दोस्ती


  आजकल इंडियन आइडल का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक कालेज का लड़का खुद शर्त लगा कर हारता है किसी ओर लडके की आर्थिक मदद के लिए. वैसे तो टी वी पर कई विज्ञापन रोज़ ही आते है लेकिन कुछ विज्ञापन दिल को छू जाते है.खास कर दोस्ती वाले विज्ञापन.अभी कुछ दिनों पहले एक मोबाईल कम्पनी का जिंगल हर एक फ्रेंड जरूरी होता है सबकी जुबान पर था. 
दोस्ती दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है एक ऐसा रिश्ता जिसमे एक दोस्त दूसरे दोस्त की भावनाओ को, मन की बातों को बिना कहे जान लेता है. जब दोस्त कहे मुझे अकेला छोड़ दो तब उसके कंधे से कन्धा मिला कर खड़ा हो जाता है.ओर जब दोस्त कहे सब ठीक है तब बता ना क्या बात है पूछ पूछ कर सब उगलवा लेता है.
 जब भी इस विज्ञापन को देखती हूँ मन २३ साल पीछे अपने कोलेज की लैब में पहुँच जाता है जब फ्री पीरियड में हम समोसे खाने का प्रोग्राम बनाते थे अब उस समय कोई भी इतना धन्ना सेठ तो था नहीं की सिर्फ अपनी अकेले की जेब से सबको खिला सके .इसलिए पैसे इकठ्ठे होते थे.हमारा एक साथी हमेशा दो लोगो के पैसे मिलता था एक खुद के ओर दुसरे उसके दोस्त जग्गू के .मजे की बात ये थी की हम में से कोई भी जग्गू से पैसे नहीं मांगता था.ओर विपिन के अलावा जग्गू के पैसे देने का किसी ओर को जैसे कोई अधिकार भी नहीं था.जग्गू के पिताजी नहीं थे वह अपनी माँ के साथ रहता था.गाँव में शायद कुछ खेती बारी थी.लेकिन कमाई का कोई ओर जरिया क्या था किसी को नहीं मालूम था. वैसे भी सब कुछ जैसे पहले से तय था.ओर सब इतनी सहजता से होता था की ना हममे से किसी को कुछ कहना होता ना कुछ पूछना. 
लेकिन दोस्ती तो जग्गू ओर विपिन की थी इस तरह की कोई बात उनके बीच नहीं आती थी ओर वो हमेशा बहुत सामान्य रहते थे. ना कभी जग्गू इसके कारण संकोच में रहता ना विपिन में  कोई गर्व की अनुभूति दिखाती.एक गहरी समझ दोनों के बीच थी. 
एक बार हमसे रहा ना गया.उस दिन जग्गू शायद कालेज नहीं आया था .हमने विपिन से पूछा तुम हमेशा जग्गू के लिए इतना करते हो तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आते है.ओर वह जोर से हंसा मुझे पता है मेरे पेड़ पर कितने पैसे लगते है बस उतने ही तोड़ता हूँ. 
आज इतने सालों बाद साथ पढ़ने वाले अधिकतर साथी कहीं गुम हो गए हैं लेकिन जग्गू ओर विपिन की वह दोस्ती आज भी मन के किसी कोने में शीतल बयार जैसी है.दोस्ती की ऐसी निश्छल  भावना इतने सालों बाद भी अब तक याद है.आज ये विज्ञापन देख कर उस दोस्ती की याद आ गयी..  

Tuesday, April 10, 2012

मुस्कान से मुस्कान तक

गुलाब की पंखुरियों से होंठों पर
नन्ही किरण सी वह मुस्कान 
आई थी जन्म के साथ 
जन्म भर साथ रहने को.

अपनी मासूमियत के साथ 
बढ़ती रही वह मुस्कान 
पल पल खिलखिलाते इठलाती रही 
होंठों से आँखों तक 
ओर पहुंचती रही दिल तक.

समय के उतार चढ़ावों में 
सिमटती रही करती रही संघर्ष 
किसी तरह बचाने अपना अस्तित्व 

उम्र के तमाम पड़ावों पर 
यूं तो कभी ना छोड़ा साथ 
लेकिन भूली बिसरी किसी सखी ने 
याद किया कुछ इस तरह 
'वह 'जो बहुत हंसती थी 
अब वही चहरे ओर नाम के साथ 
पहचान नहीं आती. 

 पोपले मुंह ओर बिसरती याददाश्त के साथ 
फिर आ बैठी है अपने पुराने ठिकाने पर 
अपने उसी मासूमियत को पाने में 
तमाम उम्र गंवाकर. 

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