Posts

Showing posts from February, 2011

विद्या दीदी

Image
विद्या दीदी हाँ यही तो नाम है कही किसी रिश्ते से दीदी लगती है है उम्र में मुझसे बहुत बड़ी शायद मेरी मम्मी की उम्र से कुछेक ही साल छोटी. रौबदार चेहरा माथे पर बड़ी सी बिंदिया गरजदार आवाज़ ,जब भी अपने मायके आती थी भाभियाँ सेवा में लगी रहती थी. हर काम सलीके से होना चाहिए,किसी काम में कोई कोताहि देखी और डपट दिया फिर वो भाई हो या भतीजा फिर भाभियों की तो कौन कहे. दो बेटियों और दो बेटों का भरा पूरा परिवार ,जीजाजी भी उनके आगे पीछे ही घूमते थे . यों तो वो बेटियों पर जान छिड़कती थी ,पर नियम कायदे ,रीति रिवाज़ सबके लिए एक सामान थे. बेटियां बड़ी हो गयी तो अच्छे घर वर देख कर शादी कर दी,पर हाँ परिवार सबके भरे पूरे थे. उनके यहाँ भी हर तीज त्यौहार समारोह पर रिवाज के अनुसार आना जाना व्यव्हार करना ,कुल मिला कर बहुत परम्परावादी है विद्या दीदी. बेटियों के बाद बेटों की बारी आयी शादी की बहुत सोच समझ कर सुंदर सुघड़ बहू धुन्धी दीदी ने जब भी मिलती करीने से सर ढके , सारे सुहाग संस्कार सजाये , हमारे जाते ही दीदी की आँख का इशारा होता और वह पैर छूने झुक जाती ,बैठ कर पैर छुओ ये क्या ऊँटो…

कुकून

Image
इस नयी सड़क पर आज पहली बार आया हूँ। शहर से दूर दोनों और पेड़ों से आच्छादित शांत सी सड़क। बिना ट्राफिक के ....गाड़ी चलने का मजा तो यहाँ है। अब अगले ३-४ दिन रोज़ यहाँ आना है । रास्ते में चार स्कूली बच्चे पीठ पर बैग लटकाए अपनी बातों में मशगूल चले जा रहे थे। अपने स्कूल के दिन याद आ गए। पता नहीं कितनी दूर है इनका स्कूल ?क्या करू इन्हें लिफ्ट दे दूं। नहीं नया रास्ता नए लोग ,फिर पता नहीं कितनी दूर हो? में बगल से आगे बढ़ गया।
अगagale ले दिन फिर वही बच्चे मिले ,पलट कर गाड़ी को देखा भी नहीं में लिफ्ट दूं न दूं की उहापोह में आगे बढ़ गया।
पापा, पता है तितली के बच्चे जब कुकून से निकलते है तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। पर अगर कोई उनकी मदद कर के कुकून को तोड़ दे और उन्हें बाहर निकाल दे तो वो जी नहीं पाते उनके पंख कमजोर रह जाते है बेटे ने बताया।
आज फिर वही बच्चे मिले अपनी धुन में मशगूल मैंने उन्हें लिफ्ट देने का नहीं सोचा ,में कुकून तोड़ने में मदद कर उन तितलियों के पंख कमजोर नहीं करना चाहता ।

अरे मैडम.....

कहते है जिंदगी हर कदम पर कुछ न कुछ सिखाती है,और ये पाठ हमें अपनी या दूसरों द्वारा किये गए भूलों ,कामों से तो मिलती ही है जीवन में मिलने वाले लोगो के सानिध्ध्य से भी मिलती है। अपने शैक्षणिक जॉब के दौरान सबसे ज्यादा सानिध्ध्य तो बच्चों का ही रहता है और बच्चे बहुत अच्छे शिक्षक होते है बस जरूरत है उनके काम, व्यवहार, बातों को उस सकारात्मक नज़रिए से देखने की।

कुछ ही दिन पहले की बात है। दोपहर भोजन के दौरान क्लास ५ की कुछ लड़कियों को रोते हुए देखा। कारण पूछने पर पता लगा उनकी क्लास की ही किसी लड़की से लड़ाई हो गयी है ,उसने कुछ कहा है और इस वजह से एक दो नहीं पूरी ५ लड़किया हिलक हिलक कर रो रही है। अब एक लड़की लड़ाई में ५-५ लड़कियों को रुला दे तो पहला ख्याल मन में आता है ,जरूर उसने कुछ किया ही होगा...खैर उन लड़कियों को किसी तरह चुप करवा कर खाना खिलाया और में बात करूंगी इस बात का आश्वासन दिया ।

खाने के बाद उस लड़की को देखा तो अपने पास बुलाया...अभी हम उसे दिव्या कहे? इससे बात करने में आसानी होगी। खैर मैंने पूछा दिव्या क्या हुआ?
मैडम कुछ नहीं ,उसने भोले पन   से जवाब दिया ।
firनीसारी सारी साऱी  लड़किया…

सिलसिला

हम हंस हंस के भुलाते गए उनकी ख़ताओं को
और उन्होंने हमें ही कसूरवार ठहरा दिया.....
ख़ताओं का इल्जाम ही क्या कम न था
जो सरे आम हमें रुसवा किया।
जो तुम को हो सुकून तो हम क्या गिला करे
आओ फिर ख़ताओं का सिलसिला शुरू करे....

सजा

खता जो तुमने की,
सजा क्यूँ हमको दी...
चुप से सह लेते हम सजा भी।
फिर क्यूं तुमने शिकायत की ,
सह लेंगे सभी शिकवे भी
पर जो सजा तुमने खुद को दी
सह न सकेंगे ........