Wednesday, April 20, 2011

एतबार

अब जान कर भी कहाँ जान पाते हैं लोग?

हर मोड़ पर नए रूप में नज़र आते हैं लोग.


थामा जो तूने हाथ तो दिल को संबल मिला.

पर तूफ़ान में हाथ छोड़ दिया कैसा दिया सिला?


सोचा था कदम बहके तो थाम लोगे तुम.

पर हमसे पहले ही तुम बहकने क्यों लगे?


तुमसे था अपने होने का गुरुर हमको

एतबार यूँ टूटा खुद पे भरोसा कैसे करें?

12 comments:

  1. बहुत बढ़िया ग़ज़ल... प्रेम और रिश्तों को बीच में रख कर लिखी गई ग़ज़ल अच्छी बन गई है..

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  2. सोचा था कदम बहके तो थाम लोगे तुम.

    पर हमसे पहले ही तुम बहकने क्यों लगे?
    ab kispe bharosa karen hum

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  3. ग़ज़ल अच्छी लिखी गई है..

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  4. तुमसे था अपने होने का गुरुर हमको
    एतबार यूँ टूटा खुद पे भरोसा कैसे करें?

    उम्दा गज़ल ओर एक से बढकर एक शेर. बहुत बहुत बधाई.

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  5. तुमसे था अपने होने का गुरुर हमको
    एतबार यूँ टूटा खुद पे भरोसा कैसे करें?

    बहुत खूब कहा है इन पंक्तियों में ... ।

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  6. kavita ji
    bahut hi lazwaab gazal
    sach jab kisi par pura bharosa ho aur vahi dil tod de to iska dard jiska dil tuta ho vahi bakhoobi samajh sakta hai.
    bahut hi badhiya prastuti ke liye hardik badhai
    poonam

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  7. सोचा था कदम बहके तो थाम लोगे तुम.
    पर हमसे पहले ही तुम बहकने क्यों लगे?
    तुमसे था अपने होने का गुरुर हमको
    एतबार यूँ टूटा खुद पे भरोसा कैसे करें?
    सुन्दर कविता..हकीकत को दर्शाया है आपने!
    आज गुड फ्राई डे के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं आपको !!

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  8. dil ko chhu leti hai ye gajal... ek ek labjh me dard mahsus hota hai.

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  9. dil ko chhu leti hai ye gajal... ek ek labjh me dard mahsus hota hai.

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  10. dil ko chhu leti hai ye gajal... ek ek labjh me dard mahsus hota hai.

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