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समंदर के किनारे

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समंदर के किनारे
एक आदमी को
चलते हुए रेत पर
मिल गयी एक सीपी
उठाया उसे
सहलाया उसे
अपने पास रखने को
साफ करने रेत कण
लहरों में डुबाया उसे
थाम न सका
लहरों के वेग में
छूट गयी हाथ से
गुम हो गयी
विस्तार में
अचकचा कर
देखा अपनी
खाली हथेलियों को
कुछ दूसरी सीपियाँ
उठाते हुए
अपनी को
पहचानने की कोशिश
न पा सका
और चल दिया
अपनी राह
छोड़ कर उसे वही

समंदर के किनारे
एक लड़की,
रेट पर पड़ा एक शंख
आकर्षित हो उस और
देखा संकोच से चहु और
हौले से उठाया उसे,
कानों से लगा
सुनी उसकी आवाज़
जो उतर गयी दिल तक
तभी एक लहर ने
खींच ली रेत
पैरों के नीचे से
छूट गया शंख
हाथ से
विलीन हो गया
अथाह समुन्द्र में
वह लड़की
अपनी खाली हथेलियाँ
देखती रही
मसलती रही
पर लहरों के बीच से
न उठा सकी
कोई और शंख

बरसों बाद
वह आदमी
चला जा रहा है
समुंदर की लहरों
और रेत को
रौंदता
बिना परवाह किये
इस बात की
कितनी ही सीपियों
पर छोड़ चूका है
वह अपने
क़दमों के निशान

बरसों बाद
वह लड़की
जो बन गयी है
औरत
समंदर के किनारे
लहरों के बीच
रेत पर
ढूंढ रही है
उसकी आँखे
वही शंख
और
मसलती जा रही है
अपनी खाली हथेलियाँ
आज भी।

उसके जाने के बाद.....

सूरज की चमक हो गयी फीकी,
पंछियों ने चहकना छोड़ दिया,
अधखुली अँखियाँ जो देखती थी
हथेलियों पर उसका नाम,
सिर्फ लकीरें नज़र आती है अब
उसके जाने के बाद...

दिन भर की गहमागहमी में ,
हसरत थी एक आहट की,
एक सन्देश जो लाता था ,
उमंगें ,गुनगुनी सी शरारतें,मुस्कुराहटें,
अब मोबाइल ने चुप्पी साध ली ,
उसके जाने के बाद.....

शाम होते ही वो मिलने की ललक
सुबह से होने लगे इंतजार शाम का
कब शाम गहराकर हो गयी रात
और भीगता रहा तकिया,
अगली स्याह सुबह तक,
उसके जाने के बाद.....


उसने कहा खुश रहो,
मैंने माना उसका हर कहा,
मुस्कुराह्ते बदल गयीं है खिलखिलाहटों में
कुछ गम सिर्फ मुस्कुराने से नहीं छुपते

प्रतिध्वनि

पहाड़ों से टकराकर
हर आवाज़ लौट
आती है ,
कितनी ही आवाजें
हो गयी है
गुम ,
मेरी आवाज़ ही
पहुंची नहीं
पहाड़ों तक ,

या पहाड़ ही
अब पत्थर
हो गए है?

ये सन्निकटता बनी रहे.....

आज जो अनोखी घटना हुई मेरे साथ उसने न सिर्फ मन को हिला दिया लेकिन एक अनूठी संतुष्टि का भाव भी दे गया...
स्कूल से आ कर अखबार पढ़ रही थी की एक खबर पर नज़र पड़ी पाकिस्तान में आत्मघाती बम विस्फोट से ५० लोगो की जाने गयी...
ऊंह वहां तो ये होता ही रहता है,मन में उठे ये भाव हतप्रभ करने वाले थे एक क्षण को ठिठकी,ये क्या सोचा ?क्यों सोचा?मरने वाले किसी के भाई बंद थे ,पर न जाने किस रो में पन्ना पलट दिया।
थोड़ी ही देर बाद किचन में काम करते हुए वहां कोने में रखी एक बंद पड़ी ट्यूब लाइट ,अचानक फिसल कर गिर पड़ी और धमाके की आवाज़ के साथ फूटे कांच की किरचे चेहरे को छूते हुए पूरे किचन में फ़ैल गयी । चेहरे पर लगी किरचे .......हाथ चेहरे पर जाते हुए अनायास ही मन कुछ मिनिटों पहले की अपनी सोच तक पहुँच गया ... वहां के लोग भी किसी के भाई बंद होते है ,किसी का परिवार,मरने का दर्द सबका एक सा होता है........
उस एक क्षण ने सारे एहसास एक साथ करा दिए....
बम धमाके में मरने वालों का दुःख,उनके परिवार के लिए संवेदना ,और इस सबसे बड़ा एक अलौकिक एहसास की ईश्वर मेरे बहुत करीब है.....मेरे मन के हर विचारों को पढ़ते हुए,गलत सोच के लिए तुरंत…