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Showing posts from November, 2009

"हेलो मर जाओगे"

कहते है इन्दौर दिल वालो का शहर है.यहाँ कि हवाओ मे अपनेपन की महक है.यहाँ  हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की चिन्ता करता है,उसके लिये फ़िक्रमन्द है.अब ये ही लीजिये ,एक बार मे डाक्टर को दिखाने के लिये समय लेने गयी.समय मेरी सुविधा के अनुसार नही मिल रहा था तो मे बाहर आ गयी .मेरे पीछे पीछे एक सज्जन जो वही बैठे सारी बाते सुन रहे थे आये और कहने लगे "भाभीजी आज डाक्टर साहब जो समय दे रहे है वही ले लीजिये फ़िर अगर आप आ सके तो ठीक है नही तो मत आइयेगा".अब बताइये बिना जान-पहचान के इतनी फ़िक्र करते हुए लोग इन्दौर के अलावा कही मिलेगे?और जब ऐसे लोगो से आपका सम्पर्क होता है तो दूसरो की फ़िक्र करना आप का भी फ़र्ज़ बन जाता है.पर कभी-कभी ये फ़िक्र और चिन्ता इतनी हावी हो जाती है कि कब चिन्ता गुस्से मे बदल जाती है,और कब गुस्सा झिड्की से अधिक कठोर होकर फ़ूट पडता है पता ही नही चलता.
इन्दौर का मालवा उत्सव बहुत प्रसिद्ध है.बात करीब ४-५ वर्ष पुरानी है.पतिदेव की बहुत इच्छा थी मालवा उत्सव देखने जाने की.वैसे तो मॆ अपनी शान्त सी कालोनी की सुहानी शाम छोड कर कही जाना, खास कर भागते ट्राफ़िक,क्रत्रिम रोशनी और शहर की …

विरासत

गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी ले लो -घी लेलो.
अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर बाहर झाँका ,तो हाथ में एक छोटी सी मटकी पकडे ,लहंगा पहने ,एक औरत को खड़े देखा.
बाई सा घी ले लो.चोखो घी है, हाँथ को बन्यो ,उसने कहा.
घी तो चाहिए ही नही ,इसलिए उसे टरकाने कि गरज से कहा, नही हम घी नही लेते घर पर ही बनाते है,अभी जाओ.
अरे बाई देखि लो घर को बन्यो चोखो घी है.पैसा कि जरूरत है काम आयेगो.
अब तक मेरा आलस छूट गया था इसलिए उस के बारे में और पता करने कि गरज से मैंने पूछा कहाँ से आयी हो?
राजस्थान से आयी हूँ बाई .यहाँ ढोर चराने आए है .एक बार घी देख लो ,चोखो लगे तो ले लीजो.
उसके सरल आग्रह को मैं इनकार न कर सकी और गर्म थपेड़ों कि परवाह न करते हुए दरवाजा खोल के बाहर आ गयी.मटकी में देखा करीब एक किलो घी होगा .कितने का है ?नही लेना था फिर भी पूछा .
एक सेर है पचास और दस रूपया दे दीजो। 
अब चौकाने कि बारी मेरी थी एक किलो घी आधा किलो कि कीमत में ? पर ये त…

छुट्टी

एल टी सी लेने का समय दिसम्बर तक ही है.अभी कहीं  नही गए तो निरस्त हो जायेगी,पति ने कहा तो वो सोच में में पड़ गयी.पिछले तीन सालों से कहीं घूमने नही जा पाए,क्या करे क्या न करे.जाने में घर की व्यवस्था करने में कोई दिक्कत नही है पर छुट्टी लेना बहुत मुश्किल काम है.फिर भी अब सोच लिया अभी समय ठीक है बच्चों की एक्साम भी नही है,ऑफिस में भी ज्यादा लोड नही है,६-७ दिन तो निकाले  जा सकते है,रिजर्वेशन भी इत्तफाक से मिल गया.उसने लीव ऍप्लिकेशन भरी कारण क्या लिखूं सोचते सोचते भी उसने सही लिखा,गोवा घूमने जा रहे है .
सुनते ही बॉस की भ्रुकती  तन गयी भी ये कोई समय है,आप को सोच समझ कर प्रोग्राम बनाना चाहिए आदी आदी.
उसने कहा भी मैंने पिछले तीन महीनों से कोई छुट्टी नही ली है पिछले दो सालों से सी एल इनकैश करवा रही हूँ ,यहाँ तक की बीमार होने पर भी कभी छुट्टी नही ली .पर बॉस ने साइन नही किया तो नही किया,थोडी बहस भी हुई आख़िर शर्त रखी गयी की इन छुट्टियों में आपका काम कौन और कैसे सम्हालेगा इसकी रूपरेखा बना कर जाइये,ठीक है ये भी सही सोच कर उसने हाँ कर दी.
इस बारे में पतिदेव को बताया तो बोले तुमने कहा क्यों की गोवा घूमन…

तसल्ली

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अरे बेटा यहाँ आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी  ने मिनी को अपनी गोद मे खींच  लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बांधेगी  मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इंतजार  था.


"बेटी हुई है" नर्स ने कहा,तो मांजी  का चेहरा बुझ गया.नेहा से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनके हाव-भाव ने काफी कुछ कह दिया. मिनी से उनका बात करना बन्द हो गया. नेहा अनजाने ही अपराधबोध से ग्रस्त हो गयी.विनय ने भी तो कुछ नही कहा,बस चुपचाप उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते रहे.मांजी  की चुप्पी देखकर विनय की चुप्पी तुड्वाने का उसका साह्स नही हुआ.
अस्पताल से घर आकर दरवाजे पर ठिठकी कि शायद मांजी  घर की लक्ष्मी की आरती उतारे,पर घर मे पसरी निशब्दता देखकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गयी.
मिनी छोटी बहन के आने से अचानक बडी हो गयी. उसने अपने आप को गुड़ियों के संसार  मे गुम कर दिया,वहां बोझिलता कम थी.
विनय आजकल अपने काम मे ज्यादा ही व्यस्त थे, उनसे बात करने का समय ही नही मिलता था.घरवालो की खामोशी ने उसके दिल-दिमाग को अजीब सी बॆचेनी…

एक सुबह

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रविवार की सुबह, हलकी गुलाबी ठण्ड एक बार तो सोचा एक झपकी और ले लूँ .लेकिन रविवार की सुबह जैसी सुकूनदाई सुबह नही होती ये सोच कर सारा आलस रजाई के साथ झटक के दूर फेंका और उठ खड़ी हुई.खिड़की से झाँका तो नव आदित्य को भी कुहासे के लिहाफ को परे खसका कर उठते देखा .मुझे देखते ही उसनेआँखे मिचका कर गुलाबी किरणों की मुस्कान मुझ पर फेंकी,और जैसे अपने साथ अठखेलियाँ करने का आमंत्रण दिया। अब भला इस आमंत्रण को मैं कैसे ठुकराती,धीरे से दरवाजा खोला और बहार आयी तब मुझे इस मुस्कराहट का राज़ समझ में आया.शरद ऋतू में ठंडी बयार की पिचकारी लेकर वो जैसे मेरे स्वागत में ही खड़ा था.बाहर आते ही सारोबार कर दिया.पर अब भीतर भागने से भी क्या होता,वैसे भी पीठ दिखाना मुझे पसंद नही है.मैंने भी सोचा ठीक है आज तुम ही खुश हो लो.मेरा हाल देख कर अब तक बाल भानु अट्टहास कर उठा .और उसकी हँसी तरुण कोपलोंपर मोतियों की तरह बिखर गयी. इतने सारे मोती कैसे चुनु,सोच ही रही थी कि चुनमुन गिलहरी ने चू चू कर मेरा धयान खीचा.मेरे ही किचेन कि तान पर घर बनाया है और मुझे ही आँख दिखाती है,पर फिर सोचा इसने कहाँ मैंने ही इसके आजाद परिवेश पर कब्जा कर …