Wednesday, April 27, 2016

'बन रही है नई दुनिया ' ( पुस्तक समीक्षा )



अमरजीत कौंके का कविता संग्रह 'बन रही है नई दुनिया ' कुछ दिनों पहले ही मिला जिसे व्यस्तता के चलते पढ़ नहीं पाई पर जब एक बार पढ़ने बैठी तो छोड़ते ही नहीं बना।  संग्रह की पहली आकर्षित करने वाली पंक्ति  ' मुहब्बत के उस एहसास के लिए जो जीवन की स्याह अँधेरी रातों में किसी जुगनू की तरह टिमटिमाता है ' इतनी रोचक और भावपूर्ण है कि आप उसके भीने एहसास में डूबते चले जाते हैं। 

शुरूआती कविताओं में ही अमरजीत जी की विराट सोच विराट ह्रदय की झलक मिल जाती है।  उनकी कवितायेँ अपने प्रेम को धरती पहाड़ नदी जंगल से परे सूरज चाँद से लेकर अंतरिक्ष ब्रम्हांड तक ले जाती है और प्रेम को उसकी विशालता में महसूस करती हैं।  

अपने आसपास के परिवेश को कवि ने शिद्दत से महसूस किया और जिया है फिर चाहे वह बस का सफर हो वैक्यूम क्लीनर से घर की सफाई , चादर की धुलाई पत्थर पक्षी या तितली।  कवि की कलम हर विषय पर पूरे अधिकार से चली है और उन्हें सार्थक अर्थ प्रदान करती है। 

बानगी देखिये , कहता हूँ खींच लो / वैक्यूम क्लीनर के साथ / मेरे दिमाग में फंसी/ यादों की मकड़ियाँ / बुनती रहती हैं जाले हमेशा / उलझा रहता है मन। 

गरीब मजदूर हालात के मारे इंसानों का सूक्ष्म निरिक्षण करती कई कवितायेँ कवि की गहन संवेदनशील दृष्टी का परिचय देती हैं। अस्पताल, नई दुनिया के आलीशान निर्माण , महल दुमहलों में होने वाले वर्ग विशेष के कार्यकलाप कवि की वक्र दृष्टी से बच नहीं सके हैं। 

प्रेम के सतहीपन या सम्पूर्ण  की ललक को व्यक्त करती खूबसूरत कविता है 'अनछुए होंठ ' जो दो जिस्मों के संबंधों के अनदेखे अनछुए अधूरेपन को व्यक्त करती है।  

धर्म के नाम पर फैली अराजकता दंगे आगजनी से आम आदमी मजदूर वर्ग औरतें बुजुर्ग बच्चे किस तरह शिकार होते सहम जाते हैं और इन सबके पीछे बड़ी ताकतें किस तरह अपनी सफलता पर अट्टहास करते हैं ये कविताओं में तीखे तेवर के साथ मौजूद है। 

इंसान के अंदर छुपा हैवान जंगली जानवर जो समय समय पर मुखौटा उतार अपने असली रूप में आ जाता है और मानवता को शर्मसार करता है।  इस मुखौटे वाले इंसान से व्यथित कवि ने अपनी पीड़ा भावुक शब्दों में उंडेली है। 

मानव की विनाश लीला आतंकवाद से निरीह पशु पक्षी जीव जंतु किस तरह प्रभावित होते हैं इसे महसूस करने वाला कोमल मन उनकी स्थिति को देखता महसूसता और शब्दों में उतरता है। 

कविताओं में एक भावुक प्रेमी के दर्शन होते हैं जो अपने सहचर के मोह में जीने को आतुर है उसके मन मरुस्थल में प्रेम के पुष्प उग आये हैं। 
बानगी देखिये 
मोह की कुछेक बूंदे क्या गिरीं / कि मेरे कण कण में / फिर प्यास जग गई / जीने की प्यास/ अपने भीतर से/ कुछ उगाने की प्यास। 

लेकिन कवि यथार्थ से मुँह नहीं मोड़ता वह जानता है भावुक प्रेमी का प्रेम छिन जाने पर भी जीवन गति नहीं थमती बस एक 'दाग ' रह जाता है। 
काश मुझे पकड़ने का नहीं/ त्यागने का ढंग आता/ इस तरह ही शायद / मैं तुम्हारी याद को / छल पाता। 

कहीं कहीं किसी कालखण्ड में नैराश्य भाव भी उपजा है जिसमे प्रेम से बिछड़े टूटे मन के दर्शन होते हैं। 

कुछ नहीं होगा ', ' क्यों लगता है ', 'तुमने तो ' स्त्री पुरुष मन की मजबूत थाह है। इन  कविताओं  की हर पंक्ति मन पर अपना अक्स छोड़ जाती है। प्रेम के उतार चढाव विश्वास अविश्वास को व्यक्त करती ये कविताएं अथाह प्रेम में अविश्वास की लहरों के थपेड़ों से मन को हिला देती हैं। 
बानगी देखिये 
उसकी आँखों में / उन युद्धों की तस्वीर झलकती थी / वहाँ मेरा अक्स तो / कहीं भी नहीं था। 

लेकिन / कभी महसूस करके देखना / कि सब कुछ होने के बावजूद / कुछ नहीं होगा हमारे पास / अपने सच्चे दिनों की/ मोहब्बत जैसा। 

मैं कहता / दिन तारीखों की/ याद तुम्हीं रख लो / मेरे भीतर तो बस / मिलन के उन पलों का / एहसास ही / महकता रहने दो।  

कुछ कविताएं काफी लम्बी हैं जिन्हे खण्डों में बाँटा गया है जिससे भाव भिन्नता की पहचान आसान हुई है।  पढ़ते हुए जब आप रुक कर इसे महसूसते हैं तो ये खण्ड आपकी मदद करते हैं। पूरा संग्रह अपने आसपास की इतनी बातों को समेटे हुए है कि अमरजीत जी की संवेदन शीलता पर हैरानी होती है। कविताओं में कहीं कहीं आंचलिक शब्द माटी की सोंधी गंध से दिल दिमाग में समा जाते हैं।

इस पर भी कवि आपको निर्णय का हक़ देता है कि उनकी कविताओं का मूल्यांकन किया जाये और उनकी सार्थकता होने पर ही उन्हें संचित किया जाये। ये आत्मविश्वास कितने कवियों में होता है।  कुल मिला कर अमरजीत कौंके जी का ये कविता संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है। 

कविता वर्मा 
बन रही है नई दुनिया 
बोधि प्रकाशन जयपुर 
मूल्य 100 रुपये 







1 comment:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-04-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2326 में दिया जाएगा
    धन्यवाद 

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