Wednesday, March 9, 2016

क्या सच में है समानता

क्या सच में है समानता


पिछले चार पाँच दिन से लगभग रोज़ ही महिला दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों में जाना हो रहा है।  किसी होटल के ए सी हॉल में बढ़िया चाय नाश्ते के साथ सशक्त महिलाएं महिला सशक्तिकरण की बातें कर रही हैं।  हालाँकि कुछ वक्ताओं ने कुछ नए विचार भी दिए जिनसे निश्चित ही नया नजरिया विकसित हुआ। हर कार्यक्रम के साथ एक कसक भी रही कि ऐसे विचार उन महिलाओं तक पहुँचना चाहिए जो अभी भी आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पाई हैं वे इनसे प्रेरणा ले सकती हैं।  

आज बेटी से बात हुई उसने बताया उसकी कंपनी में सभी महिला कर्मचारियों (अधिकांश लड़कियाँ हैं ) की एक मीटिंग बुलाई गई थी और उनसे अपने साथ होने वाले व्यवहार के बारे में बोलने को कहा गया। प्रोग्राम का थीम था pledge for  parity समानता की शपथ।  अधिकांश लड़कियों ने अपने परिवार में उन्हें मिले सहयोग और समानता की बात कही कुछ ने अपने संघर्ष की बात भी बताई पर कंपनी में होने वाले भेदभाव की बात किसी ने नहीं की।  जब मेरी बेटी के बोलने की बारी आई तब उसने कुछ यूँ कहा।  

* सर अभी सभी ने घर में मिले सपोर्ट समानता की बात कही लेकिन कंपनी में होने वाले भेदभाव के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।  मैं बताना चाहती हूँ की प्लांट में हमें इंजीनियर नहीं बल्कि लड़कियाँ समझा जाता है।  जब भी किसी सीनियर का फ़ोन आता है और  हम फ़ोन उठाते है सबसे पहले पूछा जाता है कोई मेल इंजीनियर है क्या वहाँ उससे बात करवाइये।  अगर वहाँ मेल इंजीनियर न हो तो फ़ोन रख दिया जाता है हमसे बात नहीं की जाती।  मुझे कंपनी ने इंजीनियर के रूप में अपॉइंट किया है किसी लड़की के रूप में नहीं। 

* जब शॉप फ्लोर पर काम करना होता है तो हमारे कलीग इंजीनियर हमें मना करते हैं कि तुम लड़की हो तुम रहने दो।  क्यों रहने दो लड़की होने से क्या फर्क पड़ता है  मैं यहाँ काम करने और सीखने आई हूँ लड़की होने के कारण मुझे मौके नहीं दिए जाते ये मुझे मंजूर नहीं है।  

* कंपनी की पॉलिसी है कि लड़कियों को नाइट शिफ्ट नहीं दी जाती हम तो नाइट शिफ्ट में भी पूरा काम कर सकते हैं पर इस वजह से हमें हमारे डे शिफ्ट में किये गए काम को कम करके आँका जाता है। 

* एक भ्रम ये भी है कि लड़कियों को ज्यादा सहानुभूति मिलती है उन्हें जब चाहे छुट्टी दे दी जाती है पर ऐसा नहीं है हम भी अपने ब्रेकिंग पॉइंट तक काम करते हैं प्लांट में मेन पावर की कमी को देखते हुए छुट्टी लेना टालते हैं वो कोई नोटिस नहीं करता।इन सब के बाद भी हमारी हेल्थ सबसे ऊपर है और जब हमें आराम की जरूरत होगी हम छुट्टी लेंगे। 

*हमसे यहाँ लड़कियों वाले काम करवाये जाते हैं।  अगर मैं शिफ्ट में नहीं हूँ और किसी को कोई रजिस्टर या कोई टूल चाहिए तो वह खुद ढूंढने के बजाय फ़ोन करके पूछता है फलानि चीज़ कहाँ रखी है ? ऑफिस में दो अलमारियाँ हैं जिसमे सारा सामान होता है लडके खुद से नहीं निकाल सकते ? जब मेरा ऑफ है या मैं ड्यूटी पर नहीं हूँ तब सामान का पता बताने के लिए मुझे डिस्टर्ब क्यों किया जाता है ? मैं यहाँ इंजीनियर हूँ इन लड़कों की माँ नहीं जो हर चीज़ उन्हें हाथ में दूँ। 

* सर मैं यही कहना चाहती हूँ की हमें अपने घर परिवार में समानता का माहौल मिला है।  हमारे परिवार को पता है हम सब कर सकते हैं हमें भी पता है हम सब कर सकते हैं लड़कों के बराबर और उनसे ज्यादा ही कर सकते हैं पर ये बात लड़कों को नहीं पता है।  आप ये महिला दिवस और pledge of parity उनके साथ मनाइये।  उन्हें बताइये की हम लड़कियाँ नहीं उन्ही के सामान इंजीनियर हैं। 

* सर इसी माहौल के कारण इस कंपनी में महिलाएं टॉप पर नहीं पहुँच पाती। 
इस पर सीनियर अधिकारी बोले क्यों क्यों हमारे बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में एक महिला हैं वो वहाँ तक पहुंची है तो तुम लोग भी पहुँच सकते हो। 
मेरी बेटी ने कहा सर सिर्फ एक महिला बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में है क्योंकि वह सरकार की पालिसी है की वहाँ एक महिला का होना जरूरी है।  इस बात पर सन्नाटा खिंच गया।  

* इसके बाद एक सीनियर ने मेरी बेटी से पूछा तुम कुछ भी कहने से डरती नहीं हो ना ? उसने जवाब दिया नहीं सर मेरी मम्मी ने मुझे सिखाया है जो गलत है उसे बोलो अगर नहीं बोलोगी तो लोग हमेशा तुम्हे दबाएंगे।  इसलिए मैं खुल कर बोलती हूँ और किसी से नहीं डरती। 

उसके बोलने के बाद एक और लड़की में हिम्मत आ गई और उसने कहा सर दो घंटे में ये मीटिंग ख़त्म हो जाएगी उसके बाद सब कुछ फिर वैसा ही होगा जैसा होता आया है आज इस मीटिंग से कुछ नहीं बदलने वाला है।  

ये है बड़ी बड़ी इंटरनेशनल कंपनी में लड़कियों की आज की स्थिति लेकिन कुछ साहसी लड़कियां pledge of parity के लिए बोल रही हैं खुल कर सामने आ रही हैं और सही मायने में महिला दिवस मना भी रही हैं और लोगों को मनाना सीखा भी रही हैं।  
मुझे गर्व है मेरी बेटी और उस जैसी सभी बेटियों पर।  
कविता वर्मा 








4 comments:

  1. निश्चित ही गर्व होना चाहिए बेटी पर ...सही समय पर और सही जगह पर चूक नहीं होनी चाहिए ..जो गलत है उसे सबके सामने रखने का साहस यदि कोई एक कर दे तो बाकी भी पीछे पीछे चले आते हैं ..इसलिए शुरुवात जरुरी है ..
    बिटियाँ को बधाई!

    ReplyDelete
  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मिट जायेंगे मिटाने वाले, ये हिन्दुस्तान है - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    ReplyDelete
  3. आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

    ReplyDelete
  4. A reality in most companies. But it feels good that girls are stepping up to voice their opinion. Change must happen from within...
    A very nice article Kavita-ji.

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती है।
सार्थक टिप्पणियों का सदा स्वागत रहेगा॥

दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी  "मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे...