Followers

Tuesday, September 18, 2012

यूं विलुप्त हो जाने देना...



http://lalitdotcom.blogspot.in/2012/09/blog-post_17.html?showComment=1347968550352#क८८६१५१९९४७९१३८६६१९०
ललित शर्मा जी का ये आलेख पढ़ कर आज एक घटना याद आ गयी.स्कूल में महिलाओं का पसंदीदा विषय होता है साड़ियाँ..हंसिये मत ये बहुत संजीदा विषय है और इसकी संजीदगी आपको ये घटना पढ़ कर समझ आएगी.
तो हुआ ये की मेरी एक साड़ी जिसमे बहुत ही खूब सूरत कढ़ाई थी उसका कपडा ख़राब हो गाया.लेकिन उसकी कढाई का कुछ नहीं बिगड़ा .इतना सुन्दर हाथ का काम उसे यूं ही फेंक देने की इच्छा ही नहीं हुई.कई साल तक उसे पेटी में रखे रही फिर एक आइडिया आया क्यों ना इसका काम किसी और साड़ी पर लगा कर इसे फिर नया कर दूं.बस फिर क्या था एक दो सहेलियों से इस बारे में सलाह  की और फिर उस के मेचिंग की साड़ी ढूँढने में लग गयी. जल्दी ही खोज पूरी हुई ओर उस पर काम शुरू हुआ.नया हो कर वह काम खिल उठा  और सबके आकर्षण का केंद्र भी बना.जो भी उसे देखता उस काम की साड़ी की तारीफ किये बिना नहीं रह पता और में भी गर्व से बताती की इसमें क्या समझदारी दिखाई है मैंने.
ऐसे ही एक दिन एक कलीग को जब अपनी कलाकारी बताई तो वह बोली ऐसी ही एक साड़ी मेरे पास भी है कश्मीरी कढ़ाई की . जो कम से कम ५० साल पुरानी है और उसका रेशमी कपडा अब सड चुका है लेकिन उसका कसीदाकारी का काम अब भी ज्यों का त्यों है .एक बार एक कश्मीरी साड़ी सूट बेचने वाले को मैंने वह साडी दिखाई जिससे उसके मेचिंग की कोई साड़ी ले कर उस पर वह काम करवा लूं .साड़ी हाथ में लेते ही वह बोला आप ये साड़ी मुझे दे दो में आपको इसके १०.००० रुपये दे दूंगा.१०,००० सुनते ही मैंने झट से उसके हाथ से वह साड़ी वापस ले ली और पूछा ऐसा क्यों??वह साड़ी बिलकुल गल चुकी थी.उसकी इतनी कीमत भरोसा ही नहीं हुआ.
तो वह बोला हाँ १०,००० क्योंकि ये कश्मीरी काम करने वाले पूरे कश्मीर में सिर्फ दो ही कारीगर थे जिनमे से एक की मृत्यु हो चुकी है और दूसरे इतने बुजुर्ग है की अब वो ये काम नहीं कर सकते है.
आप समझ सकते है कैसे एक बेहतरीन कला यूं ही विलुप्त हो गयी और क्यों उस कला के जानकारों ने इसे अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में नहीं दिया.संभव है उन्हें अपनी कारीगरी से वह संसाधन  नहीं मिले होंगे जिनकी उन्हें दरकार थी इसलिए उन्होंने उसे अगली पीढ़ी को सौप देने के बजाय यूं ही गुम हो जाने देना बेहतर समझा. 

Wednesday, September 12, 2012

सूखी रेत के निशान

उठ कर चल दिए
 मुझे छोड़ कर यूँ 
बिना अलविदा कहे 
दूर तक दिखता रहा 
तुम्हारा धुंधलाता अक्स 
सोचती रही क्या होंगे 
उन आँखों में आंसूं 
या एक खुश्क ख़ामोशी 
जैसे कुछ हुआ ही ना हो.

बिखरी पड़ी यादों को 
अकेले संभालना है मुश्किल
 एक गठरी में बाँध 
लोटना चाहती हूँ तुम्हे 
कि ये शिकवा ना कर सको 
चुपके से रख लीं मैंने 

रास्ते पर ढूँढती हूँ 
तुम्हारे कदमों के निशान 
लेकिन मिलते है 
सूखे पानी के रेले रेत पर 

आंसुओं के निशान पर चल कर 
यादों कि गठरी लौटाई नहीं जाती 
अब भी सहेजे हुए हूँ उसे 
उस दिन के इंतजार में 
जब तुम आ कर ले जाओगे अपनी यादें 
ओर कौन जाने मेरी यादें 
तुम भी सहेजे रखे  हो अब तक.

Wednesday, September 5, 2012

मन का क्लेश

 ये कविता मेरे भाई योगेश वर्मा ने अपने कौलेज के दिनों में लिखी थी


मन का क्लेश 
समाप्त हुआ अब वह अध्याय
नित-सौरभ-संचन औ' काव्य व्यवसाय 
नूतन से विषयों ने आज किया है मन व्यथित
और प्रिय यायावरी से भी हुआ अब तन थकित 

तब लेखनी में भी हुआ करती थी एक पावन रसधार 
और हम स्वप्नों को बुनते थे लेकर मन के तार| 
क्या कविता महज तुकबंदी थी और गीतों में शेष तान ही था?
 शब्दों का वह खेल भावुक मन का गान नहीं था?

अब भुला चला वो प्रेम स्मृतियाँ -घुटनों पर है सिर रखा 
पर्वत हिलाने में सक्षम मनुष्य हिय बोझ से है थका
अनुभूति गयी,आल्हाद गया,अब अश्रु रह गए शेष!
स्नेह क्षणिक तड़ित था मन में,स्थाई है क्लेश!
 

हिन्दी में लिखिए

image

चेतावनी

"कासे कहूँ?"ब्लॉग के सारे लेखों पर अधिकार सुरक्षित हैं इस ब्लॉग की सामग्री को किसी भी अन्य ब्लॉग, समाचार पत्र, वेबसाईट पर प्रकाशित एवं प्रचारित करते वक्त लेखक का नाम एवं लिंक देना जरुरी हैं।

image

ब्लॉग4वार्ता पर आएं

ब्लॉग4वार्ता हिन्दी चिट्ठों का अनवरत प्रकाशित एक मात्र संकलक है। जहाँ आपको एक ही स्थान पर विभिन्न विषयों के उम्दा एवं बेहतरीन चिट्ठे पढने को मिलेगें। आपका हार्दिक स्वागत है।