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Showing posts from January, 2012

एवज़

रोज़ की तरह चंपा ने उठकर खाना बनाया ओर डब्बा साइकल पर टांग दिया नौ बजे उसे काम पर पहुंचना था .माथे पर चमकीली बिंदी ,आँखों में काजल,तेल लगा कर संवारे बाल ओर धुली हुई साडी पहने वह काम पर जाने को तैयार थी. उसके पति भूरा ने एक भरपूर नज़र उस पर डाली तो चंपा लजा गयी. 
ठेकेदार ने भीड़ में खड़े मजदूरों को काम के हिसाब से तौला ओर ज्यादातर ओरतों  को अलग खड़ा कर लिया .बाकियों से कह दिया आज ज्यादा काम नहीं है.  चंपा झट से भूरा के साथ खडी हो गयी ओर ठेकेदार से बोली ये काम पर नहीं होगा तो में भी काम  नहीं करूंगी . ठेकेदार ने एक नज़र गदराई चंपा पर डाली ओर फिर काम न होने की बात दोहरा दी. चंपा ने काम करने से साफ इंकार  कर दिया तो ठेकेदार ने अनिच्छा से भूरा को काम पर ले लिया. ईंट उठाती ,माल बनाती,फावड़ा चलाती चंपा पर ठेकेदार की कामुक दृष्टी को भूरा ने भी महसूस किया .तभी ठेकेदार ने चंपा को देख कर अश्लील टिपण्णी कर दी .चंपा ने भूरा की ओर इस उम्मीद से देखा की वह कुछ कहेगा लेकिन भूरा ने तुरंत नज़र फेर ली ओर जल्दी जल्दी फावड़ा चलाने लगा.  उसे पता था इसी नज़र सिंकाई के एवाज़ में उसे काम मिला है ओर उसे काम की सख्त…

याद

गली के मुहाने पर  बंद सा एक मकान  अपनी खामोश उदासियों  में भीगा सा  जाने क्यूँ पुकारता रहा मुझे  बरसों पहले  उसके बंद कपाटों से  आती महक  तेरा जिक्र होते ही  फिर छा गयी .

मकरसंक्रांति

सुबह उठते ही याद आया आज तो मकर संक्रांति है .चलो अब से दिन थोड़े बड़े होंगे ओर इस हाड़ कपाऊ सर्दी से थोड़ी राहत मिलेगी.सबसे पहला ख्याल तो यही आया.सन्डे  की छुट्टी ढेर सारा काम ओर त्यौहार ओर सबसे बड़ी बात काम वाली बाई की छुट्टी.सब काम से निबटते दोपहर हो गयी. वैसे तो आज भी ठण्ड काफी थी तो सोचा चलो थोड़ी देर छत पर धूप सेक ली जाये. रेडियो विविध भारती पर बड़े अच्छे पुराने गाने आ रहे थे उन्हें छोड़ कर छत पर जाने का मन नहीं हुआ ,तो झट मोबाइल में रेडियो लगाया ओर गुनगुनी धूप में ऊपर पहुँच गए. सच कहूँ तो छत पर जाते हुए इस नीरस सी निकलने वाली संक्रांति पर बड़ी निराशा हुई. कहाँ गए वो बचपन के तीज त्यौहार ,उन्हें मनाने के वो तौर तरीके. दादी सुबह से तिल पीस कर उबटन बनाती थी धूप में बैठ कर उबटन लगाते फिर नहा कर भगवान को तिल गुड का भोग लगाते तब कुछ खाने को मिलता था.लेकिन छोटी बिटिया जिसे त्यौहार मनाने का सबसे ज्यादा शौक है वो तो सुबह सुबह ही कोचिंग चली गयी. जब तक लौटी दोपहर हो चुकी थी.फिर काहे का उबटन | 
 छत पर हम तो बातों में मगन हो गए तभी एक कोने में पतंग नज़र आयी |शायद कहीं से कट कर आ गिरी थी| उसके …