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Showing posts from September, 2016

अब हमारी बारी

देश की सरहदों पर तैनात हमारे जवान हमेशा अपनी जान हथेली पर लिये देश की रक्षा में लगे रहते हैं। जान देने की बारी आने पर एक पल के लिए भी नहीं सोचते ना खुद के बारे में ना अपने परिवार के बारे में। जिस तरह हम अपने घरों में इस विश्वास के साथ चैन से सोते हैं कि सरहद पर सैनिक हैं उसी तरह वे विश्वास करते हैं कि पीछे से देश की जनता और सरकार है जो उनके परिवार की देखभाल करेगी। किसी भी जवान की शहादत पर लोगों में भावनाओं का ज्वार उठता है उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शहर उमड़ता है सरकार तुरंत मदद घोषित कर देती है। हर प्रदेश सरकार अपनी सोच की हैसियत के अनुसार मदद घोषित करती है। अब जिनकी सोच में ही दिवालियापन हो वह उसी के मुताबिक मदद घोषित करते हैं। हाँ लोगों के गुस्से मीडिया की लानत मलानत से कभी कभी सोच परिष्कृत हो जाती है और स्तर बढ़ जाता है सोच का भी और मदद का भी।  खैर मुद्दा प्रदेश सरकार या राजनैतिक पार्टी की सोच का नहीं है मुद्दा है इन सैनिक परिवारों की सच्ची मदद और उनके सही हाथों में पहुँचने का। कई बार होता यह है कि भावनाओ के अतिरेक में घोषणाएं तो हो जाती हैं पर उनपर अमल कब और कितना होता है इसे …

जीने दे मुझे तू जीने दे

सामाजिक बदलावों में फिल्मो की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। हमारे यहाँ फिल्मो को विशुद्ध मनोरंजन का साधन माना जाता है ऐसे में कोई फिल्म अगर सोचने को विवश करती है तो उस पर चर्चा की जाना चाहिए। हाल ही में शुजीत सरकार की फिल्म पिंक रिलीज हुई। महिलाओं के प्रति समाज के नज़रिये पर सवाल उठाती इस फिल्म ने हर आयु वर्ग के चैतन्य लोगों को झकझोरा है और इस पर चर्चा जोर शोर से जारी है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद पूरे देश में एक लहर उठी थी जिसमे बड़ी संख्या युवकों की थी। उस घटना ने युवकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया था और स्वयं को सदैव शक के दायरे में पाना उनके लिए असह्यनीय था। कभी लड़कियों के बारे में सोचा है जो हमेशा समाज की निगाहों की चौकसी में रहती हैं और उनके क्रिया कलाप हमेशा ही शक़ के दायरे में।  फिल्म की कहानी तीन मध्यम वर्गीय कामकाजी लड़कियों के आसपास घूमती है जो दिल्ली में एक फ्लैट किराये पर लेकर रहती हैं। उनके साथ हुए एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है तब एक बूढा वकील उनका केस लड़ता है और अदालती कार्यवाही के दौरान समाज की लड़कियों के प्रति मानसिकता पर उठाये सवालों के द्वा…

'आइना सच नहीं बोलता'

मातृभारती मातृभारती पर प्रकाशित हो रहे धारावाहिक उपन्यास 'आइना सच नहीं बोलता' की इस पहली और दूसरी कड़ी की लेखिका हैं नीलिमा शर्मा और कविता वर्मा... नंदिनी की इस कहानी को पढ़िए और सुझावों व् प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइये..


http://matrubharti.com/book/6191/ 


http://matrubharti.com/book/6337/

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हँसते हँसते कट जायें रस्ते भाग 1

रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जब याद करो हंसी फूट पड़ती है। ये छोटी छोटी बातें घटनायें हमें जीने की ऊर्जा देती हैं। कुछ घटनायें गहरी तसल्ली दे जाती हैं कुछ खुद की पीठ थपथपाने का मौका। ऐसी ही घटनाओं को कलमबद्ध करने का मन आज हो आया। आप भी पढिये और मुस्कुराइये। 

सिटी बस से सफर करना हमेशा ही रोमांचक होता है और अगर आसपास एक दो सहयात्री भी मजेदार या नोटंकीबाज मिल जाएँ तो फिर कहना ही क्या। बेटी रोज़ सिटी बस से कॉलेज जाती है कभी बैठने की जगह मिल जाती है कभी नहीं। कभी कभी बीच के स्टॉप पर कोई उतरने वाला होता है तो आसपास वालों में उस सीट को हथियाने की होड़ लग जाती है। अब सफर रोज़ का ही है इसलिए बिना वजह की सदाशयता भी कोई नहीं दिखाता सब अपने में मगन अपने लिए थोड़ी सी जगह और सुकून जुटाने भर की चिंता करते हैं। एक दिन एक लड़की दो सीट के बीच की जगह में खड़ी थी। सीट पर बैठी लड़की अगले स्टॉप पर उतरने वाली थी। एक स्टॉप पहले एक महिला चढ़ीं और उस सीट से थोड़ी दूर खड़ी थीं। जैसे ही स्टॉप आया वह लड़की उठी तो उन महिला ने अपना पर्स खाली हुई सीट पर फेंक दिया क्योंकि वहाँ तक तुरंत पहुँचना मुश्क…