Sunday, October 31, 2010

एक बार....

उठे जब जनाजा मेरा
बस एक बार आ जाना,
दूर से ही सही ,
एक झलक देख लेना
दिखला जाना।

न देना कन्धा मेरे
जनाजे को,
न करना रुसवा मुझे
ज़माने में,
न आने देना मेरा
नाम भी होंठों पर
चेहरे की हर शिकन
छुपा जाना ।

न दे सकोगे एक
मुठ्ठी माती भी,
जानती हूँ
पर सबके जाने के
बाद,
दो फूल कब्र पर
रख जाना ।

नहीं देखना चाहती
आंसूं तुम्हारी आँखों में ,
पर हो सके तो
दो बूँद मेरी कब्र
पर गिरा जाना।

हसरत ही रही मिलने
की तुमसे,
dar था समझ न
सकेगा जमाना,
इसलिए दूर से ही सही,
एक झलक देख लेना
दिखला jana ना।

11 comments:

  1. बहुत विरोधाभासी ख्वाहिशें लिए हुए अच्छी रचना ..

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  2. sach kaha sangeeta di ne..........ek aur nahi girana aanshu, aur fir akele me anshu girane ki gujarish.......achchhi lagi!!

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  3. वाह क्या बात है……………हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले………………चाहत है भी और नही भी……………गज़ब का प्रस्तुतिकरण्।

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  4. sangeetaji,mukeshji,vandnaji, meri pahli koshish par aapki housla afjai ke liye bahut abhari hu.....

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  5. नहीं देखना चाहती
    आंसूं तुम्हारी आँखों में ,
    पर हो सके तो
    दो बूँद मेरी कब्र
    पर गिरा जाना।

    कमाल की प्रस्तुति..प्रेम की ख्वाहिशों का बहुत सुन्दर चित्रण..बधाई

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  6. very nice & wish u a happy diwali and happy new year

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  7. विरोधाभास तो मुझे भी लगा लेकिन ये सोच कर कि प्रेम की पराकाष्ठा है सुंदर रचना के लिए कवयित्री को बधाई

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  8. padhker accha laga aaj idhar se nikla to socha kuch der yaha bhi thaher jau .thara to thaher hi gaya .so nice ..........aata jata rahunga..

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  9. आपकी कविता पढ़कर मुझे अपनी पंक्तियां याद आ गईं-

    जीते हैं एक आरजू लेकर
    मरेंगे एक आरजू लेकर

    जिस जिससे न हो सके मुलाकात इस बेदर्द जमाने में
    एक खुदा तू तो मिला देना कम से कम अपने घराने में

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  10. bahut jabardst abhivyakti

    bahut accha laga aapki kavita ko padhkar ..

    bahut sundar rachna

    badhayi

    vijay
    kavitao ke man se ...
    pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

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