Monday, December 10, 2018

उपन्यास समीक्षा


"आ कविता वर्माजी का उपन्यास "छूटी गलियाँ" मंगा तो बहुत पहले लिया था लेकिन समयाभाव के चलते पढ़ नहीं पाया था. और आज संयोग बैठ ही गया जब भोपाल से मुंबई की फ्लाइट मे इसे पढ़ने का समय मिल गया. एक बार शुरुआत करने के बाद खत्म करके ही दिल माना. कविता जी एक बेहतरीन लेखिका हैं और उनकी लघुकथा और कहानियों से काफी समय से रिश्ता रहा है लेकिन उपन्यास लिखना बहुत धैर्य और मेहनत का काम होता है और मुझे उत्सुकता इस बात की था कि क्या इनकी पकड़ इस विधा मे भी ऐसी ही होगी जैसी लघुकथा और कहानियों मे है. आज उपन्यास पढ़कर यह यकीन हो गया कि कविता जी की पकड़ इस विधा में भी बहुत बढ़िया है. यह उपन्यास मानवीय भावनाओं, रिश्तों और उससे गुजर रहे दो परिवारों के बारे मे है. उपन्यास का नायक पैसों को खुशियों का पैमाना मानकर उसे कमाने के चक्कर में अपने परिवार को खो देता है और जब वह एक और ऐसे ही परिवार के बारे में जानता है तो उसे बचाकर अपनी गलतियों को सुधारने के जद्दोजहद मे लग जाता है. कहानी दिलचस्प मोड़ लेती रहती है और पाठक उससे जुड़ा रहता है. एक अच्छे मोड़ पर उपन्यास खत्म होता है और पाठक राहत की सांस लेता है. पात्र काफी कम हैं इसलिए ज्यादा उलझन नहीं होती, बस अंत थोड़ी जल्दबाजी मे कर दिया गया लगता है. बहरहाल एक बढ़िया उपन्यास के लिए आ कविता वर्माजी बधाई की पात्र हैं और हम भविष्य मे उनकी और रचनाएँ पढ़ने की उम्मीद करेंगे."
विनय अंजू कुमार 

1 comment:

  1. उपन्यास रोचक लग रहा है। क्या ये ऑनलाइन मौजूद है?? मैं पढ़ना चाहूँगा।

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