Monday, July 23, 2018

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा वैष्णोदेवी श्रीनगर बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जाने का कार्यक्रम बना। लगभग एक महीने का टूर था मम्मी पापा दोनों भाई मैं हमारी फिएट कार से एक ड्राइवर को लेकर बैतूल से निकल पड़े।
ग्वालियर आनंद होते हुए दिल्ली पहुंचना था और एक परिचित ने बहुत जोर देकर कहा था कि आप वहाँ हमारी बहन के घर ही ठहरें। वह मोबाइल गूगल का जमाना नहीं था और एक कागज पर लिखा पता लेकर जब हम दिल्ली शहर में प्रविष्ट हुए तो माहौल भयावह था। सड़क के दोनों ओर दो पांच सौ मीटर की दूरी पर रेत की बोरियों के पीछे सैनिक मशीनगन लिये मोर्चा संभाले खड़े थे। सड़क पर पुलिस थी किसी भी गाड़ी को रुकने नहीं दिया जा रहा था और हमें तो जगह जगह रास्ता पूछना था।
कहीं पुलिस वालों से तो कहीं रास्ते चलते लोगों से रास्ता पूछते हम दिशा भ्रमित से चले जा रहे थे। सांझ घिर आई थी पीली रौशनी फेंकते हैलोजन माहौल को और भयावह सा बना रहे थे। हर कोई और आगे और आगे ही बताता जा रहा था। कहीं कोई पीसीओ भी नहीं दिख रहा था।
एक जगह अंदर जाती सड़क के किनारे खड़े चार पाँच लडकों से पापाजी ने रास्ता पूछा तो उन्होंने मेन रोड से अंदर जाती सड़क की ओर इशारा करते हुए वहाँ जाने को कहा। मैं पीछे खिड़की के पास बैठी थी और तभी मैंने उन लडकों को एक दूसरे को आंखों में इशारा करते और आंख मारते देखा।
ड्राइवर गाड़ी मोडता इससे पहले ही मैंने जोर देकर कहा "नहीं पापाजी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप मेन रोड मत छोडो और सीधे चलो किसी पुलिस वाले से रास्ता पूछेंगे।
पापाजी ने मेरी बात मान कर मेन रोड पर ही चलने का फैसला किया और आगे जाकर चौराहे पर खड़े पुलिस वालों से पता पूछा। वो लोग भी सही पता नहीं जानते थे तब उनसे पूछा कि पीछे कुछ लड़के अंदर की रोड पर बता रहे थे। तब वह बोला अंदर कहाँ साहब वहाँ तो कर्फ्यू लगा है देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया है।
दिल्ली के उन लडकों की आंखों की उस हरकत ने हमें बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया था।

_________________
आंखें वाकई मासूम होती हैं और अपनी हरकतों से गाहे-बगाहे मासूमों को फंसने से बचा लेती हैं।
कविता वर्मा 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-07-2018) को "अज्ञानी को ज्ञान नहीं" (चर्चा अंक-3042) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. आँखों की जानी अनजानि हरकतें कई बार बड़े काम कर जाती हैं ...

    ReplyDelete
  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की प्रथम पुण्यतिथि : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती है।
सार्थक टिप्पणियों का सदा स्वागत रहेगा॥

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा व...