Wednesday, June 2, 2021

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं तो दिल धड़कने लगता है। हास्पिटल से आने के पंद्रह दिनों बाद भी वह वार्ड वहाँ का माहौल रात के सन्नाटे में अपनी रंगबिरंगी लाइट चमकाते बीप बीप करते मानिटर याद आते हैं तो पल्स बढ़ जाती है।

मेरे बेड के दो बेड छोड़कर थी वह। उसे बायपेप लगा था। वह मेरे पहले आई थी या बाद में यह भी नहीं पता। मोटे बेल्ट से पूरे चेहरे पर बंधा वह मास्क उस गर्मी में लगाये रहना बेहद मुश्किल था। लाल गाउन पहने वह लगातार बैठी रहती। कभी-कभी उसकी मास्क के अंदर से घुटी घुटी आवाज आती। उसके पास मोबाइल नहीं था। अक्सर वह हाउस कीपिंग वाली सफाई कर्मचारियों के मोबाइल पर अपने घर बात करती जिसमें उसकी बेबसी झुंझलाहट गुस्सा झलकता।

दो तीन दिन में जब मैं अपने आसपास को देखने की स्थिति में आई तब उसे बैठे या मोबाइल पर बात करते देखकर सोचती कि इस समय उसे काउंसलिंग की आवश्यकता है। कोई ऐसा आत्मीय या प्रोफेशनल जो उसे इस माहौल और इलाज के प्रति आश्वस्ति दे सके। इसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर सके ताकि वह इलाज को पूरी तरह स्वीकार कर पाए। कभी-कभी मेरा मन होता कि पांच मिनट ही सही उससे बात करूँ।

यह बिल्कुल भी संभव नहीं था। आक्सीजन मास्क के साथ आप खूंटे पर बंधी गाय से ज्यादा नहीं रहते। तीन बाय छह का वह पलंग उस पर रखा सामान का थैला और बगल की टेबल पर रखी पानी की बाटल और दवाइयाँ। जबकि खाना खाते हुए भी मास्क उतारने की अनुमति न हो। बिस्तर पर मल-मूत्र विसर्जन मजबूरी हो ऐसे में हास्पिटल के बाहर आपके इंतजार में पल पल गिनते पति बच्चे माता-पिता भाई भाभी को नजरअंदाज कर आप एक अनजान के लिए आपके लिए बताये नियमों को नहीं तोड़ सकते।

हाउस कीपिंग वाली एक लड़की आशा से अच्छी बातचीत हो गई थी। वह सुबह मुझे व्हीलचेयर पर बैठा कर वाशरूम ले जाती और वहीं रुकती। मैं फ्रेश हो हाथ मुंह धोकर कपड़े बदलती और वापस आते हाँफने लगती। आते ही वह आक्सीजन मास्क लगाती और पलंग पर लेटने में मदद करती। चौबीस घंटे में वह दस बारह मिनिट ही होते जब मैं रिस्क लेती और अपना ध्यान रखने के एवज में उसकी मुठ्ठी गर्म करती। आशा से उसके बारे में पता चला कि वह अपने पति पर भडकती है उसे समझाते हैं लेकिन मानती नहीं है। 

हालांकि दिन में कई बार जूनियर डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग स्टाफ के सदस्य उसे समझाते कि वह परेशान न हो और आराम करे। बाहर उसके पति उसकी चिंता कर रहे हैं। मैं अपने बेड पर बैठी लेटी सुनती देखती और ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसके चित्त को शांत करे उसे जल्दी ठीक करे। दिन गुजरते गये उसे कुछ अन्य तकलीफें होती गईं जिनके बारे में वह डाक्टर को बताती और उसे इलाज मिलता। कुछ आवाजें मुझ तक आतीं लेकिन अब उसकी फोन पर लंबी बातें बंद हो गई थीं या शायद अब उसे मोबाइल नहीं मिलता था। कभी-कभी वह बात करती लेकिन अपेक्षाकृत शांत रहती। मुझे भी सुकून लगता कि वह एडजस्ट हो रही है और जल्दी ठीक हो जायेगी।


लगभग आठ दिन बाद मेरा आक्सीजन मास्क निकल गया। उस दिन जिस असुरक्षा का अहसास हुआ उसके साथ रहना अन्य दिनों से ज्यादा मुश्किल था। उसी दिन बगल के बेड पर एक नया मरीज आया। पता नहीं उसे कितना इंफेक्शन है और मैं सिर्फ एक सर्जिकल मास्क लगाए पांच छह फीट दूर बैठी हूँ।

उस दिन भी उसे देखा। वह शांति से बैठी वार्ड के मरीजों को देख रही थी। आठ दिन वहाँ और उसके पहले चार दिन अन्य हास्पिटल में रहने के बाद घर जाने की उत्सुकता कोई भी अति उत्साही बेवकूफी करने की इजाजत नहीं दे रही थी। वैसे भी कमजोरी इतनी थी कि फोन पर दो मिनट बात करना दो मंजिल सीढियाँ चढ़ने जितना थका देता था। लगभग आधा दिन बिना मास्क शांति से गुजरा और उम्मीद बंधी कि जल्द ही छुट्टी मिलेगी।

अगले दिन सुबह से पतिदेव प्रोसेस में लगे डाक्टर के साइन फाइल मीटिंग करते करते दो बज गये । व्हीलचेयर पर अपने सामान लादे मैं उसके सामने से गुजरी लेकिन न कुछ कह पाई न कर पाई। नीचे पतिदेव इंतजार कर रहे हैं घर पर मम्मी पापा राह देख रहे हैं।

घर आकर जब तीन बाय छह के बिस्तर से नीचे कदम रखा तो जाना कि घर जो शरीर आया है उसमें पहले की तुलना में रत्ती भर ताकत ही बची है और अभी लंबा सफर तय करना है जिसमें न जाने कितना समय लगेगा। सच कहूँ तो घर आने के बाद के दस बारह दिन हास्पिटल के दस बारह दिनों के समान ही थे। हास्पिटल की याद आते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती पल्स बढ जाती। आधी रात में नींद खुलती तो लगता कि ढेरों मानिटर अपनी लाल हरी पीली लाइट चमकाते बीप बीप कर रहे हैं। मैं जोर से आंखें और कान बंद कर लेती और उसका चेहरा दिमाग के पर्दे पर कौंध जाता। वह ठीक हो गई होगी एक उम्मीद जागती और कहीं एक नाउम्मीदी भी। दिल और दिमाग के बीच इन दोनों के बीच जंग छिडती। वह ठीक हो गई होगी उसमें जिजीविषा नहीं थी नहीं हुई होगी। तो क्या अब तक हास्पिटल में होगी? और मैं दस पंद्रह फीट दूर लाल गाउन पहने उसे बायपेप लगाये बैठा हुआ देखने लगती। वह सपना होता या खुली आँखों का भ्रम समझ नहीं आता।

आखिर एक दिन इस जंग ने बैचेन कर दिया। मैंने आशा को फोन लगाया। कभी उसकी जरूरत पड़ेगी तो बुलाने के लिए उसका नंबर ले लिया था मैंने। हालचाल पूछने और बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि उस लाल गाउन वाली का क्या हुआ वह ठीक हो गई न।

'नहीं दीदी वह नहीं रही। बहुत कोशिश की लेकिन बची नहीं। सबने उसे खूब समझाया कि वह खुश रहे लेकिन वह समझती ही नहीं थी। उसका पूरा शरीर सूज गया था। दो बच्चे हैं उसके एक साल और तीन साल के और पति मजदूरी करता है।'

रोना नहीं रोक पाई मैं क्या सच में मैनें गलती कर दी क्या मुझे उससे एक बार बात करना था अपने डर पर काबू करके थोड़ा रिस्क लेकर? क्या मैं नियति का लिखा बदल सकती थी या शायद कुछ उम्मीद जगा सकती थी। पता नहीं जो हुआ वह ठीक था या नहीं लेकिन उसकी मौत बार बार याद आती रहेगी। लाल गाउन पहने वह दो बेड दूर इतनी दूर क्यों थी बस यही सोच रही हूँ।

कविता वर्मा 

Saturday, April 10, 2021

ये इत्तेफाक है या कुछ और

 आप लोग इत्तेफाक में विश्वास रखते हैं या नहीं? अगर नहीं रखते तो इस किस्से को पढ़कर बताइये कि यह क्या है?


अभी कुछ दिन पहले मैं पतिदेव की पोस्टिंग वाले शहर में रहने चली गई। अभी तक तो उनका बैचलर्स अपार्टमेंट था सिंगल बेड से काम चल रहा था। मेरे जाने के बाद दो अलग-अलग डील डौल आकार के पलंग बदलने की जरूरत महसूस हुई। तो हम लोग शहर की एक दुकान पर डबल बेड देखकर आये। चूँकि हमारा वहाँ रहना लाॅकडाउन के कारण कुछ दिन टल गया तो हमने सोचा पलंग देख लेते हैं और जब लगेगा खरीद लेंगे।

उसी दिन सुबह हमने सोचा कि एक्स्ट्रा पलंग एक परिचित को अगर जरूरत हुई तो दे देते हैं इस बारे में हमने उनसे फोन पर बात भी की। साथ ही यह भी बताया कि वे जब चाहे बता दें और पलंग ले जाएं।

सभी बातें तय हो गई।

उसी दिन दोपहर में मेरे नंबर पर एक फोन आया "मैम आपने पलंग का आर्डर दिया था उसकी डिलीवरी कब करना है?

यह चौंकाने वाला था क्योंकि अभी तक हमने कोई आर्डर नहीं दिया था। दूसरी बात कि दुकानदार के पास मेरा फोन नंबर कैसे आया? क्योंकि अनजान लोगों को मेरा नंबर नहीं देती हूँ खासकर जब हसबैंड भी साथ में डील कर रहे हैं।

"मैंने कहा कि अभी हम तुरंत नहीं ले रहे हैं आपको दो चार दिन में बता देते हैं।" 

वह बोला "मैम फिर दो दिन लाॅकडाउन रहेगा।" 

"हाँ ठीक है हमें अभी कोई जल्दी नहीं है" यह कहकर मैंने फोन रख दिया लेकिन इस बात से हम दोनों ही अचंभित थे। थोड़ी देर सोचने के बाद कि ऐसा कैसे हुआ हसबैंड ने उस नंबर पर फिर फोन लगाया और पूछा कि आपको ये नंबर कहाँ से मिला?

उसने कहा ये फलाने भाई ने दिया। अब उसने जिस फलाने भाई का नाम लिया था उसी नाम के हमारे परिचित से हमने सुबह पलंग देने की बात की थी।

इस बार बात करके हम और ज्यादा कंफ्यूज हो गये कि फलाने भाई अभी पलंग लेने आ रहे हैं क्या? उन्होंने ऐसा कुछ तो नहीं कहा था कि आज पलंग लेंगे।

हम सोचने लगे कि उन परिचित को फोन लगाकर पूछें कि वे किसी को पलंग लेने भेज रहे हैं क्या? इस दौरान पलंग लेना है या डिलीवर करना है का कंफ्यूजन बना रहा।

इस बात को तीन-चार घंटे बीत गये फिर अचानक फोन की घंटी बजी "मैम आपका पलंग हमने भेज दिया है आप घर पर ही हैं न"

अब यह सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा आया मैंने कहा "आप यह तो बताइये कि आप यह पलंग किसके घर डिलीवर करना चाहते हैं। उनका कोई नाम तो होगा?"

"मैम फलाने जी ने कहा कि पलंग डिलीवर कर दें उन्होंने ही नंबर दिया।"

दिन भर के दो तीन बार फोन पर हुई बातों को प्रोसेस करके दिमाग ने निष्कर्ष निकाला कि निश्चित रूप से यह रांग नंबर है। अब मैंने खुद को संयत किया और कहा" भाईसाहब या तो फलाने भाई ने आपको गलत नंबर दिया है या आपने गलत नंबर नोट किया है या गलत नंबर लगाया है। आप एक बार नंबर फिर से चैक करें। मैं आपकी मदद ही करना चाहती हूँ। अगर मैं कह दूँ कि पलंग ले आइये और वहाँ घर पर कोई नहीं मिला तो आपका चक्कर बेकार होगा। आप फिर मुझे फोन करेंगे लेकिन उससे क्या होगा? आप नंबर फिर से अच्छे से चैक करें। "

अब वह मेरी बात समझ गया" जी मैम समझ गया ठीक है मैं देखता हूँ "कहकर उसने फोन रख दिया।

पता नहीं फिर वह पलंग डिलीवर हुआ या नहीं दुकानदार को सही नंबर मिला या नहीं?

आपको क्या लगता है कि मुझे फोन करके पूछना चाहिये?

पूछना तो खैर नहीं होगा लेकिन आप इसे क्या कहेंगे इत्तेफाक या कुछ और?

कविता वर्मा 

Tuesday, April 6, 2021

मन में बसते रास्ते

 अपना घर छोड़कर जाना हमेशा एक अजीब सा अहसास देता है। बार बार रुक कर पीछे मुड़कर देखती हूँ कि उसे थोड़ा और अपने अंदर उतार लूँ थोड़ा सा और साथ ले जाऊँ लेकिन फिर भी बहुत कुछ पीछे छूट जाता है।

इस अहसास को सांत्वना देने के लिए या कहें कि इसे एक अवसर की तरह जीवन में कुछ और जोड़ने के लिए रास्ते मोड़ जंगल नदी पहाड़ पत्थर खेत पेड़ फूल फल को अपने भीतर उतारती चलती हूँ। भरती जाती है हर दृश्य को अपने अंतस में फिर चाहे वे खेत में काम करती गोबर के कंडे पाथती दरांता लेकर खेत पर जाती या सड़क किनारे बैठ कपड़े धोती स्त्रियाँ हों या सड़क किनारे खेलते बच्चे किसी छप्पर के नीचे बीड़ी फूंकते गेंहूँ निकालते भूसा ढोते पुरुष या कि गाँव की सड़कों पर बहती नालियाँ नलों का पानी गांव के बाहर कचरे के ढेर या सड़कों पर बने गढ्ढे। हर दृश्य उस जीवन से जोड़ता है जो आमतौर पर हम से बहुत दूर रहता है।

इसी दृश्य में एक और स्थान जुड़ता है वह है किसी छोटे से गांव में आहते से घिरा एक मंदिर जो हर बार आते-जाते रास्ते के एक पहचान चिन्ह के रूप में गुजर जाता है।

आज अचानक उस मंदिर के सामने गाड़ी रोकी। आधा बना आधा खुदा आहता जिसमें नक्काशी दार बलुआ पत्थरों से बना बडे़ से गुंबद को पत्थरों के खंभे पर उठाए एक प्राचीन हनुमान मंदिर। मंदिर के सामने गुंबद के नीचे बिछा हरी घास का कार्पेट बाहर के तापमान को रोक कर सुकून भरा अहसास दे रहा था। मंदिर में खड़े हनुमान जी की बड़ी सी प्रतिमा भक्तों को प्रेममयी दृष्टि से निहारती। आप देर तक टकटकी लगाए देखते रह सकते हैं।

इसी मंदिर परिसर में थोड़े अंदर एक और परिसर है जिसमें एक अति प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर अहिल्या बाई के शासनकाल या उससे पहले का हो सकता है। बडे-बडे पीपल के वृक्ष कलरव करती गौरैया छोटे पत्थर के खंभो पर टिका मंडप जिस पर कोई विशेष सज्जा न होते हुए भी वे आकर्षक थे। पीली मिट्टी जैसे रंग से पुते ये खंभे समय के थपेड़ों से अपनी नक्काशी की धार खो चुके फूल पत्तों से सजे थे। आधुनिक मंदिरों में ये साधारणता अब गायब हो चुकी है। महेश्वर में राजराजेश्वर मंदिर में कृत्रिम फूल पत्तों की सजावट और वंदनवार मंदिर की गरिमा को कम करते ही प्रतीत होते हैं। ऐसे में शिवलिंग पर सहज चढ़े फूल बेलपत्र कलश से बूँद बूँद टपकता पानी सामने एक छोटा सा नंदी और सिर झुका कर अंदर जाया जा सके इतना बड़ा द्वार।

मंदिर परिसर में रामायण की चौपाई के स्वर गूँज रहे थे। पता चला कि यहाँ लगभग चालीस पचास वर्षों से सतत रामायण पाठ हो रहा है। नजर घुमाई एक वृद्ध रामायण की चौपाई बोलते दिखे। उन्हें शायद रामायण कंठस्थ थी। बिना किसी लाउडस्पीकर और जल्दबाजी के चौपाई के शब्द वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भर रहे थे। 

मंदिर में दर्शन करके कुछ देर वहीं बैठे प्रसाद लिया और बाहर आ गये। कुछ और देर हनुमान जी से भेंटने का मन हुआ तभी दाँयी ओर नजर पड़ी थोड़ा आगे जाकर देखा तो एक बावड़ी दिखी। आश्चर्य इस इलाके में बावड़ी मिलना बहुत सामान्य नहीं है। किनारे जाकर देखा काफी पानी था। एक छोटी पुरानी मोटर लगी थी। पानी साफ था और सीढियाँ भी साफ सुथरी थीं। मन प्रसन हो गया। थोड़ी देर वहाँ रुककर हम आगे बढ़ गये।

घर छोड़कर आने का मलाल खत्म हो जाता है जब ऐसे स्थानों के दर्शन हो जाते हैं जो आधुनिक दुनिया से दिखावे से दूर अपने सहज स्वरूप में हैं। 

Wednesday, January 20, 2021

त्रिभंग या बहुभंग

 त्रिभंग या बहुभंग 

बहुत दिनों से सोशल मीडिया पर फिल्म त्रिभंग की चर्चा चल रही थी। कई बार इसका प्रोमो सामने आया लेकिन न जाने क्यों प्रोमो देखते हुए फिल्म देखने की इच्छा नहीं जागी इसलिए इसे स्थगित करती रही।

आज सोचा कि क्यों न इसे देख ही लिया जाये। अकसर बहुत ज्यादा तारीफ प्राप्त फिल्म या वेबसीरीज निराश ही करती हैं लेकिन हो सकता है कि यह इस धारणा को तोड दे। एक संवेदनशील लेखिका द्वारा लिखी कहानी पर नामी अभिनेत्रियों का अभिनय कुछ तो खास होगा। स्त्री जीवन और उसकी जिजीविषा को कोई अलग आयाम उठाया गया होगा इसमें।

फिल्म की शुरुआत में कांपते हाथों से लिफाफे पर नाम लिखती नायिका के साथ शुरू हुई कहानी नायिका की इस स्वीकारोक्ति के साथ कि उससे गलती हुई है। जीवन कई बार चुनाव के मौके देता है और उस चुनाव में गलती होना स्वाभाविक है लेकिन इस फिल्म में जो हुआ वह गलती नहीं ब्लंडर ज्यादा लगा।

एक लेखिका जो माँ भी है उसका अपने पति बच्चों जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ कर सिर्फ लेखन में लिप्त होना कई प्रश्न खड़े करता है।

लेखन इतना जरूरी था तो शादी करने घर गृहस्थी बसाने की क्या जरूरत थी? जिन बच्चों को जानते समझते पैदा किया उनकी जिम्मेदारी से बड़ा और क्या?

अब अगर नारीवादी यह कहें कि क्या घर बच्चों के काम सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है तो वे ये बताएं कि फिर नायिका पैसे कमाने की ही जिम्मेदारी उठा लेती। पति नौकरी कर रहा है उसकी माँ घर बच्चे संभाल रही है और फिर भी पत्नी दुखी है और आँसू पोंछती कोसती बच्चों को लेकर घर से निकल जाती है और नारीवादी यह कहने पर गुस्सा और दुख जताते हैं कि सास ने कहा 'ये तो मैं मर जाऊंगी तब भी लिखेगी' या आफिस से थके हारे आये पति ने कहा कि 'खाना लगाओ '। उनकी नजरों में यह स्त्री के लिए सबसे बड़ी गाली है।

नायिका को अबला बताते हुए कहानी की लेखिका और डायरेक्टर यह भूल गईं कि वह बूढ़ी औरत जो इस उम्र में अपने पोते पोती और घर को संभाल रही है वास्तव में उस पर अत्याचार हो रहा है। एक तरफ स्त्री वादी नारेबाजी करते हैं कि महिलाओं को घर गृहस्थी से रिटायर्मेंट नहीं मिलता दूसरी ओर वे खुद एक बूढ़ी स्त्री को घर गृहस्थी में झोंक रहे हैं और उसकी थकान उसकी झल्लाहट को नजरअंदाज करके उसे सास रूपी अत्याचारी साबित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उसके सामने बहू लोगों के साथ बैठकर शराब पिये लेकिन वह कुछ न बोले। 

पति को शुक्र है कि बख्श दिया वह एक सफल पत्नी के तेवरों को झेलता आम आदमी है जो माँ बच्चों को हैरान परेशान देखता है लेकिन कुछ कर नहीं पाता। 

पहले समय में जब स्त्री घर छोड़ती थी या घर से निकाली जाती थी उसके सामने आजीविका की समस्या उत्पन्न होती थी। त्रिभंग की नायिका इसका तोड़ निकालती है कि किसी अमीर आदमी से प्रेम करो उसके दिये आलीशान मकान में रहो एक फुलटाइम मेड रखो और अपना लेखन जारी रखो। जब एक से दिल भर जाये या उसका दिल भर जाये दूसरे को पकड लो। जिस नायिका के पास पति के घर आने पर उसके पास दो मिनट बैठने की उसका हालचाल पूछने की फुर्सत नहीं है उसे बाय फ्रेंड बनाने उससे प्रेम करने की फुर्सत कैसे मिल जाती है? तब भी प्रेम करने की ही फुर्सत मिलती है अपने बच्चों को जानने समझने उनसे बात करने की न वह जरूरत समझती है न कभी कोशिश करती है।

क्या लेखिकाएं इतनी असंवेदनशील होती हैं कि उन्हें अपने ही बच्चों की परेशानियाँ नहीं दिखतीं?

जिस लेखिका को पहले ही उपन्यास के लिये अकादमी पुरस्कार मिलता है वह न अपने बच्चों का व्यक्तित्व बना पाती है और न ही उनका मन पढ पाती है। उसके पात्र कैसे होंगे यह तो सोचने की जरूरत ही नहीं है।

काजोल जिसने एक ऐसी लड़की का रोल किया है जिसने बचपन में माँ बाप को अलग होते देखा है माँ की गैरजिम्मेदारी की शिकार हुई है माँ के बाय फ्रेंड के द्वारा यौन अत्याचार सहा है वह बेहद अकेली है लेकिन अकेले पन की पूर्ति बिना शादी किये लिव इन में रहते बार बार पार्टनर बदलते करती है। वह अपने को विद्रोही दिखाने के लिए धाराप्रवाह गालियाँ देती हैं और एक सफल नृत्यांगना पेज थ्री पर्सनालिटी होते हुए भी पत्रकारों को उन्हीं के मुँह पर गालियाँ देती है।

माँ के कोमा में जाने पर उसे लोकाचार निभाते हास्पिटल जाना पड़ता है। एक स्वतंत्र स्त्री गालियाँ देने वाली अपनी माँ को उसके नाम से पुकारने वाली समाज क्या कहेगा के डर से माँ को देखने जाती है उसके साथ हास्पिटल में रहती है। यह तो आम स्त्रियाँ भी करती हैं। देखा जाये तो वह फिल्म की मुख्य हीरोइन है पर्दे पर सबसे ज्यादा फुटेज उसे ही मिला है लेकिन सिवाय गालियों के कोई महत्वपूर्ण डायलॉग या चरित्रिक मजबूती वे प्रकट नहीं कर पाई हैं। पहले प्यार के साथ लिव इन में रहना जिसमें उनकी माँ उनकी मदद करती हैं उस प्रेमी से प्रेगनेंट होना उसकी मारपीट सहना फिर उसे घर से निकाल देना। माँ से नाराजगी बेटी होने के बाद फिर माँ से जुड़ाव नृत्य से जुड़ाव लेकिन फिर माँ से कब कैसे दूरी बनी इसका कोई जिक्र नहीं है। उसका घर कैसे चला बेटी को अकेले कैसे पाला ये संघर्ष तो आजकल की फिल्मों में वैसे भी नहीं होते हैं। यही माँ अपनी बेटी का रिश्ता एक पारंपरिक परिवार में करने जाती है तो वहाँ कहती है कि अगर आपको दहेज चाहिए तो मुझे एक अमीर बाय फ्रेंड पकड़ना पडे़गा क्योंकि अभी तो मेरे पास कुछ नहीं है। आश्चर्य कि ऐसी बात सुनकर भी वह पारंपरिक परिवार उनकी बेटी को अपनी बहू बना लेता है। हालाँकि शायद यही एक बात अच्छी और तसल्ली देने वाली है कि लड़की की माँ और नानी के अतीत की छाया उस लड़की के जीवन पर पड़ती नहीं दिखाई है।

फिल्म के अंतिम दृश्य में जब काजोल की बेटी अपनी सास से सिर पर पल्ला रखकर वीडियो काल पर बात करती है और उसकी माँ को सास की पूछताछ चिंता अखरती है। वह फोन लेकर खुद बात करती है। तभी वह अपनी बेटी से बात करती है और तब उसकी बेटी पहली बार अपनी माँ के सामने अपने दुख अपने अपमान बताती है जो उसे बचपन में माँ के व्यवहार के कारण मिले हैं। लब्बोलुआब यही रहा कि एक लड़की जिसे माँ की देखभाल नहीं मिली जिसके कारण वह अपनी माँ से नाराज रही वही अपनी बेटी की भावनाओं से इस कदर बेखबर है कि उसके प्रेगनेंट होने तक जान ही नहीं पाती कि बेटी कैसा महसूस कर रही है। यह माँ भी कलाकार है जो कि आम इंसानों से ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।

अंततः सबसे युवा पीढ़ी की लड़की एक परंपरा वादी परिवार में इसलिए इतनी पाबंदियां सहती है कि उसे अपने बच्चे के लिए पिता का नाम चाहिए। वह ससुराल वालों को खुश करने के लिए भ्रूण परीक्षण तक करवाती है।

लब्बोलुआब यह है कि स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ है अपनी जिम्मेदारियों से मुँह चुराना उस पर सीनाजोरी करना शराब पीना देह की स्वतंत्रता का इस्तेमाल आर्थिक स्वतंत्रता लेने के लिए करना और बाय फ्रेंड कपड़े की तरह बदलना। जब यह भटकन पीढ़ी दर पीढ़ी चले तब फिर घूम फिर कर उसी सोलहवीं सदी में पहुँच जाना जहाँ सिर ढंकना बेटा पैदा करना जैसी चीजें स्त्री को घर से बांधे रखती हैं और उनके बच्चों को पिता का नाम दिलवा देती हैं।

अंत में एक प्रश्न जो मेरे दिमाग में कुलबुलाता रहा कि आज अच्छे-अच्छे लेखक भी अपने लेखन से चार लोगों को काफी नहीं पिला सकते वहीं फिल्म की नायिका अपने लेखन से न सिर्फ अपना उच्च स्तरीय जीवन चलाती हैं बल्कि शराब के गिलास पर गिलास खाली करती रहती हैं।

कविता वर्मा

#tribhang #kajol 

Saturday, January 16, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 8


12 नवंबर 2020 

आज सुबह से जाने की तैयारी जैसी हडबडी थी अंदर से बार बार रुलाई आ रही थी लेकिन दिमाग हर चीज हर काम को करने में भी लगा था। कई बार सबकी नजरें बचा कर मन में भरी दुख आशंका डर की बदली को बरसा कर हल्का करने की कोशिश की लेकिन ये इतने अधिक थे कि बार बार फिर भर आते थे। इन्हें बार बार खाली करने का समय कहाँ था। खाली पेट बहुत सारे टेस्ट होना था। बिटिया ने कहा वह हमें छोड़कर वापस आ जायेगी फिर खाना बना लेगी।

स्नान ध्यान करके भगवान के आगे दीपक लगा कर देर तक सलामती की कामना करती रही। सवा नौ बजे के लगभग हम मेदांता हास्पिटल पहुँचे। गेट पर हमें छोड़कर बेटी कार पार्क करने चली गई। मैंने व्हीलचेयर मँगवाई और बताया कि डॉ श्रीवास्तव के पेशेंट हैं कल बायपास होना है। उन्होंने तुरंत इमर्जेंसी डोर से उन्हें अंदर लिया और मुझे काउंटर पर एडमिशन के लिए कहा। चूंकि एक दिन पहले सभी बात हो चुकी थी मेडिकल इंश्योरेंस से क्लीयरेंस आ चुका था इसलिए वहाँ कोई ज्यादा समय नहीं लगा। कहना पडे़गा कि मेदांता का स्टाफ बहुत विनम्र और मददगार है। पूरा फार्म भी उन्होंने ही भरा मुझे सिर्फ अपना नाम पेशेंट से रिश्ता और साइन करना था। जब सब करके फाइल लेकर इमर्जेंसी रूम में पहुँची तब तक पतिदेव के टेस्ट शुरू हो चुके थे। उन्होंने हास्पिटल की ड्रेस पहन ली थी। उनके कपड़े मुझे दिये और जल्दी ही हमें रूम में शिफ्ट कर दिया। यहाँ भी कुछ जानकारी ली गईं बेटी भी आ गई थी अब सारे दिन बस टेस्ट होना थे। एक्सरे डोपलर ईको ब्लड शुगर बीपी के अलावा एनेस्थेटिस्ट की इंक्वायरी। दिन भर फोन आते रहे डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग की आवाजाही के बीच मन कभी आशा से भर जाता कभी डर और आशंका से। बीच-बीच में जब भी समय मिलता हम एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे रहते। दोनों ही डरे हुए थे और दोनों ही एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। अपने अंदर आये नकारात्मक विचारों को होठों पर आने से रोक रहे थे जो अत्यधिक दबाव से तरल होकर आँखों के रास्ते बाहर आ रहे थे।

यहाँ नर्सिंग स्टेशन मतलब इस फ्लोर का काउंटर रूम के बाहर ही था। वहाँ से नर्स डाक्टर की बहुत तेज आवाजें आ रही थीं। दोपहर में थोड़ी देर सोने की कोशिश की लेकिन दुश्चिंता और शोर ने सोने नहीं दिया। दो रातों की अधूरी नींद अब थकान पैदा कर रही थी। 

बेटी वापस घर जाये खाना बनाए इसकी इच्छा नहीं हुई। पास ही एक रेस्तरां था वहाँ जाकर हमने बारी बारी से खाना खाया। पतिदेव का खाना नाश्ता हास्पिटल कैंटीन से आ रहा था। 

हसबैंड को एक्सरे के लिए लेकर गये काफी देर हो गई वे वापस नहीं आये। बेटी देखने गई तो देखा कि वहाँ लंबी वेटिंग है और वे बाहर व्हीलचेयर पर बैठे हैं। यह देखकर वह नाराज हुई कि पहले पता करो कि रूम खाली है या नहीं। कोरोना काल में इस तरह कारीडोर में इतनी देर पेशेंट को क्यों बैठाना। फिर वह भी वहीं रुकी रही ।वापस आकर उसने पूरी बात बताई।

उसका भी तनाव लगातार बढ़ रहा था वह कुछ बोल नहीं रही थी लेकिन अंदर ही अंदर चिंतित थी। अभी तक कभी ऐसी कोई स्थिति नहीं आई थी उसके जीवन में पहली बार ऐसा तनाव आया था जिसे एक के बाद एक कामों के चक्कर में उसे निकालने का समय उसे भी नहीं मिल रहा था।

शाम को एनेस्थिसिया देने वाले सीनियर डाक्टर आये और उन्होंने लंबा इंटरव्यू लिया। खान पान की आदतें किस हाथ से काम करते हैं वगैरह वगैरह। यह सब आपरेशन की तैयारी का हिस्सा था।

शाम को बेटी को घर जाने का कह दिया।। छोटी बेटी से भी वीडियो काल पर बात हुई। वह भी अपनी चिंता और तनाव के साथ इतनी दूर अकेली थी। उसके सब्मिशन हो चुके थे इसलिए अब उसे हर पल की खबर दे रहे थे। या कहें कि उससे कह कर अपना मन हल्का कर रहे थे। वह भी हौसला बढा रही थी और बात करते करते हँस रही थी वास्तव में तो वह अपनी रुलाई रोक रही थी।

अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे आपरेशन थियेटर में जाना था। मम्मी पापा को भी सुबह जल्दी आने का कह दिया था। बेटी से भी कहा अब घर जाओ। गुरुजी ने कुछ दान का कहा था उसकी सामाग्री खरीद कर रख लो कल सुबह जल्दी दान कर आना। देर रात तक आवाजाही चलती रही। करीब दो बजे एक ब्लड टेस्ट के सैंपल लेने नर्स आई। सैंपल लेते ही पतिदेव को अचानक घबराहट शुरू हो गई। ड्यूटी डाक्टर को बुलाया उन्होंने चैक किया सब ठीक था तब तक घबराहट कम हो गई। डाक्टर को कहा कि बाहर बहुत शोर है हम एक मिनट नहीं सो पा रहे हैं। यह तीसरी रात थी जो आँखों में कट रही थी।

नर्स ने कहा कि सुबह साढ़े चार बजे उठकर नहा कर तैयार हो जाएं। अब बमुश्किल तीन घंटे बचे थे आपरेशन में। मन बुरी तरह आशंकित था पलकें भारी थीं लेकिन नींद गायब थी। जैसे तैसे आँखें बंद किये पडे रहे। बाहर अब शांति थी लेकिन मन में उथल-पुथल मची थी। चार बजे हम उठ गये फ्रेश होकर थोड़ी देर बैठे फिर नहा कर तैयार हो गये। नर्स वार्ड बाॅय आ गये पतिदेव के पूरे शरीर पर बीटाडाइन का लेप किया। बड़ी बेटी को फोन किया वह घर से निकल गई थी। छोटी को फोन किया उससे बात की। हम आपरेशन थियेटर के बाहर पहुंचे बड़ी बेटी का फोन आया कि गार्ड अंदर नहीं आने दे रहा है। उससे बात की लेकिन फिर भी उसने बेटी को अंदर नहीं आने दिया। पतिदेव को ओटी के अंदर करने के लिए डाक्टर आ गई उनसे रिक्वेस्ट की कि बस दो मिनट बेटी आ रही है उससे मिल लेने दीजिए। वे रुक गये लेकिन बेटी अभी भी नहीं आई। उसे फोन किया तो बोली मम्मी अंदर नहीं आने दे रहे हैं। वहाँ मौजूद गार्ड से कहा कि प्लीज फोन करके बोलो न। उसने फोन किया कि उसके पापा का बायपास है आने दो अंदर। पापाजी का फोन आया वे रास्ते में थे। उनसे कहा कि हम ओटी के बाहर खड़े हैं। दो तीन मिनट में बेटी दो दो सीढियाँ चढते हुए आई वह बुरी तरह हाँफ रही थी। उसने पापा को दूर से देखा। पतिदेव ने उससे कहा मम्मी का ध्यान रखना।

मम्मी पापा पहुंच नहीं पाये ओटी का दरवाजा बंद हो गया।

अचानक आई इस विपत्ति पर कैसी मनःस्थिति थी और किस तरह से उसका सामना किया इसका दस्तावेजीकरण करने की कोशिश की है। यह पूर्णतः निजी और मौलिक है। इस पर किसी तरह की आपत्ति और शंका के लिए कोई स्थान नहीं है। बस इसे पढ़कर ऐसी स्थिति का कोई धैर्य से सामना कर पाए इसलिए इसे लिखा गया है।

#बायपास #bypass #minor_attack 

Thursday, January 14, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 7

11 नवंबर 2020

रात की भयावह परछाई सुबह के उजाले में कहीं नहीं थी लेकिन मन के किसी कोने में उसकी कालिमा अपना असर छोड़ गई थी। क्या हुआ था रात में क्या हार्ट को ब्लड आक्सीजन की सप्लाई नहीं हो रही थी? क्या वह भी कोई छोटा सा अटैक था? क्या यह कोई ईश्वरीय संकेत था जो कह रहा था कि अपने निर्णय पर विचार करो?

मुझे पाँच तारीख याद आ गई जब सुबह आफिस जाते समय हसबैंड ने सीना दबाया था। वह प्रथम ईश्वरीय संकेत था जिसे नजरअंदाज किया गया। दूसरा था जब पतिदेव आफिस में सीढ़ियों से चढ़े और हाँफने लगे थे लेकिन वे रुके नहीं और काम करते रहे। उन्होंने किसी को भी अपनी तकलीफ के बारे में नहीं बताया। अगर बताया होता तो कोई उन्हें डाक्टर के पास ले जाता उसी समय ईसीजी हो जाता तो शायद अटैक नहीं आता और हार्ट को नुकसान नहीं होता। अटैक के बिना भी एंजियोग्राफी करवा लेते।

कल रात जो हुआ वह भी ईश्वरीय संकेत था। शरीर ने अपने संकेत भेजे हैं क्या इन्हें नजरअंदाज करना ठीक होगा?

इतना बड़ा आपरेशन पूरे शरीर को खोलना उसमें से हार्ट को बाहर निकालना। आपरेशन के बाद लंबी देखभाल और जीवन चक्र में इतने आकस्मिक बदलाव। अब न वह बेफिक्री रहेगी न स्वतंत्रता कि कभी भी कहीं भी घूमने फिरने चल दो कितनी भी गाड़ी चलाओ जहाँ जो मिले खाओ पियो। सोच सोच कर रोना आ रहा था लेकिन रो नहीं सकती थी। यह समय कमजोर पड़ने का नहीं है। 

थोड़ी देर पतिदेव से बातचीत की क्या हो रहा था कैसा लग रहा था? क्या करें आपरेशन की डेट ले लें क्या? अभी तीन चार दिन डाक्टर यहाँ हैं फिर वे बाहर चले जाएंगे। एक और डाक्टर का ओपिनियन लेने का विचार था लेकिन वह जिस हास्पिटल में आपरेशन करते हैं उसकी अच्छी रिपोर्ट नहीं थी इसलिए मन आगे पीछे हो रहा था।

लगभग ग्यारह बजे मैंने मम्मी पापा जी को फोन किया रात में क्या हुआ और आगे क्या करें का विचार करना है तो आप लोग आ जाओ। उन्हें बताते बताते रोना आ गया। आज सुबह बिटिया भी पूना से इंदौर आने के लिए निकली थी। वह अपनी गाड़ी से आ रही थी। उससे भी सतत संपर्क बना हुआ था लेकिन उसे अभी तक कुछ नहीं बताया था।

मैं खाना बनाने की तैयारी में जुट गई। पतिदेव ने तब तक मेडीकल क्लेम के लिए एजेंट को फोन किया। उसने हास्पिटल में डाक्टर के असिस्टेंट को फोन किया और जो भी जरूरी पेपर्स लगने थे उनकी स्कैन कापी उसे भेजीं। खाना बनने खाने तक लगभग तय हो गया कि अगले दिन ही हास्पिटल में एडमिट होना है ताकि उसके अगले दिन यानि कि रूपचौदस के दिन बायपास सर्जरी हो सके।

अभी दिन उगे बमुश्किल पांच घंटे हुए थे हमें उठे शायद चार घंटे ही हुए थे। एक रात पहले सोच कर सोये थे कि आपरेशन दस पंद्रह दिन बाद करवाएंगे। रात में विचार डगमगाया। सुबह सब ठीक था और मात्र तीन चार घंटे में बायपास करवाना है यह लगभग तय हो गया था।

दो बजे तक मम्मी पापा जी आ गये ।उन्हें भी बताया कि अब और ओपिनियन के लिए रुकने का समय नहीं है। वैसे भी एंजियोग्राफी करने वाले डाक्टर ने भाभी ने उनकी बहन जो हार्ट सर्जन हैं उन्होंने और कल डाक्टर श्रीवास्तव ने बायपास के लिए ही कहा है तो अब करवा लेना ही बेहतर है।

दरअसल कुछ दिन रुकने का एक कारण यह भी था कि भाई तीन साल बाद नाइजीरिया से वापस आया था और हम चाह रहे थे कि वह अपने परिवार के साथ दीपावली मना ले। आपरेशन के कारण वह परिवार के पास नहीं जा पाता जो दूसरे शहर में रहता है। लेकिन अब परिस्थितियां ऐसी बन गई थीं कि रुकना संभव नहीं था। रात बड़ी भयावह थी जिस तरह की असहायता महसूस की थी और जिस गंभीर स्थिति की आशंका अब बन गई थी उसके बाद तुरंत बायपास ही उचित था।

पापाजी ने भी कहा कि दीपावली तो हर साल आएंगी। भाई से बात की तो वह भी बोला मेरे और दीपावली के लिए मत रुको जो जरूरी है वह करो। भाभी से बात हुई उन्होंने भी कहा कि नहीं स्थिति ठीक नहीं है देर मत करो।

शाम को बिटिया के आने का समय होने को था मैं खाने की तैयारी में लग गई। दिन भर के लंबे सफर के बाद वह थकी होगी। अगले दिन सुबह हास्पिटल जाने की तैयारी भी करना था।

पाँच बजे बिटिया आ गई ।वह नाना-नानी को देखकर चौंकी। हालचाल पूछने के बाद उसे बताया कि कल पापा को एडमिट होना है परसों बायपास है।

चौंक गई वह भी सब कुछ अचानक लेकिन जल्दी ही संभल गई ठीक है क्या तैयारी करना है बताओ।

छोटी बेटी को भी फोन करके बताया कि पापा का आपरेशन करने का डिसाइड किया है और कल एडमिट हो जाएंगे। थोड़ी देर में उसने अपने दोस्तों से और गूगल पर आपरेशन के बारे में पता किया और हमें हौसला देने लगी कि सब ठीक होगा। वह बड़ी कुशलता से अपने डर और तनाव को छुपा रही थी। 

खाना खाते नौ बज गये। सुबह की तैयारी करके रख दीं थोड़ी देर टीवी देखा आज का दिन भी बेहद लंबा और व्यस्त रहा।  रात में थोड़ी देर पतिदेव के पास बैठी। मन का डर जुबान पर आ ही गया। तुम ठीक हो जाओगे न? बस जो भी हो ठीक हो जाना कहते कहते रोना आ ही गया।

हम दोनों देर तक एक दूसरे का हाथ थामे बैठे रहे।

रात बारह बजे अचानक नींद खुल गई। एक रात पहले का वह पल ही था जिसने जगा दिया। करीब एक घंटे तक पतिदेव के चेहरे को देखती रही। उनकी साँसों की गति माथे का ताप सभी नार्मल था कि अचानक उनकी नींद खुल गई। फिर वही दर्द वही बैचेनी। मैंने उठकर गर्म पानी दिया। वे टायलेट गये लेकिन बैचेनी दूर नहीं हुई। मन हुआ सुबह का इंतजार क्यों अभी हास्पिटल चलें। वे कभी लेटते कभी बैठते कभी गर्म पानी पीते कभी डकार लेने की कोशिश करते। मैं कभी उनकी पीठ पर हाथ फेरती कभी हाथ थामे बैठती भगवान का स्मरण लगातार करती रही हे ईश्वर रात ठीक से गुजर जाये।

ईश्वर ने सुन ही लिया। दिन भर की थकी हारी बिटिया को नींद से नहीं जगाना पड़ा। थोड़ी देर में पतिदेव सो गये मैं देर तक जागती रही।

#बायपास #bypass #minor_attack 

Monday, January 11, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 6

 10 नवंबर 2020 

चार दिन बाद सुकून से नींद आई। सुबह जल्दी ही आँख खुल गई। हास्पिटल में सोशल मीडिया पर बात करते एक वैद्य का पता मिला था जिनकी बहुत तारीफ मेरी एक दोस्त ने की थी। मैंने फोन पर बात करके पूछा था कि क्या हार्ट प्राब्लम की दवा आयुर्वेद में है? उन्होंने आज बुलाया था। जाने के पहले जल्दी जल्दी घर के काम निपटाए। कोरोना के चलते अभी कोई हाउस हेल्प भी नहीं थी और अब तक पतिदेव जिन कामों में सहयोग दे देते थे वह भी कोई सहयोग नहीं कर पा रहे थे। साफ सफाई के साथ ही खाने की तैयारी पूरी की ताकि आते ही खाना बना सकूं। आयुर्वेद में नब्ज देखने का महत्व है इसलिए खाली पेट ही जाना था जबकि कुछ दवाएं जो चल रही थीं उन्हें नाश्ते के बाद ही लेना था। वैद्य जी से बात की तो उन्होंने कहा कि अन्न न खाएं कुछ और खाकर दवाइयाँ ले लें।

औषधालय घर से दूर था और मेन मार्केट में था जहाँ गाड़ी की पार्किंग मिलना मुश्किल था। हमने मेन मार्केट से दूर एक पार्किंग में गाड़ी खड़ी की और वहाँ से आटो करके औषधालय पहुँचे। नब्ज देखकर थोड़ी देर बातचीत करके और बहुत देर तक खुद की तारीफ करने के बाद दवाइयाँ दीं जिन्हें लेकर हम घर जाने के लिए निकले।

पतिदेव की गाड़ी अभी भी बाम्बे हास्पिटल में खड़ी थी जिसे लेने जाना था। वहाँ हुए कुछ टेस्ट की रिपोर्ट भी मिली नहीं थीं इसलिए लौटते में बाम्बे हास्पिटल गये। वहाँ देर तक इस डिपार्टमेंट से उस डिपार्टमेंट में घूमते रहे लेकिन कोई जिम्मेदारी से जवाब नहीं दे रहा था। अंततः एक व्यक्ति को कुछ तरस आया और उसने हस्तक्षेप किया और ईसीजी की रिपोर्ट और एक्सरे की रिपोर्ट दिलवाई लेकिन एक्सरे फिल्म नहीं मिली। 

इसी समय डाक्टर से मिले और अनायास मैंने पूछा वर्माजी गाड़ी चला सकते हैं? उन्होंने कहा असंभव। अब गाड़ी ले जाने का सवाल ही नहीं था हम घर आ गये। 

 काफी देर हो गई थी आते ही खाना बनाया और दोपहर में थोड़ी देर आराम किया।

शाम को पांच बजे मेदांता हास्पिटल के हार्ट सर्जन डॉ श्रीवास्तव से अपॉइंटमेंट था। उन्हें दिखाने के लिए एंजियोग्राफी की सीडी ले जाना था। हमने सीडी देखने के लिए लैपटॉप में चलाई लेकिन वह प्ले ही नहीं हो रही थी। बहुत कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। इसी वक्त पंजाब से भतीजे का फोन आया। वह साफ्टवेयर इंजीनियर है। जरूरी हालचाल बता कर उससे कहा कि यह सीडी कैसे चलेगी बताओ। सीडी डाउनलोड करके उसे भेजी। उसने थोड़ी देर देखा फिर फोन करके बताया कि क्या कैसे करना है। पांच बजने वाले थे फिर जल्दी से तैयार हुए हास्पिटल जाने के लिए। पतिदेव ने एक ड्राइवर बुलवा लिया था जो गाड़ी से हमें लेकर हास्पिटल पहुँचा।

वहाँ ओपीडी का रजिस्ट्रेशन करवाकर ऊपर गये तो डॉक्टर के असिस्टेंट ने कहा कि एक्सरे करवाइये। मरीज का कोरोना टेस्ट के लिए एक्सरे जरूरी है। बाम्बे हास्पिटल में तीन-चार एक्सरे हुए थे लेकिन सभी उन्होंने रख लिये थे। सिर्फ रिपोर्ट देखकर वे लोग मानने को तैयार ही नहीं थे। मैंने उनसे कहा कि आपके हाथ में पेपर्स हैं जो बता रहे हैं कि पेशेंट कल तक हास्पिटल में एडमिट थे और वह भी हार्ट प्राब्लम के लिए। सारी दवाइयाँ हार्ट प्राब्लम की हैं कोई भी कोरोना की दवा नहीं है। इसका यह अर्थ है कि पेशेंट को कोरोना नहीं है। आप मेरी बात न माने लेकिन आपके हाथ में जो पेपर्स हैं वह आपके प्रोफेशन के लोगों द्वारा बनाए गये हैं उनकी बात तो मानें। ये पेपर्स बाम्बे हास्पिटल के हैं कोई गली कूचे के छोटे से हास्पिटल के तो नहीं हैं।

मेरे तर्क ने उन्हें सोचने को मज़बूर किया और वे बिना एक्सरे डाक्टर को दिखाने पर सहमत हो गये। डाक्टर के केबिन में सीडी लैपटॉप पर लगा कर देखी जा चुकी थी। हम गये तब तक वे देख चुके थे। उनके सामने एक बड़ा सा शीशा लगा था। हम उनसे कम से कम आठ फीट दूर बैठे थे। शीशे के उस पार डाक्टर ने फेसशील्ड लगा रखी थी। देख कर हँसी भी आई कि इतने सब के बाद अगर कोरोना पेशेंट भी होगा तो उसके विषाणु कैसे डाक्टर तक पहुँचेंगे?

मजे की बात यह कि चेस्ट एक्सरे सिर्फ पेशेंट का होता जबकि अटेंडेंट यानि की मेरा नहीं होता और मैं भी उसी केबिन में बैठी थी।

डाॅ ने कुछ प्रश्न पूछे और बताया कि यह हाई रिस्क सर्जरी है और तुरंत करवाना चाहिये। साथ ही बताया कि वे अगले किन किन दिनों में आपरेशन कर सकते हैं। उसके बाद वे एक हफ्ते के लिए देश से बाहर जाने वाले थे।

मैंने उनसे पूछा कि अगर हम आठ दस या पंद्रह दिन रुकते हैं फिर आपरेशन करवाते हैं तो रिस्क फैक्टर क्या होंगे?

अगला अटैक मेजर हार्ट अटैक होगा।

इस बात ने तो जैसे साँस ही रोक दी।

यह अटैक हो सकता है अगले पांच दस या पंद्रह दिनों में आ जाये या शायद पाँच साल तक न आये कुछ कह नहीं सकते। 

सच ही था कैसे कहा जा सकता है कि शरीर के अंदर किसी अनजानी शक्ति से चलती मशीनरी कब क्या रंग दिखाएगी? 

किसे पता था कि आठ दिन पहले डेढ़ घंटे तक बैडमिंटन खेलने वाले व्यक्ति की तीनों आर्टरी सिकुड़ गई हैं और अब बायपास ही एकमात्र इलाज है। यह बात बेहद डरावनी थी। 

आप वेन्स का बायपास करेंगे या आर्टरी का यह पूछने पर डाक्टर अचानक चौंक गये । इतने टैक्नीकल प्रश्न की उम्मीद उन्हें नहीं थी लेकिन क्षणांश में उन्होंने खुद को संभाल लिया फिर बहुत धैर्य और शांति से बताया कि वैसे तो वेन्स का ट्रांसप्लांट भी कई मामलों में अच्छा रहता है। वह भी काफी समय चलता है लेकिन आर्टरी का ट्रांसप्लांट भी कर सकते हैं। इसमें दो आर्टरी चेस्ट से और एक हाथ से निकाली जायेगी।

हार्ट के आपरेशन के एक हफ्ते पहले खून को पतला करने वाली दवाइयाँ बंद कर दी जाती हैं लेकिन कभी-कभी जरूरी होता है तो एक दो दिन पहले बंद करके भी आपरेशन किया जा सकता है। आप लोग जैसा भी डिसाइड करें बता दें। अभी दीवाली आने वाली है वह सब आप लोग देखें हम तो दीवाली के दिन भी आपरेशन करते हैं। 

इसके बाद डाक्टर के असिस्टेंट ने हमें आपरेशन के कितने पहले एडमिट होना कितने दिन रहना कितना खर्च क्या प्रोसेस सभी कुछ बताया। वहाँ से बाहर निकले तो दिल में बड़ा असमंजस था।

ड्राइवर गाड़ी लेकर आ गया और हम वहाँ से निकल कर बाम्बे हास्पिटल गये। वहाँ मैंने अपनी गाड़ी ली और ड्राइवर ने पतिदेव की गाड़ी ली और हम घर आ गये ।

आज का पूरा दिन बेहद व्यस्त और पल पल मन के विचार बदलने वाला था। सुबह आयुर्वेद पर विश्वास कर मन में जो आशा बँधी थी वह शाम तक डाक्टर की सलाह और चेतावनी के बाद डगमगा गई थी।

दिन भर की भागदौड़ के बाद भी पतिदेव को कोई थकान कोई शिथिलता नहीं थी। यह देखकर भी लगा कि शायद हम लोग कुछ ज्यादा सीरियस हो रहे हैं ऐसी भी गंभीर बात नहीं है। 

घर आकर थोड़ा आराम किया खाना बनाया पापाजी को फोन किया और बताया कि डाक्टर ने क्या कहा है। अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा है आयुर्वेद की दवाइयां शुरू करते हैं फिर दीवाली के बाद ही आपरेशन का सोचेंगे मैंने कहा। पापाजी भी इससे संतुष्ट ही दिखे।

रात में खाना खाकर थोड़ी देर टीवी देखा फिर सो गये।

लगभग डेढ़ बजे नींद खुली देखा पतिदेव बाथरूम जा रहे हैं। मैंने पूछा मैं चलूँ तो बोले नहीं। वहाँ से काफी देर में वापस आये और फिर बिस्तर में बैठे रहे।

 क्या हुआ?

कुछ अजीब सा लग रहा है शायद पेट दर्द हो रहा है। 

गैस तो नहीं बन रही? 

समझ नहीं आ रहा है थोड़ा गर्म पानी दे दो गैस पास हो जायेगी। 

मैंने पानी गर्म करके लाकर दिया। उसे पीकर वे वज्रासन में बैठ गये लेकिन अजीब सा दर्द घबराहट हो रही थी। मैंने माथे पर हाथ फेरा यह क्या उन्हें ठंडा पसीना आ रहा था। ठंडा पसीना अगला मेजर अटैक डाक्टर की बात दिमाग में गूँज गई। 

पता नहीं क्या है यह ऐसे में टहलने को भी नहीं कह सकते और क्या करें यह भी समझ नहीं आ रहा है। गाड़ी निकालूं हास्पिटल ले चलूँ या एंबुलेंस को फोन करूँ। दिमाग कुछ सोच नहीं पा रहा था। कभी उन्हें पानी देती कभी माथे पर हाथ फेरती तो कभी हास्पिटल जाने का विचार करती पतिदेव से पूछती हास्पिटल चलें क्या और वे चुप। खुद ही नहीं समझ पा रहे थे क्या कहें क्या करें? ये अटैक का दर्द है या गैस का? 

लगभग पंद्रह बीस मिनट यह असमंजस रहा फिर उन्हें कुछ ठीक लगने लगा और वे सो गये। मैं देर तक जाग कर उनके माथे पर हाथ फेरकर देखती रही कभी उनकी साँसों की गति देखती सुनती रही। वे चैन से सो रहे थे जब यह आश्वस्ति हुई तब पता नहीं कब मेरी आँख लग गई। 

कविता वर्मा 
#बायपास #bypass #minor_attack 

Friday, January 8, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 6

 10 नवंबर 2020 

चार दिन बाद सुकून से नींद आई। सुबह जल्दी ही आँख खुल गई। हास्पिटल में सोशल मीडिया पर बात करते एक वैद्य का पता मिला था जिनकी बहुत तारीफ मेरी एक दोस्त ने की थी। मैंने फोन पर बात करके पूछा था कि क्या हार्ट प्राब्लम की दवा आयुर्वेद में है? उन्होंने आज बुलाया था। जाने के पहले जल्दी जल्दी घर के काम निपटाए। कोरोना के चलते अभी कोई हाउस हेल्प भी नहीं थी और अब तक पतिदेव जिन कामों में सहयोग दे देते थे वह भी कोई सहयोग नहीं कर पा रहे थे। साफ सफाई के साथ ही खाने की तैयारी पूरी की ताकि आते ही खाना बना सकूं। आयुर्वेद में नब्ज देखने का महत्व है इसलिए खाली पेट ही जाना था जबकि कुछ दवाएं जो चल रही थीं उन्हें नाश्ते के बाद ही लेना था। वैद्य जी से बात की तो उन्होंने कहा कि अन्न न खाएं कुछ और खाकर दवाइयाँ ले लें।

औषधालय घर से दूर था और मेन मार्केट में था जहाँ गाड़ी की पार्किंग मिलना मुश्किल था। हमने मेन मार्केट से दूर एक पार्किंग में गाड़ी खड़ी की और वहाँ से आटो करके औषधालय पहुँचे। नब्ज देखकर थोड़ी देर बातचीत करके और बहुत देर तक खुद की तारीफ करने के बाद दवाइयाँ दीं जिन्हें लेकर हम घर जाने के लिए निकले।

पतिदेव की गाड़ी अभी भी बाम्बे हास्पिटल में खड़ी थी जिसे लेने जाना था। वहाँ हुए कुछ टेस्ट की रिपोर्ट भी मिली नहीं थीं इसलिए लौटते में बाम्बे हास्पिटल गये। वहाँ देर तक इस डिपार्टमेंट से उस डिपार्टमेंट में घूमते रहे लेकिन कोई जिम्मेदारी से जवाब नहीं दे रहा था। अंततः एक व्यक्ति को कुछ तरस आया और उसने हस्तक्षेप किया और ईसीजी की रिपोर्ट और एक्सरे की रिपोर्ट दिलवाई लेकिन एक्सरे फिल्म नहीं मिली। 

इसी समय डाक्टर से मिले और अनायास मैंने पूछा वर्माजी गाड़ी चला सकते हैं? उन्होंने कहा असंभव। अब गाड़ी ले जाने का सवाल ही नहीं था हम घर आ गये। 

 काफी देर हो गई थी आते ही खाना बनाया और दोपहर में थोड़ी देर आराम किया।

शाम को पांच बजे मेदांता हास्पिटल के हार्ट सर्जन डॉ श्रीवास्तव से अपॉइंटमेंट था। उन्हें दिखाने के लिए एंजियोग्राफी की सीडी ले जाना था। हमने सीडी देखने के लिए लैपटॉप में चलाई लेकिन वह प्ले ही नहीं हो रही थी। बहुत कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। इसी वक्त पंजाब से भतीजे का फोन आया। वह साफ्टवेयर इंजीनियर है। जरूरी हालचाल बता कर उससे कहा कि यह सीडी कैसे चलेगी बताओ। सीडी डाउनलोड करके उसे भेजी। उसने थोड़ी देर देखा फिर फोन करके बताया कि क्या कैसे करना है। पांच बजने वाले थे फिर जल्दी से तैयार हुए हास्पिटल जाने के लिए। पतिदेव ने एक ड्राइवर बुलवा लिया था जो गाड़ी से हमें लेकर हास्पिटल पहुँचा।

वहाँ ओपीडी का रजिस्ट्रेशन करवाकर ऊपर गये तो डॉक्टर के असिस्टेंट ने कहा कि एक्सरे करवाइये। मरीज का कोरोना टेस्ट के लिए एक्सरे जरूरी है। बाम्बे हास्पिटल में तीन-चार एक्सरे हुए थे लेकिन सभी उन्होंने रख लिये थे। सिर्फ रिपोर्ट देखकर वे लोग मानने को तैयार ही नहीं थे। मैंने उनसे कहा कि आपके हाथ में पेपर्स हैं जो बता रहे हैं कि पेशेंट कल तक हास्पिटल में एडमिट थे और वह भी हार्ट प्राब्लम के लिए। सारी दवाइयाँ हार्ट प्राब्लम की हैं कोई भी कोरोना की दवा नहीं है। इसका यह अर्थ है कि पेशेंट को कोरोना नहीं है। आप मेरी बात न माने लेकिन आपके हाथ में जो पेपर्स हैं वह आपके प्रोफेशन के लोगों द्वारा बनाए गये हैं उनकी बात तो मानें। ये पेपर्स बाम्बे हास्पिटल के हैं कोई गली कूचे के छोटे से हास्पिटल के तो नहीं हैं।

मेरे तर्क ने उन्हें सोचने को मज़बूर किया और वे बिना एक्सरे डाक्टर को दिखाने पर सहमत हो गये। डाक्टर के केबिन में सीडी लैपटॉप पर लगा कर देखी जा चुकी थी। हम गये तब तक वे देख चुके थे। उनके सामने एक बड़ा सा शीशा लगा था। हम उनसे कम से कम आठ फीट दूर बैठे थे। शीशे के उस पार डाक्टर ने फेसशील्ड लगा रखी थी। देख कर हँसी भी आई कि इतने सब के बाद अगर कोरोना पेशेंट भी होगा तो उसके विषाणु कैसे डाक्टर तक पहुँचेंगे?

मजे की बात यह कि चेस्ट एक्सरे सिर्फ पेशेंट का होता जबकि अटेंडेंट यानि की मेरा नहीं होता और मैं भी उसी केबिन में बैठी थी।

डाॅ ने कुछ प्रश्न पूछे और बताया कि यह हाई रिस्क सर्जरी है और तुरंत करवाना चाहिये। साथ ही बताया कि वे अगले किन किन दिनों में आपरेशन कर सकते हैं। उसके बाद वे एक हफ्ते के लिए देश से बाहर जाने वाले थे।

मैंने उनसे पूछा कि अगर हम आठ दस या पंद्रह दिन रुकते हैं फिर आपरेशन करवाते हैं तो रिस्क फैक्टर क्या होंगे?

अगला अटैक मेजर हार्ट अटैक होगा।

इस बात ने तो जैसे साँस ही रोक दी।

यह अटैक हो सकता है अगले पांच दस या पंद्रह दिनों में आ जाये या शायद पाँच साल तक न आये कुछ कह नहीं सकते। 

सच ही था कैसे कहा जा सकता है कि शरीर के अंदर किसी अनजानी शक्ति से चलती मशीनरी कब क्या रंग दिखाएगी? 

किसे पता था कि आठ दिन पहले डेढ़ घंटे तक बैडमिंटन खेलने वाले व्यक्ति की तीनों आर्टरी सिकुड़ गई हैं और अब बायपास ही एकमात्र इलाज है। यह बात बेहद डरावनी थी। 

आप वेन्स का बायपास करेंगे या आर्टरी का यह पूछने पर डाक्टर अचानक चौंक गये । इतने टैक्नीकल प्रश्न की उम्मीद उन्हें नहीं थी लेकिन क्षणांश में उन्होंने खुद को संभाल लिया फिर बहुत धैर्य और शांति से बताया कि वैसे तो वेन्स का ट्रांसप्लांट भी कई मामलों में अच्छा रहता है। वह भी काफी समय चलता है लेकिन आर्टरी का ट्रांसप्लांट भी कर सकते हैं। इसमें दो आर्टरी चेस्ट से और एक हाथ से निकाली जायेगी।

हार्ट के आपरेशन के एक हफ्ते पहले खून को पतला करने वाली दवाइयाँ बंद कर दी जाती हैं लेकिन कभी-कभी जरूरी होता है तो एक दो दिन पहले बंद करके भी आपरेशन किया जा सकता है। आप लोग जैसा भी डिसाइड करें बता दें। अभी दीवाली आने वाली है वह सब आप लोग देखें हम तो दीवाली के दिन भी आपरेशन करते हैं। 

इसके बाद डाक्टर के असिस्टेंट ने हमें आपरेशन के कितने पहले एडमिट होना कितने दिन रहना कितना खर्च क्या प्रोसेस सभी कुछ बताया। वहाँ से बाहर निकले तो दिल में बड़ा असमंजस था।

ड्राइवर गाड़ी लेकर आ गया और हम वहाँ से निकल कर बाम्बे हास्पिटल गये। वहाँ मैंने अपनी गाड़ी ली और ड्राइवर ने पतिदेव की गाड़ी ली और हम घर आ गये ।

आज का पूरा दिन बेहद व्यस्त और पल पल मन के विचार बदलने वाला था। सुबह आयुर्वेद पर विश्वास कर मन में जो आशा बँधी थी वह शाम तक डाक्टर की सलाह और चेतावनी के बाद डगमगा गई थी।

दिन भर की भागदौड़ के बाद भी पतिदेव को कोई थकान कोई शिथिलता नहीं थी। यह देखकर भी लगा कि शायद हम लोग कुछ ज्यादा सीरियस हो रहे हैं ऐसी भी गंभीर बात नहीं है। 

घर आकर थोड़ा आराम किया खाना बनाया पापाजी को फोन किया और बताया कि डाक्टर ने क्या कहा है। अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा है आयुर्वेद की दवाइयां शुरू करते हैं फिर दीवाली के बाद ही आपरेशन का सोचेंगे मैंने कहा। पापाजी भी इससे संतुष्ट ही दिखे।

रात में खाना खाकर थोड़ी देर टीवी देखा फिर सो गये।

लगभग डेढ़ बजे नींद खुली देखा पतिदेव बाथरूम जा रहे हैं। मैंने पूछा मैं चलूँ तो बोले नहीं। वहाँ से काफी देर में वापस आये और फिर बिस्तर में बैठे रहे।

 क्या हुआ?

कुछ अजीब सा लग रहा है शायद पेट दर्द हो रहा है। 

गैस तो नहीं बन रही? 

समझ नहीं आ रहा है थोड़ा गर्म पानी दे दो गैस पास हो जायेगी। 

मैंने पानी गर्म करके लाकर दिया। उसे पीकर वे वज्रासन में बैठ गये लेकिन अजीब सा दर्द घबराहट हो रही थी। मैंने माथे पर हाथ फेरा यह क्या उन्हें ठंडा पसीना आ रहा था। ठंडा पसीना अगला मेजर अटैक डाक्टर की बात दिमाग में गूँज गई। 

पता नहीं क्या है यह ऐसे में टहलने को भी नहीं कह सकते और क्या करें यह भी समझ नहीं आ रहा है। गाड़ी निकालूं हास्पिटल ले चलूँ या एंबुलेंस को फोन करूँ। दिमाग कुछ सोच नहीं पा रहा था। कभी उन्हें पानी देती कभी माथे पर हाथ फेरती तो कभी हास्पिटल जाने का विचार करती पतिदेव से पूछती हास्पिटल चलें क्या और वे चुप। खुद ही नहीं समझ पा रहे थे क्या कहें क्या करें? ये अटैक का दर्द है या गैस का? 

लगभग पंद्रह बीस मिनट यह असमंजस रहा फिर उन्हें कुछ ठीक लगने लगा और वे सो गये। मैं देर तक जाग कर उनके माथे पर हाथ फेरकर देखती रही कभी उनकी साँसों की गति देखती सुनती रही। वे चैन से सो रहे थे जब यह आश्वस्ति हुई तब पता नहीं कब मेरी आँख लग गई। 

#बायपास #bypass #minor_attack 


Tuesday, January 5, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 5

 

8 /9 नवंबर 2020
देर रात रूम में आने के बाद शुगर बीपी टेस्ट फाइल का, दवाइयों का हैंड ओवर आदि करते साढ़े बारह एक बज गये। रात सुकून से गुजरी हालाँकि नई जगह नींद आसानी से नहीं आती लेकिन फिर भी बहुत ज्यादा देर जागरण नहीं करना पड़ा। यह शायद दिन भर के तनाव और थकान के कारण हुआ कि नींद लग गई।
सुबह पांच बजे से हलचल शुरू हो गई स्पंज बेड क्लीनिंग बीपी शुगर टेस्ट। थोड़ी देर लेटे रहने की कोशिश की लेकिन बार बार किसी के आने-जाने से लेटना कहाँ हो पाता है इसलिए उठ जाना ही ठीक लगा।
कमरे की खिड़की से सोये अलसाये शहर का नजारा बहुत खूबसूरत था। हालाँकि दूर तक फैली धूल की लेयर इस आनंद में खलल डाल रही थी फिर भी बारहवीं मंजिल से शांत शहर को देखना खूबसूरत अहसास देता है। जल्दी ही सड़क पर ट्रैफिक शुरू हो गया था धूप धीरे-धीरे मकानों की छत से उतरते हुए दीवारों पर उतरते हुए सड़क पर गई थी। नाश्ता चाय अभी तक नहीं आया था। हसबैंड को तेज भूख लगने लगी। बाहर से कुछ लाना संभव नहीं था और अंदर कैंटीन पर ही निर्भर थे।
चाय नाश्ता करके स्नान किया तब तक हसबैंड के कलीग आ गये। उनसे देर तक बात हुई जिसमें एक दिन पहले उस डाक्टर की बदतमीजी के बारे में भी बात हुई। मुख्यतः वे मुझे शांत रहने और शिकायत न करने के लिए ही समझाते रहे। यह तो तय था कि उस डाक्टर को समझ आ गया था कि उसने बड़ी गलती कर दी है लेकिन मानें किस मुँह से। खैर मैं तो अभी सामने आई समस्या के समाधान में व्यस्त थी ऐसे में छोटी मोटी बातों के लिए समय कहाँ था?
दोपहर में डाक्टर राउंड पर आये उन्होंने बताया कि वे आज ही डिस्चार्ज पेपर बना कर दे देंगे। कल दिन में डिस्चार्ज हो जायेगा। आगे बायपास के बारे में क्या सोचा है आदि के बारे में बात करते रहे। मैंने बताया कि सेकेंड ओपिनियन ले रहे हैं फिर डिसाइड करेंगे।
मैं एक दिन पहले ही मेदांता हास्पिटल में फोन करके मंगलवार का अपॉइंटमेंट ले चुकी थी। हास्पिटल से तो सोमवार को डिस्चार्ज होना था लेकिन पिछले तीन बार के मेडीक्लेम के कटु अनुभवों ने बताया था कि लगभग पूरा दिन निकल जाता है क्लेम क्लीयर होने में इसलिए एक दिन बाद का ही लेना ठीक है।
रविवार का पूरा दिन आराम करते बीता। हसबैंड अच्छा महसूस कर रहे थे कुछ देर सोते कुछ देर खिड़की से बाहर देखते बातचीत करते दिन कट गया।
9 नवंबर 2020
सोमवार की सुबह से एक आस जगी कि आज तो घर चले जाएंगे। चाय नाश्ते के बाद इंतजार शुरू हुआ डिस्चार्ज का जो दोपहर के बाद देर शाम तक जारी रहा। शाम को तीस हजार रुपये जमा करने का संदेश आया। हसबैंड ने सारी जानकारी निकलवाई। पता चला कि प्रायवेट रूम होने से आईसीयू का पैसा भी फर्स्ट क्लास का जोड़ा गया था। जो दस हजार जमा किये थे वे भी समायोजित नहीं किये गये थे।
मेरा सब्र अब खत्म होने लगा था। हसबैंड ने दो तीन बार फोन पर बात की फिर खुद ही लिफ्ट से नीचे टीपीए डिपार्टमेंट में गये। वहाँ उन्हें लगभग पौन एक घंटा लग गया। कमरे में बैठे बैठे मेरा दिल घबराने लगा। अभी तीन दिन पहले ही अटैक आया है और इतनी भागदौड़ बहस। मेडीक्लेम की कैशलेस पालिसी के बावजूद हजारों का बिल होता ही है। इतने सबके बावजूद लगभग सत्ताईस हजार रुपये भरने थे जो जमा कर दिये।
यहाँ भी एक पेंच था कि जितने भी टेस्ट हुए हैं उनकी रिपोर्ट हमें नहीं दी गई। कहा गया कि वे मेडीक्लेम के लिए जमा होंगीं। जबकि तय था कि आगे अभी और इलाज करवाना है जिसमें ईसीजी चेस्ट एक्सरे सभी लगेंगे लेकिन और कोई रास्ता नहीं था। मेडीक्लेम कंपनियों और हास्पिटल की जुगलबंदी आपको बंधक बना लेती है और आप पालिसी होने के बावजूद अपनी ही चीजों से वंचित किये जाते हैं।
रात के खाने का समय हो गया था आसपास के कमरों में खाना आ रहा था। मैंने कैंटीन फोन लगाया और खाना भिजवाने को कहा। वहाँ से जवाब मिला आपका तो डिस्चार्ज हो गया है सुनकर खून खौल गया।
नहीं भैया कहाँ हुआ डिस्चार्ज अभी तो हम यहीं हैं अभी पेपर क्लीयर नहीं हुए हैं। अब बाहर का खाना लाने नहीं देते यहाँ खाना भिजवाते नहीं हैं तो पेशेंट को क्या भूखा रखोगे?
नहीं नहीं मैडम मैं खाना भिजवा देता हूँ। खैर थोड़ी देर में खाना आ गया। एक एक्स्ट्रा थाली के पैसे दिये और खाना खाया। रात के आठ बज गये थे इंतजार करते करते थक चुके थे अब घर जाकर खाना बनाना संभव नहीं था।
काउंटर पर बता दिया कि पैसे भर दिये हैं लेकिन देर तक कोई नर्स ड्रिप के लिए लगाई निडिल निकालने नहीं आई। मैं दो बार काउंटर पर जा चुकी थी। धैर्य चूकने को था मन चिल्लाने का हो रहा था बस और थोड़ी देर कह कहकर खुद को समझा रही थी।
निडिल निकलने के बाद दवाइयों के डोज के लिए फिर काउंटर पर गई। नर्स को रूम में आकर दवाइयाँ बताने में जोर आ रहा था। ये बची हुई दवाइयाँ थीं कुछ के नाम फट चुके थे ऐसे में फाइल पर देखकर दवाई समझना मुश्किल था। उसका बना हुआ मुँह देखकर फिर गुस्सा आने को हुआ लेकिन चुप ही रही।
अंततः रात लगभग नौ बजे हम घर पहुंचे जबकि शनिवार से डिस्चार्ज तय था और रविवार को पेपर्स भेजे जा चुके थे।
घर आकर राहत की सांस ली।
कविता वर्मा

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#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...