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Sunday, December 11, 2011

.दुखवा कासे कहूँ ???



वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो
की  इच्छा  को
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए . 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...