Saturday, April 10, 2021

ये इत्तेफाक है या कुछ और

 आप लोग इत्तेफाक में विश्वास रखते हैं या नहीं? अगर नहीं रखते तो इस किस्से को पढ़कर बताइये कि यह क्या है?


अभी कुछ दिन पहले मैं पतिदेव की पोस्टिंग वाले शहर में रहने चली गई। अभी तक तो उनका बैचलर्स अपार्टमेंट था सिंगल बेड से काम चल रहा था। मेरे जाने के बाद दो अलग-अलग डील डौल आकार के पलंग बदलने की जरूरत महसूस हुई। तो हम लोग शहर की एक दुकान पर डबल बेड देखकर आये। चूँकि हमारा वहाँ रहना लाॅकडाउन के कारण कुछ दिन टल गया तो हमने सोचा पलंग देख लेते हैं और जब लगेगा खरीद लेंगे।

उसी दिन सुबह हमने सोचा कि एक्स्ट्रा पलंग एक परिचित को अगर जरूरत हुई तो दे देते हैं इस बारे में हमने उनसे फोन पर बात भी की। साथ ही यह भी बताया कि वे जब चाहे बता दें और पलंग ले जाएं।

सभी बातें तय हो गई।

उसी दिन दोपहर में मेरे नंबर पर एक फोन आया "मैम आपने पलंग का आर्डर दिया था उसकी डिलीवरी कब करना है?

यह चौंकाने वाला था क्योंकि अभी तक हमने कोई आर्डर नहीं दिया था। दूसरी बात कि दुकानदार के पास मेरा फोन नंबर कैसे आया? क्योंकि अनजान लोगों को मेरा नंबर नहीं देती हूँ खासकर जब हसबैंड भी साथ में डील कर रहे हैं।

"मैंने कहा कि अभी हम तुरंत नहीं ले रहे हैं आपको दो चार दिन में बता देते हैं।" 

वह बोला "मैम फिर दो दिन लाॅकडाउन रहेगा।" 

"हाँ ठीक है हमें अभी कोई जल्दी नहीं है" यह कहकर मैंने फोन रख दिया लेकिन इस बात से हम दोनों ही अचंभित थे। थोड़ी देर सोचने के बाद कि ऐसा कैसे हुआ हसबैंड ने उस नंबर पर फिर फोन लगाया और पूछा कि आपको ये नंबर कहाँ से मिला?

उसने कहा ये फलाने भाई ने दिया। अब उसने जिस फलाने भाई का नाम लिया था उसी नाम के हमारे परिचित से हमने सुबह पलंग देने की बात की थी।

इस बार बात करके हम और ज्यादा कंफ्यूज हो गये कि फलाने भाई अभी पलंग लेने आ रहे हैं क्या? उन्होंने ऐसा कुछ तो नहीं कहा था कि आज पलंग लेंगे।

हम सोचने लगे कि उन परिचित को फोन लगाकर पूछें कि वे किसी को पलंग लेने भेज रहे हैं क्या? इस दौरान पलंग लेना है या डिलीवर करना है का कंफ्यूजन बना रहा।

इस बात को तीन-चार घंटे बीत गये फिर अचानक फोन की घंटी बजी "मैम आपका पलंग हमने भेज दिया है आप घर पर ही हैं न"

अब यह सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा आया मैंने कहा "आप यह तो बताइये कि आप यह पलंग किसके घर डिलीवर करना चाहते हैं। उनका कोई नाम तो होगा?"

"मैम फलाने जी ने कहा कि पलंग डिलीवर कर दें उन्होंने ही नंबर दिया।"

दिन भर के दो तीन बार फोन पर हुई बातों को प्रोसेस करके दिमाग ने निष्कर्ष निकाला कि निश्चित रूप से यह रांग नंबर है। अब मैंने खुद को संयत किया और कहा" भाईसाहब या तो फलाने भाई ने आपको गलत नंबर दिया है या आपने गलत नंबर नोट किया है या गलत नंबर लगाया है। आप एक बार नंबर फिर से चैक करें। मैं आपकी मदद ही करना चाहती हूँ। अगर मैं कह दूँ कि पलंग ले आइये और वहाँ घर पर कोई नहीं मिला तो आपका चक्कर बेकार होगा। आप फिर मुझे फोन करेंगे लेकिन उससे क्या होगा? आप नंबर फिर से अच्छे से चैक करें। "

अब वह मेरी बात समझ गया" जी मैम समझ गया ठीक है मैं देखता हूँ "कहकर उसने फोन रख दिया।

पता नहीं फिर वह पलंग डिलीवर हुआ या नहीं दुकानदार को सही नंबर मिला या नहीं?

आपको क्या लगता है कि मुझे फोन करके पूछना चाहिये?

पूछना तो खैर नहीं होगा लेकिन आप इसे क्या कहेंगे इत्तेफाक या कुछ और?

कविता वर्मा 

Tuesday, April 6, 2021

मन में बसते रास्ते

 अपना घर छोड़कर जाना हमेशा एक अजीब सा अहसास देता है। बार बार रुक कर पीछे मुड़कर देखती हूँ कि उसे थोड़ा और अपने अंदर उतार लूँ थोड़ा सा और साथ ले जाऊँ लेकिन फिर भी बहुत कुछ पीछे छूट जाता है।

इस अहसास को सांत्वना देने के लिए या कहें कि इसे एक अवसर की तरह जीवन में कुछ और जोड़ने के लिए रास्ते मोड़ जंगल नदी पहाड़ पत्थर खेत पेड़ फूल फल को अपने भीतर उतारती चलती हूँ। भरती जाती है हर दृश्य को अपने अंतस में फिर चाहे वे खेत में काम करती गोबर के कंडे पाथती दरांता लेकर खेत पर जाती या सड़क किनारे बैठ कपड़े धोती स्त्रियाँ हों या सड़क किनारे खेलते बच्चे किसी छप्पर के नीचे बीड़ी फूंकते गेंहूँ निकालते भूसा ढोते पुरुष या कि गाँव की सड़कों पर बहती नालियाँ नलों का पानी गांव के बाहर कचरे के ढेर या सड़कों पर बने गढ्ढे। हर दृश्य उस जीवन से जोड़ता है जो आमतौर पर हम से बहुत दूर रहता है।

इसी दृश्य में एक और स्थान जुड़ता है वह है किसी छोटे से गांव में आहते से घिरा एक मंदिर जो हर बार आते-जाते रास्ते के एक पहचान चिन्ह के रूप में गुजर जाता है।

आज अचानक उस मंदिर के सामने गाड़ी रोकी। आधा बना आधा खुदा आहता जिसमें नक्काशी दार बलुआ पत्थरों से बना बडे़ से गुंबद को पत्थरों के खंभे पर उठाए एक प्राचीन हनुमान मंदिर। मंदिर के सामने गुंबद के नीचे बिछा हरी घास का कार्पेट बाहर के तापमान को रोक कर सुकून भरा अहसास दे रहा था। मंदिर में खड़े हनुमान जी की बड़ी सी प्रतिमा भक्तों को प्रेममयी दृष्टि से निहारती। आप देर तक टकटकी लगाए देखते रह सकते हैं।

इसी मंदिर परिसर में थोड़े अंदर एक और परिसर है जिसमें एक अति प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर अहिल्या बाई के शासनकाल या उससे पहले का हो सकता है। बडे-बडे पीपल के वृक्ष कलरव करती गौरैया छोटे पत्थर के खंभो पर टिका मंडप जिस पर कोई विशेष सज्जा न होते हुए भी वे आकर्षक थे। पीली मिट्टी जैसे रंग से पुते ये खंभे समय के थपेड़ों से अपनी नक्काशी की धार खो चुके फूल पत्तों से सजे थे। आधुनिक मंदिरों में ये साधारणता अब गायब हो चुकी है। महेश्वर में राजराजेश्वर मंदिर में कृत्रिम फूल पत्तों की सजावट और वंदनवार मंदिर की गरिमा को कम करते ही प्रतीत होते हैं। ऐसे में शिवलिंग पर सहज चढ़े फूल बेलपत्र कलश से बूँद बूँद टपकता पानी सामने एक छोटा सा नंदी और सिर झुका कर अंदर जाया जा सके इतना बड़ा द्वार।

मंदिर परिसर में रामायण की चौपाई के स्वर गूँज रहे थे। पता चला कि यहाँ लगभग चालीस पचास वर्षों से सतत रामायण पाठ हो रहा है। नजर घुमाई एक वृद्ध रामायण की चौपाई बोलते दिखे। उन्हें शायद रामायण कंठस्थ थी। बिना किसी लाउडस्पीकर और जल्दबाजी के चौपाई के शब्द वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भर रहे थे। 

मंदिर में दर्शन करके कुछ देर वहीं बैठे प्रसाद लिया और बाहर आ गये। कुछ और देर हनुमान जी से भेंटने का मन हुआ तभी दाँयी ओर नजर पड़ी थोड़ा आगे जाकर देखा तो एक बावड़ी दिखी। आश्चर्य इस इलाके में बावड़ी मिलना बहुत सामान्य नहीं है। किनारे जाकर देखा काफी पानी था। एक छोटी पुरानी मोटर लगी थी। पानी साफ था और सीढियाँ भी साफ सुथरी थीं। मन प्रसन हो गया। थोड़ी देर वहाँ रुककर हम आगे बढ़ गये।

घर छोड़कर आने का मलाल खत्म हो जाता है जब ऐसे स्थानों के दर्शन हो जाते हैं जो आधुनिक दुनिया से दिखावे से दूर अपने सहज स्वरूप में हैं। 

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...