Monday, December 10, 2018

उपन्यास समीक्षा


"आ कविता वर्माजी का उपन्यास "छूटी गलियाँ" मंगा तो बहुत पहले लिया था लेकिन समयाभाव के चलते पढ़ नहीं पाया था. और आज संयोग बैठ ही गया जब भोपाल से मुंबई की फ्लाइट मे इसे पढ़ने का समय मिल गया. एक बार शुरुआत करने के बाद खत्म करके ही दिल माना. कविता जी एक बेहतरीन लेखिका हैं और उनकी लघुकथा और कहानियों से काफी समय से रिश्ता रहा है लेकिन उपन्यास लिखना बहुत धैर्य और मेहनत का काम होता है और मुझे उत्सुकता इस बात की था कि क्या इनकी पकड़ इस विधा मे भी ऐसी ही होगी जैसी लघुकथा और कहानियों मे है. आज उपन्यास पढ़कर यह यकीन हो गया कि कविता जी की पकड़ इस विधा में भी बहुत बढ़िया है. यह उपन्यास मानवीय भावनाओं, रिश्तों और उससे गुजर रहे दो परिवारों के बारे मे है. उपन्यास का नायक पैसों को खुशियों का पैमाना मानकर उसे कमाने के चक्कर में अपने परिवार को खो देता है और जब वह एक और ऐसे ही परिवार के बारे में जानता है तो उसे बचाकर अपनी गलतियों को सुधारने के जद्दोजहद मे लग जाता है. कहानी दिलचस्प मोड़ लेती रहती है और पाठक उससे जुड़ा रहता है. एक अच्छे मोड़ पर उपन्यास खत्म होता है और पाठक राहत की सांस लेता है. पात्र काफी कम हैं इसलिए ज्यादा उलझन नहीं होती, बस अंत थोड़ी जल्दबाजी मे कर दिया गया लगता है. बहरहाल एक बढ़िया उपन्यास के लिए आ कविता वर्माजी बधाई की पात्र हैं और हम भविष्य मे उनकी और रचनाएँ पढ़ने की उम्मीद करेंगे."
विनय अंजू कुमार 

Sunday, December 9, 2018

कमजोरी को शक्ति बना जीत लें दुनिया

विश्व दिव्यांग दिवस के अंतर्गत वामा साहित्य मंच के मासिक कार्यक्रम में संजीवनी संगम मूक बधिर केंद्र जाने का मौका मिला। शहर के व्यस्त इलाके में लेकिन मुख्य सड़क से अंदर यह एक बड़ा और शांत परिसर है। सन 81 में शुरू हुआ यह केंद्र प्रारम्भ में सिर्फ अनाथ बच्चों का संरक्षण गृह था। तब से अब तक लगभग ७५० अनाथ लावारिस छोड़ दिए गए नवजात बच्चे यहाँ लाये जा चुके हैं। ऐसे बच्चे जो सड़क किनारे झाड़ियों नालों में छोड़ दिए जाते हैं कई बेहद बुरी हालत में होते हैं। बीमार वक्त से पहले जन्में चीटियों द्वारा कटे गए पॉलीथिन में कम ऑक्सीजन में जीवन के लिए संघर्ष करते ये बच्चे जब इस केंद्र की ममतालु नर्सआया और डॉक्टर्स की देखरेख में आते हैं तो अधिकांश इस सम्बल को पा कर जी जाते हैं। ठीक होने के बाद शीघ्र ही बच्चों के लिए ममता रखने वाले माता पिता को गोद दे दिए जाते हैं। यहाँ अधिकतम आठ वर्ष तक के बच्चों को रखा जा सकता है। 
केंद्र की आया दीदी से बात करते हुए ऐसे कई बच्चों की लोमहर्षक कहानियाँ सुनीं। कुछ बच्चे विदेशों में भी गॉड दिए जाते हैं। 
पूछने पर कि गोद देने के बाद इन बच्चों की मॉनिटरिंग कैसे की जाती है ? आया दीदी ने बताया कि तीन साल तक हर तीन महीने में उनके घर जाकर देखा जाता  है। उसके बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं उन्हें पता न चले कि गोद दिया गया है इसलिए संस्था के पदाधिकारी मेहमान बन कर मिलने जाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि कई बच्चे तो बड़े होकर खुद पता लगते हैं कि वे कहाँ से गोद लिए गए हैं और फिर हमारे यहाँ मिलने आते हैं दान और अन्य सेवाएं देते हैं। 
पाँच छह कमरों में बिस्तर पालने किचन सहित सभी व्यवस्था बेहद साफसुथरी थीं। 
मूक बधिर केंद्र पहले सिर्फ ऐसे बच्चों को पढ़ाया जाता था लेकिन अब यहाँ स्पेशल बच्चों को पढ़ने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग भी दी जाती है। जो बच्चे सुन नहीं पते उन्हें आवाज़ होते हुए भी बोलने में तकलीफ होती है क्योंकि उच्चारण क्या होते है वे नहीं जानते। इन बच्चों को साइन लेंग्वेज के द्वारा ही पढ़ाया और समझाया जाता है। यहाँ बच्चों के लिए कंप्यूटर लैब क्लास रूम एक्टिविटी रूम सभी हैं।  कुछ कक्षा स्मार्ट क्लास में भी तब्दील की गई हैं। 
बच्चों के कान की जाँच के लिए यहाँ रोज़ शाम शहर के वरिष्ठ नाक कान विशेषज्ञ आते हैं। यह ओ पी डी हैं जहाँ बाहर के अन्य मरीज भी बेहद कम फीस से अपने कान की जाँच करवा सकते हैं।संस्था को कुछ सालों पहले ही सरकारी मदद मिलाना शुरू हुई है इसके अल्वा शहर के दानदाता बड़ी मात्रा में आर्थिक और अन्य मदद देते हैं। मदद के लिए यहाँ संपर्क करके आवश्यक वस्तुओं की सूची प्राप्त की जा सकती है। फिलहाल यहाँ डे स्कूल है लेकिन शीघ्र ही भवन निर्माण करके हॉस्टल भी शुरू करने की योजना है ताकि आसपास के गाँवों कस्बों के मूक बधिर बच्चों को भी पढाई की सुविधा मिल सके। 
संस्था की फाउंडर सदस्य शारदा मंडलोई जी ने बताया कि उनकी टीम शहर में बस्तियों में सर्वे करके मूकबधिर बच्चों को तलाशती है और उनके माता पिता को बच्चों का इलाज करवाने और स्कूल भेजने को प्रेरित करती है। बहुत गरीब बच्चों की फीस माफ़ कर दी जाती है अन्य बच्चों की फीस भी काफी कम है। किसी बच्चे की साल भर की फीस की जिम्मेदारी लेकर भी मदद की जा सकती है। 
बच्चों के इलाज के बारे में बताते हुए कोर्डिनेटर यादव जी ने बताया कि एक कॉक्लियर इम्प्लांट करवाने में पाँच से सात लाख का खर्चा आता है फिर इसे रखने का बॉक्स ही ८०० रुपये का होता है जो हर महीने बदलना पड़ता है। बैटरी की कीमत लगभग पाँच लहज होती है और पोस्ट केयर खर्च भी लाखों का आता है। इस तरह जीवन भर का खर्च बीस से पच्चीस लाख तक होता है। 
वामा क्लब के लिए इन बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। यह आश्चर्यजनक था कि जो बच्चे सुन नहीं सकते वे संगीत की हर टाक के साथ न सिर्फ थिरक रहे थे बल्कि उनका आपसी सामंजस्य भी कमाल का था। उनकी टीचर सामने से उन्हें स्टेप्स के एक्शन दे रही थीं और वे एक दूसरे को देखे बिना बस अपने में मगन नृत्य का आनंद ले रहे थे। उनके टीचर्स ने बताया कि जब एक गुण कम होता है तो डी अन्य गुण अधिक सशक्त होता है। बच्चों के साथ क्लब की सदस्यों ने पिक्चर चेयर रेस और क्विज खेले और विजेताओं को पुरुस्कार बाँटे। 
संस्था की एक वरिष्ठ सदस्य इन बच्चों की सिलाई कढ़ाई बुनाई भी सिखाती हैं। छोटे बच्चों के स्वेटर नैपकिन कम्बल आदि का स्टॉल यहाँ लगाया गया था और सदस्यों ने जैम कर इन सामानों की खरीदी की। 
रोजमर्रा की जिंदगी से अलग हट कर एक दिन इन स्पेशल बच्चों के साथ बिता कर यह एहसास होता है कि अपनी कमजोरियों को अपनी शक्ति बना कर कितने आसानी से खुश रहा जा सकता है। 
कविता वर्मा 

Saturday, September 29, 2018

समीक्षा किसी और देश में

विनय कुमार जी से पहचान फेसबुक के माध्यम से ही हुई। उनके बनाये लघुकथा समूह नया लेखन नए दस्तख़त ने लघुकथा की बारीकियां सिखाई तो नियमित लिखना भी सिखाया। आपके बारे में जानने पर अचम्भा हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भी भारत उनमें धड़कता है। उनकी पोस्ट से भारतीय जीवन संस्कृति आचार विचार के साथ साथ खेती किसानी तीज त्यौहार नदी प्रकृति के प्रति प्रेम और चिंता सभी प्रकट होते हैं। चीज़ों को देखने की उनकी दृष्टी सहज सरल होते हुए बेहद सुलझी हुई है और कई बार हैरान करती है। हिन्दी भाषा के प्रति उनके प्रेम ने दक्षिण अफ्रीका में भी इसके प्रचार प्रसार की राह खोज ली। हाल ही में उनका एक लघुकथा कहानी संग्रह 'किसी और देश में ' दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित हुआ है। 

किसी और देश में 
किसी और देश में विनय कुमार जी का लघुकथा कहानी संग्रह है जिसमे छोटी बड़ी कई कहानियाँ शामिल हैं। संग्रह की पहली कहानी शीर्षक कहानी 'किसी और देश में ' विदेशों की मंहगी पढाई  कर्ज को उतारने के बाद बच्चों का पैसों की चकाचौंध के लिए विदेशों में बस जाने की मार्मिक कथा है। यह कथा पीछे असहाय माता पिता की पीड़ा छोड़ जाती है। 
लड़कियाँ सबके लिए सहज ही एक ममत्व भाव सहेजे होती हैं और इसी भाव को व्यक्त करती कथा है बेटियाँ जो अनायास आँखें नम कर देती है। 
दूसरों के कृत्य पर नाक भौं सिकोड़ने वाले जब खुद वही करते हैं तो कोई सरलता से उन्हें अपनी गलती का एहसास करवा देता है। तमाचा बेहद अच्छी पंच लाइन के साथ चुस्त लघुकथा है। 
महिलाओं और पुरुषों के लिए समाज ने दोहरे मापदंड तय कर लिए हैं। इन्हीं पर करारा प्रहार करती लघुकथा इज्जत दो तीखे मोड़ लेकर चकित करती है।वहीँ फर्क लघुकथा इस मापदंड को स्वर देती है।  
श्राद्ध और प्रायश्चित जीते जी इंसान को तरसाने के बाद उसके मरने पर धूमधाम से श्राद्ध करने की कुसंस्कृति पर प्रहार करती है। 
'उदासी' यूँ तो अपने दुःख को छुपा कर दूसरों के सामने हँसने की कथा है लेकिन इसमें एक सच्चे दोस्त के द्वारा छुपे दुःख को पहचान लेने की दिल छूती भावना है। 
ईमान लघुकथा वंचितों की ईमानदारी बचाने की सामाजिक जिम्मेदारी को  अच्छी कथा है। हालाँकि इसे एक और ड्राफ्ट की जरूरत भी महसूस हुई। 
लेखन में लगातार आगे बढ़ते कई बार असंभव आदर्श सिर उठाने लगते हैं लेकिन संकल्प लघुकथा एक टीस छोड़ते हुए व्यावहारिक रास्ता अख्तियार करती है। 
कुछ लघुकथाएं बेहद चौंकाती हैं। ये सरल लेकिन मनोवैज्ञानिक सजगता से लिखी गई कथाएं हैं। बदलाव , बदलते रिश्ते , स्टोरी, यकीन ,परिपक्वता, गुलाल के रंग   ऐसी ही लघुकथाएं हैं जिनके बारे में कुछ भी कहने से बेहतर है पढ़ना होगा। 
राजनीति और धर्म एक मेहनत मजदूरी करने वाले व्यक्ति के लिए शतरंज की ऐसी बिसात होते हैं जिसमे शह और मात का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रहता। उसे तो हर हालत में हारना ही है।  
स्वच्छता अभियान का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों पर पड़ा है उसके चलते सफाई कर्मियों के काम को सम्मान मिलने लगा है जो कि एक अच्छी बात है कुछ ऐसे भी भाव है लघुकथा सम्मान में। कह सकते है कि विनय जी की लेखनी समसामयिक मुद्दों पर तो बड़ी सजगता से चली है साथ ही समाज के सकारात्मक बदलाव को उन्होंने अपने लेखन में शामिल करते हुए देश की छवि को 'किसी और देश में 'निखारा है।
कामयाबी का सेहरा अपने और अपनों के सिर पर तो आसानी से बाँधा जाता है लेकिन इससे अलग कुछ लोग बहुत ख़ामोशी से सफलता के पायदानों पर चढ़ने के लिए सहारा देते हैं। ऐसे ही लोगों को पहचानने और सम्मान देने की कथा है नींव। 
बालश्रम ,लड़कियों के प्रति संकुचित नजरिया जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी आपकी लेखनी खूब चली है। 
विकास की दौड़ में उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण से उपजी निराशा का चित्र करती है लघुकथा वचन। 

इस संग्रह में लघुकथाओं के साथ कुछ कहानियाँ भी हैं। 'कसूर' इकलौती बेटी के प्रति पिता के प्रेम की अनूठी कहानी है जो विपरीत हालात में बेटी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाता है। 
'घर वापसी' धर्म और राजनीति के खेल में पिसती तो आम जनता है इसी भाव को उकेरती है यह कहानी। विनय जी की कहानियों में भाषा सरल सहज और प्रवाहमय है। शब्दों का चयन खूबसूरती से किया गया है। किसी और देश में अपने देश की समस्या संस्कृति राजनीति भावनाओं को इस खूबी से उभारने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। 
कविता वर्मा 

 

Monday, July 23, 2018

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा वैष्णोदेवी श्रीनगर बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जाने का कार्यक्रम बना। लगभग एक महीने का टूर था मम्मी पापा दोनों भाई मैं हमारी फिएट कार से एक ड्राइवर को लेकर बैतूल से निकल पड़े।
ग्वालियर आनंद होते हुए दिल्ली पहुंचना था और एक परिचित ने बहुत जोर देकर कहा था कि आप वहाँ हमारी बहन के घर ही ठहरें। वह मोबाइल गूगल का जमाना नहीं था और एक कागज पर लिखा पता लेकर जब हम दिल्ली शहर में प्रविष्ट हुए तो माहौल भयावह था। सड़क के दोनों ओर दो पांच सौ मीटर की दूरी पर रेत की बोरियों के पीछे सैनिक मशीनगन लिये मोर्चा संभाले खड़े थे। सड़क पर पुलिस थी किसी भी गाड़ी को रुकने नहीं दिया जा रहा था और हमें तो जगह जगह रास्ता पूछना था।
कहीं पुलिस वालों से तो कहीं रास्ते चलते लोगों से रास्ता पूछते हम दिशा भ्रमित से चले जा रहे थे। सांझ घिर आई थी पीली रौशनी फेंकते हैलोजन माहौल को और भयावह सा बना रहे थे। हर कोई और आगे और आगे ही बताता जा रहा था। कहीं कोई पीसीओ भी नहीं दिख रहा था।
एक जगह अंदर जाती सड़क के किनारे खड़े चार पाँच लडकों से पापाजी ने रास्ता पूछा तो उन्होंने मेन रोड से अंदर जाती सड़क की ओर इशारा करते हुए वहाँ जाने को कहा। मैं पीछे खिड़की के पास बैठी थी और तभी मैंने उन लडकों को एक दूसरे को आंखों में इशारा करते और आंख मारते देखा।
ड्राइवर गाड़ी मोडता इससे पहले ही मैंने जोर देकर कहा "नहीं पापाजी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप मेन रोड मत छोडो और सीधे चलो किसी पुलिस वाले से रास्ता पूछेंगे।
पापाजी ने मेरी बात मान कर मेन रोड पर ही चलने का फैसला किया और आगे जाकर चौराहे पर खड़े पुलिस वालों से पता पूछा। वो लोग भी सही पता नहीं जानते थे तब उनसे पूछा कि पीछे कुछ लड़के अंदर की रोड पर बता रहे थे। तब वह बोला अंदर कहाँ साहब वहाँ तो कर्फ्यू लगा है देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया है।
दिल्ली के उन लडकों की आंखों की उस हरकत ने हमें बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया था।

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आंखें वाकई मासूम होती हैं और अपनी हरकतों से गाहे-बगाहे मासूमों को फंसने से बचा लेती हैं।
कविता वर्मा 

Wednesday, June 20, 2018

उपन्यास समीक्षा 'छूटी गलियाँ '

(फेसबुक और साहित्य जगत में सीमा भाटिया गंभीर और औचित्य पूर्ण लेखन में जाना पहचाना नाम है। मेरा उपन्यास 'छूटी गलियाँ ' उनकी नजरों से।

आजकल लेखन के साथ साथ पुस्तकें पढ़ने का क्रम भी जारी है। पिछले दिनों "क्षितिज अखिल भारतीय लघुकथा समारोह" में Kavita Verma  जी से मिलने का सुअवसर मिला और उनके द्वारा लिखित पहला उपन्यास "छूटी गलियाँ" भी। पढ़ने से पहले तक इसी संशय में थी कि कोई रूमानी उपन्यास होगा। पर कल जो हाथ में लिया, तो पहले अध्याय से ही एकदम नए और अछूते कथानक के साथ ऐसा तारतम्य बना कि समाप्त कर के ही उठी इसे। विदेश में धन कमाने की लालसा एक इंसान को अपने परिवार से कैसे दूर कर देती है, और वहां की चकाचौंध और बच्चों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में वह सब पीछे छूट जाता है जिसे पारिवारिक खुशी कहते हैं। ऐसे हालात में पत्नी और बच्चों की मनोव्यथा और बाद में सब कुछ छूट जाने की पीड़ा एक अनचाहे पश्चाताप से भर देती है नायक के मन को और वह उसी परिस्थिति में जी रहे एक मासूम को वह खुशी देने की कोशिश करता है जिसके अभाव में उसका अपना बेटा मानसिक तनाव में जूझता हुआ संघर्ष कर रहा  बाहर आने के लिए। खून के रिश्तों के अतिरिक्त भी स्नेह के रिश्ते होते और कई बार उनसे भी ज्यादा मजबूत सिद्ध होते हैं। बहुत ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के बाद लेखिका ने पूरा तानाबाना बुना है उपन्यास का और इस क्षेत्र में वह पूरी तरह सक्षम प्रतीत होती हैं।

हर पात्र के चरित्र को उसके अंतर्द्वंद्व के माध्यम से और भी सशक्त रूप से उकेरने में सफल रही हैं कविता जी। अंत के एकाध अध्याय में कुछ जगह नेहा और मिस्टर सहाय के अंतरद्वंद्व में confusion महसूस होती पाठक के तौर पर, पर यह कमी ज्यादा नहीं खलती पूरे उपन्यास को देखते हुए। सारा उपन्यास एक अनूठी शैली में लिखा गया है और शुरुआत से अंत तक रोचकता बनाए रखता है। पारिवारिक रिश्तों में जरूरी संवाद की कमी और आपाधापी के इस युग में सिर्फ धनार्जन के लिए परिवार की उपेक्षा करने के दुष्परिणाम की ओर सचेत करता यह उपन्यास लेखिका का पहला प्रयास होने के बावजूद एक बहुत बड़ी सफलता है। आशा है कि आगे भी ऐसी और भी कृतियों को पढ़ने का सौभाग्य मिलता रहेगा।
सीमा भाटिया 

Friday, June 15, 2018

लघुकथा सम्मेलन 2

अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के दूसरे दिन का शुभारंभ महेंद्र पंडित द्वारा स्वस्ति वाचन के साथ माँ सरस्वती को माल्यार्पण से हुआ। आज के मुख्य अतिथि श्री बलराम वरिष्ठ कथाकार प्रधान संपादक लोकायत पाक्षिक पत्रिका दिल्ली , विशेष अतिथि श्री श्रीराम दवे कार्यकारी संपादक समावर्तन उज्जैन और श्री राकेश शर्मा संपादक वीणा इंदौर थे। कार्यक्रम सम्मान समारोह और पुस्तक विमोचन के रूप में शुरू हुआ। 

अनघा जोगलेकर के उपन्यास अश्वत्थामा का लोकार्पण श्याम सुंदर दीप्ति की लघुकथा पत्रिका प्रतिमान लघुकथाओं के मराठी अनुवाद की पत्रिका 'भाषा सखी ' आदि का विमोचन हुआ। 
लघुकथा शिखर सम्मान श्री बलराम अग्रवाल दिल्ली का क्षितिज संस्था के सदस्य डॉ अखिलेश शर्मा द्वारा शॉल श्रीफल अंग वस्त्र मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र द्वारा किया गया। आपको सम्मान राशि भी प्रदान की गई। 
लघुकथा समालोचना सम्मान 2018 श्री बी एल आच्छा जी चेन्नई को मिला। 
लघुकथा नवलेखन सम्मान कपिल शास्त्री भोपाल 
क्षितिज लघुकथा कला सम्मान संदीप राशिनकर को  रेखांकन और चित्रांकन के लिए और नंदकिशोर बर्बे  को नाट्य कर्म के लिए प्रदान किया गया। 
क्षितिज लघुकथा विशिष्ट सम्मान श्री बलराम को प्रदान किया गया। 
इसके अलावा श्री योगराज प्रभाकर सतीशराज पुष्करणा भगीरथ परिहार सुभाष नीरव अशोक भाटिया कांता रॉय को लघुकथा विशिष्ठ सम्मान से सम्मानित किया गया। अनघा जोगलेकर और किशोर बागरे जी को उनके बनाये पोस्टर और चित्रकारी के लिए सम्मानित किया गया। 
लघुकथा साहित्य पत्रकारिता सम्मान इंदौर के पत्रकार श्री रविंद्र व्यास को दिया गया। 

इस अवसर पर बोलते हुए बलराम अग्रवाल ने कहा साहित्य का मूल कर्म जिज्ञासा पैदा करना है। परकाया प्रवेश कर लेखक वह कर सकता है जो वह करना चाहता है। लघुकथा की छोटी काया है उसमे अन्य संकोचन नहीं हो सकता। लेखन व्यवसाय नहीं व्यसन है।
 
सम्मान समारोह की अगली कड़ी में श्री योगराज प्रभाकर अशोक भाटिया कांता राय सतीश राज पुष्करणा भगीरथ परिहार सुभाष नीरव जी को क्षितिज लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया। 
इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्र शर्मा ने अतिथियों को बधाई और आयोजन के लिए शुभकामनायें प्रेषित कीं। आपने इस आयोजन को लघुकथा का महाकुंभ कहा। आपने कहा लघु पर जब चिंतन होता है तो बहुत सारी चिंताएं हमारे समक्ष आती हैं। आपने कहा कि जिस तरह मंदिर की घंटी की गूंज देर तक गूंजती रहती है वैसी ही गूँज लघुकथा की होना चाहिए। लघुकथाकारों को सहानुभूति के साथ समाज के सरोकारों से जुड़ना चाहिए। लघुकथाकार भी शिल्पी हैं और इन्हें अपने अंदर के लोक कथाकार को जगाने की जरूरत है और ऐसे आयोजन यह काम बखूबी करते हैं। 


आज के पहले सत्र और आयोजन के चतुर्थ सत्र में लघुकथा लोकप्रियता और गुणवत्ता के बीच अंतर्संबंध एवं पाठकों के मध्य सेतु निर्माण पर बोलते हुए श्री बलराम ने कहा चालीस साल से लघुकथा लघुकथा सुन रहा हूँ अब लघुकथाकार को कारीगर बनना होगा तभी वह शिखर तक पहुँचेगा। कथाकार मूर्तिकार चित्रकार कोई यूँ ही नहीं हो जाता उसके लिए साधना करनी पड़ती है। जब तक रचना कलात्मक नहीं होगी तब तक वह ऊंचाइयों पर नहीं पहुँचेगी। विधाएँ हमारे अंतर से निकलती हैं इसलिए विरोध से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि आलोचना के बिना विकास संभव नहीं है। जो लेखक पाठकों और आलोचकों का सामना करने में माहिर होते हैं एक वर्ग उन्हें महान मानता है तो दूसरा वर्ग जो लोकजन की अनुभूतियों को लिखते हैं उन्हें महान मानते हैं। अच्छे लेखक मध्य मार्ग से आते हैं। 

आपने शहर के साहित्यकार चैतन्य त्रिवेदी की दो लघुकथाओं खुलता बंद घर और जूते और कालीन का जिक्र करते हुए उनकी समीक्षा की और एक कथा में आदमी और दूसरे में समाज की महत्ता को प्रतिपादित करने को इंगित किया। 

चर्चाकार श्रीमती संध्या तिवारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारे समकालीन लघुकथाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं और विविध विषयों पर लिख रहे हैं और संवेदनाओं के द्वारा पाठकों से जुड़े भी हैं। 
दूसरे चर्चाकार श्री सतीश राठी ने कहा कि यदि लघुकथा के संप्रेषण में भोथरापन है तो वह पाठकों से सेतु नहीं बना सकती। तुलसी की चौपाइयां अनपढ़ व्यक्ति भी पढता है और यही उसकी लोकप्रियता है गुणवत्ता है और पाठकों से उसका संबंध स्थापित करता है। 
इस सत्र में भी लघुकथाकारों ने लघुकथा पाठ किया और उनकी विभिन्न आयामों से समीक्षा की गई। 

अगले सत्र में चित्र आधारित लघुकथाऐं बनाम स्वयं स्फूर्त लघुकथाएं पर बीज वक्तव्य देते कांता राय ने कहा लघुकथा लेखन के लिए कोई प्रेरणा आवश्यक है फिर वह चित्र या शीर्षक ही क्यों न हो। लेखन के लिए रोजमर्रा की परेशानियां भी सृजन की संभावना पैदा करती हैं। अवचेतन में दबी संवेदनाएं चित्र या शीर्षक देख जीवित हो जाती हैं जो लेखन में सहायक होता है इस चिंतन को सृजन में उपयोग कर कथ्य को उभारा जाता है। स्वयं स्फूर्त लेखन के नाम पर सृजन से दूर होने से कोई प्रेरणा होना बेहतर है। 
चर्चाकार अंतरा करवडे ने दोनों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया और स्वयं स्फूर्त रचना मस्तिष्क को उर्वर करती है इससे सृजन का सुख महसूस होता है जबकि विषय आधारित में अनुभव और जानकारी को विषय के आसपास लाया जाता है। 
सुभाष नीरव जी ने कहा 21 वीं सदी में लघुकथा में लोग जुड़ रहे हैं। लेखन का दबाव स्वस्फूर्त होता है खुले आकाश में स्वतंत्र रचनाएँ पैदा होती हैं जबकि विषय पर लेखन ऐसा है मानों एक खिड़की खोल दी हो कि इसमें से जितना आसमान दिख रहा है उस पर लिखो। 
इस सत्र में लघुकथाओं पर बात करते हुए कविता वर्मा ने कहा की साहित्य का काम समाज में संवेदना जगाना होता है इस संवेदना को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए और इसलिए लगातार लिखना जरूरी है। 

अंतिम सत्र में वैश्विक क्षितिज के साथ नई जमीन की तलाश विषय पर बात करते हुए श्याम सुंदर दीप्ति ने कहा यह बाजार वाद वैश्वीकरण का दौर है। पहले व्यक्ति साल में जीता था और अब क्षण क्षण में जी रहा है। पूर्व में जो विषय लिखे गए वह कैसे लिखे और वर्तमान में कैसे लिखे जा रहे हैं इसका अध्ययन करने की आवश्यकता है।  मनोवैज्ञानिक दृष्टी से तो देखना होगा साथ ही अर्थशास्त्रीय दृष्टी से भी तर्क करना होगा। जिज्ञासा व्यक्ति को आगे बढाती है। 
वक्तव्य पर चर्चा करते हुए सतीश राज पुष्करणा ने आज की वैश्विक समस्याओं का जिक्र करते हुए नए विषयों पर प्रकाश डाला। आपने पर्यावरण जनसँख्या नारी शोषण जैसी विसंगतियों की चर्चा करने के साथ ही खेती की कम होती जमीन, युवाओं का पलायन, शस्त्र बाजार, आतंकवाद, स्त्री का सही स्पेस, जैसे विषयों पर लिखने पर जोर दिया। 
अशोक भाटिया ने कहा कि एक विषय पर अनेक आयामों से लघुकथाएं लिखी जा सकती हैं और इसके लिए अध्ययन का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। आपने घटना की गुलामी करना छोडने और घटना का पुनर्निर्माण करने की जरूरत पर बल दिया। कई वैश्विक लघुकथाकारों के उद्धरण देते हुए आपने अपनी बात स्पष्ट की जिसमें खलील जिब्रान की लघुकथा आदमी की पर्तें प्रमुख है। 
समारोह के समापन अवसर पर क्षितिज के लिए काम करने वाले वालेंटियर्स और परिवारों का सम्मान किया गया। माहेश्वरी भवन के ट्रस्टी लाइट साउंड केटरिंग वालों आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के समापन की औपचारिक घोषणा की गई। 

दो दिवसीय इस कार्यक्रम में अतिथियों को लाने छोड़ने रहने खाने नाश्ते की स्तरीय व्यवस्था सम्मलेन स्थल पर की गई थी। आयोजक क्षितिज संस्था के सदस्यों के साथ ही सतीश राठी जी का पूरा परिवार भी इस व्यवस्था में लगा रहा। कहीं कोई अव्यवस्था या हड़बड़ाहट देखने को नहीं मिली। लघुकथा के विभिन्न आयामों पर सारगर्भित सत्रों ने लघुकथाकरों को समृद्ध किया तो सोशल मीडिया पर जुड़े लघुकथाकारों को आपस में मिलने जुलने का मौका भी उन्हें मिला जिससे उनके बीच आत्मीयता बढ़ी। खूबसूरत फोटो के माध्यम से सभी खूबसूरत यादें अपने साथ ले गए।

( इस रिपोर्ट या इसके किसी भी अंश का लेखक की अनुमति के बिना कहीं भी किसी भी तरह का उपयोग वर्जित है। ) 


कविता वर्मा 

Thursday, June 14, 2018

लघुकथा सम्मेलन 1

क्षितिज लघुकथा सम्मेलन का उद्घाटन माहेश्वरी भवन में दो जून को सुबह हुआ। वर्षा टावरी द्वारा सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई । अतिथि श्री बलराम श्री बलराम अग्रवाल श्री बी एल आच्छा श्री सतीशराज पुष्करणा ,श्री श्याम सुंदर दीप्ति एवं श्री सूर्यकांत नागर  द्वारा सरस्वती को माल्यार्पण कर समारोह के शुभारंभ और सुचारु संचालन हेतु आशीर्वाद प्राप्त किया गया। क्षितिज के अध्यक्ष श्री सतीश राठी द्वारा शब्दाहार से अतिथियों का स्वागत किया गया तत्पश्चात संचालन करते हुए श्री पुरुषोत्तम दुबे ने संस्था के सदस्यों से सभी अतिथियों का पुष्प गुच्छ से स्वागत करने का आव्हान किया। 
उद्घाटन सत्र के प्रथम सोपान में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का लोकार्पण किया गया।
क्षितिज संस्था के पैतीस वर्षों की यात्रा को एक पत्रिका के रूप में सहेजा गया जिसमे पत्रिका का प्रारंभिक स्वरुप पत्रिका के लिए फण्ड और विज्ञापन जुटाने के प्रयास उस समय की गोष्ठी आयोजन वरिष्ठ साहित्यकारों से मुलाकातें अख़बारों में क्षितिज की खबरों को फोटोग्राफ के रूप में सहेजा गया है। इसी अंक में लघुकथा की विभिन्न पत्रिकाओं की जानकारी उनमे प्रकाशित चुनिंदा लघुकथाओं की विवेचना लघुकथाओं पर आलेख समीक्षा आदि भी शामिल हैं। 'क्षितिज सफर पैंतीस वर्षों का' का लोकार्पण श्री बलराम जी द्वारा और क्षितिज पत्रिका के ताज़ा अंक का विमोचन श्री बलराम अग्रवाल जी द्वारा किया गया। क्षितिज का यह अंक 2011 से 2017 के मध्य रची गई लघुकथाओं से सजा है। इस अंक में विशिष्ट लघुकथाकार के रूप में श्री श्याम सुन्दर दीप्ति जी की पाँच लघुकथाओं को शामिल किया गया है। 

इस अवसर पर बलराम अग्रवाल की पुस्तक परिंदों के दरमियान का विमोचन हिंदी साहित्य समिति के प्रधानमंत्री श्री सूर्य प्रकाश चतुर्वेदी जी द्वारा रामकुमार घोटड की पुस्तक 'स्मृति शेष' अपना प्रकाशन भोपाल द्वारा प्रकाशित पुस्तक  ' ठहराव में सुख कहाँ' मासिक लघुकथा अखबार 'लघुकथा टाइम्स' जाॅन मार्टिन की 'सब खैरियत है' का लोकार्पण भी किया गया। 
लघुकथा को चित्रांकन और कोलाज के द्वारा खूबसूरत अभिव्यक्ति दी गई है। गुड़गांव की अनघा जोगलेकर द्वारा लघुकथाओं को खूबसूरत चित्रों के माध्यम से और कैलाश बागरे द्वारा कोलाज और चित्रांकन द्वारा उकेरा गया। जूट के विशाल केनवास पर मालवी मांडा के खूबसूरत पैनल की बॉर्डर से रेखांकित इस पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन और लोकार्पण श्री सुभाष नीरव और श्री बी एल आच्छा ने किया। लगभग चालीस पोस्टरों के माध्यम से कई लघुकथाओं को प्रदर्शित किया गया। इस अवसर पर श्री किशोर बगरे जी का पुष्प गुच्छ से स्वागत किया गया। 
इसी अवसर पर एक बुक स्टॉल पर विभिन्न प्रतिभागियों की पुस्तके विक्रय हेतु रखी गईं। हाल ही में प्रकाशित लघुकथा संग्रह और साझा संग्रह एक ही स्थान पर उपलब्ध करवाने का यह प्रयास सराहनीय था।   इसका उद्घाटन श्री अशोक भाटिया द्वारा किया गया। 
इंदौर के बाहर से आये अतिथियों को इंदौर के बारे में बताये बिना इस सम्मेलन की परिकल्पना पूर्ण नहीं होती और न ही क्षितिज की पूरी जानकारी को इतने कम समय में उन तक पहुंचाया जा सकता है। अनुध्वनि द्वारा इस सब को एक वृत चित्र के द्वारा प्रस्तुत किया जिसमें इंदौर के राजवाडा छत्री सराफा कपड़ा मार्केट आदि की झलक के साथ क्षितिज के सहभागी साथियों के विचारों की झलक थी। क्षितिज संस्था के पुराने साथी श्री अशोक शर्मा भारतीय इस समय देश से बाहर हैं उन्हें और उनके योगदान को याद कर उनके प्रति आभार व्यक्त किया गया। 

मुख्य अतिथि लोकायत पत्रिका के संपादक बलराम जी ने अपने वक्तव्य में खुशी जाहिर करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने लघुकथा को मान्यता दी है और चार साहित्यकारों को अकादमी में लघुकथा पाठ के लिए आमंत्रित किया और यही लघुकथा की स्वीकार्यता है।
आपने कहा प्रेमचंद ने इसे गद्य काव्य की संज्ञा दी तो अज्ञेय ने इसे छोटी कहानी कहा । अंतर सिर्फ नाम का है। आपने काव्यात्मक और अकाव्यात्मक लघुकथा लिखने वाले रचनाकारों के नाम का उल्लेख करते हुए इसके महत्व को प्रतिपादित किया।चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा संग्रह उल्लास का जिक्र करते हुए आपने कहा कि इनकी लघुकथाओं में काव्य तत्वों की अधिकता ने अतिरिक्त आभा सौंपी है। 
लघु कथा में गद्य पर काव्य दोनों का समावेश स्वीकार्य है। लघुकथा लिखने के लिए भी परकाया प्रवेश आवश्यक है। लघुकथा में लघुकहानी की विडम्बना से घबराने की आवश्यकता नहीं है। नै पीढ़ी में दीपक मशाल संध्या तिवारी संतोष सुपेकर अनघा जोगलेकर शोभना श्याम में लघुकथा को दूर तक ले जाने की ताकत है। रमेश बत्रा सतीश दुबे सुरेश शर्मा पुणताम्बेकर मोहन राकेश कुलदीप जैन की लघुकथाएं पढ़े जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।  आपने बताया कि लघुकथा को स्थापित किये जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह पहले से ही स्थापित है प्रेमचंद परसाई सानी जी इसे पहले ही स्थापित कर गए हैं।  माधव राव सप्रे की लघुकथा टोकरी भर मिटटी को पहली लघुकथा माना जाता है। राजेंद्र यादव जो लघुकथा को विधा ही नहीं मानते थे उन्होंने भी अंततः लघुकथा कोष की भूमिका लिखी और हंस में लघुकथाओं को स्थान दिया। 
आपने लघुकथाकारों को अन्य विधाओं में पढ़ने और लिखने पर भी जोर दिया और अन्य विधाओं में स्थापित लेखकों नरेंद्र कोहली नागर जी चित्रा मुद्गल सतीश दुबे सुभाष नीरव असगर वजाहत सुरेश उनियाल हरीश नवल रामेश्वर कम्बोज नासिरा शर्मा दामोदर दीक्षित आदि ने साहित्य की अन्य विधाओं में भी लिखा। मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के प्रधान मंत्री श्री सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने कहा कि कोई भी विधा छोटी नहीं होती। 
उद्घाटन सत्र के समापन पर वसुधा गाडगीळ ने आभार मन। इस अवसर पर उर्मि शिरीष का सन्देश भी पढ़ कर सुनाया गया। 
पहले सत्र में श्री बलराम अग्रवाल ने लघुकथा कितनी पारंपरिक कितनी आधुनिक पर बात करते हुए कहा कि लघुकथा ने अब मजबूती पा ली है समाज में जो चलन में है वह गाह्य होकर परंपरा बन जाती है ोे रीति रिवाज संस्कार में से आते हैं। लेकिन लघुकथा में कथ्य में नवीनता होना आवश्यक है। िषय वास्तु नई होगी तो कथ्य भी नवीन होगा। 

चर्चा कार चैतन्य त्रिवेदी ने कहा कि लघुकथाकार को समकालीनता की हकीकत स्वीकार करना होगा। लघुकथा में परंपरा एक प्रकाश से दूसरे प्रकाश के रूप में जाती है इसमें शब्द और शक्ति का रिश्ता कद और परछाई का रिश्ता है। हमारा कद ही हमारी परछाई है। लघुकथा में आज जो दबाव देखने में आ रहा है वह 90 के दशक के बाद आया है। कोई भी लघुकथा कार लगातार नहीं लिख सकता और इस अंतराल का दबाव भी उसे ही सहन करना पड़ता है। 
वहीं श्री पुरुषोत्तम दुबे ने बताया कि आधुनिकता निरंतर है और इसके अभाव में परंपरा जड़ रूढि बनकर रह जायेगी। इसी तरह परंपरा विहीन आधुनिकता खड़ी नहीं रह सकती। इसलिए परंपरा आवश्यक है। परंपरा मरती नहीं लक्षित रहती है और नवीनता को जन्म देती है। समय और परिस्थिति के अनुसार लघुकथा का स्वरुप बदला है और भाषा सर्वथा गतिमान रही। शिल्प भाषा शैली का द्योतक है। लघुकथा कथ्य और शिल्प भी है वह केवल भाषा नहीं है। 


दूसरे सत्र में हिंदी लघुकथा बुनावट और प्रयोगशीलता पर बीज वक्तव्य देते हुए श्री अशोक भाटिया ने कहा लघुकथा जितनी चर्चित है उतनी ही विवादास्पद उपेक्षित और सवालों के घेरे में है। काव्य संक्षिप्त और सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है जबकि गद्य  का वर्णन करने से विस्तार होता है। गद्य विस्तार मांगता है। गद्य में संक्षिप्तता होना ठीक नहीं लेकिन उसमें अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए। 
बुनावट और प्रयोगशीलता का प्रश्न अलग अलग नहीं है हमारी सोच गणनात्मक साँचे में ढल गई है लघुकथा के लिए वर्णनात्मक बुनावट को छोड़ना होगा। लिखना विलास की वस्तु नहीं है साहित्य सामाजिक चेतना का जीवंत मार्ग है हर रचना को चुनौती रूप में लें। रचना में बुनावट हो सौंदर्य हो यथार्थ पर आधारित हो इसमें कल्पना जुड़ती है टूटती है फिर जुड़ती है। खरा साहित्य वह है जो हमें गति दे संघर्ष दे। 
प्रयोगशीलता वह है जो पाठक की संवेदना को झकझोर दे। पहले हमारे भीतर उस संवेदना को उतरना होगा। प्रेमचंद ने कहा था खरा साहित्य वही है जो हमें बैचेनी दे गति दे सुलाए नहीं इसलिए पाठक बनकर अपनी रचना को देखें। पाठक रोचकता के साथ कहानी माँगता है।

लघुकथा में न्यूनोक्ति (under statement ) अर्थात अंत तक बात को छुपाये रखना बेहद जरूरी है। रमेश बत्रा (बीच बाजार ) युगल ( मातम ) कथाओं का जिक्र करते हुए आपने कहा यथार्थ के दवाब से नया प्रयोग होगा। इसी कड़ी में विष्णु नागर की किताब ईश्वर की कहानियाँ मुकेश वर्मा की मुक्त करो वैचारिक बुनावट की कथाएं हैं जिसमे विचार केंद्र में हैं। व्यंग्यात्मक बुनावट की हरिशंकर परसाई जी की कथाएं व्यंग्य को बुनती हैं या व्यंग्य रचना को बुनता है। उन्होंने तर्क वितर्क से बुनावट समावेशी बुनावट काव्यात्मक बुनावट फैंटेसी बुनावट प्राचीन संदर्भों से बुनावट आदि का उल्लेख किया। 

सीमा जैन ने चर्चा करते हुए कहा कि प्रयोग के बिना जीवन अधूरा है प्रयोग के बिना जीवन में नयापन नहीं दे पाएंगे उन्होंने कुछ कथाएं 'स्त्री कुछ नहीं करती ' राजा अँधा है ' के उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट किया। आपने कहा पढना लिखना भी आवश्यक है लेकिन मौलिकता बनी रहे। 

योगराज प्रभाकर जी ने लघुकथा के लिए दृष्टि विकसित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कथानक प्लाट है तो शिल्प आर्किटेक्ट लेकिन आँख और कान खुले रखने पडेंगे। आपने कहा कि अगर बुनावट ढीली रह गई तो प्रयोग किस पर करेंगे। 


तीसरे सत्र में आलोचना मापदंड और अपेक्षाएं पर वक्तव्य देते हुए श्री बी एल आच्छा जी ने कहा कि आजतक काव्य शास्त्र कितना बदला है उस पर कोई प्रश्न नहीं उठाता। अगर लघुकथाकार भी शब्द और ध्वनि विज्ञानं से जुड़ें तो बुनावट जोरदार होगी। शीर्षक से पूरी लघुकथा ध्वनित होती है इसलिए शीर्षक पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अच्छी कविता तनावों को बुनती है तो लघुकथाकार भी शब्दों व तनावों को लघुकथा रूप में बन सकता है। हर अच्छा रचनाकार अपनी भाषा का अपनी कविता का अतिक्रमण करता है और लघुकथाकार को भी नए विषयों की ओर जाने की आवश्यकता है। 

चर्चा करते हुए श्री सूर्य कांत नागर  जब भी साहित्य का मूल्यांकन होता है वह विश्वसनीय होना चाहिए। लघुकथा की समीक्षा में प्रशंसा अधिक और आलोचना काम होती है। आलोचना रचना का सफर तय करती है। आलोचक तभी न्याय कर सकता है जब वह रचनाकार की पीर को समझे। काशीनाथ सिंह ने कहा आलोचना भी रचना है। आपने कहा कई लघुकथाएं सांकेतिक और  बौद्धिक होती हैं लेकिन इनमें भी कथानक में प्रासंगिकता होनी चाहिए। कथानक में यथार्थ का होना आवश्यक है। 

इसी विषय पर चर्चा करते हुए श्री भगीरथ परिहार जी ने कहा कि आलोचना अलग अलग रूपों में होती है। पाठक आलोचना नहीं पढ़ता। पाठक रचना सार्थक या निरर्थक बता सकता है। आलोचना शोधार्थी के लिए सार्थक है और कुछ हद तक लेखक के आगे होने वाले सृजन के लिए मार्गदर्शन है। लघुकथा एक सुगठित विधा है वह कसी हुई होना चाहिए उसमे अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह लघुकथा के सौंदर्य में रूकावट लाता है। लघुकथा में उपसंहार नहीं होना चाहिए और जो घटनाएं ले रहे हैं उसमे संक्षिप्तिकरण होना चाहिए। लघुकथा में छोटे वाक्य अधिक आकर्षक होते हैं। लघुकथा में कथ्य सशक्त होना चाहिए और वह अभिव्यंजनात्मक और सटीक होना चाहिए। आपने कहा लघुकथा की वर्तमान स्थिति ठीक नहीं है और आलोचना का अर्थ सभी को खुश करना नहीं है। 

कार्यक्रम के अंतिम चरण में पथिक नाट्य संस्था द्वारा 17 लघुकथाओं का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया। बलराम अग्रवाल अशोक भाटिया सतीश राठी महेश सुरेश बजाज सतीश दुबे आदि अनेक लघुकथाकारों की लघुकथाओं को नाटक रूप में प्रस्तुत किया गया। 



कविता वर्मा 
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Wednesday, June 6, 2018

जरूरी है बारिश का पानी सहेजना

कल विश्व पर्यावरण दिवस पर सिरपुर तालाब पर नेचर वालेंटियर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मैंने भी बारिश के पानी को सहेजने के बारे में कुछ बिंदु बताए।

हमने घरों में कच्ची जमीन नहीं छोडी छत पर गिरने वाले पानी को ड्रेनेज में बहा देते हैं जिससे कम वर्षा में नदी नालों में बाढ़ आ जाती है और पानी बर्बाद होता है।

बड़े मैदानों में गाडियों की आवाजाही से जमीन ठोस हो गई है जिससे पानी अंदर नहीं जा पाता बल्कि बह जाता है।

जमीन की गहराई में पानी न जाने के कारण जमीन का तापमान बढ़ रहा है इसलिए गर्मी बढ़ रही है और पेड़ लगाने पर बहुत देखभाल करना पड़ती है।

बारिश के पानी को रोकने सहेजने के उपाय बहुत आसान और सस्ते सरल हैं। बस यह सोचिये कि इसमें जो कुछ सौ हजार रुपये आप खर्च कर रहे हैं वह आपके बच्चों के लिए विरासत है।

घर के सामने अगल-बगल खाली प्लॉट को साफ करवा कर कुदाली से खुदवा दीजिए। जमीन में बारिश का पानी आसानी से समा जायेगा।
सड़क पर बहते पानी को कच्ची जमीन की तरफ मोड़ दें।
पानी के बहाव के रास्ते में 4*4*4फीट के गढ्ढे करवा कर उनमें आसपास पडे ईंट पत्थर भरवा दें (ताकि कोई दुर्घटना न हो)। बारिश का पानी आसानी से जमीन में समा कर ग्राउंड वॉटर लेवल बढायेगा।

याद रखें आपके यहाँ ट्यूब वेल नहीं है फिर भी जमीन में पानी जाने की जुगत लगाएं क्योंकि इससे जमीन ठंडी होगी और गर्मी कम।
कविता वर्मा

Sunday, May 27, 2018

गुदगुदा गये बाल नाटक

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों के लिए बाल नाट्य शिविर लगना इंदौर में आम हो गया है। बच्चों को व्यस्त रखना उन्हें संवेदनशील बनाना और उनमें आत्मविश्वास के विकास में ऐसे शिविर बेहद सक्षम हैं। शिविर की समाप्ति पर बच्चों के द्वारा नाट्य प्रस्तुति इसके परिणाम को सामने लाती है। अनवरत संस्था ने इन्हीं बच्चों के साथ चार नाटक प्रस्तुत किये।
अनवरत संस्था के बाल नाट्य शिविर रंग बंदरा का पहला नाटक बाॅबी की कहानी एक ऐसी छोटी बच्ची की कहानी है जिसके मम्मी पापा दोनों कामकाजी हैं। स्कूल से आने के बाद वह बच्ची अकेले घर पर रहती है और अपने अकेलेपन में एक आभासी संसार रचती है। जिसमें वह अपने स्कूल के तनाव और अवसाद को निकालती है। किसी को डांटती है तो किसी को सजा देती है और किसी को अपना दोस्त बनाती है। रूपकथा सरकार ने अकेली बच्ची को साकार किया तो साथी बच्चों ने इस संसार को रचने में जी जान लगा दिया।
अशोका नाटक अशोक के जीवन की यात्रा को बेहद कसे हुए अंदाज में प्रस्तुत करती है। अशोक का चरित्र निभाया रुद्रांश खत्री ने लगभग पूरे समय मंच पर उपस्थित रह कर मंच को अपने कब्जे में किया। पार्श्व संगीत और लाइव गीत के बोल मन में रचबस जाते हैं। बानगी देखिए
सब हवा हो जायेगा मिट्टी में मिल जायेगा
जो सितारे तू बटोरे साथ न ले जायेगा।
अशोक की कुरूपता को बेहद रोचक तरीके से मिट्टी और प्रकृति से जोड़ा गया और अशोक का बुद्ध की शरण में जाने का दृश्य बहुत आकर्षक बन सका।
नाटक में अशोक के अपने भाइयों से युद्ध और कलिंग युद्ध के दृश्य बहुत सफाई से खेले गये। एक दस बारह साल का बच्चा शरीर के आरपार तलवार के दृश्य बिना किसी गलती के सही दूरी और संयोजन के खेले तो यह नाटक की रिहर्सल में की गई मेहनत को दर्शाता है।
तीसरा नाटक कठपुतली अपने पिता से उपेक्षित लड़की की कहानी है जिसे चारुता नांदेडकर और उसे पालने वाले पिता मग्दु उर्फ राहुल भदौरिया ने अपने भावपूर्ण अभिनय से ऊंचाइयाँ दीं। नाटक के उत्तरार्ध में कोर्ट के आदेश से लड़की को उसके जैविक पिता को सौंपा जाये या पालक पिता को इस फैसले से मन विचलित होता है पर अंत एक मुस्कान दे जाता है।
नाटक में तीन खूबसूरत कठपुतलियाँ जिनमें एक बेहद छोटी पाँच छह वर्ष की बच्ची थी जिसे बेहद खूबसूरती और बराबरी से डायलॉग दिये गये और उसने पूरी जिम्मेदारी से उसे निभाया।
हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य नाटक भोलाराम का जीव बच्चों की उम्र और आज के समय में उपलब्ध तकनीक के संयोजन का खूबसूरत मेल है। मोबाइल फोन पर फीडबैक लेते यमराज और कंप्यूटर पर लेखा-जोखा रखते चित्रगुप्त अपनी कामेडी टाइमिंग के कारण हास्य को बेहतर तरीके से उभारा गया है। नारद मुनि का पृथ्वी पर आना और बहुत कम प्राॅप और दृश्य परिवर्तन के नाटक को पूरा माहौल प्रदान करना निर्देशकीय कौशल है। इसमें भी एक छोटे से बच्चे ने बाबू के पात्र में अपने अभिनय से जान फूंकी फिर चाहे वह पान की पीक थूकने का दृश्य हो या आफिस में बाबू के काम को टालमटोल करने का। नाटक में इंदौरी टच देते हुए सफाई अभियान का जिक्र और जुर्माने में नारद के खडताल जब्त कर लेना लुभा गया।
हर नाटक के बाद सहभागी बच्चों का परिचय और उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया गया और इस समय का सदुपयोग दूसरे नाटक की तैयारी के लिए किया गया।
अंशुल जोशी राज लोगरे और सनत पाण्डेय का संगीत हमेशा की तरह जानदार रहा।
अनवरत थियेटर ग्रुप और नीतेश उपाध्याय की यह बेहतरीन प्रस्तुति रही।
कविता वर्मा

Friday, May 11, 2018

वह अनजान औरत


पार्क में सन्नाटा भरता जा रहा था मैं अब अपनी समस्त शक्ति को श्रवणेन्द्रियों की ओर मोड़ कर उनकी बातचीत सुनने का प्रयत्न करने लगा। पार्क की लाइटें एक एक करके जलने लगी थीं। छोटे बच्चे धीरे धीरे जाने लगे पार्क में टहलने आने वाले बुजुर्ग भी अब बाहर की तरफ बढ़ने लगे कुछ युगल जोड़े अभी भी झाड़ियों के झुरमुट में थे लेकिन उनकी आवाज़ बमुश्किल एक दूसरे तक पहुँचती होगी इसलिए उनसे कोई शोर नहीं होता। चना जोर गरम वाला और मूंगफली गुब्बारे वाले भी अपने ग्राहकों के जाते ही दिन भर का हिसाब करने चल दिए थे। कुल मिला कर चारों ओर शांति ही शांति थी इसलिए थोड़ी कोशिश करके मैं उनकी बातें सुन सकता था।
दूसरी लड़की या कहें महिला पीली शिफ़ोन की साड़ी पहनी थी और नीली साड़ी वाली का हाथ थामे पूछ रही थी "क्या बात है ठीक से बता तो।"
मैं अपनी बेंच पर उनकी बेंच तरफ के किनारे तक खिसक आया। उन दो अनजान महिलाओं की बातें सुनने की स्वयं की उत्सुकता से मैं स्वयं ही चकित था। मुझे दूसरों की बातों में कभी भी ऐसा रस तो नहीं आता था। अब यह अकेलेपन की ऊब थी या उन दोनों या उनमे से किसी एक का आकर्षण जिसकी वजह से मैं जानना चाहता था कि वे क्या बातें कर रही हैं।
"तुझे तो मालूम है विजय पिछले दस सालों से दुबई में है। शादी के तीन सालों बाद ही वो वहाँ चले गए थे तब राहुल दो साल का था। शुरू शुरू में तो डेढ़ दो साल में एक बार इंडिया आते थे। तब मम्मी पापा दोनों ही थे। उनका आग्रह टाल नहीं पाते थे।

कहानी संग्रह परछाइयों के उजाले को आप सभी पाठकों मित्रों से मिले प्रतिसाद के बाद अब मैं अपने उपन्यास छूटी गलियाँ लेकर आपके सामने हाजिर हुई हूँ। पिता पुत्र के रिश्तों पर आधारित यह उपन्यास महत्वाकांक्षा दूरी जिम्मेदारी पश्चाताप और प्रायश्चित की मिलीजुली अनुभूति के साथ आपको इस रिश्ते के अनोखेपन में डुबो देगा ऐसा मेरा मानना है। उपन्यास की कीमत है 120 रुपये इसे आप बोधि प्रकाशन bodhiprakashan@gmail.com पर मेल या 98290 18087 पर फोन कर आर्डर कर सकते हैं।
कविता वर्मा

Tuesday, May 8, 2018

छोटी सी जिम्मेदारी

कुछ समय पहले घर के पास एक खंबे पर बड़ा सा हैलोजन लगा है। एक दिन दोपहर में बाहर जाते समय देखा हैलोजन चालू था।(मेरे घर के सामने बड़ा सा नीम का पेड़ है इसलिए न सड़क दिखती है न लाइट।) थोड़ा ध्यान से देखा तो पाया कि डायरेक्टर तार जोड़ कर चालू कर दिया गया है और वह दिन रात जल रहा है।
दूसरे दिन आसपास देख कर उसका फोटो खींच लिया। (कोई फोटो खींचते देख लेता और शिकायत करने पर वह बंद हो जाता तो मोहल्ले में मेरे नाम के कसीदे पढे जाते।)
कल नगर निगम के एप पर उसकी शिकायत कर दी। आज दिन में फोन आया मैडम कौन-सी लाइट चालू करना है?
मैंने बताया भैया चालू नहीं करना बंद करना है दिन रात जल रही है उसकी व्यवस्था करो।
शाम को फिर फोन आया मैडम उसे स्ट्रीट लाइट फीडर पर डाल दिया है और टाइमर लगा दिया है। अब सुबह बंद हो जायेगा शाम को चालू हो जायेगा।
बात छोटी सी है आसपास रहने वाले सभी लोगों को दिख रहा था लेकिन किसी ने उसकी व्यवस्था करवाने के लिए नहीं सोचा क्योंकि उसका बिल उनके यहाँ नहीं आ रहा था। लोग यह क्यों नहीं समझते कि जब बिजली के खपत के मुताबिक बिल वसूली नहीं होती वह कमर्शियल लाॅस कहलाता है और इसलिए बिजली के दाम बढ़ते हैं।
कविता वर्मा 

Tuesday, May 1, 2018

मजदूर दिवस

आज मजदूर दिवस है हम न खुद मजदूर हैं और न सीधे इन मजदूरों के संपर्क में हैं। एक काम वाली बाई ही मजदूरों के नाम पर संपर्क में रहती है।
अभी कुछ दिन पहले छोटे से काम के लिए एक मजदूर लेकर आये थे पूरे दिन की दिहाड़ी तीन सौ रुपए देकर। उसका काम करने का टालू तरीका देख समझ आ गया कि इसे काम बता कर अंदर नहीं जाया जा सकता। खैर उसे बताया क्या करना है कैसे करना है लेकिन उसकी सुस्त रफ्तार देख कोफ्त होने लगी। फिर मैंने उससे कहा अच्छा तुम तो हमेशा ये काम करते हो तुम बताओ कैसे करें? ऐसा काम करके जाओ कि याद रहे कि किसी से काम करवाया था वगैरह वगैरह। उसके बाद उसने काम में मन भी लगाया और फुर्ती से काम भी निपटाया।

काम वाली को आज छुट्टी नहीं दी क्योंकि अभी तीन दिन शादी के लिए छुट्टी ले चुकी है और चार महीने का एडवांस भी। आज पानी के चार डब्बे लेकर आई थी पानी भरने फिर काम न करवाना तो खुद को ठगना हुआ । हर बात में काम न करने को प्रोत्साहित करने के बजाय मेहनत से काम करने की सीख देने और उनकी वक्त जरुरत पर सही सलाह देना प्रोत्साहन देकर आत्मविश्वास बढाना और उनकी जरूरत पर काम आना ज्यादा जरूरी है।
कविता वर्मा 

Friday, April 13, 2018

मानसिकता बदलें

बात तो बहुत छोटी सी है और कोई नई बात भी नहीं है रोज होती है और सैंकड़ों हजारों के साथ होती है। फिर भी उसका जिक्र करना चाहती हूँ पूछना चाहती हूँ अपने सभी मित्रों से खास कर पुरुष मित्रों से। उम्मीद नहीं है कि आप यहां जवाब देंगे न भी दें लेकिन इस पर विचार तो करें। अपने आप में और अपने बेटों में इस तरह का व्यवहार देखें तो सजग हो जायें। समझें कि सोच में बदलाव की जरूरत है।

कल फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई प्रोफाइल ठीक ठाक थी सौ से ज्यादा म्यूचुअल फ्रेंड थे स्वीकार कर ली। आज जय हिंद संदेश आया। मैसेंजर पर मैसेज भेजने से मना किया। कहा फेसबुक पर पोस्ट हैं उस पर विचार व्यक्त करें।
ऐसा तो होता ही रहता है। लेकिन सिर्फ यही नहीं होता। आहत होता है एक पुरुष का अहं कोई महिला किसी बात से मना कैसे कर दे?
 जिस बात को वह सही मान रहे हैं उसे कोई महिला गलत कैसे कह रही है?
अगर दोस्ती की है तो उनकी मर्जी सर्वेसर्वा होना चाहिए महिला को पसंद नहीं है तो क्या फर्क पड़ता है? उसकी पसंद नापसंद के हमारे लिए कोई मायने नहीं हैं।
फेसबुक पर भी ना सुनने में जो पौरुष आहत हो जाता है शब्द बाण चला कर महिला को नीचा दिखाने की कोशिश करता है फिर अनफ्रेंड ब्लाक कर अपने अहं की तुष्टि करता है ऐसे पौरुष के साथ आम जिंदगी में बराबरी करती लडकियों महिलाओं के लिए कितनी बड़ी बड़ी मुसीबतें हैं।
कैसे मान लें फेसबुक के ये आहत पौरुष असल जिंदगी के भावी बलात्कारी नहीं होंगे।
हम दुखी होते रहेंगे बलात्कार की घटनाओं से सरकार से प्रशासन से जवाब मांगते रहेंगे अपनी बेटियों को सतर्क करते रहेंगे लेकिन जब तक पौरुष की सही परिभाषा नहीं समझी जायेगी बलात्कार होते रहेंगे।
कविता वर्मा

Saturday, April 7, 2018

इन्हें कौन दिशा देगा ?

बेटी तब 9 वीं में थी। शाहिद कपूर नया नया आया था और इस आयु वर्ग के सभी बच्चे उसके बड़े फैन थे।
बेटी की क्वार्टरली एक्जाम का रिजल्ट और काॅपी देखने स्कूल गई थी। इंग्लिश की काॅपी देख कर वह बड़ी मायूस हुई कि my hero पर लिखे उसके पैराग्राफ में सर ने बहुत कम नंबर दिये। वह चाहती थी कि मैं सर से इस बारे में बात करूं। मैं काॅपी लेकर सर के पास गई और उनसे पूछा कि आपने इस पैराग्राफ में नंबर दिये ही क्यों?  आपने इसे पूरा काट क्यों नहीं दिया? हीरो का मतलब क्या होता है किसे अपना हीरो अपना आदर्श बनाया जाना चाहिए यह भी आप नहीं समझा पाये बच्चों को। क्या किया है शाहिद कपूर ने देश के लिए?
सर और बिटिया के साथ वहाँ उपस्थित बाकी पैरंट्स भी सन्न थे लेकिन मैंने कहा कि आप बच्चों के मार्कस् की चिंता न करें बल्कि सही कंसेप्ट देने की चिंता करें। आपकी जगह मैं होती तो पूरे पेज पर ऊपर से नीचे तक कट लगा कर शून्य देती और अगली बार अगर ऐसे हीरो के बारे में लिखे मेरी बेटी तो आप उसे जीरो ही दें।
आज टीवी पर रोना बिसूरना और उसको भुनाना देख कर याद आया।
कविता वर्मा

Thursday, March 29, 2018

अपनी कृति को एक उपन्यास के रूप में अपने हाथों में देखने का अहसास कितना सुखद होता है यह शब्दों में व्यक्त करना बेहद मुश्किल है। मेरा चिर प्रतिक्षित उपन्यास 'छूटी गलियाँ' बोधी प्रकाशन से प्रकाशित होकर जब आया तो उसकी खुशी आप सभी से बांटे बिना पूरी हो ही नहीं सकती थी।
पढने के इच्छुक सभी मित्रगण बोधी प्रकाशन से इसे मंगवा सकते हैं। मूल्य है 120 रुपये।
बोधी प्रकाशन
सी 46 सुदर्शन पुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन
नाला रोड़, 22गोदाम
जयपुर 302006
bodhiprakashan@gmail.com

98290 18087 पर एसएमएस कर सकते हैं किताब का नाम और खुद का पूरा पता डाक के लिए। पेमेंट पेटीएम या अकाउंट में जैसी सुविधा हो।

Sunday, February 18, 2018

#नई कहानी 2

कॉलेज में पहला दिन साड़ी हाथों में चूड़ियाँ गले में मंगलसूत्र कानों में गूँजता  'आंटीजी' संबोधन और अब क्लास का रास्ता पूछने पर अजीब सी घूरती निगाहों ने उसके बचे खुचे आत्मविश्वास को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया। बड़े शहर में आकर फाइनल करने के उसके फैसले के सही होने का विश्वास डगमगाने लगा। खुद को इतना अकेला उसने कभी महसूस नहीं किया था। जिसके साथ रहने  लिए उसने यह फैसला किया था वह साथ तो थे लेकिन इस समय उनका हाथ थाम हिम्मत पाने की जरूरत बेतरह महसूस होने लगी। वह भी तो अपनी मजबूरी में बंधे थे। उसे कॉलेज के गेट पर छोड़ कर अपनी नई नवेली पत्नी के लिए एक बेहतर आशियाना देने के लिए दो गाड़ियाँ बदल कर पच्चीस किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर जाना भी तो जरूरी था। क्या पता कुछ ना कह पाने और कुछ ना कर पाने की मजबूरी में उन्होंने भी अपनी आँखें धीरे से पोंछी हों। 
क्लास में प्रवेश करते ही सबकी निगाहें उसकी और घूम गईं जिसने उसे संकोच के मोटे आवरण में लपेट दिया। थोड़े ही समय बाद उसने फलाने की बहू के रूप में खुद का परिचय होते पाया। यह बेहद अप्रत्याशित था। उसका अपना एक नाम है लेकिन वहाँ मौजूद एक दो लड़कियों के सिवाय किसी ने उसका नाम जानने की इच्छा तक प्रकट नहीं की। वैसे भी बड़े शहर के प्राइवेट कॉलेज में साड़ी पहने एक लड़की जिसके जेठ भी उसी कॉलेज उसी क्लास में हों उसका नाम कुछ भी हो उसकी योग्यता कुछ भी हो क्या फर्क पड़ता है ?
उस दिन तीन क्लास लगीं हर प्रोफ़ेसर और लेक्चरर को उसका परिचय बहू के रूप में दिया गया उसके आगे एक स्टूडेंट के रूप में उसका कोई वजूद ही नहीं था। लगभग साढ़े ग्यारह बजे कॉलेज छूटा। सुबह जल्दी उठ कर तैयार होने टिफिन बनाने के बाद इतना समय ही कहाँ था कि खुद के खाने का ख्याल रहता। एक कप दूध जरूर उसने पी लिया था वह भी विदाई के समय मम्मी ने जिठानी से कह दिया था उसके दूध का ख्याल रखना इसलिए पहले दिन से उसे चाय के स्थान पर एक कप दूध मिल जाता था। पेट में चूहे कूद रहे थे मन मरा हुआ था। वापसी के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर टेम्पो लेना था फिर उतर कर लगभग एक किलोमीटर और चलना था। सिर बुरी तरह दुःख रहा था थोड़े पैसे पास में थे लेकिन रास्ते में रुक कर कुछ लेने और खाने की हिम्मत नहीं बची थी। 
हालाँकि सुबह वह रास्ता पहचानने  लिए बड़े ध्यान से दुकानों के साइन बोर्ड देखती आई थी जहाँ से उसे मुड़ना था लेकिन सुबह जो साइन बोर्ड सामने दिख रहे थे अब वे पीछे हो गए थे और वह मोड़ जहाँ से उसे मुड़ जाना था वह पीछे छूट गया। आगे बढ़ते हुए वह एक बड़े चौराहे पर आई तब अपनी गलती समझ आई। भूख से अंतड़ियाँ और सिर टनक रहा था। उसने किसी से रास्ता पूछा और लगभग पौना किलोमीटर और घूम  कर टेम्पो स्टैंड पर आई। थोड़े इंतज़ार के बाद ही टेम्पो मिल गया। अब उसकी अगली चिंता शुरू हो गई कि उसे उतरना कहाँ है ? वैसे उसने देखा था जहाँ से वह टेम्पो में चढ़ी थी वहाँ एक डॉक्टर का साइन बोर्ड लगा था। उसने अपना स्टॉप बताया लेकिन फिर भी आशंकित सी बैठी रही। 
काफी देर चलते रुकते सवारियाँ चढ़ाते उतारते टेम्पो एक स्टॉप पर रुका और उसे उसी डॉक्टर का साइन बोर्ड दिखा और वह तेज़ी से टेम्पो से उतर गई। टेम्पो वाले ने उसे घूर कर देखा लेकिन भूख थकान और मरे मन के साथ दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था। टेम्पो आगे बढ़ गया उतर कर उसने चारों तरफ देखा तो लगा कि यह वह चौराहा नहीं है जहाँ से वह चढ़ी थी। आधे घंटे पहले एक मोड़ छोड़ देने की गलती की ग्लानि और गुस्से ने अब उसे एक चौराहे पहले ही टेम्पो से उतार दिया था। दोपहर के एक बज रहे थे क्वांर की चिलचिलाती धूप खाली पेट उसकी रुलाई छूट गई। 
पापा के यहाँ कभी भी कहीं जाना होता था तो भाई मोटरबाइक से छोड़ देते थे या पापा के ऑफिस की जीप से ड्राइवर। जीवन के इतने बेरहम यथार्थ से उसकी पहली मुठभेड़ थी यह बिना किसी तैयारी के। अब उसे लगभग दो किलोमीटर और चलना था दोपहर की धूप में उस सुनसान सड़क पर चलते हुए एक और विचार उसके मन में कौंधा अगर उसे घर नहीं मिला तो ? उसकी रुलाई छूट गई लेकिन दिमाग ने खुद के गुम होने पर घर ढूंढने के उपाय खोजने शुरू कर दिए। शुक्र है इसकी नौबत नहीं आई एक किलोमीटर चलने पर उसे पहचाना रास्ता मिल गया। दरवाजा खटखटाते समय लगभग डेढ़ बज रहा था दरवाजा तो खुला लेकिन उसका स्वागत अंदर पसरी बोझिलता ने किया। 
कविता वर्मा 

Thursday, February 15, 2018

# नई कहानी

शादी के आठ दिन बाद वह मायके चली गई थी जिसके बाद करीब डेढ़ महीने बाद वापस लौटी। सगाई और शादी के बीच डेढ़ साल का फैसला था  ने इजाजत दी थी कि पोस्ट ग्रजुएट कर ले। प्रीवियस ईयर के बाद ही शादी हो गई। इन डेढ़ महीनों में यही जद्दोजहद चलती रही कि फाइनल कहाँ से करे ? इसके साथ ही एक अदृश्य दबाव सा बना रहा कि एक साल ड्राप ले ले लेकिन वह जानती थी ड्राप लेना मतलब ड्राप हो जाना। शादी में कॉलेज के प्रोफेसर भी आये थे और उनमे से एक ने स्टेज पर उसे आशीर्वाद देते हुए कहा था " फाइनल कर लेना ड्राप मत लेना। " जाने क्यों वे शब्द दिमाग में जम गए थे इसलिए उसने ड्राप लेने के आईडिया को दरकिनार कर उसी साल फ़ाइनल करने की जिद पकड़ ली थी। 
वह तो गई थी कॉलेज में अड्मिशन लेने लेकिन उसी दिन कॉलेज में दो गुटों के बीच झगडे हो गए और यहाँ माहौल ख़राब है के नाम से आखिर ससुराल से ही फ़ाइनल करने का तय हुआ। आसान तो वह भी नहीं था क्योंकि सिर्फ कॉलेज नहीं बदलना था बल्कि यूनिवर्सिटी भी बदलना था माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेना था फिर बड़े शहर के ढेर सरे कॉलेजों में से सही कॉलेज चुनना था। 
इत्तफाक था कि उसी साल जेठ भी उसी विषय से पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे थे और फाइनल में थे। उन्हीं ने सुझाव दिया कि उनके कॉलेज में एडमीशन ले ले। प्रायवेट कॉलेज है रोज़ जाने की दिक्कत नहीं रहेगी। "रोज़ जाने की दिक्कत " या "ना जाने की आसानी" समझ ही कहाँ पाई वह जैसा जिसने किया कर लिया। 
कहीं कुछ सुगबुगा रहा है यह भी तो नहीं समझ आया। 
मायके से आकर जब उसने अपनी अटैची खोली थी उसमे सलवार सूट देख कर बड़े तल्ख़ लहजे में पूछा गया था "क्या वह सूट पहनेगी ?" 
"कॉलेज जाना है तो सूट तो पहनना पड़ेगा " आश्चर्य में भर कर सहज ही जवाब दिया था उसने लेकिन बात फिर भी नहीं समझी थी।  
वह अंदर के कमरे में थी तभी बाहर किसी पड़ोसन को बात करते सुना " तो क्या वह जेठ के साथ कॉलेज जाएगी ?"
"हाँ जेठ के साथ सलवार सूट पहन कर कॉलेज जाएगी "एक तल्ख़ स्वर उभरा। 
शाम को जब पति वापस आये तो उन्हें फरमान सुनाया गया "उसे कॉलेज जाना हो तो जाये लेकिन सूट नहीं पहन सकती। " एक क्षीण प्रतिवाद भी हुआ लेकिन उनके घर में रहना है तो उनके अनुसार रहना होगा के फरमान के साथ ख़त्म हो गया। पति की नौकरी अभी पक्की नहीं हुई थी स्टायपेंड मिलता था एक दो महीने तो दिक्कत थी ही। हालाँकि पापा का मकान खाली था वह चाहती तो वहाँ रह सकती थी लेकिन घर में आते ही दो चूल्हे करने की उसकी सोच ही नहीं थी। एक भरे पूरे घर में शादी करना उसका सपना था इसलिए वह ऐसा कुछ नहीं चाहती थी।
दूसरे दिन सुबह आठ बजे नहा कर तैयार होकर पति के खाने का डब्बा बना कर वह साड़ी पहन कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई थी। रास्ता उसने देखा नहीं था वह तल्खी कानों के रस्ते थोड़ी तो दिल में भी उतरी थी इसलिए उसने कहा एक बार मुझे रास्ता दिखा दो फिर मैं चली जाऊँगी। रास्ते भर पति भुनभुनाते रहे। पापा से बात करने की बात करते रहे , मुझे कोई पायजामा कुरता पहन कर ऑफिस जाने को कहेगा तो कैसा लगेगा ? वह उन्हें शांत करने की कोशिश करती रही। बेकार में बुढ़ापे में उन्हें क्यों दुःख देना जैसी बातें उन्हें समझाती रही। 
"कॉलेज में घुसते ही उसकी साड़ी के कारण सबका ध्यान अनायास ही उसकी तरफ चला गया। पीछे से आंटी जी की आवाज़ें आती रहीं। अभी तक पति को देती समझाइश पर यथार्थ का पत्थर पड़ा था उसके आँसू निकल पड़े। मात्र बीस साल की उम्र में अपने से बड़े डीलडौल वाले लड़कों के मुँह से आंटीजी सुनना सिर्फ इसलिए कि अब उसकी शादी हो गई थी उसके सूट पहन लेने से किसी को तकलीफ थी कि वह बेवजह भाइयों बीच मनमुटाव का कारण नहीं बनना चाहती थी इसलिए कि वह बड़े घर की बेटी थी और उसपर लांछन लगा कर उसे बुरा साबित करना आसान था और इसलिए कि घर बना कर रखने के संस्कार उसे घुट्टी में मिले थे। 
कविता वर्मा 

Monday, January 1, 2018

नया बनाम पुराने का अंत
साल 2017 चला गया समाप्त हुआ पूरी दुनिया में जश्न मना। जश्न मना उसके बाद आने वाले नये साल का। हालांकि नये साल के गर्भ में क्या है कोई नहीं जानता। बस एक आस होती है कि कुछ सुखद कुछ सुकून दायक होगा लेकिन हर जाने वाली चीजों के बाद आने वाली चीजें ऐसी ही सुखद नहीं होती।
रीगल चौराहे पर मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर एक चाय की गुमटी है जहाँ अकसर साहित्यिक गोष्ठी के बाद चाय पीने जाते हैं। उसी गुमटी में एक छोटा सा कमरा है पता नहीं क्या है उस कमरे में कभी झांक कर नहीं देखा। उस दिन वहाँ एक बुजुर्ग व्यक्ति भी थे। मंझोला कद अनुभवों के रंग से रंगी दाढ़ी कुर्ता पायजामा पहने और चेहरे पर मुस्कान लिये वहां घूम रहे थे। किसी ने उन्हें पहचाना और सभी से परिचय कराया। वे अपने समय के सक्षम चित्रकार पचास वर्षीय श्री किशन राव जी थे।
एक जमाने में पोस्टर चित्रकार की विशिष्ट पूछ परख होती थी। किसी फिल्म की रिलीज के पहले किसी के जन्मदिन पर या किसी अवसर विशेष पर इन लोगों के पास सिर उठाने का समय नहीं होता था। उनके बनाए महान हस्तियों के पोट्रेट रेखाचित्र अभी भी वहाँ रखे थे।
फिर वक्त बदला नई तकनीक आई और उसने पुराने को अलविदा करने के साथ ही किसी का वक्त भी खत्म कर दिया।
कविता वर्मा






#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...