Tuesday, October 27, 2020

नई हैं साइकिल पर पुरानी सा मजा कहाँ

 हालाँकि दशहरा तो रविवार को ही मन गया था लेकिन सोमवार सुबह भी दशमी तिथि थी। सुबह मतलब पूरे ही दिन। कल शाम  मार्केट में किसी काम से रुके तो अचानक एक दुकान में और उसके सामने खूब ज्यादा भीड़ दिखी। कौतुहल हुआ कि कहाँ तो बाजार मंदी से जूझ रहा है और इस दुकान में ऐसा क्या है जो इतनी भीड़ जमा है? पहले लगा शायद किसी दुकान का उद्घाटन होगा लेकिन कहीं हार फूल नहीं दिखे और न नाश्ते खाने का इंतजाम। अब इंदौरी बिना खाने उद्घाटन तो नहीं कर सकते न। फिर ध्यान से देखा आखिर चल क्या रहा है? दरअसल दुकान दो मंजिला थी तो साइनबोर्ड काफी ऊँचा था इसलिए एकदम नजर नहीं जा रही थी और भीड़ के बीच क्या चल रहा है वह दूरी के कारण समझ नहीं आया ।फिर दुकान का नाम देखा साइकिल वर्ल्ड। ओह तो यह  साइकिल की दुकान है और लोग दशहरे के शुभ मुहूर्त में साइकिल खरीदने आये हैं। तभी कुछ लोग साइकिल का ट्रायल लेते नजर आये तो कुछ साइकिल के अस्थि पंजर कसवाते।

याद आया कि कुछ ही देर पहले उज्जैन रोड़ पर बने नये पुल पर बहुत सारे लोगों को साइकिल चलाते देखा था। 

आजकल इंदौर में साइकिल चलाने का क्रेज बढ़ता जा रहा है। बहुत सारे युवा प्रौढ़ साइकिल चलाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। आजकल साइकिल भी काले रंग पर पतली सी लाल सुनहरी लाइन और एक जैसे नक्शे के बजाय अलग-अलग रंग डिजाइन टायर के साइज मोटाई के रूप में मिल रही हैं और हाँ कीमत भी बहुत वैरायटी में हैं। इन डिजाइनर साइकिल की कीमत सामान्य वर्ग के हिसाब से बहुत ज्यादा हैं जिस पर कंट्रोल किये जाने की आवश्यकता है।

हालाँकि इंदौर में सड़कें साइकिल चलाने के लिये बिलकुल भी तैयार नहीं हैं न कोई अलग लेन है और न ही लोगों में साइकिलिस्ट के लिए कोई ट्रेफिक सेंस ही विकसित किया गया है लेकिन साइकिल से सफर को बढ़ावा जहाँ आयातित तेल पर निर्भरता कम कर रहा है प्रदूषण के स्तर में कमी कर सकता है और चलाने वाले के स्वास्थ्य को भी सकारात्मक अंजाम दे सकता है।

वैसे आजकल जो नई साइकिल आ रही हैं वे चाहे जितनी अच्छी दिखती हों उनमें बालबियरिंग हों या गियर हों उन्हें चलाना चाहे जितना आसान हो लेकिन मुझे उनकी बहुत छोटी और कठोर सीट बिलकुल पसंद नहीं आती। इस मामले में पुरानी काली साइकिल की चौड़ी और स्प्रिंग लगी सीट का कोई मुकाबला नहीं। अब आज के युवा कभी उस आरामदायक सीट पर बैठे ही नहीं हैं तो उसके लिए जो है सो है।

# cycling #cycle

Saturday, October 24, 2020

पड़ोसी हाय पड़ोसी

 करीब दो महीने से हाथ में तेज दर्द था। लगा कि लाॅकडाउन में सभी काम हाथ से करने के कारण शायद मसल्स में दर्द हो गया है लेकिन दर्द बढ़ता गया। यह समय बिटिया के अमेरिका जाने का भी था इसलिए थोड़ा टालते रहे कि अभी हास्पिटल डाक्टर के चक्करों में न पडें। बिटिया के जाने के बाद डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने फ्रोजन शोल्डर की आशंका जताते हुए एम आर आई करवाई ब्लड टेस्ट हुए। दवाइयाँ पहले ही लिख दी गई थीं साथ ही एक्सरसाइज का एक चार्ट था जिसे पहले तो खूब सीरियसली नहीं लिया लेकिन फिर लगा कि यह भी एक आवश्यक तत्व है तो उसे करना शुरू किया।

परसों डाक्टर को ब्लड रिपोर्ट और एमआरआई दिखाई तो उन्होंने शोल्डर में इंजेक्शन देने को कहा। चूँकि भाभी भी डाक्टर है उससे बात हुई तो उनने बताया कि इससे कंधे की साॅकेट में जो कैल्शियम डिपाजिशन होता है उसे डिजाल्व करके मूवमेंट को सरल बनाया जाता है इसलिए मैं तुरंत तैयार हो गई। ओटी में ले जाकर यह इंजेक्शन लगा कुछ आराम महसूस हुआ। अब रोज कंधे की गर्म पानी के नैपकिन से सिंकाई करके एक्सरसाइज करने में लगभग एक घंटा लग जाता है जो बुरी तरह थका देता है। इस सबके साथ दवाइयों के असर के कारण चक्कर से आने लगते हैं तेज नींद आती है। खैर यह तो हुई सामान्य सी बात शायद सभी के फ्रोजन शोल्डर में यही स्थिति होती होगी।

अब खास बात घर के सामने एक मकान बन रहा है जहाँ आजकल टाइल्स लगने का काम चल रहा है दिन भर टाइल्स कटने की किर्र किर्र कानों में अजीब झनझनाहट पैदा करती है लेकिन वह तो होगा ही इस आवाज को आप रोक नहीं सकते। असली परेशानी है इस मकान के मालिक की आवाज। वह व्यक्ति इतनी जोर से बात करता है कि मुझे मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक उसकी आवाज आती है। पहले वह हर संडे सारे दिन मकान का काम देखने आता था और फोन स्पीकर पर डालकर जोर जोर से बातें करता था। एक दिन अंततः मैंने उससे कहा कि भाईसाहब संडे को लोग दिन में आराम करते हैं।

अब वह यहीं एक किराये के मकान में शिफ्ट हो गया है और दिन भर इतनी जोर जोर से बोलता है कि मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक टाइल्स कटने की आवाज नहीं आती लेकिन उसके बोलने की आवाज आती है। दोपहर बाद वह आफिस चला जाता है तो उसका बेटा उसकी जगह संभाल लेता है। शाम को तरी करना हो या खेलना हो इतनी जोर जोर से चिल्लाता है कि आप घर के किसी कमरे में शांति से नहीं बैठ सकते।

चूंकि अब उसे जिंदगी भर इसी मकान में रहना है और कुछ कहने का मतलब जीवन भर की बुराई मोल लेना है और कुछ न कहना मतलब जिंदगी भर टार्चर होना। पता नहीं लोगों को अपनी खुद की आवाज सुनाई देती है या नहीं या वे बोलते ही इसलिये हैं कि आसपास वाले लोग सुनकर उन्हें स्मार्ट समझें। हालाँकि मुझे तो वे..... खैर छोड़िये।

#civic_sense #noisi_neigbbour #तुम_कहो_जग_सुने

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...