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Saturday, June 11, 2011

यादें

कभी सोचती हूँ
दिमाग जो होता एक डिबिया
निकाल कर देखती उसमे पड़े
विचार,भाव रिश्ते-नाते ,
यादें ,एहसास,घटनाएँ
हौले से छूकर सहलाती
संचेतना भरती उनमे
हंसती, रोती, खिलखिलाती
फिर महसूसती उन्हें

करीने से फिर रखती
छांट बाहर करती
अगड़म -बगड़म विचार
टूटे बेजान रिश्तों के तार
टीसते एहसास

खाली पड़े कोनों को भर देती
किसी सुंदर विचार से
सुनहरी यादों की गोटी किनारी से
सजा लेती डिबिया

लेकिन,
उस एक अनाम से रिश्ते
जाने अनजाने से नाम
कुछ अनबूझे से भाव ,
कुछ कसकती बातें, यादें
झाड़ पोंछ कर फिर सहेज देती
छुपा देती फिर किसी कोने में
चाह कर भी न निकाल पाती
निकाल कर भी न भुला पाती
वो बसी है दिल में कहीं गहरे
बहुत गहरे .

Saturday, April 30, 2011

इंतजार २

(बरसो बाद मंदिर में मधु और मधुसुदन ने एक दूसरे को देखा और उनकी कई पुरानी यादे जाग उठी.) अब आगे.....
तुम यहाँ कैसे मधु ने पूछा.
अभी चार पांच महीने पहले ही ट्रान्सफर हो कर यहाँ आया हूँ. पास ही की कॉलोनी में मकान लिया है . कभी कभार शाम को यहाँ आ जाता हूँ. इस मंदिर में बहुत शांति मिलती है. बहुत सारी बातें याद करते हुए शाम निकल जाती है.
में भी यहाँ इसीलिए आती हूँ. कहते हुए मधु ने जीभ काट ली वह दूर देखने लगी.
तुम यही कही पास ही रहती हो? उसकी झेंप कम करने के लिए मैंने बात बदली.
पास तो नहीं हाँ ५-७ किलोमीटर दूर एक कॉलोनी में .
तुम्हारा खुद का घर है या...
खुद का है .कई साल हो गए . मम्मी बहुत पीछे पड़ी थी-अपना घर नहीं बसाया तो क्या कम से कम एक मकान तो अपना कर लो.
में कुछ असहज हो गया. मधु आज भी अकेली है मेरे कारण.
मुझे माफ़ कर दो मधु मेरे कारण ...
नहीं तुम्हारे कारण नहीं मेरी बात को बीच से काटते हुए उसने कहा .शायद यही हमारी नियति थी .
क्या कर रही हो तुम?
एक कम्पनी में सलाहकार हूँ. मम्मी मेरे ही साथ रहती है दिन भर काम और शाम को सहेलियों के साथ घूमना फिरना. आज मेरी सहेलियां साथ नहीं आ पाई तो अकेले ही निकल पड़ी. और तुम??
में एक कम्पनी में सीनियर मेनेजर हो कर यहाँ आया हूँ . पत्नी दो साल पहले गुजर गयी बेटा अमेरिका में है और बेटी दिल्ली में .दोनों की शादी हो गयी अपनी अपनी जिंदगी में सेटल है यहाँ में अकेला हूँ.
थोड़ी देर हम दोनों के बीच चुप्पी छाई रही .पूछना तो चाहता था.मधु कैसे गुजारे तुमने इतने साल अकेले पर पूछ न सका .
अब मुझे जाना होगा .मम्मी घर में अकेली है आजकल उनकी तबियत भी ठीक नहीं रहती . फिर कब मिलोगी मधु? अपनी आवाज़ के कम्पन पर में खुद ही हैरान था.
मुझे देख कर हंस पड़ी वो. अरे अब तो इंदौर में ही हो जब चाहो मिल सकते हैं.
उसे हँसता देख कर मेरी जान में जान आयी.
तुम्हारा फोन नंबर ,पता?
हमने एक दूसरे का नंबर लिया और धीरे धीरे गाड़ी की ओर बढ़ चले .
आपको कही छोड़ दूं ?
नहीं में चला जाऊँगा ,थोडा टहलना भी हो जायेगा.
ठीक है फिर मिलते है हाथ हिलाते मधु ने गाडी बढ़ा दी. में दूर तक जाते धूल के गुबार को देखता रहा. क्रमश

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...