Tuesday, August 25, 2020

दाँत दर्द का इलाज ढूँढते

 कोरोना काल में बहुत सारी अच्छी बुरी बातों की श्रृंखलाएं चलती जा रही हैं। यूँ तो अच्छी बुरी बातों से ही जीवन बना है लेकिन क्योंकि यह समय हमारे लिए सदियों में एक बार आने वाला, कभी देखा ना कभी सुना, ऐसा समय है इसलिए इस समय होने वाली सभी बातें बहुत ज्यादा  महत्वपूर्ण हो जाती हैं। 

इस दौरान हर व्यक्ति ने अपने आप को जिस तरह एक बंधन में एक कैद में पाया है उसने भी हमें झकझोर दिया है। आम तौर पर अपने आपको हर तरह से स्वतंत्र समझने वाला व्यक्ति भी जब यह करो वह ना करो यह कर सकते हैं वह नहीं कर सकते के दायरे में पाता है तो घबरा सा जाता है। सहज सुलभ चीजें जिन्हें आम दिनों में करते हुए न कभी कोई योजना बनानी पड़ती थी न कभी उनके बारे में सोचना पड़ता था इन दिनों में बहुत सोचने बहुत योजना बनाने के बाद ही की जा सकती हैं। जिसकी वजह से न सिर्फ एक पराधीनता का भाव पैदा होता है बल्कि अपनी विवशता जान कर मन बहुत खिन्न भी हो जाता है। 

ऐसा ही अचानक महसूस हुआ जब एक दिन सुबह सोकर उठी पानी पिया और पीते ही दांत में तेज दर्द हुआ। इतना तेज दर्द जो मैंने कभी जीवन में महसूस नहीं किया था।  ऐसा लगा मानों पानी मसूड़ों को चीरकर अंदर तक घुस गया है और उसने जबड़े के चेहरे के पूरे बाएं हिस्से को अपनी जकड़न में ले लिया है। उस ठंडक को उस तीखे दर्द को  सहन कर पाना बड़ा ही मुश्किल लगा। 

चूंकि लाॅकडाउन चल रहा था इसलिए कहीं भी किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं था। तुरंत अपने डेंटिस्ट डॉक्टर को फोन किया तो उन्होंने कुछ एंटीबायोटिक और दर्द से राहत के लिए कुछ गोलियाँ लिख दीं जिन्हें तुरंत ही मेडिकल स्टोर से मंगवा कर खाना शुरु कर दिया। दर्द में कुछ राहत जरूर मिली लेकिन कुछ भी खाने पीने पर ठंडे और गर्म का वह तीखा का एहसास पूरे चेहरे पर लगातार बना रहा। 

इंतजार के सिवा और कोई चारा नहीं था। पांच दिन के लिए दी गई एंटीबायोटिक का डोज दस दिन तक चलाया गया। कुछ राहत जरूर मिली लेकिन ज्यादा नहीं। एंटीबायोटिक बंद करने के कुछ ही दिनों बाद एक दिन फिर बहुत तेज दर्द हुआ जैसे किसी ने अंदर की सारी नसों को झकझोर दिया हो।

उस दिन सारे डर को ताक पर रखकर डॉक्टर के पास जाने का निश्चय कर लिया। डॉक्टर के क्लीनिक पर हैंड सैनिटाइजर लगा सिर पर कैप पहन ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन का लेबल चेक करवा कर जब अंदर पहुंची तो डॉ को पीपीई किट में खुद को सिर से पैर तक ढके हुए देखा। उन्हें देखकर एक अपराध बोध सा हुआ कि क्यों इस समय मैं यहाँ आ गई? लेकिन मजबूरी थी दिखाना बहुत जरूरी लग रहा था। 

डॉक्टर ने फार्सेप से दांतों में फंसा कुछ पुराना खाना निकाला और अंदर तक रोशनी डाल कर देखी तो पता चला एक बड़ी सी कैविटी है जिस में सड़न पैदा हो चुकी थी। उन्होंने कहा इसका तो रूट कैनाल ही करवाना होगा लेकिन इस समय कोई भी डॉक्टर रूट कैनाल करने के लिए तैयार नहीं होगा क्योंकि उसमें पानी के छींटे उड़ते हैं इसलिए  अभी आपको फिर कुछ दिन एंटीबायोटिक खाना पड़ेगी और एक ब्रश दे रहा हूँ जिससे आप दांतों के बीच की सफाई अच्छे से करते रहिए उससे दर्द में कुछ आराम होगा। 

रूट कैनाल सुनते ही दिल धक से हो गया। रूट  कैनाल मतलब दांतो के अंदर की नसों को पूरी तरह मार देना जिससे कि उसमें ठंडे गर्म का किसी भी तरह के दर्द का अहसास ही न हो। अपने शरीर के अंदर ऐसे किसी मृत अंग को रखना भला कोई कैसे चाहेगा? 

दवाई लेकर और वह तारों वाला आडा ब्रश लेकर हम घर आ गए। ब्रश का उपयोग तुरंत शुरू किया तब जाना कि अरे हमारे दांतो के बीच कितना सारा अन्न फँसा रह जाता है, जिसे हम सोचते हैं कि ब्रश करके निकाल दिया है। वही अंदर ही अंदर सड़न पैदा करता है। 

रूट कैनाल के डर ने अब तक के आलसी मन को  उकसाया और जो चीज मैं कभी नहीं करना चाहती यानी यूट्यूब पर देख कर नीम हकीम बनना मैंने वह भी करने का निश्चय किया। अभी कुछ समय से होम्योपैथी की दवा चल रही थी तो सोचा शायद दांत के दर्द के लिए भी होम्योपैथी की कोई दवा हो। लेकिन वह दवा अभी चल रही दवा के साथ मैच करेगी या नहीं यह चीज समझ में नहीं आई इसलिए उसे ड्रॉप कर दिया। 

इसके बाद आयुर्वेद में दांत दर्द के कुछ इलाज तलाशे गए। पता चला कि लौंग का तेल  दांत के दर्द में बेहद कारगर है। यह तो पहले ही पता था बचपन में दांत दर्द के लिए लौंग के तेल के उपयोग के बारे में बहुत सुना था लेकिन कभी आवश्यकता नहीं पड़ी इसलिए वह ध्यान से उतर गया। तुरंत  लौंग का तेल मंगवाया गया और रुई में उसे लगाकर दांत की उस कैविटी में फँसाया गया। उससे भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ क्योंकि रुई के दबाव की वजह से कैविटी पर जोर पड़ता और दर्द बढ जाता। दूसरे विकल्प की तलाश की गई जिसमें हल्दी नमक लौंग का तेल और थोड़ा नारियल का तेल का पेस्ट मिलाकर कैविटी में भरने की सलाह दी गई थी। वह भी करके देखा कैविटी में नमक और हल्दी का मिश्रण लौंग के तेल के साथ मिलाकर भरा गया जिससे कोई फौरी राहत जरूर मिलती लेकिन वह कितना अंदर जाता यह पता करना बेहद मुश्किल था। 

कुछ दिन करते उससे भी उकताहट हो गई इसलिए धीरे-धीरे वह बंद हो गया। इसके बाद सोचा कि क्यों न लौंग के तेल को सीधे उस केविटी के अंदर डाला जाए ताकि अंदर जो भी बैक्टीरियल इंफेक्शन है उस पर वह सीधे काम करे। एक ड्रॉपर ढूंढा और उसकी मदद से बिटिया से कहकर कैविटी के अंदर लौंग का तेल सीधा टपकाया गया, ताकि वहाँ जो भी इंफेक्शन है वह खत्म हो जाए। इसे जरूर फायदा मिला कुछ दर्द से और कुछ पानी भी लगने पर होने वाला तेज दर्द कुछ कम हुआ जिससे एक उम्मीद बंधी कि शायद यह धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। 

मौसम ठंडा होते ही कई बार कम पानी पीने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट कम होने की वजह से नसों में जकड़न ऐंठन होने लगती है। कई बार यह इतनी तेज होती है कि पैर सीधा रखना मुश्किल होता है। अंदर ही अंदर यह मरोड़ नीचे से ऊपर देर तक उठती रहती है जिससे किसी भी तरह कोई राहत नहीं मिलती, सिवाय इसके कि तुरंत नींबू नमक का घोल बनाकर पी लिया जाए। 

उस दिन अचानक पैर की नस बुरी तरह से ऐंठ गई दर्द इतना तेज था कि चीख निकल गई। नींबू काटने निचोड़ने की ताकत भी नहीं थी इसलिए तुरंत एक गिलास में थोड़ा सा नमक घोला और पीने लगी। 

जब नमक का पानी उस कैविटी में लगा तो अचानक ध्यान आया कि यह तो सबसे अच्छा तरीका है। क्यों न पानी में नमक घोलकर उसके कुल्ले किए जाएं कुछ इस तरह की पानी उस केविटी तक पहुंचे। पानी को तो कोई रोक नहीं सकता वह जहाँ दरार मिलेगी वहीं चला जाएगा और उसके साथ घुला हुआ नमक भी। नमक से बेहतर एंटीबैक्टीरियल दवा और कौन सी हो सकती है? 

बस फिर क्या था मुझे तो मानो इलाज मिल गया। करने गए थे पैर का इलाज मिल गया दांत के दर्द का इलाज। अगले ही दिन से दिन में चार-पांच बार खासकर सुबह कॉफी पीने के बाद खाना खाने के बाद रात में खाना खाने के बाद मुँह अच्छे से साफ करके नमक के पानी का एक घूँट मुँह में भरकर उसे देर तक मुँह के चारों तरफ घुमाना विशेष रूप से उस कैविटी के आसपास अंदर की तरफ। ताकि नमक का पानी उसके अंदर तक चला जाए और वहाँ जो भी इंफेक्शन है उसे खत्म करे। 

नतीजा यह हुआ कि पिछले 20 25 दिनों से जिस दाढ़ से एक कौर भी नहीं चबा पा रही थी उसी दाढ़ से कुछ ही दिनों बाद अच्छे से खाना चबाकर खाने लगी। हालांकि कैविटी अभी भी है उसे भरने में समय लगेगा पर रात में जब नमक का कुल्ला करके सुबह उठती हूँ तो वह कैविटी बहुत छोटी सी महसूस होती है। शायद रात भर में वह अपने आप हील होती है लेकिन दिन में फिर खाने पीने की वजह से वह थोड़ी बड़ी हो जाती है। 

इतना जरूर कहूँगी कि दर्द मैं बहुत हद तक कमी आई है  और न जाने क्यों यह उम्मीद है कि बहुत जल्द यह इंफेक्शन पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। उसके बाद दांत में जो कैविटी बचेगी उसे फिलिंग से बंद करवा लूँगी और शायद रूट कैनाल करने से भी बच जाऊँ।

आखिर हमारे बड़े बुजुर्ग भी तो हफ्ते में एक दिन सरसों के तेल और नमक से दाँत चमकाने के बहाने दाँतों को डिस्इंफेक्ट ही तो करते थे। 

कविता वर्मा

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...