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Tuesday, June 28, 2011

कुछ ....


.सूरज की सुनहरी धुप
 छूती  है जो गालों को 
 पर कुनकुनी नहीं लगती
 कुछ सर्द सा है. 

बारिश की रिमझिम बूँदें
 पड़ती जो तन पर 
पर मन को नहीं भिगोती
 कुछ सूखा सा है. 

भीड़ भरे बाज़ार में 
चीखती आवाजें
 कुछ सुनाई नहीं देता
 कुछ सूना सा है. 

दोस्ती प्रेम प्यार के
 एहसासों से भरे जीवन में
 नहीं होता कोई एहसास 
कुछ रीता सा है. 

एक तुम्हारा स्पर्श
 एक  तुम्हारी नज़र 
 जो मिल जाये मुझे
फिर सब अपना सा है. 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...