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Tuesday, June 21, 2011

किन्नर

कल दो खबरे सुनी और पढ़ीं उनसे  मन  विचलित हो गया .
एक  घटना हमारे घर के पास ही हुई ,किसी के नए मकान का गृहप्रवेश था मेहमान खाना खा रहे थे तभी वहां किन्नर आ गए और नेग के रूप में ११,००० रुपये माँगने लगे. स्वाभाविक ही था की इतनी बड़ी रकम सिर्फ नेग के नाम पर देना किसी को भी नागवार गुजरता सो गृह स्वामी ने मना कर दिया और कुछ कम का प्रस्ताव रखा .लेकिन वह राशी उन किन्नरों  को बहुत कम लगी और फिर उन्होंने सभी मेहमानों के सामने हील हुज्जत और अपनी चिर परिचित आखरी धमकी के रूप में अश्लील हरकते शुरू कर दी.आखिर गृह स्वामी को ८,००० रुपये दे कर उन्हें विदा करना पड़ा. पैसे गए बिना बात का मेहमानों के सामने नाटक हुआ और गृह प्रवेश जैसी एक ख़ुशी का क्षण हमेशा के लिए एक कड़वी याद के लिफाफे में बंद हो गया. 
दूसरी  खबर अख़बार( नईदुनिया १८ जून  )  में पढ़ने को मिली की राउरकेला में  एक व्यक्ति से किसी किन्नर ने शादी का प्रस्ताव रखा जिसे उसने मना कर दिया तो उस किन्नर ने उस व्यक्ति पर कांच की बोतल से हमला कर दिया. जब उसने इसकी रिपोर्ट पुलिस में की तो उस किन्नर को पकड़ा गया लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया की किन्नर को जेल में नहीं रखा जा सकता ,इसलिए उस किन्नर  को छोड़ना पड़ा. 
इन दो घटनाओं ने बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया. एक समय था जब साल में दो बार सिर्फ होली और दिवाली पर किन्नर त्यौहार का ईनाम माँगने आते थे. प्रकृति की जिस क्रूरता ने इनसे जीवन की सामान्य खुशियाँ छीनी है उसे महसूस करते हुए उन्हें इन त्योहारों के मौकों पर नेग दे कर अपने लिए दुआएं लेना शायद ही किसी को बुरा लगता हो. इसके बाद बच्चे के जन्म के अवसर पर या शादी ब्याह के मौकों पर इनका आना आम बात होने लगी. लेकिन उसमे भी इनके मुंह से निकली दुआएं असर करती है,और इनके जीवन में जो खुशियाँ नहीं आ सकती वह खुशियाँ हमारे आँगन में देख कर ये खुश हो लेते है जैसी भावना बलवती थी इसलिए नेग देने का ये सिलसिला चल निकला. उस समय इन लोगो के लिए पढाई लिखाई नौकरी रोजगार के अवसर भी नहीं के बराबर थे .फिर ऐसी भी ख़बरें सुनने को मिलती रही की  नेग के लिए इलाके पर अपने वर्चस्व के लिए किन्नरों के गुट में संघर्ष हुआ .कई बार तो एक ही त्यौहार पर दो तीन बार किन्नर आने लगे. तब उनसे कहना पड़ता था की हम तो नेग दे चुके.और वो अपनी पहचान बता कर जाते थे की इस इलाके में में ही आती हूँ  किसी और को नेग मत देना. धीरे धीरे इनकी जनसँख्या बढ़ती गयी और इनका नेग लेने का चलन किसी त्यौहार या ख़ुशी विशेष से न हो कर एक तरह की हफ्ता वसूली हो गयी. अब तो किन्नर ट्रेन में, बस स्टैंड पर ,बाज़ार में कहीं भी ,और कभी भी मिल जाते है और अब उनको मिलने वाला नेग या ईनाम सामने वाली की ख़ुशी पर नहीं उनकी मर्जी पर होने लगा. नेग की राशी ये ही लोग तय करते है और उसे देना सामने वाले की मजबूरी बन जाती है. 
मेरी छोटी बेटी के जन्म के ५-६ दिन बाद किन्नर मेरे घर आये. सुबह का समय था दरवाजा खुला था और बिटिया पलंग पर लेटी थी. बिना पूछे घर में घुसे और सबसे पहले एक ने बिटिया को अपनी गोद में उठा लिया. और तुरंत २१०० रुपये की मांग कर दी. अब बताइए अपनी ५ दिन की बेटी को उनकी गोद में देख कर किस माँ बाप की हिम्मत होगी की उन्हें मना करे .जैसे तैसे उन्हें समझा बुझा कर उन्हें नेग दिया और  बिटिया को उनसे लिया ,लेकिन इतनी देर सांस मानों रुकी ही रही .
आज इन दो तीन घटनाओं के बहाने जब सोचती हूँ  तो कई  सवाल मन में उठते है. 
  • आज़ादी के इतने साल बाद भी क्या इस तरह की जबरिया वसूली के खिलाफ कोई कानून नहीं बन पाया है? 
  • जनगणना में जाती के नाम पर इतना बवाल होता है तो निश्चित ही किन्नरों की जनसँख्या भी पता की जाती होगी ,क्या कभी किसी सरकार ने इस विकृति के साथ पैदा होने वाले बच्चों की संख्या और इनकी जनसँख्या के तालमेल को जानने की कोशिश की है? (ऐसी बातें अक्सर सुनाने में आती है की बच्चों को उठा कर ओपरेशन कर उन्हें विकृत बने जाता है.) 
  • आज जब सबके लिए पढ़ने और रोजगार के लिए सामान अवसर है फिर इनके रोजगार की जानकारी क्यों नहीं ली जाती? 
  • इनकी संपत्ति का कोई ब्यौरा लिया जाता है और उस कमाई का जरिया जानने की कोशिश की जाती है? 
  • जब कानून सबके लिए एक सामान है फिर किन्नरों के लिए क्यों नहीं ? इनके अपराध के लिए इन्हें जेल में क्यों नहीं रखा जा सकता? 
  • आज़ादी के इतने साल बाद भी अभी तक किसी ही पार्टी को इन्हें भी मुख्य धारा में जोड़ने की सुध क्यों नहीं आयी? 
  • इनके लिए रोजगार के अवसर जुटाने के लिए क्या काम हुए है? 
  • क्या सरकार ने इनके इस लूट के धंधे को मौन स्वीकृति दे रखी है? क्या ये एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं है? 
  • कब तक आम आदमी इस तरह की लूट का शिकार होता रहेगा? 
प्रशन तो और भी कई होंगे लेकिन शायद इनका जवाब कम से कम आम आदमी के पास तो नहीं है.आज जब इन लोगों की जबरिया वसूली लाखों करोड़ों के धंधे में बदल गयी है जरूरत है इस पर रोक लगा कर इन्हें भी कानून के दायरे में लाने की ताकि लोग चैन से जी सके और अपनी खुशियाँ चैन से मना सकें. 

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