Saturday, December 26, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 4

 उन आठ दिनों की डायरी 4

7 नवंबर 2020

सुबह जल्दी उठकर हास्पिटल पहुँची कुछ देर बाहर हाॅल में बैठी रही। गार्ड को बता दिया था कि मुझे मिलना है हसबैंड से और जानना है कि उनकी तबियत कैसी है? उसने कहा थोड़ी देर में बुलाते हैं। थोड़ी देर करते करते लगभग डेढ़ घंटा बीत गया अब धैर्य जवाब देने लगा। मैं फिर अंदर गई गार्ड नहीं था तो अंदर चली गई। नर्सिंग स्टेशन और वार्ड के बीच में खड़ी थी कि कोई दिख जाये तो उससे पूछ कर हसबैंड को देख आऊं। तभी वहाँ ड्यूटी डाक्टर आया और बिना कोई बात सुने चिल्लाने लगा। मैडम आप कल भी आईं थीं आपको बार बार अंदर नहीं आना है आप क्यों बार बार अंदर आ रही हैं?

बार बार कहाँ आ रही हूँ कल मुझे हसबैंड ने बुलवाया था रिपोर्ट लेने उसके पहले उन्हें खाना खिलाने आई थी क्योंकि पैर से एंजियोग्राफी करने के कारण वे उठ कर बैठ नहीं सकते थे। जो रिपोर्ट आपको मुझे उपलब्ध करवाना था वह आपने नहीं करवाई इसलिये मुझे आना पड़ा। लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था और लगातार चिल्लाता रहा फिर आखिर में बोला आपके हसबैंड ठीक हैं।

बिना बात की चिल्ला चोट से मैं आहत हुई। अपने पेशेंट का हालचाल जानना हर अटेंडेंट का अधिकार है और उसके लिये भेड़ बकरी जैसे हकाला जाये यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। मैंने कहा कि आपने जो आखरी लाइन बोली वह सबसे पहले ठीक से बोल देते तो मैं चली जाती। बस यही तो जानना था मुझे कि मेरे हसबैंड कैसे हैं?

यह सुनकर उसका पारा फिर चढ़ गया और वह कहने लगा आपको अपने हसबैंड को यहाँ रखना है तो रखिये नहीं तो कहीं और ले जाइये।

अब यह बात असहनीय थी। मैंने कहा माइंड योर लैंग्वेज। वह फिर चिल्लाने लगा तब तक मैंने कहा ये कहने का अधिकार आपको तो क्या किसी को नहीं है यू जस्ट माइंड योर लैंग्वेज। तब तक और डाक्टर नर्स आ गये उन्होंने उसे शांत किया और अंदर ले गये। जाते जाते उसने डाक्टर मनोज बंसल को फोन लगाया जो हसबैंड का इलाज कर रहे थे। मैंने कहा जिसे फोन लगाना है लगाओ लेकिन अपनी हद में रहना मैं यहाँ इलाज करवा रही हूँ खैरात नहीं ले रही। मैं बाहर आ गई तभी डाक्टर बंसल का फोन आया क्या हुआ मैम?

मैंने कहा समझा लेना आपके ड्यूटी डाक्टर को तमीज से बात करे। ये मत समझना कि मैं हेल्पलेस हूँ। इलाज करवाना है तो करवाओ या ले जाओ अपने पेशेंट को यह कहने का अधिकार हास्पिटल के मालिक को भी नहीं है। हास्पिटल मेडिकल काउंसिल के नियमों से बंधा है मैं छोडूंगी नहीं उसे ।

मैंने उन्हें पूरी बात बताई कि कब कब और क्यों मैं अंदर गई थी और यह भी कि अगर मुझे टाइम टू टाइम मेरे पेशेंट की प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं मिलेगी तो मैं अंदर जाऊंगी रिपोर्ट लेने। मुझे ये रिपोर्ट सेकेंड ओपिनियन के लिए भेजना है और ये मुझे तुरंत चाहिए ये मेरा अधिकार है।

डाक्टर को भी शायद समझ आ गया कि मैं आसानी से हकाले जाने वाले लोगों में नहीं हूँ और इसलिए वह समझाने लगे जाने दीजिये मैम हो जाता है वगैरह वगैरह। इसके बाद डाक्टर ने हसबैंड के कलीग को फोन लगाकर सभी बातें बताई वे डॉक्टर के पूर्व परिचित थे। उनका फोन आया जो मुख्यतः मुझे शांत करने के लिए था कि कहीं मैं शिकायत न कर दूँ। मैंने कहा मैं किसी का बुरा नहीं करना चाहती लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ और रही बात शिकायत की तो मेरे हसबैंड की केयर में कोई कोताही हुई तो मैं नौकरी नहीं कैरियर भी खत्म कर दूंगी यह आप समझा देना।

मन बेहद क्षुब्ध था थोड़ी ही देर में भाई आ गया। मैंने उसे कुछ नहीं बताया क्योंकि अगर उसे पता चलता कि मेरे साथ इस तरह बात की गई है तो वह कोहराम मचा देता।

थोड़ी देर बाद मुझे अंदर बुलाया गया। हसबैंड को शायद कुछ पता न था उन्होंने कोई बात नहीं की और न ही मैंने। यह समय उनको टेंशन देने का नहीं था।

बाहर आकर बैठी तब देखा एक बेहद बुजुर्ग महिला बदहवास सी बैठी हैं। आसपास बैठे लोग उनके फोन से नंबर लेकर उनके रिश्तेदारों को फोन कर रहे थे। उनका मेडिक्लेम था या नहीं यह भी उन्हें नहीं पता था। उनका पोता दिल्ली में था उसे खबर की गई वह आने वाला था। उन्हें दवाइयों की लिस्ट दी गई जिसे किसी और पेशेंट के परिजन लेकर आये उन्होंने उन्हें पैसे दिये। पता चला कि सुबह सुबह उनके हसबैंड को खून की उल्टी हुई है और वे पडोसियों की मदद से उन्हें यहाँ लाईं हैं।

बोली भाषा से वे बिहार की लगीं मैंने पूछा कि यहाँ आप और आपके हसबैंड अकेले रहते हैं? बच्चे वगैरह कहीं बाहर हैं।

कहने लगीं कि बेटा तो यहीं है पोता अभी दिल्ली से आ रहा है। मैंने पिछले दो घंटे में उनके बेटे को नहीं देखा था और इसके बाद कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। ऊफ इतना अकेलापन झेलते वे किस ह्दय से यहाँ बैठी हैं उन्हें कुरेदना ठीक नहीं है। मैंने बात बदलते हुए कहा कि आपने खाना खा लिया।

खाना तो पडोसी लेकर आये थे लेकिन अंदर ही नहीं लाने दिया। यहाँ कैंटीन है वहाँ जाकर खा लूँगी।

दो बज रहे हैं कब खाएंगी पहले खाना खा लीजिये।

हाँ पोता आ जाये न फिर खाऊंगी ।

कब तक आयेगा?

चार बजे उसकी फ्लाइट है दिल्ली से।

अरे तब तो उसे पांच साढ़े पांच बज जाएंगे आने में। मैं खाना खाने जा रही हूँ कैंटीन आप चल रही हैं? मैं समझ गई थी कि अकेले जाने की घबराहट है कि इतने बड़े हास्पिटल में कहीं खो न जाऊँ।

वे तुरंत तैयार हो गईं। मुझे अंदर से एक फाइल दी गई थी कि सीएमओ से रूम अलाॅट करवा लूं मैंने वह पर्स में रखी कि लौटते में वह काम भी करवा लूंगी।

लिफ्ट तक पहुंचे कि हसबैंड दूसरे दरवाजे से लिफ्ट के सामने लाये गये। वे व्हीलचेयर पर थे। कहां तो सुबह मिलने के लिए इतनी हील हुज्जत हुई और अब वे यहाँ पब्लिक प्लेस में व्हीलचेयर पर बैठे हैं और लिफ्ट से ईको के लिए ले जाये जा रहे हैं जिसमें सभी रोगी और अटेंडेंट ले जाये जाते हैं। अब ये लूप होल बता दिये जाएं तो फिर कोई तिलमिला जायेगा इसलिए बस दो मिनट हैलो हाय करके हम नीचे कैंटीन में चले गये। 

कैंटीन में आंटी जी के लिए बिना प्याज लहसुन की पेशेंट वाली थाली ली उन्होंने तुरंत पर्स खोला पैसे मैं दूंगी। मैंने पैसे लेकर उनकी स्लिप कटवाई हमने खाना खाया और उन्हें लिफ्ट में छोड़ा और मैं सीएमओ आफिस चली गई।

सीएमओ ने कहा कि अभी कोई रूम खाली नहीं है। सेमी प्रायवेट भी नहीं है।

जनरल। आप फर्स्ट क्लास वाले हैं जनरल आपको जमेगा नहीं कहते हुए उन्होंने फाइल रख ली जैसे ही रूम खाली होगा मैं अलाॅट कर दूंगा।

मेडीकल इंश्योरेंस कंपनी से फोन आया कि आप एक लेटर दें कि पेशेंट का पहले कहीं इलाज नहीं हुआ है?

अरे ये क्या शर्त है क्या एक बार ही बीमार पड़ सकता है कोई? लेकिन एक बार इंश्योरेंस के चक्कर में पड़ गये तो आप चकरघिन्नी से घुमाए जाते हैं। मैंने लेटर लिख कर रखा था भाई उसे लेकर गया।

हसबैंड के कलीग का फिर फोन आया कि डाक्टर आपसे बात करना चाह रहे हैं लेकिन डर रहे हैं भाभीजी थोड़ा आराम से बात करियेगा।

मैंने कहा कि अगर वे आराम से बात करेंगे तो मैं भी करूँगी लेकिन गलत बात बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे कोई सींग नहीं उगे हैं इसलिए उन्हें डरने की जरूरत नहीं है।

डाक्टर ने कहा कि मैडम आप चाहें तो वर्मा जी को आज ही डिस्चार्ज कर देते हैं क्योंकि संडे को डिस्चार्ज हो नहीं पाएंगे फिर मंडे को डिस्चार्ज करेंगे। अभी कोई रूम खाली नहीं है जब रूम मिलेगा तब शिफ्ट कर देंगे।

आज कैसे डिस्चार्ज करेंगे? अभी तो अटैक आये अडतालीस घंटे हुए हैं 72 घंटे आब्जर्वेशन में रखना पड़ता है न।

जी रखना तो चाहिए लेकिन रूम खाली नहीं है।

रूम नहीं है तो आईसीयू में रखिये लेकिन अभी मैं डिस्चार्ज नहीं करवाऊंगी। हद है यह तो मैंने मन में सोचा। वह तो अच्छा था कि भाभी से सुबह शाम बात हो रही थी और उसने अभी डिस्चार्ज करवाने से मना किया था नहीं तो ये लोग तो किसी भी पेशेंट को कभी भी डिस्चार्ज कर देंगे। गुस्सा तो आ रहा था लेकिन मैंने दबा लिया और यही कहा कि 72 घंटे के पहले डिस्चार्ज नहीं करवाऊंगी जब रूम मिले आप शिफ्ट करिये।

शाम को फिर दवाई मंगवाई गई जिसे अंदर पहुंचाया इसके साथ ही ईको की रिपोर्ट भी ली जिसमें पता चला कि हार्ट का एक लोब 30%डैमेज हुआ है अटैक से। रिपोर्ट भी भाभी को पहुँचा दी।

वहीं एक परिवार बैठा था उनके घर के बुजुर्ग लगभग हफ्ते भर से एडमिट थे। हालाँकि डाक्टर ने अभी डिस्चार्ज के बारे में स्पष्ट नहीं बताया था लेकिन वे डिस्चार्ज के बाद घर की व्यवस्थाओं के बारे में सोच रहे थे और पूर्व तैयारी के लिए सबको फोन लगा रहे थे। उन्होंने दिन-रात देखभाल के लिए मेल नर्स के लिए किसी को फोन किया और उसकी तनख्वाह और दूसरे खर्च की बात करने लगे जो लाख रुपये महीने से भी अधिक हो रहे थे। मैंने अपनी एक सखी के लिए कुछ दिन पहले ही मेल नर्स की खोज के लिए एक समूह में लिखा था और मेरे पास कुछ नंबर थे। उनका फोन बंद होने के बाद मैंने उन्हें वे सभी नंबर दिये साथ ही मेडिकल इक्विपमेंट जैसे पलंग वाकर व्हीलचेयर किराये पर मिलने वाली संस्था के बारे में उन्हें बताया। इस बीच वह महिला मोबाइल पर अरदास लगा कर कहीं बाहर चली गई। उसके शोर में बात करना मुश्किल था। मैंने गार्ड से कहा भैया इसे कम कर दो और उसने आकर उसे बंद कर दिया।

थोड़ी ही देर में आपसी बातचीत से खुशनुमा माहौल बन गया था। आंटी का पोता आ गया था। आंटी को ब्लड का इंतजाम करने को कहा था। मैंने पूछा कि अगर आपके पास कोई डोनर हो तो फोन करके बुलवा लें नहीं तो मैं किसी ग्रुप पर डालकर डोनर बुलवा लेती हूँ ।उनके पोते को भी कहा कि आप बेसमेंट में ब्लड बैंक में जाकर पता कर लीजिये कि ब्लड की उपलब्धता कैसी है?

शाम को एक बार मैं घर गई लाइट जलाईं पड़ोसियों को अभी तक कुछ नहीं पता था उन्हें घर का ख्याल रखने का कहा। रूम मिलने पर जरूरी कपड़े आदी रखे और बैग तैयार करके गाड़ी में रख दिया और वापस हास्पिटल आ गई ।

अंधेरा हो गया था मैं एक और बार सीएमओ के पास हो आई थी लेकिन कोई रूम खाली नहीं था। करीब नौ बजे मैंने पूछा कि कोई दवा तो नहीं मँगवाना है फिर मैं घर जा रही हूँ। वही गोलमाल जवाब मिला जरूरत होगी तो मँगवा लेंगे। मैंने कहा मैं घर जा रही हूँ।

गार्ड ने अंदर जाकर पता किया फिर मैं घर आ गई।

घर के कुछ जरूरी काम किये कपड़े बदले खाना खाया और दिन भर की थकान के साथ सुबह की बहस को दिमाग से निकालने के लिए मैंने टीवी चालू किया। लगभग सवा ग्यारह बज रहे थे कि अचानक मोबाइल बजा। मैं चौंक गई इतनी रात में किसका फोन है?

हास्पिटल से नर्स का फोन था कि मैम एक रूम अभी खाली हुआ है और सर को वहाँ शिफ्ट करना है।

इतनी रात में!! चौंक गई मैं ।यह कौन सा समय होता है रूम खाली करने का और पेशेंट को शिफ्ट करने का? आप कल सुबह शिफ्ट कर देना अभी तो मैं घर आ गई हूँ और उन्हें अकेले तो रूम में भेज नहीं सकते।

मैम कल तक रूम रहेगा या नहीं क्या पता। अगर आपको रूम चाहिए तो अभी शिफ्ट करना होगा। सर कह रहे हैं कि शिफ्ट कर दें वे अकेले रह जायेंगे आप सुबह आ जाना।

अरे ऐसे कैसे आप एक हार्ट पेशेंट को रूम में अकेले शिफ्ट कर देंगी? अभी आप रुकिये मैं पंद्रह मिनट में पहुंच रही हूँ और तब तक आप सर को अकेले नहीं छोड़ेंगी।

मैं जल्दी से तैयार हुई सामान गाड़ी में ही था दरवाजा लगाया गाड़ी स्टार्ट की और सूनी अंधेरी सड़क पर चल पड़ी। मैं तो मात्र पंद्रह मिनट दूरी पर थी लेकिन जो लोग दूर या दूसरे शहर में रहते हैं उनके लिये ऐसी स्थिति कितनी विकट होगी। ज्यों-ज्यों घटनाएँ घट रही थीं बाम्बे हास्पिटल के बड़े नाम के छोटे पन के दर्शन होते जा रहे थे।

आईसीयू में डिस्चार्ज की प्रक्रिया चल रही थी मैंने और पंद्रह मिनट इंतजार किया। अधिकांश लोग सो चुके थे। दो लोग उनकी नींद की परवाह किये बिना जोर जोर से बातें कर रहे थे। इच्छा तो हुई कि टोक दूँ लेकिन चुप ही रही।

पंद्रह बीस मिनट बाद हसबैंड बाहर आये हम बारहवीं मंजिल पर प्रायवेट रूम में पहुंचे। वहाँ फिर बीपी शुगर टेस्ट हुआ और सभी प्रक्रिया पूरी होते सोते सोते साढ़े बारह बज गये।

कविता वर्मा

#बायपास #minor_attack #bypass 

Saturday, December 19, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 3

 उन आठ दिनों की डायरी 3

6 नवंबर 2020

सुबह जल्दी ही आँख खुल गई उठते ही पहला विचार आया हास्पिटल। जल्दी से तैयार हुई आज एंजियोग्राफी होना है पता नहीं क्या निकलेगा बस सब ठीक हो कोई बड़ी बात न हो। होना तो नहीं चाहिये अभी चार दिन पहले तक तो खेलते रहे टूर पर गये अचानक इतनी बड़ी कोई बात तो नहीं हो सकती। शायद ज्यादा भागदौड़ के कारण एक झटका सा लगा था। उम्मीद है कि सब ठीक हो।

हास्पिटल पहुँची तभी पापाजी का फोन आ गया वे लोग भी बस पहुंचने वाले थे। आईसीयू में जाकर मिलकर आई सब ठीक था। पतिदेव ने बच्चों के बारे में पूछा मैंने कहा बड़ी बिटिया को बता दिया है छोटी का सब्मिशन है दो दिन बाद इसलिए अभी उसे नहीं बताया है।

फैमिली ग्रुप पर कोई डाल देगा तो वो परेशान हो जायेगी।

कोई नहीं डालेगा सबको मना कर दिया है।

उनसे बात करते हुए मेरी नजर लगातार मानिटर पर थी। बेटियों की बात करते मानिटर जरा सा कांप जाता। इंश्योरेंस एजेंट को फोन कर देना इस नाम से नंबर है आफिस में बात हुई क्या।

तमाम चिंताएँ आईसीयू में भी पीछा नहीं छोड रही थीं या कहें कि वो खुद इन चिंताओं को नहीं छोड़ पा रहे थे। सब हो गया सबको बता दिया। मैं सबके फोन अटैंड कर रही हूँ अब तुम किसी बात के बारे में मत सोचो।

डाक्टर को आने में समय था गार्ड ने बताया कि ग्यारह बजे तक आएंगे। बाहर आई तब तक मम्मी पापा और भाई आ चुके थे। एक दिन पहले की ईसीजी रिपोर्ट की फोटो लेकर भाभी को भिजवाई उनकी बहन हार्ट सर्जन हैं। दवाइयों के नाम पहले ही भेज चुकी थी। सब कुछ अच्छा होते हुए भी मन कांपता है किसी अपने को अनजान हाथों में सौंप कर। आजकल इतनी बातें सुनने को मिलती हैं कि अगर किसी अपने का ओपिनियन मिल सके तो उसे लेना आवश्यक हो जाता है।

देर तक इंतजार के बाद डाक्टर आये एंजियोग्राफी के लिए ले जाने से पहले पतिदेव को सभी से मिलवाया अब बाहर बैठ कर बस इंतजार करना था। यदि स्टेंट लगाना है तो तुरंत फैसला करना होगा और ऐसे फैसलों में परिवार के लोगों का साथ होना आवश्यक होता है। करीब आधे घंटे बाद ही अंदर बुलाया गया। दिल की धड़कनें बेकाबू थीं सब ठीक हो कोई बड़ी बात न हो की प्रार्थना मन में चल रही थी।

डाक्टर ने कंप्यूटर के पास बुलाया और बताया कि ये देखिये तीनों आर्टरी सिकुड़ गई हैं। बायपास ही एक आप्शन है। मैं अगर चाहता तो दो आर्टरी में स्टेंट डालने का कह सकता था लेकिन उनकी लाइफ कम होती है और मैं बायपास नहीं करता लेकिन फिर भी आपको सलाह दूंगा कि आप बायपास ही करवाएं वही बेस्ट है। बायपास आप कहीं से भी करवा सकते हैं यहाँ बाम्बे हास्पिटल में सीएचएल या मेदांता में कहीं भी। पतिदेव को फिर आईसीयू में ले जा चुके थे और हम सभी हतप्रभ से खड़े थे। कल तक भागदौड़ करते व्यक्ति की तीनों आर्टरी सिकुड़ी हुई हैं जिनमें से एक तो नब्बे प्रतिशत तक बंद है तो अब तक वो इतनी भागदौड़ कर कैसे रहे थे?

हम लोग बाहर आकर बैठ गये किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एंजियोग्राफी की सीडी ले लो वो भाभी को भिजवाते हैं। उसके बाद देखते हैं क्या करना है।

सुबह से नाश्ता भी नहीं किया था सिर फट रहा था लेकिन खाने की इच्छा मर गई थी। एकदम बायपास मतलब जीवन सिर के बल औंधा हो जाना। ढेर सारे बंधन ये करो ये न करो क्या ऐसा जीवन जी सकते हैं? कभी सोचा नहीं इस बारे में। छह साल पहले जब मुझे स्लिप डिस्क हुआ था तब डाक्टर ने कहा था कुछ समय गाड़ी मत चलाना और मैंने डरते हुए पूछा था गाड़ी चला तो पाऊंगी न मैं।

पतिदेव ने तो कभी किसी चीज को न कहा ही नहीं। खैर अभी यह सब सोचने का समय नहीं है अभी तो सेहत और खास कर दिल की सेहत देखना है और बायपास जैसा फैसला लेना है।

दोपहर बाद हमें सीडी मिल गई। शाम को मम्मी पापा को भी घर भेज दिया वे भी दिन भर में थक गये थे। भाई साथ ही था। आफिस वालों के फोन लगातार आ रहे थे बिटिया की चिंता बनी हुई थी।

आसपास बहुत सारे लोगों की हलचल थी। एक परिवार अपने घर के बुजुर्ग को लेकर आया था तो एक महिला अपनी बेटी को लेकर आई थी जिसका टायफाइड बिगड़ गया था। वह एक महीने से वहाँ थी। 

देर शाम पतिदेव ने अंदर बुलवाया। एंजियोग्राफी की रिपोर्ट की फोटो ली और उनसे कुछ देर बात करके मैं घर चली गई।

कविता वर्मा

#बायपास #bypass #angiography 

Saturday, December 12, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 2

 वेटिंग हाॅल में बैठ कर अपने आसपास नजर डाली कहीं अकेले दुकेले तो कहीं समूह में बीमारों के परिजन बैठे थे। किसी के पास एक बैग झोला या लिपटा हुआ बिस्तर रखा था। दौड़ दौड़ कर इतनी थक गई थी कि आईसीयू में किसी नर्स को वाटर कूलर से पानी भरते देख उसकी बाॅटल मांग कर पानी पी लिया था ।आसपास देखते बैग में से पतिदेव का मोबाइल निकाला। जिस मोबाइल को वो कभी हाथ नहीं लगाने देते थे आज मय पासवर्ड के मेरे पास था। मोबाइल देते समय उन्होंने बाॅस को फोन लगाने का कहा था तो दवाइयाँ का इंतजार करते उनके बाॅस को भी फोन करके बता दिया था कि वे हास्पिटल में हैं। छोटी बेटी अभी सवा महीने पहले ही अमेरिका गई है और अभी रविवार को उसका सबमिशन है अभी उसे नहीं बताया जा सकता है नहीं तो वह घबरा जायेगी। अभी तक उसके ए ग्रेड हैं ग्रेड खराब हो जाएंगे। तुरंत बेटी को मैसेज किया कि उसे न बताया जाये। तभी पापाजी का फोन आ गया उन्हें भी बताया कि अभी छोटी बेटी को नहीं बताया इसलिए ग्रुप पर न डालें।

एक महिला ने मोबाइल पर गुरुग्रंथ साहिब का पाठ लगा दिया था और वह खुद भी पाठ कर रही थीं। हालाँकि आवाज तेज थी लेकिन इस समय जब सभी असहाय थे ऊपर वाले का ही सहारा था इसलिए उनकी इस आस्था पर आस्था हो आई।

मैं अभी भी विश्वास नहीं कर पा रही थी कि क्या हुआ है और जो हुआ है क्या वह सच है? एक नवंबर को हम चार पांच फैमिली आउटिंग पर गये थे जहाँ पतिदेव ने लगभग डेढ़ घंटे बैडमिंटन खेला था उन्हें आज अचानक अटैक कैसे आ सकता है? तो क्या सुबह जो सीने को दबाते देखा था वह इसी अटैक का पूर्व संकेत था? क्या उस समय रोक लेती और वे थोड़ा आराम कर लेते तो यह अटैक नहीं आता? लेकिन बिना अटैक के हार्ट के अंदर कोई दिक्कत है कैसे पता चलता? तो क्या ये माइनर अटैक चेतावनी देने के लिए आया है? कल एंजियोग्राफी होगी तब पता चलेगा कि वास्तव में क्या हुआ है? हे ईश्वर सब ठीक हो कोई बड़ा नुकसान न हुआ हो।

इन्हीं सब विचारों के बीच कुछ और फोन किये और फिर याद आया कि घर में सभी लाइट बंद हैं। रात में यहाँ रुकने के लिए कुछ कपड़े चादर लाना होगा। मैं एक बार फिर अंदर आईसीयू में गई और सिस्टर से पूछा कि अभी कोई मेडिसिन तो नहीं चाहिये मैं थोड़ी देर में घर होकर आती हूँ।

घर आकर लाइट जलाई भगवान के आगे दीपक लगा कर हाथ जोड़कर देर तक खड़ी रही। क्या मांगूं क्या नहीं जो हुआ उसके लिए शिकायत करूँ या जो हो सकता था और होते-होते रह गया उसके लिए धन्यवाद दूँ । जब कुछ समझ न आये तब मौन समर्पण ही वह सब कह सकता है जो कहना चाहिए।

फोन चार्जिंग पर लगाने के लिए निकाला तो उसमें कई मिस काॅल थे। पतिदेव के आफिस में खबर फैल गई थी और जिसने भी सुना वही हक्का बक्का था कि ऐसा कैसे हो सकता है? सिर्फ मैंने ही नहीं किसी ने भी उन्हें कभी सुस्त थका हुआ या आराम करने के मूड में नहीं देखा था। एक अनजान नंबर से फोन आया आप वर्मा जी के यहाँ से बोल रही हैं? मैं उनका डाक्टर हूँ आपसे मुलाकात हुई नहीं थी तो सोचा आपसे बात कर लूँ ।क्या करते हैं वर्मा जी कहाँ पोस्टिंग है जैसे सवालों के बाद उन्होंने कहा कि आप तो रात में आराम से घर पर सोइये यहाँ हम लोग हैं देखभाल करने के लिए। वहाँ हाॅल में जमीन पर आप परेशान हो जाएंगी। कल सुबह हम एंजियोग्राफी करेंगे तब आप वहाँ रहें और जैसी भी स्थिति होगी उसके अनुसार तुरंत निर्णय लेना होगा कि एंजियोप्लास्टी करना है या नहीं। बात तो सही थी आगे क्या स्थिति बनने वाली है कौन जानता है? अभी दस पंद्रह दिन पहले ही फ्रोजन शोल्डर के लिए इंजेक्शन लगवाया है ऐसे में सारी रात बैठे बैठे सोना या जमीन पर लेटना!! और किसी नई मुसीबत के लिए अभी समय नहीं है। अभी तो मैं लाइट्स जलाने आई हूँ एक बार हास्पिटल जाकर इन्हें बता दूँ तब देखती हूँ।

मैंने खाना खाया और एक बैग में दो तीन चादर रखे कि कहीं रुकना हुआ तो वापस न आना पडे।

एक बार फिर आईसीयू में जाकर पतिदेव से मिली। अब तक हुए तीन चार ईसीजी की रिपोर्ट वहाँ रखी थीं जिसकी फोटो ली ताकि भाभी जो डाक्टर हैं उन्हें भिजवा सकूँ। उन्हें बताया कि रात को घर चली जाऊंगी। नर्स से पूछा कोई दवाई लाना है तो बता दें या फिर खुद मँगवा लें इंश्योरेंस है इसलिए पैसे नहीं देना है। गार्ड के पास अपना फोन नंबर लिखवाया और घर आ गई।

पतिदेव की गाड़ी में सुबह का खाना रखा था जो उन्होंने नहीं खाया था उसी में से खाना खाया और यही ख्याल आता रहा कि उन्होंने आज सुबह से कुछ नहीं खाया है।

रात में बेटी से बात की कुछ उसे समझाया कुछ खुद का मन हल्का किया और सो गई अगले दिन फिर एक अनजान स्थिति का सामना करने के लिए खुद को तैयार करते।

कविता वर्मा

#बायपास #bypass #minor_attack 

Friday, December 11, 2020

उन आठ दिनों की डायरी

5 नवंबर 2020

कुछ विशेष न था इस दिन में रोज की तरह ही सूरज निकला था रोज की तरह सुबह के काम किये थे और रोज की तरह ही पतिदेव की आफिस जाने की तैयारी भी हुई थी। हाँ इतना जरूर था कि उन्होंने कहा खाना खाकर नहीं जाऊँगा टिफिन में रख दो। मैंने पूछा क्यों तो कहने लगे कि भूख नहीं है पेट भरा भरा सा लग रहा है। मैंने भी सोचा ठीक ही है जब भूख लगे तब खाना चाहिए फिर खाना साथ रहेगा तो कहीं भी गाड़ी रोककर खा सकते हैं।

दूध दे दूँ मैंने पूछा तो उसके लिए भी मना कर दिया केले खा लो।

साथ में रख दो मैं बाद में खा लूँगा। मैंने भी जिद नहीं की रात में खाना खाने के बाद तुरंत सो गये थे शायद इसीलिए पेट साफ नहीं हुआ है।

आफिस के लिए निकलते समय उन्होंने एक बार सीने को दबाया मैंने पूछा क्या हुआ सीना दुख रहा है क्या? चिरपरिचित जवाब मिला नहीं कुछ नहीं और बात आई गई हो गई।

बहुत दिनों से एक लेख लिखने का सोच रही थी पतिदेव के जाने के बाद वहीं सोफे पर बैठ गई और लेख लिख डाला। जब खत्म किया तब तक सवा डेढ़ घंटे बीत गये थे। कितनी देर हो गई ये मुआ मोबाइल भी बहुत समय खाता है अब एक घंटे इसे हाथ नहीं लगाऊँगी सोचते हुए मोबाइल वहीं सोफे पर पटका और अपने काम निपटाने लगी।

खाना खाते हुए वेबसीरीज के एक दो एपिसोड देखने की आदत सी लग गई है तो मैं प्लेट लेकर टीवी के सामने जम गई इस तसल्ली के साथ कि मोबाइल तो हाथ में नहीं है। खाना खत्म हुआ एपिसोड के खत्म होने का इंतजार करते प्लेट हाथ में लिये बैठी रही। प्लेट किचन में रखकर आई तब मन फिर ललचाया कि एक बार मोबाइल पर नजर डाल लूँ। मोबाइल में पतिदेव के दो मिस काल थे जिन्हें देख कर चौंक गई। आज तो बैंक का कोई काम भी नहीं था फिर दोपहर के इस समय फोन क्यों किया होगा? तुंरत काल बैक किया हाँ क्या हुआ? फोन करते कतई अंदाजा नहीं था कि कोई बहुत नई बहुत भौंचक करने वाली बात सुनने को मिलेगी। कहाँ हो तुम?

घर पर, घर पर ही रहती हूँ कहाँ जाती हूँ। झुंझलाहट सी हुई।

अच्छा सुनो मुझे जरा चेस्ट में पेन हो रहा था मैं बाम्बे हास्पिटल आया हूँ ईसीजी करवाने।

क्या कहा क्या सुना है मैंने क्या ठीक सुना है या शायद ठीक से समझा नहीं है दो पांच या दस सेकेंड के लिए दिमाग सुन्न सा हो गया। ऐसी कोई खबर ऐसी किसी बात के लिये दिन में फोन आयेगा कभी सोचा ही कहाँ था? अच्छा मैं अभी आती हूँ कहाँ हो तुम?

हाँ आराम से आना घबराने की कोई बात नहीं है।

हास्पिटल आना है और घबराने की बात नहीं है। क्या करूँ कपड़े बदलूँ नहीं अलमारी में से पैसे निकालूँ पता नहीं कहाँ कैसी जरूरत पड जाये गाड़ी की चाबी पर्स मोबाइल ओह गाड़ी भी तो गंदी पड़ी है कितनी धूल जमी है क्या करूँ गाड़ी साफ करने का समय नहीं है। सामने एक मकान बन रहा है दिन भर धूल सीमेंट उड़ती है गाड़ी धोवो दूसरे दिन गंदी। उन लोगों से कहा भैया अगर पानी हो तो जरा पाइप से पानी डाल दो गाड़ी पर। ताला लगाकर नीचे आई तब तक वे लोग खड़े थे गाड़ी से कपड़ा निकाला और धूल झाड़ने लगी तब तक एक लड़के ने कहा मैडम हम डाल देते हैं पानी। विंड स्क्रीन पर पानी डालकर गाड़ी स्टार्ट की। हास्पिटल में पार्किंग की जगह ही नहीं थी। आगे बढ़ते बढ़ते गाड़ी हास्पिटल परिसर से बाहर निकल गई और पीछे की सड़क के किनारे पार्क की। वहाँ से लगभग भागते हुए अंदर पहुँची फिर फोन लगाया पतिदेव ने कहा हाँ ऊपर आ जाओ फोर्थ फ्लोर पर आईसीयू में।

आईसीयू!!!!

दिल की धड़कने यह सुनते ही और तेज हो गईं। भागते दौड़ते आईसीयू में पहुँची वहाँ के तीन-चार दरवाजे वाले गलियारे पार करके अंदर बिस्तर पर पतिदेव को लेटे पाया। सीने पर नलियाँ लगी थीं बगल में मानिटर पींपीं कर रहा था। जिस इंसान को पिछले इकतीस साल से हमेशा भागते दौड़ते देखा हो उसे इस तरह मानिटर और नलियों से घिरे आईसीयू में लेटे देखकर सदमे सी स्थिति हो गई मेरी।

वहाँ एक डॉक्टर थे उन्होंने बताया कि माइनर अटैक आया था इसलिए अभी मानिटरिंग में रखना पडे़गा कल एंजियोग्राफी करेंगे। अभी आप काउंटर पर जाकर एडमिशन बनवा लाइये फिर उस पर सीएमओ के दस्तखत करवा लाइये। यह जल्दी करवा लीजिये ताकि इलाज शुरू हो सके।

क्या कहा गया क्या करना है कुछ समझते कुछ न समझते मैं जाने को हुई तब तक पतिदेव ने कहा पैसे चाहिए क्या यह लो और अपनी जेब से पैसे निकालने लगे।

पैसे हैं मेरे पास लेकिन तब तक पैसे मोबाइल चाबियाँ न जाने क्या क्या बाहर आ गया। सब कुछ अपने पर्स में ठूंस कर मैं फिर नीचे भागी। काउंटर पर पैसे जमा करने के साथ सीएमओ आफिस के बाहर अपनी बारी आने का इंतजार। उसे लेकर फिर आईसीयू में आई तब उन्होंने एक छोटी सी चिट पकड़ा दी जिस पर एक नंबर लिखा था। आप मेडिकल स्टोर से ये दवाइयाँ ले आइये। मेडिकल स्टोर पर जाते हुए देखा कि एक गाड़ी बीच में खड़ी है। वहाँ खड़े गार्ड एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि किसकी गाड़ी है कब से खड़ी है। दो तीन बार अनाउंसमेंट करवा दिया लेकिन कोई नहीं आया। ये बातें कान में पडने के बाद मैंने गाड़ी को ध्यान से देखा। अरे ये तो सरकारी गाड़ी है नंबर तो याद नहीं रहता लेकिन रजिस्ट्रेशन इंदौर के बाहर का है मतलब पतिदेव की गाड़ी। गार्ड ने बताया कि एक साहब खुद ही गाड़ी चला कर आये थे बहुत देर से खड़ी है एंबुलेंस लाने में दिक्कत आ रही है।

हाँ भैया उन्हें अटैक आया है वे आईसीयू में हैं मैं अभी हटवाती हूँ गाड़ी पहले दवाइयाँ दे आऊं। मैडम थोड़ा जल्दी करिये यहाँ दिक्कत हो रही है।

दिक्कत तो हो ही रही होगी लेकिन दवाइयाँ भी तो जरूरी हैं मैं मेडिकल स्टोर पर भागी। एक नंबर पर ढेर सारी दवाइयाँ थीं क्या क्या लिखा है क्या नहीं नहीं पता। दवाइयाँ देकर वापस नीचे आई और गार्ड से कहा भैया आप हटा देंगे क्या गाड़ी? मैंने कई बार कहा लेकिन कभी टीयूवी चलाने नहीं दी और अब इस समय तो कम से कम पहली बार नहीं चला सकती। गार्ड भी गाड़ी नहीं चला सकता था वह किसी को ढूंढने चला गया। अब तक मैंने किसी को नहीं बताया था कि क्या हुआ है क्या हो रहा है और मैं अकेले इस तनाव के साथ अब थकने लगी थी अकेलापन मुझ पर हावी होने लगा था और अब मुझे किसी बेहद अपने के साथ अपने तनाव अपनी चिंताओं को साझा करने की सख्त जरूरत थी। लेकिन यह गाड़ी बीच में खड़ी है इमर्जेंसी एंबुलेंस के रास्ते में। मैंने पास में खड़े एक व्यक्ति से कहा एक्सक्यूज मी क्या आप यह गाड़ी चला सकते हैं? फिर मैंने दो तीन वाक्यों में पूरी कहानी सुनाई। वह थोड़ा झिझका और बोला गार्ड को बोल दीजिये। उसे गाड़ी चलाना नहीं आता। पांच सेकेंड सोचने के बाद उसने चाबी के लिए हाथ बढ़ाया। चाबी दे तो दी लेकिन क्या इस तरह किसी अजनबी को चाबी देना ठीक है? अभी एक परेशानी सामने है दूसरी के लिए कोई जगह नहीं है तो मैं भी जल्दी से उसके साथ गई और गाड़ी का दरवाजा खोल कर दूसरी तरफ बैठ गई। मुझे पता रहेगा कि गाड़ी कहाँ लगी है। शुक्र है थोड़े आगे ही जगह मिल गई और गाड़ी लगा दी।

अब समय था अपने तनाव को मैनेज करना। पापाजी मम्मी को बताते हुए खुद को संयमित रखना जरूरी है इसलिए उन्हें सबसे पहले नहीं बताया जा सकता इसलिए सबसे पहला फोन किया बेटी मानसी को। जैसे ही उसे बताया मुझे जोर से रोना आ गया और मानसी को भी। नहीं अभी मैं कमजोर नहीं पड सकती नहीं तो बच्चे जीवन में किसी स्थिति में कमजोर हो जाएंगे। उन्हें खुद को मजबूत रखना तभी संभव होगा जब वे मुझे मजबूत देखेंगे। मैंने जल्दी ही अपने आप पर काबू किया और मानसी को भी समझाया कि रोओ मत। हमारे मोबाइल में नेट वाउचर खत्म हो गया है वह डलवा दो कभी जरूरत पडे तो। थोड़ी देर बेटी से बात करके उसे समझा कर खुद को संभाल कर पापाजी को फोन लगाया। रोकते रोकते भी रोना आ गया। सुनकर पापाजी भी घबरा गये हम अभी आते हैं। नहीं अभी आप मत आओ अभी तो यहाँ सिर्फ बैठना है कल एंजियोग्राफी होगी तब आप सुबह आ जाना। कोई भी बात हो तो तुरंत बताना हम आ जाएंगे इस आश्वासन पर बात खत्म हुई। इसके बाद मैं ऊपर आईसीयू के बाहर बने वेटिंग हाॅल में आकर बैठ गई।

कविता वर्मा

#बायपास #minor_attack #bypass 

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...