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Monday, November 2, 2009

तसल्ली


अरे बेटा यहाँ आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी  ने मिनी को अपनी गोद मे खींच  लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बांधेगी  मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इंतजार  था.


"बेटी हुई है" नर्स ने कहा,तो मांजी  का चेहरा बुझ गया.नेहा से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनके हाव-भाव ने काफी कुछ कह दिया. मिनी से उनका बात करना बन्द हो गया. नेहा अनजाने ही अपराधबोध से ग्रस्त हो गयी.विनय ने भी तो कुछ नही कहा,बस चुपचाप उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते रहे.मांजी  की चुप्पी देखकर विनय की चुप्पी तुड्वाने का उसका साह्स नही हुआ.
अस्पताल से घर आकर दरवाजे पर ठिठकी कि शायद मांजी  घर की लक्ष्मी की आरती उतारे,पर घर मे पसरी निशब्दता देखकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गयी.
मिनी छोटी बहन के आने से अचानक बडी हो गयी. उसने अपने आप को गुड़ियों के संसार  मे गुम कर दिया,वहां बोझिलता कम थी.
विनय आजकल अपने काम मे ज्यादा ही व्यस्त थे, उनसे बात करने का समय ही नही मिलता था.घरवालो की खामोशी ने उसके दिल-दिमाग को अजीब सी बॆचेनी से भर दिया.रात मे सोते-सोते अचानक नींद खुल जाती,दिमाग मे कभी बहुत से ख्याल गड्मग होते या कभी सोचने पर भी कोइ ख्याल नही होता.
इसी बेचेनी मे एक रात उसने नींद मे करवट बदली तो अधखुली आँखों से विनय को छोटी बिटिया के हाथ को अपने हांथों मे थामे स्नेह से उसे निहारते पाया.उसे लगा कमरे मे उजास भर गया,घर मे घंटियाँ  बजने लगी,उसकी बेचेनी अचानक खत्म हो गयी,उसके बाद वह चैन से सोयी.

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...