Wednesday, June 2, 2021

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं तो दिल धड़कने लगता है। हास्पिटल से आने के पंद्रह दिनों बाद भी वह वार्ड वहाँ का माहौल रात के सन्नाटे में अपनी रंगबिरंगी लाइट चमकाते बीप बीप करते मानिटर याद आते हैं तो पल्स बढ़ जाती है।

मेरे बेड के दो बेड छोड़कर थी वह। उसे बायपेप लगा था। वह मेरे पहले आई थी या बाद में यह भी नहीं पता। मोटे बेल्ट से पूरे चेहरे पर बंधा वह मास्क उस गर्मी में लगाये रहना बेहद मुश्किल था। लाल गाउन पहने वह लगातार बैठी रहती। कभी-कभी उसकी मास्क के अंदर से घुटी घुटी आवाज आती। उसके पास मोबाइल नहीं था। अक्सर वह हाउस कीपिंग वाली सफाई कर्मचारियों के मोबाइल पर अपने घर बात करती जिसमें उसकी बेबसी झुंझलाहट गुस्सा झलकता।

दो तीन दिन में जब मैं अपने आसपास को देखने की स्थिति में आई तब उसे बैठे या मोबाइल पर बात करते देखकर सोचती कि इस समय उसे काउंसलिंग की आवश्यकता है। कोई ऐसा आत्मीय या प्रोफेशनल जो उसे इस माहौल और इलाज के प्रति आश्वस्ति दे सके। इसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर सके ताकि वह इलाज को पूरी तरह स्वीकार कर पाए। कभी-कभी मेरा मन होता कि पांच मिनट ही सही उससे बात करूँ।

यह बिल्कुल भी संभव नहीं था। आक्सीजन मास्क के साथ आप खूंटे पर बंधी गाय से ज्यादा नहीं रहते। तीन बाय छह का वह पलंग उस पर रखा सामान का थैला और बगल की टेबल पर रखी पानी की बाटल और दवाइयाँ। जबकि खाना खाते हुए भी मास्क उतारने की अनुमति न हो। बिस्तर पर मल-मूत्र विसर्जन मजबूरी हो ऐसे में हास्पिटल के बाहर आपके इंतजार में पल पल गिनते पति बच्चे माता-पिता भाई भाभी को नजरअंदाज कर आप एक अनजान के लिए आपके लिए बताये नियमों को नहीं तोड़ सकते।

हाउस कीपिंग वाली एक लड़की आशा से अच्छी बातचीत हो गई थी। वह सुबह मुझे व्हीलचेयर पर बैठा कर वाशरूम ले जाती और वहीं रुकती। मैं फ्रेश हो हाथ मुंह धोकर कपड़े बदलती और वापस आते हाँफने लगती। आते ही वह आक्सीजन मास्क लगाती और पलंग पर लेटने में मदद करती। चौबीस घंटे में वह दस बारह मिनिट ही होते जब मैं रिस्क लेती और अपना ध्यान रखने के एवज में उसकी मुठ्ठी गर्म करती। आशा से उसके बारे में पता चला कि वह अपने पति पर भडकती है उसे समझाते हैं लेकिन मानती नहीं है। 

हालांकि दिन में कई बार जूनियर डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग स्टाफ के सदस्य उसे समझाते कि वह परेशान न हो और आराम करे। बाहर उसके पति उसकी चिंता कर रहे हैं। मैं अपने बेड पर बैठी लेटी सुनती देखती और ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसके चित्त को शांत करे उसे जल्दी ठीक करे। दिन गुजरते गये उसे कुछ अन्य तकलीफें होती गईं जिनके बारे में वह डाक्टर को बताती और उसे इलाज मिलता। कुछ आवाजें मुझ तक आतीं लेकिन अब उसकी फोन पर लंबी बातें बंद हो गई थीं या शायद अब उसे मोबाइल नहीं मिलता था। कभी-कभी वह बात करती लेकिन अपेक्षाकृत शांत रहती। मुझे भी सुकून लगता कि वह एडजस्ट हो रही है और जल्दी ठीक हो जायेगी।


लगभग आठ दिन बाद मेरा आक्सीजन मास्क निकल गया। उस दिन जिस असुरक्षा का अहसास हुआ उसके साथ रहना अन्य दिनों से ज्यादा मुश्किल था। उसी दिन बगल के बेड पर एक नया मरीज आया। पता नहीं उसे कितना इंफेक्शन है और मैं सिर्फ एक सर्जिकल मास्क लगाए पांच छह फीट दूर बैठी हूँ।

उस दिन भी उसे देखा। वह शांति से बैठी वार्ड के मरीजों को देख रही थी। आठ दिन वहाँ और उसके पहले चार दिन अन्य हास्पिटल में रहने के बाद घर जाने की उत्सुकता कोई भी अति उत्साही बेवकूफी करने की इजाजत नहीं दे रही थी। वैसे भी कमजोरी इतनी थी कि फोन पर दो मिनट बात करना दो मंजिल सीढियाँ चढ़ने जितना थका देता था। लगभग आधा दिन बिना मास्क शांति से गुजरा और उम्मीद बंधी कि जल्द ही छुट्टी मिलेगी।

अगले दिन सुबह से पतिदेव प्रोसेस में लगे डाक्टर के साइन फाइल मीटिंग करते करते दो बज गये । व्हीलचेयर पर अपने सामान लादे मैं उसके सामने से गुजरी लेकिन न कुछ कह पाई न कर पाई। नीचे पतिदेव इंतजार कर रहे हैं घर पर मम्मी पापा राह देख रहे हैं।

घर आकर जब तीन बाय छह के बिस्तर से नीचे कदम रखा तो जाना कि घर जो शरीर आया है उसमें पहले की तुलना में रत्ती भर ताकत ही बची है और अभी लंबा सफर तय करना है जिसमें न जाने कितना समय लगेगा। सच कहूँ तो घर आने के बाद के दस बारह दिन हास्पिटल के दस बारह दिनों के समान ही थे। हास्पिटल की याद आते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती पल्स बढ जाती। आधी रात में नींद खुलती तो लगता कि ढेरों मानिटर अपनी लाल हरी पीली लाइट चमकाते बीप बीप कर रहे हैं। मैं जोर से आंखें और कान बंद कर लेती और उसका चेहरा दिमाग के पर्दे पर कौंध जाता। वह ठीक हो गई होगी एक उम्मीद जागती और कहीं एक नाउम्मीदी भी। दिल और दिमाग के बीच इन दोनों के बीच जंग छिडती। वह ठीक हो गई होगी उसमें जिजीविषा नहीं थी नहीं हुई होगी। तो क्या अब तक हास्पिटल में होगी? और मैं दस पंद्रह फीट दूर लाल गाउन पहने उसे बायपेप लगाये बैठा हुआ देखने लगती। वह सपना होता या खुली आँखों का भ्रम समझ नहीं आता।

आखिर एक दिन इस जंग ने बैचेन कर दिया। मैंने आशा को फोन लगाया। कभी उसकी जरूरत पड़ेगी तो बुलाने के लिए उसका नंबर ले लिया था मैंने। हालचाल पूछने और बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि उस लाल गाउन वाली का क्या हुआ वह ठीक हो गई न।

'नहीं दीदी वह नहीं रही। बहुत कोशिश की लेकिन बची नहीं। सबने उसे खूब समझाया कि वह खुश रहे लेकिन वह समझती ही नहीं थी। उसका पूरा शरीर सूज गया था। दो बच्चे हैं उसके एक साल और तीन साल के और पति मजदूरी करता है।'

रोना नहीं रोक पाई मैं क्या सच में मैनें गलती कर दी क्या मुझे उससे एक बार बात करना था अपने डर पर काबू करके थोड़ा रिस्क लेकर? क्या मैं नियति का लिखा बदल सकती थी या शायद कुछ उम्मीद जगा सकती थी। पता नहीं जो हुआ वह ठीक था या नहीं लेकिन उसकी मौत बार बार याद आती रहेगी। लाल गाउन पहने वह दो बेड दूर इतनी दूर क्यों थी बस यही सोच रही हूँ।

कविता वर्मा 

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...