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Sunday, July 13, 2014

जिंदगी की ताल

जिंदगी की ताल 
ऐय लड़कियों सही संझा घर से बाहर ना निकरो ,ज्यादा जोर से न हँसों , आग लगे तोहरे गले में जब देखो फूटे बाँस सो बजत रहत है ,पाँव में तो घूमर पड़े हैं सीधे एक जगह बैठो नहीं जात दिन भर नचती रहती हो। गाँव के हर घर में सुबह से शाम तक हर लड़की यही बातें सैकड़ों बार सुन लेती थी। और बातें सुनाई भी क्यों ना जाएँ आये दिन तो खेत खलिहानों की मेढ़ पर बेटियों की आबरू लूटी जाती थी। पता नहीं ये दरिंदे खेत से ही पैदा हो कर खलिहानों में ही कहाँ गायब हो जाते थे। कभी लड़की की जिन्दा लाश मिलती तो कभी किसी पेड़ से लटकी हैवानियत की दास्ताँ मिलती।
लड़कियों का घर से निकलना पढ़ना लिखना सब बंद हो चुका था .हर तीसरे घर में जिंदगी को लाश की तरह ढोती और लाश बनने से डरती जिंदगियाँ सिसक रहीं थीं। तीज त्यौहार शादी ब्याह सभी तो डर के साये में गुजरते थे।
एक दिन कुछ जिन्दा लाशों ने खुद में दबी पड़ी चिंगारी को फूंक मार कर सुलगाया और प्रण किया की अब और नहीं। नन्ही कलियों को खिलने खिलखिलाने से अब नहीं रोका जायेगा। हम इनकी रक्षा करेंगे उस दिन जब इन लाशों में प्राण फुंके इनके हाथों में चूड़ियों की जगह बंदूकें आ गई कई कद्दवारों के हौसले पस्त हो गए। जिस तरह दरिंदे हवा में घुल जाते थे उसी तरह ये रक्षक हवा से प्रकट होने लगे। जिंदगी ने पैर में घुंघरू बाँध लिए जीवन की सुरीली तान से गलियाँ गूँज उठीं।
कविता वर्मा

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