Sunday, February 18, 2018

#नई कहानी 2

कॉलेज में पहला दिन साड़ी हाथों में चूड़ियाँ गले में मंगलसूत्र कानों में गूँजता  'आंटीजी' संबोधन और अब क्लास का रास्ता पूछने पर अजीब सी घूरती निगाहों ने उसके बचे खुचे आत्मविश्वास को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया। बड़े शहर में आकर फाइनल करने के उसके फैसले के सही होने का विश्वास डगमगाने लगा। खुद को इतना अकेला उसने कभी महसूस नहीं किया था। जिसके साथ रहने  लिए उसने यह फैसला किया था वह साथ तो थे लेकिन इस समय उनका हाथ थाम हिम्मत पाने की जरूरत बेतरह महसूस होने लगी। वह भी तो अपनी मजबूरी में बंधे थे। उसे कॉलेज के गेट पर छोड़ कर अपनी नई नवेली पत्नी के लिए एक बेहतर आशियाना देने के लिए दो गाड़ियाँ बदल कर पच्चीस किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर जाना भी तो जरूरी था। क्या पता कुछ ना कह पाने और कुछ ना कर पाने की मजबूरी में उन्होंने भी अपनी आँखें धीरे से पोंछी हों। 
क्लास में प्रवेश करते ही सबकी निगाहें उसकी और घूम गईं जिसने उसे संकोच के मोटे आवरण में लपेट दिया। थोड़े ही समय बाद उसने फलाने की बहू के रूप में खुद का परिचय होते पाया। यह बेहद अप्रत्याशित था। उसका अपना एक नाम है लेकिन वहाँ मौजूद एक दो लड़कियों के सिवाय किसी ने उसका नाम जानने की इच्छा तक प्रकट नहीं की। वैसे भी बड़े शहर के प्राइवेट कॉलेज में साड़ी पहने एक लड़की जिसके जेठ भी उसी कॉलेज उसी क्लास में हों उसका नाम कुछ भी हो उसकी योग्यता कुछ भी हो क्या फर्क पड़ता है ?
उस दिन तीन क्लास लगीं हर प्रोफ़ेसर और लेक्चरर को उसका परिचय बहू के रूप में दिया गया उसके आगे एक स्टूडेंट के रूप में उसका कोई वजूद ही नहीं था। लगभग साढ़े ग्यारह बजे कॉलेज छूटा। सुबह जल्दी उठ कर तैयार होने टिफिन बनाने के बाद इतना समय ही कहाँ था कि खुद के खाने का ख्याल रहता। एक कप दूध जरूर उसने पी लिया था वह भी विदाई के समय मम्मी ने जिठानी से कह दिया था उसके दूध का ख्याल रखना इसलिए पहले दिन से उसे चाय के स्थान पर एक कप दूध मिल जाता था। पेट में चूहे कूद रहे थे मन मरा हुआ था। वापसी के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर टेम्पो लेना था फिर उतर कर लगभग एक किलोमीटर और चलना था। सिर बुरी तरह दुःख रहा था थोड़े पैसे पास में थे लेकिन रास्ते में रुक कर कुछ लेने और खाने की हिम्मत नहीं बची थी। 
हालाँकि सुबह वह रास्ता पहचानने  लिए बड़े ध्यान से दुकानों के साइन बोर्ड देखती आई थी जहाँ से उसे मुड़ना था लेकिन सुबह जो साइन बोर्ड सामने दिख रहे थे अब वे पीछे हो गए थे और वह मोड़ जहाँ से उसे मुड़ जाना था वह पीछे छूट गया। आगे बढ़ते हुए वह एक बड़े चौराहे पर आई तब अपनी गलती समझ आई। भूख से अंतड़ियाँ और सिर टनक रहा था। उसने किसी से रास्ता पूछा और लगभग पौना किलोमीटर और घूम  कर टेम्पो स्टैंड पर आई। थोड़े इंतज़ार के बाद ही टेम्पो मिल गया। अब उसकी अगली चिंता शुरू हो गई कि उसे उतरना कहाँ है ? वैसे उसने देखा था जहाँ से वह टेम्पो में चढ़ी थी वहाँ एक डॉक्टर का साइन बोर्ड लगा था। उसने अपना स्टॉप बताया लेकिन फिर भी आशंकित सी बैठी रही। 
काफी देर चलते रुकते सवारियाँ चढ़ाते उतारते टेम्पो एक स्टॉप पर रुका और उसे उसी डॉक्टर का साइन बोर्ड दिखा और वह तेज़ी से टेम्पो से उतर गई। टेम्पो वाले ने उसे घूर कर देखा लेकिन भूख थकान और मरे मन के साथ दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था। टेम्पो आगे बढ़ गया उतर कर उसने चारों तरफ देखा तो लगा कि यह वह चौराहा नहीं है जहाँ से वह चढ़ी थी। आधे घंटे पहले एक मोड़ छोड़ देने की गलती की ग्लानि और गुस्से ने अब उसे एक चौराहे पहले ही टेम्पो से उतार दिया था। दोपहर के एक बज रहे थे क्वांर की चिलचिलाती धूप खाली पेट उसकी रुलाई छूट गई। 
पापा के यहाँ कभी भी कहीं जाना होता था तो भाई मोटरबाइक से छोड़ देते थे या पापा के ऑफिस की जीप से ड्राइवर। जीवन के इतने बेरहम यथार्थ से उसकी पहली मुठभेड़ थी यह बिना किसी तैयारी के। अब उसे लगभग दो किलोमीटर और चलना था दोपहर की धूप में उस सुनसान सड़क पर चलते हुए एक और विचार उसके मन में कौंधा अगर उसे घर नहीं मिला तो ? उसकी रुलाई छूट गई लेकिन दिमाग ने खुद के गुम होने पर घर ढूंढने के उपाय खोजने शुरू कर दिए। शुक्र है इसकी नौबत नहीं आई एक किलोमीटर चलने पर उसे पहचाना रास्ता मिल गया। दरवाजा खटखटाते समय लगभग डेढ़ बज रहा था दरवाजा तो खुला लेकिन उसका स्वागत अंदर पसरी बोझिलता ने किया। 
कविता वर्मा 

Thursday, February 15, 2018

# नई कहानी

शादी के आठ दिन बाद वह मायके चली गई थी जिसके बाद करीब डेढ़ महीने बाद वापस लौटी। सगाई और शादी के बीच डेढ़ साल का फैसला था  ने इजाजत दी थी कि पोस्ट ग्रजुएट कर ले। प्रीवियस ईयर के बाद ही शादी हो गई। इन डेढ़ महीनों में यही जद्दोजहद चलती रही कि फाइनल कहाँ से करे ? इसके साथ ही एक अदृश्य दबाव सा बना रहा कि एक साल ड्राप ले ले लेकिन वह जानती थी ड्राप लेना मतलब ड्राप हो जाना। शादी में कॉलेज के प्रोफेसर भी आये थे और उनमे से एक ने स्टेज पर उसे आशीर्वाद देते हुए कहा था " फाइनल कर लेना ड्राप मत लेना। " जाने क्यों वे शब्द दिमाग में जम गए थे इसलिए उसने ड्राप लेने के आईडिया को दरकिनार कर उसी साल फ़ाइनल करने की जिद पकड़ ली थी। 
वह तो गई थी कॉलेज में अड्मिशन लेने लेकिन उसी दिन कॉलेज में दो गुटों के बीच झगडे हो गए और यहाँ माहौल ख़राब है के नाम से आखिर ससुराल से ही फ़ाइनल करने का तय हुआ। आसान तो वह भी नहीं था क्योंकि सिर्फ कॉलेज नहीं बदलना था बल्कि यूनिवर्सिटी भी बदलना था माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेना था फिर बड़े शहर के ढेर सरे कॉलेजों में से सही कॉलेज चुनना था। 
इत्तफाक था कि उसी साल जेठ भी उसी विषय से पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे थे और फाइनल में थे। उन्हीं ने सुझाव दिया कि उनके कॉलेज में एडमीशन ले ले। प्रायवेट कॉलेज है रोज़ जाने की दिक्कत नहीं रहेगी। "रोज़ जाने की दिक्कत " या "ना जाने की आसानी" समझ ही कहाँ पाई वह जैसा जिसने किया कर लिया। 
कहीं कुछ सुगबुगा रहा है यह भी तो नहीं समझ आया। 
मायके से आकर जब उसने अपनी अटैची खोली थी उसमे सलवार सूट देख कर बड़े तल्ख़ लहजे में पूछा गया था "क्या वह सूट पहनेगी ?" 
"कॉलेज जाना है तो सूट तो पहनना पड़ेगा " आश्चर्य में भर कर सहज ही जवाब दिया था उसने लेकिन बात फिर भी नहीं समझी थी।  
वह अंदर के कमरे में थी तभी बाहर किसी पड़ोसन को बात करते सुना " तो क्या वह जेठ के साथ कॉलेज जाएगी ?"
"हाँ जेठ के साथ सलवार सूट पहन कर कॉलेज जाएगी "एक तल्ख़ स्वर उभरा। 
शाम को जब पति वापस आये तो उन्हें फरमान सुनाया गया "उसे कॉलेज जाना हो तो जाये लेकिन सूट नहीं पहन सकती। " एक क्षीण प्रतिवाद भी हुआ लेकिन उनके घर में रहना है तो उनके अनुसार रहना होगा के फरमान के साथ ख़त्म हो गया। पति की नौकरी अभी पक्की नहीं हुई थी स्टायपेंड मिलता था एक दो महीने तो दिक्कत थी ही। हालाँकि पापा का मकान खाली था वह चाहती तो वहाँ रह सकती थी लेकिन घर में आते ही दो चूल्हे करने की उसकी सोच ही नहीं थी। एक भरे पूरे घर में शादी करना उसका सपना था इसलिए वह ऐसा कुछ नहीं चाहती थी।
दूसरे दिन सुबह आठ बजे नहा कर तैयार होकर पति के खाने का डब्बा बना कर वह साड़ी पहन कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई थी। रास्ता उसने देखा नहीं था वह तल्खी कानों के रस्ते थोड़ी तो दिल में भी उतरी थी इसलिए उसने कहा एक बार मुझे रास्ता दिखा दो फिर मैं चली जाऊँगी। रास्ते भर पति भुनभुनाते रहे। पापा से बात करने की बात करते रहे , मुझे कोई पायजामा कुरता पहन कर ऑफिस जाने को कहेगा तो कैसा लगेगा ? वह उन्हें शांत करने की कोशिश करती रही। बेकार में बुढ़ापे में उन्हें क्यों दुःख देना जैसी बातें उन्हें समझाती रही। 
"कॉलेज में घुसते ही उसकी साड़ी के कारण सबका ध्यान अनायास ही उसकी तरफ चला गया। पीछे से आंटी जी की आवाज़ें आती रहीं। अभी तक पति को देती समझाइश पर यथार्थ का पत्थर पड़ा था उसके आँसू निकल पड़े। मात्र बीस साल की उम्र में अपने से बड़े डीलडौल वाले लड़कों के मुँह से आंटीजी सुनना सिर्फ इसलिए कि अब उसकी शादी हो गई थी उसके सूट पहन लेने से किसी को तकलीफ थी कि वह बेवजह भाइयों बीच मनमुटाव का कारण नहीं बनना चाहती थी इसलिए कि वह बड़े घर की बेटी थी और उसपर लांछन लगा कर उसे बुरा साबित करना आसान था और इसलिए कि घर बना कर रखने के संस्कार उसे घुट्टी में मिले थे। 
कविता वर्मा 

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...