Monday, January 1, 2018

नया बनाम पुराने का अंत
साल 2017 चला गया समाप्त हुआ पूरी दुनिया में जश्न मना। जश्न मना उसके बाद आने वाले नये साल का। हालांकि नये साल के गर्भ में क्या है कोई नहीं जानता। बस एक आस होती है कि कुछ सुखद कुछ सुकून दायक होगा लेकिन हर जाने वाली चीजों के बाद आने वाली चीजें ऐसी ही सुखद नहीं होती।
रीगल चौराहे पर मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर एक चाय की गुमटी है जहाँ अकसर साहित्यिक गोष्ठी के बाद चाय पीने जाते हैं। उसी गुमटी में एक छोटा सा कमरा है पता नहीं क्या है उस कमरे में कभी झांक कर नहीं देखा। उस दिन वहाँ एक बुजुर्ग व्यक्ति भी थे। मंझोला कद अनुभवों के रंग से रंगी दाढ़ी कुर्ता पायजामा पहने और चेहरे पर मुस्कान लिये वहां घूम रहे थे। किसी ने उन्हें पहचाना और सभी से परिचय कराया। वे अपने समय के सक्षम चित्रकार पचास वर्षीय श्री किशन राव जी थे।
एक जमाने में पोस्टर चित्रकार की विशिष्ट पूछ परख होती थी। किसी फिल्म की रिलीज के पहले किसी के जन्मदिन पर या किसी अवसर विशेष पर इन लोगों के पास सिर उठाने का समय नहीं होता था। उनके बनाए महान हस्तियों के पोट्रेट रेखाचित्र अभी भी वहाँ रखे थे।
फिर वक्त बदला नई तकनीक आई और उसने पुराने को अलविदा करने के साथ ही किसी का वक्त भी खत्म कर दिया।
कविता वर्मा






#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...