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Wednesday, July 6, 2011

ढूंढता हूँ में उसे

यादों की गलियों में   
 पीछे जाते हुए  
 पहुँच जाता हूँ उस गेट पर     
जिसके उस पार हाथ हिलाते   
माँ ने मेरा हाथ 
थमा दिया था किसी हाथ में    
देख उस अजनबी चहरे     
माँ की डबडबाई आँखें    
वो बिछड़ने और अकेलेपन का एहसास    
धुंधला रास्ता ,कमरे और चहरे   
वो डर    


एक कोमल स्पर्श 
एक मीठी आवाज़ 
जब उसने कहा था    
रोओं मत में हूँ ना   
झपकाकर डबडबाती आँखें  
साफ होती वह सूरत 
 मुस्कराती आँखों में 
मेरा डर खो गया    


आज बरसों बाद   
नहीं याद आ रहा वह चेहरा    
वह नाम वो आँखें    
लेकिन जब भी उदास 
अकेला  होता हूँ में    
होते है सभी अपने आस पास 
हर संबल हर सांत्वना  में    
वह स्पर्श ढूंढता हूँ  
सुनना चाहता हूँ  
वही मीठी आवाज़ 
रोओं मत में हूँ ना ! 

प्यार के दो बोल

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