घनघोर अँधेरे पथ पर
कुछ बिखरे काँटे , कुछ
फूलों जैसे पल
अटपटी राह
पर बढ़ते अकेले कदम।
कठिन राह, घनघोर अन्धकार
संवेदनाओं से रीता संसार
मन ढूँढ रहा एक किरण
एक आस , कोई एहसास
टटोलते हाथ
टकराते सघन निरास
ठोकर खाते गिरते
भीगते जज़्बात।
नहीं समय करने का
भोर का इंतज़ार
न ही कोई साथ
उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख
हो अभ्यस्त साध अन्धकार
बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।
कविता वर्मा