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Saturday, October 12, 2013

अभ्यस्त

 

घनघोर अँधेरे पथ पर 
कुछ बिखरे काँटे , कुछ 
फूलों जैसे पल 
अटपटी राह 
पर बढ़ते अकेले कदम।  

कठिन राह, घनघोर अन्धकार 
संवेदनाओं से रीता संसार 
मन ढूँढ रहा एक किरण 
एक आस , कोई एहसास 
टटोलते हाथ 
टकराते सघन निरास 
ठोकर खाते गिरते 
भीगते जज़्बात। 

नहीं समय करने का 
भोर का इंतज़ार 
न ही कोई साथ 
उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख 
हो अभ्यस्त साध अन्धकार 
बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  

कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

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