Monday, June 28, 2021

कहानी जो पढी जाना चाहिए

 अभी कुछ दिनों में दो कहानियाँ पढीं जिनके बारे में कहने से खुद को रोक नहीं पा रही। इत्तेफाक से दोनों कहानियाँ सोनल की हैं। सोनल की लेखनी से परिचय उनकी कविताओं के माध्यम से था।  ' देखन में छोटी लगें विचार दें गंभीर ' की तर्ज पर उनकी कविताएँ प्रभावित करती रही हैं। उनके गद्य से परिचय हुआ फिल्म बनती नहीं बनाती भी हैं से जो कालीचाट फिल्म के बनने की और इस दौरान गाँव के सीधे सादे सरल लोगों के बीच खुद को जानन समझने सीखने की संस्मरणात्मक कथा है। हाँ कथा ही है जो आगे क्या की उत्सुकता बनाए रखते चलती है। उनकी पुस्तक कोशिशों की डायरी को इस वर्ष म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा कथेतर गद्य का वागीश्वरी पुरस्कार मिला है। 

तो बात करते हैं कहानियों की। 

पहली कहानी है परीकथा में प्रकाशित चस्का। सोनल की लेखनी में खास बात यह है कि वे अपने आसपास को बेहद सजगता से देखती और विवेचन करती हैं। वे जीवन के छोटे छोटे उल्लास को भी पकड़ती हैं और हँसी के पीछे छुपे दुख और तकलीफों को भी। वे इनमें शामिल होकर उनकी तीव्रता को जैसे महसूस करती हैं वैसे ही शब्दों में उतारती भी हैं और इतनी सरल सहज भाषा में कि आप उसमें रम जाते हैं। वे लोकजीवन के परिवर्तनों को सूक्ष्मता से देखती हैं और उसे उजागर करती हैं। चस्का कहानी ऐसे ही सरोकारों की कहानी है जो आम तौर पर लोगों की नजरों से चूक जाती है। 

खजुराहो के मंदिरों के आसपास घूमने वाले गाइड जो पर्यटकों को घुमाने किताबें या सजावटी सामान बेचने दिन भर भटकते हैं और कभी झिड़के जाते हैं कभी नजरअंदाज किये जाते हैं। शायद ही कभी कोई इनसे व्यक्तिगत बातें करता होगा और जानकारी लेने की कोशिश करता होगा कि आखिर इनकी जिंदगी कैसी चल रही है। लेखिका के रूप में सोनल न सिर्फ एक ऐसे ही गाइड से बात करती हैं बल्कि विदेशी पर्यटकों द्वारा इन गरीब मजदूर वर्ग के युवाओं को दिये जाने वाले प्रलोभनों और खाने पीने के लगाए चस्के के कारण अन्य कोई कार्य न कर पाने की आदत को भी समझती हैं। वे देखती हैं कि काम न मिलने पर भी ये युवा अपने खुद के खेतों में काम नहीं करना चाहते। दरअसल कहानी उन पर्यटन स्थलों की एक बड़ी समस्या को इंगित करके सोचने पर मजबूर करती है जहाँ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। वास्तव में पर्यटन स्थलों के विकास के अलावा स्थानीय लोगों के रोजगार के बारे में भी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। 

कहानी आत्मकथ्य रूप से चलती है लेकिन लेखिका कहीं भी हावी नहीं होतीं बल्कि उस गाइड की निजी जिंदगी उसकी तकलीफ विवशता और उसकी क्षुब्धता को मुख्य रूप से सामने लाती हैं। कभी उस पर क्रोध आता है तो कभी तरस । विदेशी पर्यटकों द्वारा गाँव के इन भोले भाले युवाओं को कुछ पैसों के बदले नकारा बनाए जाने की यह कहानी विकसित चमकीले स्थलों के स्याह पक्ष की कहानी है। 

दूसरी कहानी जानकी पुल पर प्रकाशित कहानी है जात्रा। सोनल जिस तरह गाँवों जंगलों नदियों और लोक से जुड़ी हैं यह कहानी उसे बखूबी बताती है। विदेश से अपने मित्र के घर आये एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो बरसों बाद अपने देश के गांवों को देख रहा है। जबकि उसका वह मित्र जो इन्हीं जंगल नदी के बीच काम करता है इन सब से अनभिज्ञ सिर्फ काम में व्यस्त है। वह अपने दोस्त के साथ जिस तरह धीरे-धीरे अपने परिवेश को देखते उसमें शामिल होता जाता है पाठकों को अद्भुत खुशी से भर देता है। ग्रामीण जीवन में जात्रा नदियों की परिक्रमा भंडारा तीज-त्यौहार खेल जीवन को गति देते हैं। इन्हें शहरों ने या तो छोड़ दिया है या भुला दिया है। धीरे-धीरे ही सही इनमें जीवन का रस पहचान कर जब दोनों दोस्त उसमें रमते हैं तो अपने तनावों को भूलकर नई जीवनी शक्ति से भर जाते हैं। गाँव के मजदूर जो दुगने पैसे मिलने पर भी अपने त्योहार छोड़कर काम पर नहीं आना चाहते वे अपने साहब के प्रेमभाव के कारण कम समय में काम पूरा करने के लिए राजी हो जाते हैं। यह प्रसंग ही बताता है कि पैसों से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता और छोटी छोटी बातों से बड़ी बड़ी खुशियाँ पाई जा सकती हैं। 

दोनों ही कहानियाँ अपनी भाषा कथ्य और कहन में बेहद प्रभावित करती हैं। 

#कहानी #kahani 

कविता वर्मा

Wednesday, June 2, 2021

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं तो दिल धड़कने लगता है। हास्पिटल से आने के पंद्रह दिनों बाद भी वह वार्ड वहाँ का माहौल रात के सन्नाटे में अपनी रंगबिरंगी लाइट चमकाते बीप बीप करते मानिटर याद आते हैं तो पल्स बढ़ जाती है।

मेरे बेड के दो बेड छोड़कर थी वह। उसे बायपेप लगा था। वह मेरे पहले आई थी या बाद में यह भी नहीं पता। मोटे बेल्ट से पूरे चेहरे पर बंधा वह मास्क उस गर्मी में लगाये रहना बेहद मुश्किल था। लाल गाउन पहने वह लगातार बैठी रहती। कभी-कभी उसकी मास्क के अंदर से घुटी घुटी आवाज आती। उसके पास मोबाइल नहीं था। अक्सर वह हाउस कीपिंग वाली सफाई कर्मचारियों के मोबाइल पर अपने घर बात करती जिसमें उसकी बेबसी झुंझलाहट गुस्सा झलकता।

दो तीन दिन में जब मैं अपने आसपास को देखने की स्थिति में आई तब उसे बैठे या मोबाइल पर बात करते देखकर सोचती कि इस समय उसे काउंसलिंग की आवश्यकता है। कोई ऐसा आत्मीय या प्रोफेशनल जो उसे इस माहौल और इलाज के प्रति आश्वस्ति दे सके। इसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर सके ताकि वह इलाज को पूरी तरह स्वीकार कर पाए। कभी-कभी मेरा मन होता कि पांच मिनट ही सही उससे बात करूँ।

यह बिल्कुल भी संभव नहीं था। आक्सीजन मास्क के साथ आप खूंटे पर बंधी गाय से ज्यादा नहीं रहते। तीन बाय छह का वह पलंग उस पर रखा सामान का थैला और बगल की टेबल पर रखी पानी की बाटल और दवाइयाँ। जबकि खाना खाते हुए भी मास्क उतारने की अनुमति न हो। बिस्तर पर मल-मूत्र विसर्जन मजबूरी हो ऐसे में हास्पिटल के बाहर आपके इंतजार में पल पल गिनते पति बच्चे माता-पिता भाई भाभी को नजरअंदाज कर आप एक अनजान के लिए आपके लिए बताये नियमों को नहीं तोड़ सकते।

हाउस कीपिंग वाली एक लड़की आशा से अच्छी बातचीत हो गई थी। वह सुबह मुझे व्हीलचेयर पर बैठा कर वाशरूम ले जाती और वहीं रुकती। मैं फ्रेश हो हाथ मुंह धोकर कपड़े बदलती और वापस आते हाँफने लगती। आते ही वह आक्सीजन मास्क लगाती और पलंग पर लेटने में मदद करती। चौबीस घंटे में वह दस बारह मिनिट ही होते जब मैं रिस्क लेती और अपना ध्यान रखने के एवज में उसकी मुठ्ठी गर्म करती। आशा से उसके बारे में पता चला कि वह अपने पति पर भडकती है उसे समझाते हैं लेकिन मानती नहीं है। 

हालांकि दिन में कई बार जूनियर डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग स्टाफ के सदस्य उसे समझाते कि वह परेशान न हो और आराम करे। बाहर उसके पति उसकी चिंता कर रहे हैं। मैं अपने बेड पर बैठी लेटी सुनती देखती और ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसके चित्त को शांत करे उसे जल्दी ठीक करे। दिन गुजरते गये उसे कुछ अन्य तकलीफें होती गईं जिनके बारे में वह डाक्टर को बताती और उसे इलाज मिलता। कुछ आवाजें मुझ तक आतीं लेकिन अब उसकी फोन पर लंबी बातें बंद हो गई थीं या शायद अब उसे मोबाइल नहीं मिलता था। कभी-कभी वह बात करती लेकिन अपेक्षाकृत शांत रहती। मुझे भी सुकून लगता कि वह एडजस्ट हो रही है और जल्दी ठीक हो जायेगी।


लगभग आठ दिन बाद मेरा आक्सीजन मास्क निकल गया। उस दिन जिस असुरक्षा का अहसास हुआ उसके साथ रहना अन्य दिनों से ज्यादा मुश्किल था। उसी दिन बगल के बेड पर एक नया मरीज आया। पता नहीं उसे कितना इंफेक्शन है और मैं सिर्फ एक सर्जिकल मास्क लगाए पांच छह फीट दूर बैठी हूँ।

उस दिन भी उसे देखा। वह शांति से बैठी वार्ड के मरीजों को देख रही थी। आठ दिन वहाँ और उसके पहले चार दिन अन्य हास्पिटल में रहने के बाद घर जाने की उत्सुकता कोई भी अति उत्साही बेवकूफी करने की इजाजत नहीं दे रही थी। वैसे भी कमजोरी इतनी थी कि फोन पर दो मिनट बात करना दो मंजिल सीढियाँ चढ़ने जितना थका देता था। लगभग आधा दिन बिना मास्क शांति से गुजरा और उम्मीद बंधी कि जल्द ही छुट्टी मिलेगी।

अगले दिन सुबह से पतिदेव प्रोसेस में लगे डाक्टर के साइन फाइल मीटिंग करते करते दो बज गये । व्हीलचेयर पर अपने सामान लादे मैं उसके सामने से गुजरी लेकिन न कुछ कह पाई न कर पाई। नीचे पतिदेव इंतजार कर रहे हैं घर पर मम्मी पापा राह देख रहे हैं।

घर आकर जब तीन बाय छह के बिस्तर से नीचे कदम रखा तो जाना कि घर जो शरीर आया है उसमें पहले की तुलना में रत्ती भर ताकत ही बची है और अभी लंबा सफर तय करना है जिसमें न जाने कितना समय लगेगा। सच कहूँ तो घर आने के बाद के दस बारह दिन हास्पिटल के दस बारह दिनों के समान ही थे। हास्पिटल की याद आते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती पल्स बढ जाती। आधी रात में नींद खुलती तो लगता कि ढेरों मानिटर अपनी लाल हरी पीली लाइट चमकाते बीप बीप कर रहे हैं। मैं जोर से आंखें और कान बंद कर लेती और उसका चेहरा दिमाग के पर्दे पर कौंध जाता। वह ठीक हो गई होगी एक उम्मीद जागती और कहीं एक नाउम्मीदी भी। दिल और दिमाग के बीच इन दोनों के बीच जंग छिडती। वह ठीक हो गई होगी उसमें जिजीविषा नहीं थी नहीं हुई होगी। तो क्या अब तक हास्पिटल में होगी? और मैं दस पंद्रह फीट दूर लाल गाउन पहने उसे बायपेप लगाये बैठा हुआ देखने लगती। वह सपना होता या खुली आँखों का भ्रम समझ नहीं आता।

आखिर एक दिन इस जंग ने बैचेन कर दिया। मैंने आशा को फोन लगाया। कभी उसकी जरूरत पड़ेगी तो बुलाने के लिए उसका नंबर ले लिया था मैंने। हालचाल पूछने और बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि उस लाल गाउन वाली का क्या हुआ वह ठीक हो गई न।

'नहीं दीदी वह नहीं रही। बहुत कोशिश की लेकिन बची नहीं। सबने उसे खूब समझाया कि वह खुश रहे लेकिन वह समझती ही नहीं थी। उसका पूरा शरीर सूज गया था। दो बच्चे हैं उसके एक साल और तीन साल के और पति मजदूरी करता है।'

रोना नहीं रोक पाई मैं क्या सच में मैनें गलती कर दी क्या मुझे उससे एक बार बात करना था अपने डर पर काबू करके थोड़ा रिस्क लेकर? क्या मैं नियति का लिखा बदल सकती थी या शायद कुछ उम्मीद जगा सकती थी। पता नहीं जो हुआ वह ठीक था या नहीं लेकिन उसकी मौत बार बार याद आती रहेगी। लाल गाउन पहने वह दो बेड दूर इतनी दूर क्यों थी बस यही सोच रही हूँ।

कविता वर्मा 

Saturday, April 10, 2021

ये इत्तेफाक है या कुछ और

 आप लोग इत्तेफाक में विश्वास रखते हैं या नहीं? अगर नहीं रखते तो इस किस्से को पढ़कर बताइये कि यह क्या है?


अभी कुछ दिन पहले मैं पतिदेव की पोस्टिंग वाले शहर में रहने चली गई। अभी तक तो उनका बैचलर्स अपार्टमेंट था सिंगल बेड से काम चल रहा था। मेरे जाने के बाद दो अलग-अलग डील डौल आकार के पलंग बदलने की जरूरत महसूस हुई। तो हम लोग शहर की एक दुकान पर डबल बेड देखकर आये। चूँकि हमारा वहाँ रहना लाॅकडाउन के कारण कुछ दिन टल गया तो हमने सोचा पलंग देख लेते हैं और जब लगेगा खरीद लेंगे।

उसी दिन सुबह हमने सोचा कि एक्स्ट्रा पलंग एक परिचित को अगर जरूरत हुई तो दे देते हैं इस बारे में हमने उनसे फोन पर बात भी की। साथ ही यह भी बताया कि वे जब चाहे बता दें और पलंग ले जाएं।

सभी बातें तय हो गई।

उसी दिन दोपहर में मेरे नंबर पर एक फोन आया "मैम आपने पलंग का आर्डर दिया था उसकी डिलीवरी कब करना है?

यह चौंकाने वाला था क्योंकि अभी तक हमने कोई आर्डर नहीं दिया था। दूसरी बात कि दुकानदार के पास मेरा फोन नंबर कैसे आया? क्योंकि अनजान लोगों को मेरा नंबर नहीं देती हूँ खासकर जब हसबैंड भी साथ में डील कर रहे हैं।

"मैंने कहा कि अभी हम तुरंत नहीं ले रहे हैं आपको दो चार दिन में बता देते हैं।" 

वह बोला "मैम फिर दो दिन लाॅकडाउन रहेगा।" 

"हाँ ठीक है हमें अभी कोई जल्दी नहीं है" यह कहकर मैंने फोन रख दिया लेकिन इस बात से हम दोनों ही अचंभित थे। थोड़ी देर सोचने के बाद कि ऐसा कैसे हुआ हसबैंड ने उस नंबर पर फिर फोन लगाया और पूछा कि आपको ये नंबर कहाँ से मिला?

उसने कहा ये फलाने भाई ने दिया। अब उसने जिस फलाने भाई का नाम लिया था उसी नाम के हमारे परिचित से हमने सुबह पलंग देने की बात की थी।

इस बार बात करके हम और ज्यादा कंफ्यूज हो गये कि फलाने भाई अभी पलंग लेने आ रहे हैं क्या? उन्होंने ऐसा कुछ तो नहीं कहा था कि आज पलंग लेंगे।

हम सोचने लगे कि उन परिचित को फोन लगाकर पूछें कि वे किसी को पलंग लेने भेज रहे हैं क्या? इस दौरान पलंग लेना है या डिलीवर करना है का कंफ्यूजन बना रहा।

इस बात को तीन-चार घंटे बीत गये फिर अचानक फोन की घंटी बजी "मैम आपका पलंग हमने भेज दिया है आप घर पर ही हैं न"

अब यह सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा आया मैंने कहा "आप यह तो बताइये कि आप यह पलंग किसके घर डिलीवर करना चाहते हैं। उनका कोई नाम तो होगा?"

"मैम फलाने जी ने कहा कि पलंग डिलीवर कर दें उन्होंने ही नंबर दिया।"

दिन भर के दो तीन बार फोन पर हुई बातों को प्रोसेस करके दिमाग ने निष्कर्ष निकाला कि निश्चित रूप से यह रांग नंबर है। अब मैंने खुद को संयत किया और कहा" भाईसाहब या तो फलाने भाई ने आपको गलत नंबर दिया है या आपने गलत नंबर नोट किया है या गलत नंबर लगाया है। आप एक बार नंबर फिर से चैक करें। मैं आपकी मदद ही करना चाहती हूँ। अगर मैं कह दूँ कि पलंग ले आइये और वहाँ घर पर कोई नहीं मिला तो आपका चक्कर बेकार होगा। आप फिर मुझे फोन करेंगे लेकिन उससे क्या होगा? आप नंबर फिर से अच्छे से चैक करें। "

अब वह मेरी बात समझ गया" जी मैम समझ गया ठीक है मैं देखता हूँ "कहकर उसने फोन रख दिया।

पता नहीं फिर वह पलंग डिलीवर हुआ या नहीं दुकानदार को सही नंबर मिला या नहीं?

आपको क्या लगता है कि मुझे फोन करके पूछना चाहिये?

पूछना तो खैर नहीं होगा लेकिन आप इसे क्या कहेंगे इत्तेफाक या कुछ और?

कविता वर्मा 

Tuesday, April 6, 2021

मन में बसते रास्ते

 अपना घर छोड़कर जाना हमेशा एक अजीब सा अहसास देता है। बार बार रुक कर पीछे मुड़कर देखती हूँ कि उसे थोड़ा और अपने अंदर उतार लूँ थोड़ा सा और साथ ले जाऊँ लेकिन फिर भी बहुत कुछ पीछे छूट जाता है।

इस अहसास को सांत्वना देने के लिए या कहें कि इसे एक अवसर की तरह जीवन में कुछ और जोड़ने के लिए रास्ते मोड़ जंगल नदी पहाड़ पत्थर खेत पेड़ फूल फल को अपने भीतर उतारती चलती हूँ। भरती जाती है हर दृश्य को अपने अंतस में फिर चाहे वे खेत में काम करती गोबर के कंडे पाथती दरांता लेकर खेत पर जाती या सड़क किनारे बैठ कपड़े धोती स्त्रियाँ हों या सड़क किनारे खेलते बच्चे किसी छप्पर के नीचे बीड़ी फूंकते गेंहूँ निकालते भूसा ढोते पुरुष या कि गाँव की सड़कों पर बहती नालियाँ नलों का पानी गांव के बाहर कचरे के ढेर या सड़कों पर बने गढ्ढे। हर दृश्य उस जीवन से जोड़ता है जो आमतौर पर हम से बहुत दूर रहता है।

इसी दृश्य में एक और स्थान जुड़ता है वह है किसी छोटे से गांव में आहते से घिरा एक मंदिर जो हर बार आते-जाते रास्ते के एक पहचान चिन्ह के रूप में गुजर जाता है।

आज अचानक उस मंदिर के सामने गाड़ी रोकी। आधा बना आधा खुदा आहता जिसमें नक्काशी दार बलुआ पत्थरों से बना बडे़ से गुंबद को पत्थरों के खंभे पर उठाए एक प्राचीन हनुमान मंदिर। मंदिर के सामने गुंबद के नीचे बिछा हरी घास का कार्पेट बाहर के तापमान को रोक कर सुकून भरा अहसास दे रहा था। मंदिर में खड़े हनुमान जी की बड़ी सी प्रतिमा भक्तों को प्रेममयी दृष्टि से निहारती। आप देर तक टकटकी लगाए देखते रह सकते हैं।

इसी मंदिर परिसर में थोड़े अंदर एक और परिसर है जिसमें एक अति प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर अहिल्या बाई के शासनकाल या उससे पहले का हो सकता है। बडे-बडे पीपल के वृक्ष कलरव करती गौरैया छोटे पत्थर के खंभो पर टिका मंडप जिस पर कोई विशेष सज्जा न होते हुए भी वे आकर्षक थे। पीली मिट्टी जैसे रंग से पुते ये खंभे समय के थपेड़ों से अपनी नक्काशी की धार खो चुके फूल पत्तों से सजे थे। आधुनिक मंदिरों में ये साधारणता अब गायब हो चुकी है। महेश्वर में राजराजेश्वर मंदिर में कृत्रिम फूल पत्तों की सजावट और वंदनवार मंदिर की गरिमा को कम करते ही प्रतीत होते हैं। ऐसे में शिवलिंग पर सहज चढ़े फूल बेलपत्र कलश से बूँद बूँद टपकता पानी सामने एक छोटा सा नंदी और सिर झुका कर अंदर जाया जा सके इतना बड़ा द्वार।

मंदिर परिसर में रामायण की चौपाई के स्वर गूँज रहे थे। पता चला कि यहाँ लगभग चालीस पचास वर्षों से सतत रामायण पाठ हो रहा है। नजर घुमाई एक वृद्ध रामायण की चौपाई बोलते दिखे। उन्हें शायद रामायण कंठस्थ थी। बिना किसी लाउडस्पीकर और जल्दबाजी के चौपाई के शब्द वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भर रहे थे। 

मंदिर में दर्शन करके कुछ देर वहीं बैठे प्रसाद लिया और बाहर आ गये। कुछ और देर हनुमान जी से भेंटने का मन हुआ तभी दाँयी ओर नजर पड़ी थोड़ा आगे जाकर देखा तो एक बावड़ी दिखी। आश्चर्य इस इलाके में बावड़ी मिलना बहुत सामान्य नहीं है। किनारे जाकर देखा काफी पानी था। एक छोटी पुरानी मोटर लगी थी। पानी साफ था और सीढियाँ भी साफ सुथरी थीं। मन प्रसन हो गया। थोड़ी देर वहाँ रुककर हम आगे बढ़ गये।

घर छोड़कर आने का मलाल खत्म हो जाता है जब ऐसे स्थानों के दर्शन हो जाते हैं जो आधुनिक दुनिया से दिखावे से दूर अपने सहज स्वरूप में हैं। 

Wednesday, January 20, 2021

त्रिभंग या बहुभंग

 त्रिभंग या बहुभंग 

बहुत दिनों से सोशल मीडिया पर फिल्म त्रिभंग की चर्चा चल रही थी। कई बार इसका प्रोमो सामने आया लेकिन न जाने क्यों प्रोमो देखते हुए फिल्म देखने की इच्छा नहीं जागी इसलिए इसे स्थगित करती रही।

आज सोचा कि क्यों न इसे देख ही लिया जाये। अकसर बहुत ज्यादा तारीफ प्राप्त फिल्म या वेबसीरीज निराश ही करती हैं लेकिन हो सकता है कि यह इस धारणा को तोड दे। एक संवेदनशील लेखिका द्वारा लिखी कहानी पर नामी अभिनेत्रियों का अभिनय कुछ तो खास होगा। स्त्री जीवन और उसकी जिजीविषा को कोई अलग आयाम उठाया गया होगा इसमें।

फिल्म की शुरुआत में कांपते हाथों से लिफाफे पर नाम लिखती नायिका के साथ शुरू हुई कहानी नायिका की इस स्वीकारोक्ति के साथ कि उससे गलती हुई है। जीवन कई बार चुनाव के मौके देता है और उस चुनाव में गलती होना स्वाभाविक है लेकिन इस फिल्म में जो हुआ वह गलती नहीं ब्लंडर ज्यादा लगा।

एक लेखिका जो माँ भी है उसका अपने पति बच्चों जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ कर सिर्फ लेखन में लिप्त होना कई प्रश्न खड़े करता है।

लेखन इतना जरूरी था तो शादी करने घर गृहस्थी बसाने की क्या जरूरत थी? जिन बच्चों को जानते समझते पैदा किया उनकी जिम्मेदारी से बड़ा और क्या?

अब अगर नारीवादी यह कहें कि क्या घर बच्चों के काम सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है तो वे ये बताएं कि फिर नायिका पैसे कमाने की ही जिम्मेदारी उठा लेती। पति नौकरी कर रहा है उसकी माँ घर बच्चे संभाल रही है और फिर भी पत्नी दुखी है और आँसू पोंछती कोसती बच्चों को लेकर घर से निकल जाती है और नारीवादी यह कहने पर गुस्सा और दुख जताते हैं कि सास ने कहा 'ये तो मैं मर जाऊंगी तब भी लिखेगी' या आफिस से थके हारे आये पति ने कहा कि 'खाना लगाओ '। उनकी नजरों में यह स्त्री के लिए सबसे बड़ी गाली है।

नायिका को अबला बताते हुए कहानी की लेखिका और डायरेक्टर यह भूल गईं कि वह बूढ़ी औरत जो इस उम्र में अपने पोते पोती और घर को संभाल रही है वास्तव में उस पर अत्याचार हो रहा है। एक तरफ स्त्री वादी नारेबाजी करते हैं कि महिलाओं को घर गृहस्थी से रिटायर्मेंट नहीं मिलता दूसरी ओर वे खुद एक बूढ़ी स्त्री को घर गृहस्थी में झोंक रहे हैं और उसकी थकान उसकी झल्लाहट को नजरअंदाज करके उसे सास रूपी अत्याचारी साबित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उसके सामने बहू लोगों के साथ बैठकर शराब पिये लेकिन वह कुछ न बोले। 

पति को शुक्र है कि बख्श दिया वह एक सफल पत्नी के तेवरों को झेलता आम आदमी है जो माँ बच्चों को हैरान परेशान देखता है लेकिन कुछ कर नहीं पाता। 

पहले समय में जब स्त्री घर छोड़ती थी या घर से निकाली जाती थी उसके सामने आजीविका की समस्या उत्पन्न होती थी। त्रिभंग की नायिका इसका तोड़ निकालती है कि किसी अमीर आदमी से प्रेम करो उसके दिये आलीशान मकान में रहो एक फुलटाइम मेड रखो और अपना लेखन जारी रखो। जब एक से दिल भर जाये या उसका दिल भर जाये दूसरे को पकड लो। जिस नायिका के पास पति के घर आने पर उसके पास दो मिनट बैठने की उसका हालचाल पूछने की फुर्सत नहीं है उसे बाय फ्रेंड बनाने उससे प्रेम करने की फुर्सत कैसे मिल जाती है? तब भी प्रेम करने की ही फुर्सत मिलती है अपने बच्चों को जानने समझने उनसे बात करने की न वह जरूरत समझती है न कभी कोशिश करती है।

क्या लेखिकाएं इतनी असंवेदनशील होती हैं कि उन्हें अपने ही बच्चों की परेशानियाँ नहीं दिखतीं?

जिस लेखिका को पहले ही उपन्यास के लिये अकादमी पुरस्कार मिलता है वह न अपने बच्चों का व्यक्तित्व बना पाती है और न ही उनका मन पढ पाती है। उसके पात्र कैसे होंगे यह तो सोचने की जरूरत ही नहीं है।

काजोल जिसने एक ऐसी लड़की का रोल किया है जिसने बचपन में माँ बाप को अलग होते देखा है माँ की गैरजिम्मेदारी की शिकार हुई है माँ के बाय फ्रेंड के द्वारा यौन अत्याचार सहा है वह बेहद अकेली है लेकिन अकेले पन की पूर्ति बिना शादी किये लिव इन में रहते बार बार पार्टनर बदलते करती है। वह अपने को विद्रोही दिखाने के लिए धाराप्रवाह गालियाँ देती हैं और एक सफल नृत्यांगना पेज थ्री पर्सनालिटी होते हुए भी पत्रकारों को उन्हीं के मुँह पर गालियाँ देती है।

माँ के कोमा में जाने पर उसे लोकाचार निभाते हास्पिटल जाना पड़ता है। एक स्वतंत्र स्त्री गालियाँ देने वाली अपनी माँ को उसके नाम से पुकारने वाली समाज क्या कहेगा के डर से माँ को देखने जाती है उसके साथ हास्पिटल में रहती है। यह तो आम स्त्रियाँ भी करती हैं। देखा जाये तो वह फिल्म की मुख्य हीरोइन है पर्दे पर सबसे ज्यादा फुटेज उसे ही मिला है लेकिन सिवाय गालियों के कोई महत्वपूर्ण डायलॉग या चरित्रिक मजबूती वे प्रकट नहीं कर पाई हैं। पहले प्यार के साथ लिव इन में रहना जिसमें उनकी माँ उनकी मदद करती हैं उस प्रेमी से प्रेगनेंट होना उसकी मारपीट सहना फिर उसे घर से निकाल देना। माँ से नाराजगी बेटी होने के बाद फिर माँ से जुड़ाव नृत्य से जुड़ाव लेकिन फिर माँ से कब कैसे दूरी बनी इसका कोई जिक्र नहीं है। उसका घर कैसे चला बेटी को अकेले कैसे पाला ये संघर्ष तो आजकल की फिल्मों में वैसे भी नहीं होते हैं। यही माँ अपनी बेटी का रिश्ता एक पारंपरिक परिवार में करने जाती है तो वहाँ कहती है कि अगर आपको दहेज चाहिए तो मुझे एक अमीर बाय फ्रेंड पकड़ना पडे़गा क्योंकि अभी तो मेरे पास कुछ नहीं है। आश्चर्य कि ऐसी बात सुनकर भी वह पारंपरिक परिवार उनकी बेटी को अपनी बहू बना लेता है। हालाँकि शायद यही एक बात अच्छी और तसल्ली देने वाली है कि लड़की की माँ और नानी के अतीत की छाया उस लड़की के जीवन पर पड़ती नहीं दिखाई है।

फिल्म के अंतिम दृश्य में जब काजोल की बेटी अपनी सास से सिर पर पल्ला रखकर वीडियो काल पर बात करती है और उसकी माँ को सास की पूछताछ चिंता अखरती है। वह फोन लेकर खुद बात करती है। तभी वह अपनी बेटी से बात करती है और तब उसकी बेटी पहली बार अपनी माँ के सामने अपने दुख अपने अपमान बताती है जो उसे बचपन में माँ के व्यवहार के कारण मिले हैं। लब्बोलुआब यही रहा कि एक लड़की जिसे माँ की देखभाल नहीं मिली जिसके कारण वह अपनी माँ से नाराज रही वही अपनी बेटी की भावनाओं से इस कदर बेखबर है कि उसके प्रेगनेंट होने तक जान ही नहीं पाती कि बेटी कैसा महसूस कर रही है। यह माँ भी कलाकार है जो कि आम इंसानों से ज्यादा संवेदनशील माना जाता है।

अंततः सबसे युवा पीढ़ी की लड़की एक परंपरा वादी परिवार में इसलिए इतनी पाबंदियां सहती है कि उसे अपने बच्चे के लिए पिता का नाम चाहिए। वह ससुराल वालों को खुश करने के लिए भ्रूण परीक्षण तक करवाती है।

लब्बोलुआब यह है कि स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ है अपनी जिम्मेदारियों से मुँह चुराना उस पर सीनाजोरी करना शराब पीना देह की स्वतंत्रता का इस्तेमाल आर्थिक स्वतंत्रता लेने के लिए करना और बाय फ्रेंड कपड़े की तरह बदलना। जब यह भटकन पीढ़ी दर पीढ़ी चले तब फिर घूम फिर कर उसी सोलहवीं सदी में पहुँच जाना जहाँ सिर ढंकना बेटा पैदा करना जैसी चीजें स्त्री को घर से बांधे रखती हैं और उनके बच्चों को पिता का नाम दिलवा देती हैं।

अंत में एक प्रश्न जो मेरे दिमाग में कुलबुलाता रहा कि आज अच्छे-अच्छे लेखक भी अपने लेखन से चार लोगों को काफी नहीं पिला सकते वहीं फिल्म की नायिका अपने लेखन से न सिर्फ अपना उच्च स्तरीय जीवन चलाती हैं बल्कि शराब के गिलास पर गिलास खाली करती रहती हैं।

कविता वर्मा

#tribhang #kajol 

Saturday, January 16, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 8


12 नवंबर 2020 

आज सुबह से जाने की तैयारी जैसी हडबडी थी अंदर से बार बार रुलाई आ रही थी लेकिन दिमाग हर चीज हर काम को करने में भी लगा था। कई बार सबकी नजरें बचा कर मन में भरी दुख आशंका डर की बदली को बरसा कर हल्का करने की कोशिश की लेकिन ये इतने अधिक थे कि बार बार फिर भर आते थे। इन्हें बार बार खाली करने का समय कहाँ था। खाली पेट बहुत सारे टेस्ट होना था। बिटिया ने कहा वह हमें छोड़कर वापस आ जायेगी फिर खाना बना लेगी।

स्नान ध्यान करके भगवान के आगे दीपक लगा कर देर तक सलामती की कामना करती रही। सवा नौ बजे के लगभग हम मेदांता हास्पिटल पहुँचे। गेट पर हमें छोड़कर बेटी कार पार्क करने चली गई। मैंने व्हीलचेयर मँगवाई और बताया कि डॉ श्रीवास्तव के पेशेंट हैं कल बायपास होना है। उन्होंने तुरंत इमर्जेंसी डोर से उन्हें अंदर लिया और मुझे काउंटर पर एडमिशन के लिए कहा। चूंकि एक दिन पहले सभी बात हो चुकी थी मेडिकल इंश्योरेंस से क्लीयरेंस आ चुका था इसलिए वहाँ कोई ज्यादा समय नहीं लगा। कहना पडे़गा कि मेदांता का स्टाफ बहुत विनम्र और मददगार है। पूरा फार्म भी उन्होंने ही भरा मुझे सिर्फ अपना नाम पेशेंट से रिश्ता और साइन करना था। जब सब करके फाइल लेकर इमर्जेंसी रूम में पहुँची तब तक पतिदेव के टेस्ट शुरू हो चुके थे। उन्होंने हास्पिटल की ड्रेस पहन ली थी। उनके कपड़े मुझे दिये और जल्दी ही हमें रूम में शिफ्ट कर दिया। यहाँ भी कुछ जानकारी ली गईं बेटी भी आ गई थी अब सारे दिन बस टेस्ट होना थे। एक्सरे डोपलर ईको ब्लड शुगर बीपी के अलावा एनेस्थेटिस्ट की इंक्वायरी। दिन भर फोन आते रहे डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग की आवाजाही के बीच मन कभी आशा से भर जाता कभी डर और आशंका से। बीच-बीच में जब भी समय मिलता हम एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे रहते। दोनों ही डरे हुए थे और दोनों ही एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। अपने अंदर आये नकारात्मक विचारों को होठों पर आने से रोक रहे थे जो अत्यधिक दबाव से तरल होकर आँखों के रास्ते बाहर आ रहे थे।

यहाँ नर्सिंग स्टेशन मतलब इस फ्लोर का काउंटर रूम के बाहर ही था। वहाँ से नर्स डाक्टर की बहुत तेज आवाजें आ रही थीं। दोपहर में थोड़ी देर सोने की कोशिश की लेकिन दुश्चिंता और शोर ने सोने नहीं दिया। दो रातों की अधूरी नींद अब थकान पैदा कर रही थी। 

बेटी वापस घर जाये खाना बनाए इसकी इच्छा नहीं हुई। पास ही एक रेस्तरां था वहाँ जाकर हमने बारी बारी से खाना खाया। पतिदेव का खाना नाश्ता हास्पिटल कैंटीन से आ रहा था। 

हसबैंड को एक्सरे के लिए लेकर गये काफी देर हो गई वे वापस नहीं आये। बेटी देखने गई तो देखा कि वहाँ लंबी वेटिंग है और वे बाहर व्हीलचेयर पर बैठे हैं। यह देखकर वह नाराज हुई कि पहले पता करो कि रूम खाली है या नहीं। कोरोना काल में इस तरह कारीडोर में इतनी देर पेशेंट को क्यों बैठाना। फिर वह भी वहीं रुकी रही ।वापस आकर उसने पूरी बात बताई।

उसका भी तनाव लगातार बढ़ रहा था वह कुछ बोल नहीं रही थी लेकिन अंदर ही अंदर चिंतित थी। अभी तक कभी ऐसी कोई स्थिति नहीं आई थी उसके जीवन में पहली बार ऐसा तनाव आया था जिसे एक के बाद एक कामों के चक्कर में उसे निकालने का समय उसे भी नहीं मिल रहा था।

शाम को एनेस्थिसिया देने वाले सीनियर डाक्टर आये और उन्होंने लंबा इंटरव्यू लिया। खान पान की आदतें किस हाथ से काम करते हैं वगैरह वगैरह। यह सब आपरेशन की तैयारी का हिस्सा था।

शाम को बेटी को घर जाने का कह दिया।। छोटी बेटी से भी वीडियो काल पर बात हुई। वह भी अपनी चिंता और तनाव के साथ इतनी दूर अकेली थी। उसके सब्मिशन हो चुके थे इसलिए अब उसे हर पल की खबर दे रहे थे। या कहें कि उससे कह कर अपना मन हल्का कर रहे थे। वह भी हौसला बढा रही थी और बात करते करते हँस रही थी वास्तव में तो वह अपनी रुलाई रोक रही थी।

अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे आपरेशन थियेटर में जाना था। मम्मी पापा को भी सुबह जल्दी आने का कह दिया था। बेटी से भी कहा अब घर जाओ। गुरुजी ने कुछ दान का कहा था उसकी सामाग्री खरीद कर रख लो कल सुबह जल्दी दान कर आना। देर रात तक आवाजाही चलती रही। करीब दो बजे एक ब्लड टेस्ट के सैंपल लेने नर्स आई। सैंपल लेते ही पतिदेव को अचानक घबराहट शुरू हो गई। ड्यूटी डाक्टर को बुलाया उन्होंने चैक किया सब ठीक था तब तक घबराहट कम हो गई। डाक्टर को कहा कि बाहर बहुत शोर है हम एक मिनट नहीं सो पा रहे हैं। यह तीसरी रात थी जो आँखों में कट रही थी।

नर्स ने कहा कि सुबह साढ़े चार बजे उठकर नहा कर तैयार हो जाएं। अब बमुश्किल तीन घंटे बचे थे आपरेशन में। मन बुरी तरह आशंकित था पलकें भारी थीं लेकिन नींद गायब थी। जैसे तैसे आँखें बंद किये पडे रहे। बाहर अब शांति थी लेकिन मन में उथल-पुथल मची थी। चार बजे हम उठ गये फ्रेश होकर थोड़ी देर बैठे फिर नहा कर तैयार हो गये। नर्स वार्ड बाॅय आ गये पतिदेव के पूरे शरीर पर बीटाडाइन का लेप किया। बड़ी बेटी को फोन किया वह घर से निकल गई थी। छोटी को फोन किया उससे बात की। हम आपरेशन थियेटर के बाहर पहुंचे बड़ी बेटी का फोन आया कि गार्ड अंदर नहीं आने दे रहा है। उससे बात की लेकिन फिर भी उसने बेटी को अंदर नहीं आने दिया। पतिदेव को ओटी के अंदर करने के लिए डाक्टर आ गई उनसे रिक्वेस्ट की कि बस दो मिनट बेटी आ रही है उससे मिल लेने दीजिए। वे रुक गये लेकिन बेटी अभी भी नहीं आई। उसे फोन किया तो बोली मम्मी अंदर नहीं आने दे रहे हैं। वहाँ मौजूद गार्ड से कहा कि प्लीज फोन करके बोलो न। उसने फोन किया कि उसके पापा का बायपास है आने दो अंदर। पापाजी का फोन आया वे रास्ते में थे। उनसे कहा कि हम ओटी के बाहर खड़े हैं। दो तीन मिनट में बेटी दो दो सीढियाँ चढते हुए आई वह बुरी तरह हाँफ रही थी। उसने पापा को दूर से देखा। पतिदेव ने उससे कहा मम्मी का ध्यान रखना।

मम्मी पापा पहुंच नहीं पाये ओटी का दरवाजा बंद हो गया।

अचानक आई इस विपत्ति पर कैसी मनःस्थिति थी और किस तरह से उसका सामना किया इसका दस्तावेजीकरण करने की कोशिश की है। यह पूर्णतः निजी और मौलिक है। इस पर किसी तरह की आपत्ति और शंका के लिए कोई स्थान नहीं है। बस इसे पढ़कर ऐसी स्थिति का कोई धैर्य से सामना कर पाए इसलिए इसे लिखा गया है।

#बायपास #bypass #minor_attack 

Thursday, January 14, 2021

उन आठ दिनों की डायरी 7

11 नवंबर 2020

रात की भयावह परछाई सुबह के उजाले में कहीं नहीं थी लेकिन मन के किसी कोने में उसकी कालिमा अपना असर छोड़ गई थी। क्या हुआ था रात में क्या हार्ट को ब्लड आक्सीजन की सप्लाई नहीं हो रही थी? क्या वह भी कोई छोटा सा अटैक था? क्या यह कोई ईश्वरीय संकेत था जो कह रहा था कि अपने निर्णय पर विचार करो?

मुझे पाँच तारीख याद आ गई जब सुबह आफिस जाते समय हसबैंड ने सीना दबाया था। वह प्रथम ईश्वरीय संकेत था जिसे नजरअंदाज किया गया। दूसरा था जब पतिदेव आफिस में सीढ़ियों से चढ़े और हाँफने लगे थे लेकिन वे रुके नहीं और काम करते रहे। उन्होंने किसी को भी अपनी तकलीफ के बारे में नहीं बताया। अगर बताया होता तो कोई उन्हें डाक्टर के पास ले जाता उसी समय ईसीजी हो जाता तो शायद अटैक नहीं आता और हार्ट को नुकसान नहीं होता। अटैक के बिना भी एंजियोग्राफी करवा लेते।

कल रात जो हुआ वह भी ईश्वरीय संकेत था। शरीर ने अपने संकेत भेजे हैं क्या इन्हें नजरअंदाज करना ठीक होगा?

इतना बड़ा आपरेशन पूरे शरीर को खोलना उसमें से हार्ट को बाहर निकालना। आपरेशन के बाद लंबी देखभाल और जीवन चक्र में इतने आकस्मिक बदलाव। अब न वह बेफिक्री रहेगी न स्वतंत्रता कि कभी भी कहीं भी घूमने फिरने चल दो कितनी भी गाड़ी चलाओ जहाँ जो मिले खाओ पियो। सोच सोच कर रोना आ रहा था लेकिन रो नहीं सकती थी। यह समय कमजोर पड़ने का नहीं है। 

थोड़ी देर पतिदेव से बातचीत की क्या हो रहा था कैसा लग रहा था? क्या करें आपरेशन की डेट ले लें क्या? अभी तीन चार दिन डाक्टर यहाँ हैं फिर वे बाहर चले जाएंगे। एक और डाक्टर का ओपिनियन लेने का विचार था लेकिन वह जिस हास्पिटल में आपरेशन करते हैं उसकी अच्छी रिपोर्ट नहीं थी इसलिए मन आगे पीछे हो रहा था।

लगभग ग्यारह बजे मैंने मम्मी पापा जी को फोन किया रात में क्या हुआ और आगे क्या करें का विचार करना है तो आप लोग आ जाओ। उन्हें बताते बताते रोना आ गया। आज सुबह बिटिया भी पूना से इंदौर आने के लिए निकली थी। वह अपनी गाड़ी से आ रही थी। उससे भी सतत संपर्क बना हुआ था लेकिन उसे अभी तक कुछ नहीं बताया था।

मैं खाना बनाने की तैयारी में जुट गई। पतिदेव ने तब तक मेडीकल क्लेम के लिए एजेंट को फोन किया। उसने हास्पिटल में डाक्टर के असिस्टेंट को फोन किया और जो भी जरूरी पेपर्स लगने थे उनकी स्कैन कापी उसे भेजीं। खाना बनने खाने तक लगभग तय हो गया कि अगले दिन ही हास्पिटल में एडमिट होना है ताकि उसके अगले दिन यानि कि रूपचौदस के दिन बायपास सर्जरी हो सके।

अभी दिन उगे बमुश्किल पांच घंटे हुए थे हमें उठे शायद चार घंटे ही हुए थे। एक रात पहले सोच कर सोये थे कि आपरेशन दस पंद्रह दिन बाद करवाएंगे। रात में विचार डगमगाया। सुबह सब ठीक था और मात्र तीन चार घंटे में बायपास करवाना है यह लगभग तय हो गया था।

दो बजे तक मम्मी पापा जी आ गये ।उन्हें भी बताया कि अब और ओपिनियन के लिए रुकने का समय नहीं है। वैसे भी एंजियोग्राफी करने वाले डाक्टर ने भाभी ने उनकी बहन जो हार्ट सर्जन हैं उन्होंने और कल डाक्टर श्रीवास्तव ने बायपास के लिए ही कहा है तो अब करवा लेना ही बेहतर है।

दरअसल कुछ दिन रुकने का एक कारण यह भी था कि भाई तीन साल बाद नाइजीरिया से वापस आया था और हम चाह रहे थे कि वह अपने परिवार के साथ दीपावली मना ले। आपरेशन के कारण वह परिवार के पास नहीं जा पाता जो दूसरे शहर में रहता है। लेकिन अब परिस्थितियां ऐसी बन गई थीं कि रुकना संभव नहीं था। रात बड़ी भयावह थी जिस तरह की असहायता महसूस की थी और जिस गंभीर स्थिति की आशंका अब बन गई थी उसके बाद तुरंत बायपास ही उचित था।

पापाजी ने भी कहा कि दीपावली तो हर साल आएंगी। भाई से बात की तो वह भी बोला मेरे और दीपावली के लिए मत रुको जो जरूरी है वह करो। भाभी से बात हुई उन्होंने भी कहा कि नहीं स्थिति ठीक नहीं है देर मत करो।

शाम को बिटिया के आने का समय होने को था मैं खाने की तैयारी में लग गई। दिन भर के लंबे सफर के बाद वह थकी होगी। अगले दिन सुबह हास्पिटल जाने की तैयारी भी करना था।

पाँच बजे बिटिया आ गई ।वह नाना-नानी को देखकर चौंकी। हालचाल पूछने के बाद उसे बताया कि कल पापा को एडमिट होना है परसों बायपास है।

चौंक गई वह भी सब कुछ अचानक लेकिन जल्दी ही संभल गई ठीक है क्या तैयारी करना है बताओ।

छोटी बेटी को भी फोन करके बताया कि पापा का आपरेशन करने का डिसाइड किया है और कल एडमिट हो जाएंगे। थोड़ी देर में उसने अपने दोस्तों से और गूगल पर आपरेशन के बारे में पता किया और हमें हौसला देने लगी कि सब ठीक होगा। वह बड़ी कुशलता से अपने डर और तनाव को छुपा रही थी। 

खाना खाते नौ बज गये। सुबह की तैयारी करके रख दीं थोड़ी देर टीवी देखा आज का दिन भी बेहद लंबा और व्यस्त रहा।  रात में थोड़ी देर पतिदेव के पास बैठी। मन का डर जुबान पर आ ही गया। तुम ठीक हो जाओगे न? बस जो भी हो ठीक हो जाना कहते कहते रोना आ ही गया।

हम दोनों देर तक एक दूसरे का हाथ थामे बैठे रहे।

रात बारह बजे अचानक नींद खुल गई। एक रात पहले का वह पल ही था जिसने जगा दिया। करीब एक घंटे तक पतिदेव के चेहरे को देखती रही। उनकी साँसों की गति माथे का ताप सभी नार्मल था कि अचानक उनकी नींद खुल गई। फिर वही दर्द वही बैचेनी। मैंने उठकर गर्म पानी दिया। वे टायलेट गये लेकिन बैचेनी दूर नहीं हुई। मन हुआ सुबह का इंतजार क्यों अभी हास्पिटल चलें। वे कभी लेटते कभी बैठते कभी गर्म पानी पीते कभी डकार लेने की कोशिश करते। मैं कभी उनकी पीठ पर हाथ फेरती कभी हाथ थामे बैठती भगवान का स्मरण लगातार करती रही हे ईश्वर रात ठीक से गुजर जाये।

ईश्वर ने सुन ही लिया। दिन भर की थकी हारी बिटिया को नींद से नहीं जगाना पड़ा। थोड़ी देर में पतिदेव सो गये मैं देर तक जागती रही।

#बायपास #bypass #minor_attack 

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 अभी कुछ दिनों में दो कहानियाँ पढीं जिनके बारे में कहने से खुद को रोक नहीं पा रही। इत्तेफाक से दोनों कहानियाँ सोनल की हैं। सोनल की लेखनी से ...