Saturday, December 26, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 4

 उन आठ दिनों की डायरी 4

7 नवंबर 2020

सुबह जल्दी उठकर हास्पिटल पहुँची कुछ देर बाहर हाॅल में बैठी रही। गार्ड को बता दिया था कि मुझे मिलना है हसबैंड से और जानना है कि उनकी तबियत कैसी है? उसने कहा थोड़ी देर में बुलाते हैं। थोड़ी देर करते करते लगभग डेढ़ घंटा बीत गया अब धैर्य जवाब देने लगा। मैं फिर अंदर गई गार्ड नहीं था तो अंदर चली गई। नर्सिंग स्टेशन और वार्ड के बीच में खड़ी थी कि कोई दिख जाये तो उससे पूछ कर हसबैंड को देख आऊं। तभी वहाँ ड्यूटी डाक्टर आया और बिना कोई बात सुने चिल्लाने लगा। मैडम आप कल भी आईं थीं आपको बार बार अंदर नहीं आना है आप क्यों बार बार अंदर आ रही हैं?

बार बार कहाँ आ रही हूँ कल मुझे हसबैंड ने बुलवाया था रिपोर्ट लेने उसके पहले उन्हें खाना खिलाने आई थी क्योंकि पैर से एंजियोग्राफी करने के कारण वे उठ कर बैठ नहीं सकते थे। जो रिपोर्ट आपको मुझे उपलब्ध करवाना था वह आपने नहीं करवाई इसलिये मुझे आना पड़ा। लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था और लगातार चिल्लाता रहा फिर आखिर में बोला आपके हसबैंड ठीक हैं।

बिना बात की चिल्ला चोट से मैं आहत हुई। अपने पेशेंट का हालचाल जानना हर अटेंडेंट का अधिकार है और उसके लिये भेड़ बकरी जैसे हकाला जाये यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। मैंने कहा कि आपने जो आखरी लाइन बोली वह सबसे पहले ठीक से बोल देते तो मैं चली जाती। बस यही तो जानना था मुझे कि मेरे हसबैंड कैसे हैं?

यह सुनकर उसका पारा फिर चढ़ गया और वह कहने लगा आपको अपने हसबैंड को यहाँ रखना है तो रखिये नहीं तो कहीं और ले जाइये।

अब यह बात असहनीय थी। मैंने कहा माइंड योर लैंग्वेज। वह फिर चिल्लाने लगा तब तक मैंने कहा ये कहने का अधिकार आपको तो क्या किसी को नहीं है यू जस्ट माइंड योर लैंग्वेज। तब तक और डाक्टर नर्स आ गये उन्होंने उसे शांत किया और अंदर ले गये। जाते जाते उसने डाक्टर मनोज बंसल को फोन लगाया जो हसबैंड का इलाज कर रहे थे। मैंने कहा जिसे फोन लगाना है लगाओ लेकिन अपनी हद में रहना मैं यहाँ इलाज करवा रही हूँ खैरात नहीं ले रही। मैं बाहर आ गई तभी डाक्टर बंसल का फोन आया क्या हुआ मैम?

मैंने कहा समझा लेना आपके ड्यूटी डाक्टर को तमीज से बात करे। ये मत समझना कि मैं हेल्पलेस हूँ। इलाज करवाना है तो करवाओ या ले जाओ अपने पेशेंट को यह कहने का अधिकार हास्पिटल के मालिक को भी नहीं है। हास्पिटल मेडिकल काउंसिल के नियमों से बंधा है मैं छोडूंगी नहीं उसे ।

मैंने उन्हें पूरी बात बताई कि कब कब और क्यों मैं अंदर गई थी और यह भी कि अगर मुझे टाइम टू टाइम मेरे पेशेंट की प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं मिलेगी तो मैं अंदर जाऊंगी रिपोर्ट लेने। मुझे ये रिपोर्ट सेकेंड ओपिनियन के लिए भेजना है और ये मुझे तुरंत चाहिए ये मेरा अधिकार है।

डाक्टर को भी शायद समझ आ गया कि मैं आसानी से हकाले जाने वाले लोगों में नहीं हूँ और इसलिए वह समझाने लगे जाने दीजिये मैम हो जाता है वगैरह वगैरह। इसके बाद डाक्टर ने हसबैंड के कलीग को फोन लगाकर सभी बातें बताई वे डॉक्टर के पूर्व परिचित थे। उनका फोन आया जो मुख्यतः मुझे शांत करने के लिए था कि कहीं मैं शिकायत न कर दूँ। मैंने कहा मैं किसी का बुरा नहीं करना चाहती लेकिन मैं कमजोर नहीं हूँ और रही बात शिकायत की तो मेरे हसबैंड की केयर में कोई कोताही हुई तो मैं नौकरी नहीं कैरियर भी खत्म कर दूंगी यह आप समझा देना।

मन बेहद क्षुब्ध था थोड़ी ही देर में भाई आ गया। मैंने उसे कुछ नहीं बताया क्योंकि अगर उसे पता चलता कि मेरे साथ इस तरह बात की गई है तो वह कोहराम मचा देता।

थोड़ी देर बाद मुझे अंदर बुलाया गया। हसबैंड को शायद कुछ पता न था उन्होंने कोई बात नहीं की और न ही मैंने। यह समय उनको टेंशन देने का नहीं था।

बाहर आकर बैठी तब देखा एक बेहद बुजुर्ग महिला बदहवास सी बैठी हैं। आसपास बैठे लोग उनके फोन से नंबर लेकर उनके रिश्तेदारों को फोन कर रहे थे। उनका मेडिक्लेम था या नहीं यह भी उन्हें नहीं पता था। उनका पोता दिल्ली में था उसे खबर की गई वह आने वाला था। उन्हें दवाइयों की लिस्ट दी गई जिसे किसी और पेशेंट के परिजन लेकर आये उन्होंने उन्हें पैसे दिये। पता चला कि सुबह सुबह उनके हसबैंड को खून की उल्टी हुई है और वे पडोसियों की मदद से उन्हें यहाँ लाईं हैं।

बोली भाषा से वे बिहार की लगीं मैंने पूछा कि यहाँ आप और आपके हसबैंड अकेले रहते हैं? बच्चे वगैरह कहीं बाहर हैं।

कहने लगीं कि बेटा तो यहीं है पोता अभी दिल्ली से आ रहा है। मैंने पिछले दो घंटे में उनके बेटे को नहीं देखा था और इसके बाद कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। ऊफ इतना अकेलापन झेलते वे किस ह्दय से यहाँ बैठी हैं उन्हें कुरेदना ठीक नहीं है। मैंने बात बदलते हुए कहा कि आपने खाना खा लिया।

खाना तो पडोसी लेकर आये थे लेकिन अंदर ही नहीं लाने दिया। यहाँ कैंटीन है वहाँ जाकर खा लूँगी।

दो बज रहे हैं कब खाएंगी पहले खाना खा लीजिये।

हाँ पोता आ जाये न फिर खाऊंगी ।

कब तक आयेगा?

चार बजे उसकी फ्लाइट है दिल्ली से।

अरे तब तो उसे पांच साढ़े पांच बज जाएंगे आने में। मैं खाना खाने जा रही हूँ कैंटीन आप चल रही हैं? मैं समझ गई थी कि अकेले जाने की घबराहट है कि इतने बड़े हास्पिटल में कहीं खो न जाऊँ।

वे तुरंत तैयार हो गईं। मुझे अंदर से एक फाइल दी गई थी कि सीएमओ से रूम अलाॅट करवा लूं मैंने वह पर्स में रखी कि लौटते में वह काम भी करवा लूंगी।

लिफ्ट तक पहुंचे कि हसबैंड दूसरे दरवाजे से लिफ्ट के सामने लाये गये। वे व्हीलचेयर पर थे। कहां तो सुबह मिलने के लिए इतनी हील हुज्जत हुई और अब वे यहाँ पब्लिक प्लेस में व्हीलचेयर पर बैठे हैं और लिफ्ट से ईको के लिए ले जाये जा रहे हैं जिसमें सभी रोगी और अटेंडेंट ले जाये जाते हैं। अब ये लूप होल बता दिये जाएं तो फिर कोई तिलमिला जायेगा इसलिए बस दो मिनट हैलो हाय करके हम नीचे कैंटीन में चले गये। 

कैंटीन में आंटी जी के लिए बिना प्याज लहसुन की पेशेंट वाली थाली ली उन्होंने तुरंत पर्स खोला पैसे मैं दूंगी। मैंने पैसे लेकर उनकी स्लिप कटवाई हमने खाना खाया और उन्हें लिफ्ट में छोड़ा और मैं सीएमओ आफिस चली गई।

सीएमओ ने कहा कि अभी कोई रूम खाली नहीं है। सेमी प्रायवेट भी नहीं है।

जनरल। आप फर्स्ट क्लास वाले हैं जनरल आपको जमेगा नहीं कहते हुए उन्होंने फाइल रख ली जैसे ही रूम खाली होगा मैं अलाॅट कर दूंगा।

मेडीकल इंश्योरेंस कंपनी से फोन आया कि आप एक लेटर दें कि पेशेंट का पहले कहीं इलाज नहीं हुआ है?

अरे ये क्या शर्त है क्या एक बार ही बीमार पड़ सकता है कोई? लेकिन एक बार इंश्योरेंस के चक्कर में पड़ गये तो आप चकरघिन्नी से घुमाए जाते हैं। मैंने लेटर लिख कर रखा था भाई उसे लेकर गया।

हसबैंड के कलीग का फिर फोन आया कि डाक्टर आपसे बात करना चाह रहे हैं लेकिन डर रहे हैं भाभीजी थोड़ा आराम से बात करियेगा।

मैंने कहा कि अगर वे आराम से बात करेंगे तो मैं भी करूँगी लेकिन गलत बात बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे कोई सींग नहीं उगे हैं इसलिए उन्हें डरने की जरूरत नहीं है।

डाक्टर ने कहा कि मैडम आप चाहें तो वर्मा जी को आज ही डिस्चार्ज कर देते हैं क्योंकि संडे को डिस्चार्ज हो नहीं पाएंगे फिर मंडे को डिस्चार्ज करेंगे। अभी कोई रूम खाली नहीं है जब रूम मिलेगा तब शिफ्ट कर देंगे।

आज कैसे डिस्चार्ज करेंगे? अभी तो अटैक आये अडतालीस घंटे हुए हैं 72 घंटे आब्जर्वेशन में रखना पड़ता है न।

जी रखना तो चाहिए लेकिन रूम खाली नहीं है।

रूम नहीं है तो आईसीयू में रखिये लेकिन अभी मैं डिस्चार्ज नहीं करवाऊंगी। हद है यह तो मैंने मन में सोचा। वह तो अच्छा था कि भाभी से सुबह शाम बात हो रही थी और उसने अभी डिस्चार्ज करवाने से मना किया था नहीं तो ये लोग तो किसी भी पेशेंट को कभी भी डिस्चार्ज कर देंगे। गुस्सा तो आ रहा था लेकिन मैंने दबा लिया और यही कहा कि 72 घंटे के पहले डिस्चार्ज नहीं करवाऊंगी जब रूम मिले आप शिफ्ट करिये।

शाम को फिर दवाई मंगवाई गई जिसे अंदर पहुंचाया इसके साथ ही ईको की रिपोर्ट भी ली जिसमें पता चला कि हार्ट का एक लोब 30%डैमेज हुआ है अटैक से। रिपोर्ट भी भाभी को पहुँचा दी।

वहीं एक परिवार बैठा था उनके घर के बुजुर्ग लगभग हफ्ते भर से एडमिट थे। हालाँकि डाक्टर ने अभी डिस्चार्ज के बारे में स्पष्ट नहीं बताया था लेकिन वे डिस्चार्ज के बाद घर की व्यवस्थाओं के बारे में सोच रहे थे और पूर्व तैयारी के लिए सबको फोन लगा रहे थे। उन्होंने दिन-रात देखभाल के लिए मेल नर्स के लिए किसी को फोन किया और उसकी तनख्वाह और दूसरे खर्च की बात करने लगे जो लाख रुपये महीने से भी अधिक हो रहे थे। मैंने अपनी एक सखी के लिए कुछ दिन पहले ही मेल नर्स की खोज के लिए एक समूह में लिखा था और मेरे पास कुछ नंबर थे। उनका फोन बंद होने के बाद मैंने उन्हें वे सभी नंबर दिये साथ ही मेडिकल इक्विपमेंट जैसे पलंग वाकर व्हीलचेयर किराये पर मिलने वाली संस्था के बारे में उन्हें बताया। इस बीच वह महिला मोबाइल पर अरदास लगा कर कहीं बाहर चली गई। उसके शोर में बात करना मुश्किल था। मैंने गार्ड से कहा भैया इसे कम कर दो और उसने आकर उसे बंद कर दिया।

थोड़ी ही देर में आपसी बातचीत से खुशनुमा माहौल बन गया था। आंटी का पोता आ गया था। आंटी को ब्लड का इंतजाम करने को कहा था। मैंने पूछा कि अगर आपके पास कोई डोनर हो तो फोन करके बुलवा लें नहीं तो मैं किसी ग्रुप पर डालकर डोनर बुलवा लेती हूँ ।उनके पोते को भी कहा कि आप बेसमेंट में ब्लड बैंक में जाकर पता कर लीजिये कि ब्लड की उपलब्धता कैसी है?

शाम को एक बार मैं घर गई लाइट जलाईं पड़ोसियों को अभी तक कुछ नहीं पता था उन्हें घर का ख्याल रखने का कहा। रूम मिलने पर जरूरी कपड़े आदी रखे और बैग तैयार करके गाड़ी में रख दिया और वापस हास्पिटल आ गई ।

अंधेरा हो गया था मैं एक और बार सीएमओ के पास हो आई थी लेकिन कोई रूम खाली नहीं था। करीब नौ बजे मैंने पूछा कि कोई दवा तो नहीं मँगवाना है फिर मैं घर जा रही हूँ। वही गोलमाल जवाब मिला जरूरत होगी तो मँगवा लेंगे। मैंने कहा मैं घर जा रही हूँ।

गार्ड ने अंदर जाकर पता किया फिर मैं घर आ गई।

घर के कुछ जरूरी काम किये कपड़े बदले खाना खाया और दिन भर की थकान के साथ सुबह की बहस को दिमाग से निकालने के लिए मैंने टीवी चालू किया। लगभग सवा ग्यारह बज रहे थे कि अचानक मोबाइल बजा। मैं चौंक गई इतनी रात में किसका फोन है?

हास्पिटल से नर्स का फोन था कि मैम एक रूम अभी खाली हुआ है और सर को वहाँ शिफ्ट करना है।

इतनी रात में!! चौंक गई मैं ।यह कौन सा समय होता है रूम खाली करने का और पेशेंट को शिफ्ट करने का? आप कल सुबह शिफ्ट कर देना अभी तो मैं घर आ गई हूँ और उन्हें अकेले तो रूम में भेज नहीं सकते।

मैम कल तक रूम रहेगा या नहीं क्या पता। अगर आपको रूम चाहिए तो अभी शिफ्ट करना होगा। सर कह रहे हैं कि शिफ्ट कर दें वे अकेले रह जायेंगे आप सुबह आ जाना।

अरे ऐसे कैसे आप एक हार्ट पेशेंट को रूम में अकेले शिफ्ट कर देंगी? अभी आप रुकिये मैं पंद्रह मिनट में पहुंच रही हूँ और तब तक आप सर को अकेले नहीं छोड़ेंगी।

मैं जल्दी से तैयार हुई सामान गाड़ी में ही था दरवाजा लगाया गाड़ी स्टार्ट की और सूनी अंधेरी सड़क पर चल पड़ी। मैं तो मात्र पंद्रह मिनट दूरी पर थी लेकिन जो लोग दूर या दूसरे शहर में रहते हैं उनके लिये ऐसी स्थिति कितनी विकट होगी। ज्यों-ज्यों घटनाएँ घट रही थीं बाम्बे हास्पिटल के बड़े नाम के छोटे पन के दर्शन होते जा रहे थे।

आईसीयू में डिस्चार्ज की प्रक्रिया चल रही थी मैंने और पंद्रह मिनट इंतजार किया। अधिकांश लोग सो चुके थे। दो लोग उनकी नींद की परवाह किये बिना जोर जोर से बातें कर रहे थे। इच्छा तो हुई कि टोक दूँ लेकिन चुप ही रही।

पंद्रह बीस मिनट बाद हसबैंड बाहर आये हम बारहवीं मंजिल पर प्रायवेट रूम में पहुंचे। वहाँ फिर बीपी शुगर टेस्ट हुआ और सभी प्रक्रिया पूरी होते सोते सोते साढ़े बारह बज गये।

कविता वर्मा

#बायपास #minor_attack #bypass 

Saturday, December 19, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 3

 उन आठ दिनों की डायरी 3

6 नवंबर 2020

सुबह जल्दी ही आँख खुल गई उठते ही पहला विचार आया हास्पिटल। जल्दी से तैयार हुई आज एंजियोग्राफी होना है पता नहीं क्या निकलेगा बस सब ठीक हो कोई बड़ी बात न हो। होना तो नहीं चाहिये अभी चार दिन पहले तक तो खेलते रहे टूर पर गये अचानक इतनी बड़ी कोई बात तो नहीं हो सकती। शायद ज्यादा भागदौड़ के कारण एक झटका सा लगा था। उम्मीद है कि सब ठीक हो।

हास्पिटल पहुँची तभी पापाजी का फोन आ गया वे लोग भी बस पहुंचने वाले थे। आईसीयू में जाकर मिलकर आई सब ठीक था। पतिदेव ने बच्चों के बारे में पूछा मैंने कहा बड़ी बिटिया को बता दिया है छोटी का सब्मिशन है दो दिन बाद इसलिए अभी उसे नहीं बताया है।

फैमिली ग्रुप पर कोई डाल देगा तो वो परेशान हो जायेगी।

कोई नहीं डालेगा सबको मना कर दिया है।

उनसे बात करते हुए मेरी नजर लगातार मानिटर पर थी। बेटियों की बात करते मानिटर जरा सा कांप जाता। इंश्योरेंस एजेंट को फोन कर देना इस नाम से नंबर है आफिस में बात हुई क्या।

तमाम चिंताएँ आईसीयू में भी पीछा नहीं छोड रही थीं या कहें कि वो खुद इन चिंताओं को नहीं छोड़ पा रहे थे। सब हो गया सबको बता दिया। मैं सबके फोन अटैंड कर रही हूँ अब तुम किसी बात के बारे में मत सोचो।

डाक्टर को आने में समय था गार्ड ने बताया कि ग्यारह बजे तक आएंगे। बाहर आई तब तक मम्मी पापा और भाई आ चुके थे। एक दिन पहले की ईसीजी रिपोर्ट की फोटो लेकर भाभी को भिजवाई उनकी बहन हार्ट सर्जन हैं। दवाइयों के नाम पहले ही भेज चुकी थी। सब कुछ अच्छा होते हुए भी मन कांपता है किसी अपने को अनजान हाथों में सौंप कर। आजकल इतनी बातें सुनने को मिलती हैं कि अगर किसी अपने का ओपिनियन मिल सके तो उसे लेना आवश्यक हो जाता है।

देर तक इंतजार के बाद डाक्टर आये एंजियोग्राफी के लिए ले जाने से पहले पतिदेव को सभी से मिलवाया अब बाहर बैठ कर बस इंतजार करना था। यदि स्टेंट लगाना है तो तुरंत फैसला करना होगा और ऐसे फैसलों में परिवार के लोगों का साथ होना आवश्यक होता है। करीब आधे घंटे बाद ही अंदर बुलाया गया। दिल की धड़कनें बेकाबू थीं सब ठीक हो कोई बड़ी बात न हो की प्रार्थना मन में चल रही थी।

डाक्टर ने कंप्यूटर के पास बुलाया और बताया कि ये देखिये तीनों आर्टरी सिकुड़ गई हैं। बायपास ही एक आप्शन है। मैं अगर चाहता तो दो आर्टरी में स्टेंट डालने का कह सकता था लेकिन उनकी लाइफ कम होती है और मैं बायपास नहीं करता लेकिन फिर भी आपको सलाह दूंगा कि आप बायपास ही करवाएं वही बेस्ट है। बायपास आप कहीं से भी करवा सकते हैं यहाँ बाम्बे हास्पिटल में सीएचएल या मेदांता में कहीं भी। पतिदेव को फिर आईसीयू में ले जा चुके थे और हम सभी हतप्रभ से खड़े थे। कल तक भागदौड़ करते व्यक्ति की तीनों आर्टरी सिकुड़ी हुई हैं जिनमें से एक तो नब्बे प्रतिशत तक बंद है तो अब तक वो इतनी भागदौड़ कर कैसे रहे थे?

हम लोग बाहर आकर बैठ गये किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एंजियोग्राफी की सीडी ले लो वो भाभी को भिजवाते हैं। उसके बाद देखते हैं क्या करना है।

सुबह से नाश्ता भी नहीं किया था सिर फट रहा था लेकिन खाने की इच्छा मर गई थी। एकदम बायपास मतलब जीवन सिर के बल औंधा हो जाना। ढेर सारे बंधन ये करो ये न करो क्या ऐसा जीवन जी सकते हैं? कभी सोचा नहीं इस बारे में। छह साल पहले जब मुझे स्लिप डिस्क हुआ था तब डाक्टर ने कहा था कुछ समय गाड़ी मत चलाना और मैंने डरते हुए पूछा था गाड़ी चला तो पाऊंगी न मैं।

पतिदेव ने तो कभी किसी चीज को न कहा ही नहीं। खैर अभी यह सब सोचने का समय नहीं है अभी तो सेहत और खास कर दिल की सेहत देखना है और बायपास जैसा फैसला लेना है।

दोपहर बाद हमें सीडी मिल गई। शाम को मम्मी पापा को भी घर भेज दिया वे भी दिन भर में थक गये थे। भाई साथ ही था। आफिस वालों के फोन लगातार आ रहे थे बिटिया की चिंता बनी हुई थी।

आसपास बहुत सारे लोगों की हलचल थी। एक परिवार अपने घर के बुजुर्ग को लेकर आया था तो एक महिला अपनी बेटी को लेकर आई थी जिसका टायफाइड बिगड़ गया था। वह एक महीने से वहाँ थी। 

देर शाम पतिदेव ने अंदर बुलवाया। एंजियोग्राफी की रिपोर्ट की फोटो ली और उनसे कुछ देर बात करके मैं घर चली गई।

कविता वर्मा

#बायपास #bypass #angiography 

Saturday, December 12, 2020

उन आठ दिनों की डायरी 2

 वेटिंग हाॅल में बैठ कर अपने आसपास नजर डाली कहीं अकेले दुकेले तो कहीं समूह में बीमारों के परिजन बैठे थे। किसी के पास एक बैग झोला या लिपटा हुआ बिस्तर रखा था। दौड़ दौड़ कर इतनी थक गई थी कि आईसीयू में किसी नर्स को वाटर कूलर से पानी भरते देख उसकी बाॅटल मांग कर पानी पी लिया था ।आसपास देखते बैग में से पतिदेव का मोबाइल निकाला। जिस मोबाइल को वो कभी हाथ नहीं लगाने देते थे आज मय पासवर्ड के मेरे पास था। मोबाइल देते समय उन्होंने बाॅस को फोन लगाने का कहा था तो दवाइयाँ का इंतजार करते उनके बाॅस को भी फोन करके बता दिया था कि वे हास्पिटल में हैं। छोटी बेटी अभी सवा महीने पहले ही अमेरिका गई है और अभी रविवार को उसका सबमिशन है अभी उसे नहीं बताया जा सकता है नहीं तो वह घबरा जायेगी। अभी तक उसके ए ग्रेड हैं ग्रेड खराब हो जाएंगे। तुरंत बेटी को मैसेज किया कि उसे न बताया जाये। तभी पापाजी का फोन आ गया उन्हें भी बताया कि अभी छोटी बेटी को नहीं बताया इसलिए ग्रुप पर न डालें।

एक महिला ने मोबाइल पर गुरुग्रंथ साहिब का पाठ लगा दिया था और वह खुद भी पाठ कर रही थीं। हालाँकि आवाज तेज थी लेकिन इस समय जब सभी असहाय थे ऊपर वाले का ही सहारा था इसलिए उनकी इस आस्था पर आस्था हो आई।

मैं अभी भी विश्वास नहीं कर पा रही थी कि क्या हुआ है और जो हुआ है क्या वह सच है? एक नवंबर को हम चार पांच फैमिली आउटिंग पर गये थे जहाँ पतिदेव ने लगभग डेढ़ घंटे बैडमिंटन खेला था उन्हें आज अचानक अटैक कैसे आ सकता है? तो क्या सुबह जो सीने को दबाते देखा था वह इसी अटैक का पूर्व संकेत था? क्या उस समय रोक लेती और वे थोड़ा आराम कर लेते तो यह अटैक नहीं आता? लेकिन बिना अटैक के हार्ट के अंदर कोई दिक्कत है कैसे पता चलता? तो क्या ये माइनर अटैक चेतावनी देने के लिए आया है? कल एंजियोग्राफी होगी तब पता चलेगा कि वास्तव में क्या हुआ है? हे ईश्वर सब ठीक हो कोई बड़ा नुकसान न हुआ हो।

इन्हीं सब विचारों के बीच कुछ और फोन किये और फिर याद आया कि घर में सभी लाइट बंद हैं। रात में यहाँ रुकने के लिए कुछ कपड़े चादर लाना होगा। मैं एक बार फिर अंदर आईसीयू में गई और सिस्टर से पूछा कि अभी कोई मेडिसिन तो नहीं चाहिये मैं थोड़ी देर में घर होकर आती हूँ।

घर आकर लाइट जलाई भगवान के आगे दीपक लगा कर हाथ जोड़कर देर तक खड़ी रही। क्या मांगूं क्या नहीं जो हुआ उसके लिए शिकायत करूँ या जो हो सकता था और होते-होते रह गया उसके लिए धन्यवाद दूँ । जब कुछ समझ न आये तब मौन समर्पण ही वह सब कह सकता है जो कहना चाहिए।

फोन चार्जिंग पर लगाने के लिए निकाला तो उसमें कई मिस काॅल थे। पतिदेव के आफिस में खबर फैल गई थी और जिसने भी सुना वही हक्का बक्का था कि ऐसा कैसे हो सकता है? सिर्फ मैंने ही नहीं किसी ने भी उन्हें कभी सुस्त थका हुआ या आराम करने के मूड में नहीं देखा था। एक अनजान नंबर से फोन आया आप वर्मा जी के यहाँ से बोल रही हैं? मैं उनका डाक्टर हूँ आपसे मुलाकात हुई नहीं थी तो सोचा आपसे बात कर लूँ ।क्या करते हैं वर्मा जी कहाँ पोस्टिंग है जैसे सवालों के बाद उन्होंने कहा कि आप तो रात में आराम से घर पर सोइये यहाँ हम लोग हैं देखभाल करने के लिए। वहाँ हाॅल में जमीन पर आप परेशान हो जाएंगी। कल सुबह हम एंजियोग्राफी करेंगे तब आप वहाँ रहें और जैसी भी स्थिति होगी उसके अनुसार तुरंत निर्णय लेना होगा कि एंजियोप्लास्टी करना है या नहीं। बात तो सही थी आगे क्या स्थिति बनने वाली है कौन जानता है? अभी दस पंद्रह दिन पहले ही फ्रोजन शोल्डर के लिए इंजेक्शन लगवाया है ऐसे में सारी रात बैठे बैठे सोना या जमीन पर लेटना!! और किसी नई मुसीबत के लिए अभी समय नहीं है। अभी तो मैं लाइट्स जलाने आई हूँ एक बार हास्पिटल जाकर इन्हें बता दूँ तब देखती हूँ।

मैंने खाना खाया और एक बैग में दो तीन चादर रखे कि कहीं रुकना हुआ तो वापस न आना पडे।

एक बार फिर आईसीयू में जाकर पतिदेव से मिली। अब तक हुए तीन चार ईसीजी की रिपोर्ट वहाँ रखी थीं जिसकी फोटो ली ताकि भाभी जो डाक्टर हैं उन्हें भिजवा सकूँ। उन्हें बताया कि रात को घर चली जाऊंगी। नर्स से पूछा कोई दवाई लाना है तो बता दें या फिर खुद मँगवा लें इंश्योरेंस है इसलिए पैसे नहीं देना है। गार्ड के पास अपना फोन नंबर लिखवाया और घर आ गई।

पतिदेव की गाड़ी में सुबह का खाना रखा था जो उन्होंने नहीं खाया था उसी में से खाना खाया और यही ख्याल आता रहा कि उन्होंने आज सुबह से कुछ नहीं खाया है।

रात में बेटी से बात की कुछ उसे समझाया कुछ खुद का मन हल्का किया और सो गई अगले दिन फिर एक अनजान स्थिति का सामना करने के लिए खुद को तैयार करते।

कविता वर्मा

#बायपास #bypass #minor_attack 

Friday, December 11, 2020

उन आठ दिनों की डायरी

5 नवंबर 2020

कुछ विशेष न था इस दिन में रोज की तरह ही सूरज निकला था रोज की तरह सुबह के काम किये थे और रोज की तरह ही पतिदेव की आफिस जाने की तैयारी भी हुई थी। हाँ इतना जरूर था कि उन्होंने कहा खाना खाकर नहीं जाऊँगा टिफिन में रख दो। मैंने पूछा क्यों तो कहने लगे कि भूख नहीं है पेट भरा भरा सा लग रहा है। मैंने भी सोचा ठीक ही है जब भूख लगे तब खाना चाहिए फिर खाना साथ रहेगा तो कहीं भी गाड़ी रोककर खा सकते हैं।

दूध दे दूँ मैंने पूछा तो उसके लिए भी मना कर दिया केले खा लो।

साथ में रख दो मैं बाद में खा लूँगा। मैंने भी जिद नहीं की रात में खाना खाने के बाद तुरंत सो गये थे शायद इसीलिए पेट साफ नहीं हुआ है।

आफिस के लिए निकलते समय उन्होंने एक बार सीने को दबाया मैंने पूछा क्या हुआ सीना दुख रहा है क्या? चिरपरिचित जवाब मिला नहीं कुछ नहीं और बात आई गई हो गई।

बहुत दिनों से एक लेख लिखने का सोच रही थी पतिदेव के जाने के बाद वहीं सोफे पर बैठ गई और लेख लिख डाला। जब खत्म किया तब तक सवा डेढ़ घंटे बीत गये थे। कितनी देर हो गई ये मुआ मोबाइल भी बहुत समय खाता है अब एक घंटे इसे हाथ नहीं लगाऊँगी सोचते हुए मोबाइल वहीं सोफे पर पटका और अपने काम निपटाने लगी।

खाना खाते हुए वेबसीरीज के एक दो एपिसोड देखने की आदत सी लग गई है तो मैं प्लेट लेकर टीवी के सामने जम गई इस तसल्ली के साथ कि मोबाइल तो हाथ में नहीं है। खाना खत्म हुआ एपिसोड के खत्म होने का इंतजार करते प्लेट हाथ में लिये बैठी रही। प्लेट किचन में रखकर आई तब मन फिर ललचाया कि एक बार मोबाइल पर नजर डाल लूँ। मोबाइल में पतिदेव के दो मिस काल थे जिन्हें देख कर चौंक गई। आज तो बैंक का कोई काम भी नहीं था फिर दोपहर के इस समय फोन क्यों किया होगा? तुंरत काल बैक किया हाँ क्या हुआ? फोन करते कतई अंदाजा नहीं था कि कोई बहुत नई बहुत भौंचक करने वाली बात सुनने को मिलेगी। कहाँ हो तुम?

घर पर, घर पर ही रहती हूँ कहाँ जाती हूँ। झुंझलाहट सी हुई।

अच्छा सुनो मुझे जरा चेस्ट में पेन हो रहा था मैं बाम्बे हास्पिटल आया हूँ ईसीजी करवाने।

क्या कहा क्या सुना है मैंने क्या ठीक सुना है या शायद ठीक से समझा नहीं है दो पांच या दस सेकेंड के लिए दिमाग सुन्न सा हो गया। ऐसी कोई खबर ऐसी किसी बात के लिये दिन में फोन आयेगा कभी सोचा ही कहाँ था? अच्छा मैं अभी आती हूँ कहाँ हो तुम?

हाँ आराम से आना घबराने की कोई बात नहीं है।

हास्पिटल आना है और घबराने की बात नहीं है। क्या करूँ कपड़े बदलूँ नहीं अलमारी में से पैसे निकालूँ पता नहीं कहाँ कैसी जरूरत पड जाये गाड़ी की चाबी पर्स मोबाइल ओह गाड़ी भी तो गंदी पड़ी है कितनी धूल जमी है क्या करूँ गाड़ी साफ करने का समय नहीं है। सामने एक मकान बन रहा है दिन भर धूल सीमेंट उड़ती है गाड़ी धोवो दूसरे दिन गंदी। उन लोगों से कहा भैया अगर पानी हो तो जरा पाइप से पानी डाल दो गाड़ी पर। ताला लगाकर नीचे आई तब तक वे लोग खड़े थे गाड़ी से कपड़ा निकाला और धूल झाड़ने लगी तब तक एक लड़के ने कहा मैडम हम डाल देते हैं पानी। विंड स्क्रीन पर पानी डालकर गाड़ी स्टार्ट की। हास्पिटल में पार्किंग की जगह ही नहीं थी। आगे बढ़ते बढ़ते गाड़ी हास्पिटल परिसर से बाहर निकल गई और पीछे की सड़क के किनारे पार्क की। वहाँ से लगभग भागते हुए अंदर पहुँची फिर फोन लगाया पतिदेव ने कहा हाँ ऊपर आ जाओ फोर्थ फ्लोर पर आईसीयू में।

आईसीयू!!!!

दिल की धड़कने यह सुनते ही और तेज हो गईं। भागते दौड़ते आईसीयू में पहुँची वहाँ के तीन-चार दरवाजे वाले गलियारे पार करके अंदर बिस्तर पर पतिदेव को लेटे पाया। सीने पर नलियाँ लगी थीं बगल में मानिटर पींपीं कर रहा था। जिस इंसान को पिछले इकतीस साल से हमेशा भागते दौड़ते देखा हो उसे इस तरह मानिटर और नलियों से घिरे आईसीयू में लेटे देखकर सदमे सी स्थिति हो गई मेरी।

वहाँ एक डॉक्टर थे उन्होंने बताया कि माइनर अटैक आया था इसलिए अभी मानिटरिंग में रखना पडे़गा कल एंजियोग्राफी करेंगे। अभी आप काउंटर पर जाकर एडमिशन बनवा लाइये फिर उस पर सीएमओ के दस्तखत करवा लाइये। यह जल्दी करवा लीजिये ताकि इलाज शुरू हो सके।

क्या कहा गया क्या करना है कुछ समझते कुछ न समझते मैं जाने को हुई तब तक पतिदेव ने कहा पैसे चाहिए क्या यह लो और अपनी जेब से पैसे निकालने लगे।

पैसे हैं मेरे पास लेकिन तब तक पैसे मोबाइल चाबियाँ न जाने क्या क्या बाहर आ गया। सब कुछ अपने पर्स में ठूंस कर मैं फिर नीचे भागी। काउंटर पर पैसे जमा करने के साथ सीएमओ आफिस के बाहर अपनी बारी आने का इंतजार। उसे लेकर फिर आईसीयू में आई तब उन्होंने एक छोटी सी चिट पकड़ा दी जिस पर एक नंबर लिखा था। आप मेडिकल स्टोर से ये दवाइयाँ ले आइये। मेडिकल स्टोर पर जाते हुए देखा कि एक गाड़ी बीच में खड़ी है। वहाँ खड़े गार्ड एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि किसकी गाड़ी है कब से खड़ी है। दो तीन बार अनाउंसमेंट करवा दिया लेकिन कोई नहीं आया। ये बातें कान में पडने के बाद मैंने गाड़ी को ध्यान से देखा। अरे ये तो सरकारी गाड़ी है नंबर तो याद नहीं रहता लेकिन रजिस्ट्रेशन इंदौर के बाहर का है मतलब पतिदेव की गाड़ी। गार्ड ने बताया कि एक साहब खुद ही गाड़ी चला कर आये थे बहुत देर से खड़ी है एंबुलेंस लाने में दिक्कत आ रही है।

हाँ भैया उन्हें अटैक आया है वे आईसीयू में हैं मैं अभी हटवाती हूँ गाड़ी पहले दवाइयाँ दे आऊं। मैडम थोड़ा जल्दी करिये यहाँ दिक्कत हो रही है।

दिक्कत तो हो ही रही होगी लेकिन दवाइयाँ भी तो जरूरी हैं मैं मेडिकल स्टोर पर भागी। एक नंबर पर ढेर सारी दवाइयाँ थीं क्या क्या लिखा है क्या नहीं नहीं पता। दवाइयाँ देकर वापस नीचे आई और गार्ड से कहा भैया आप हटा देंगे क्या गाड़ी? मैंने कई बार कहा लेकिन कभी टीयूवी चलाने नहीं दी और अब इस समय तो कम से कम पहली बार नहीं चला सकती। गार्ड भी गाड़ी नहीं चला सकता था वह किसी को ढूंढने चला गया। अब तक मैंने किसी को नहीं बताया था कि क्या हुआ है क्या हो रहा है और मैं अकेले इस तनाव के साथ अब थकने लगी थी अकेलापन मुझ पर हावी होने लगा था और अब मुझे किसी बेहद अपने के साथ अपने तनाव अपनी चिंताओं को साझा करने की सख्त जरूरत थी। लेकिन यह गाड़ी बीच में खड़ी है इमर्जेंसी एंबुलेंस के रास्ते में। मैंने पास में खड़े एक व्यक्ति से कहा एक्सक्यूज मी क्या आप यह गाड़ी चला सकते हैं? फिर मैंने दो तीन वाक्यों में पूरी कहानी सुनाई। वह थोड़ा झिझका और बोला गार्ड को बोल दीजिये। उसे गाड़ी चलाना नहीं आता। पांच सेकेंड सोचने के बाद उसने चाबी के लिए हाथ बढ़ाया। चाबी दे तो दी लेकिन क्या इस तरह किसी अजनबी को चाबी देना ठीक है? अभी एक परेशानी सामने है दूसरी के लिए कोई जगह नहीं है तो मैं भी जल्दी से उसके साथ गई और गाड़ी का दरवाजा खोल कर दूसरी तरफ बैठ गई। मुझे पता रहेगा कि गाड़ी कहाँ लगी है। शुक्र है थोड़े आगे ही जगह मिल गई और गाड़ी लगा दी।

अब समय था अपने तनाव को मैनेज करना। पापाजी मम्मी को बताते हुए खुद को संयमित रखना जरूरी है इसलिए उन्हें सबसे पहले नहीं बताया जा सकता इसलिए सबसे पहला फोन किया बेटी मानसी को। जैसे ही उसे बताया मुझे जोर से रोना आ गया और मानसी को भी। नहीं अभी मैं कमजोर नहीं पड सकती नहीं तो बच्चे जीवन में किसी स्थिति में कमजोर हो जाएंगे। उन्हें खुद को मजबूत रखना तभी संभव होगा जब वे मुझे मजबूत देखेंगे। मैंने जल्दी ही अपने आप पर काबू किया और मानसी को भी समझाया कि रोओ मत। हमारे मोबाइल में नेट वाउचर खत्म हो गया है वह डलवा दो कभी जरूरत पडे तो। थोड़ी देर बेटी से बात करके उसे समझा कर खुद को संभाल कर पापाजी को फोन लगाया। रोकते रोकते भी रोना आ गया। सुनकर पापाजी भी घबरा गये हम अभी आते हैं। नहीं अभी आप मत आओ अभी तो यहाँ सिर्फ बैठना है कल एंजियोग्राफी होगी तब आप सुबह आ जाना। कोई भी बात हो तो तुरंत बताना हम आ जाएंगे इस आश्वासन पर बात खत्म हुई। इसके बाद मैं ऊपर आईसीयू के बाहर बने वेटिंग हाॅल में आकर बैठ गई।

कविता वर्मा

#बायपास #minor_attack #bypass 

Wednesday, November 4, 2020

जीवन तो बहते रहना

 पानी हर जीव की आधारभूत आवश्यकता है और यही कारण रहा कि मानव सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुईं। नदियों ने मानव को सिर्फ पानी की जरूरत के लिये ही नहीं बल्कि अपने सौंदर्य से अपने कलछल बहते प्रवाह से अपने हरे भरे किनारों से और लहरों पर किलोल करते पक्षियों के गीतों से भी मनुष्य को आकर्षित किया।

नदियों के पथरीले तट हों या रेतीले अथाह पानी हो या आवेगपूर्ण जलधार हो या शांत स्थिर विस्तार इसकी शीतलता मन को सुकून देती है। यह इंसान को खुद को भुला कर इस असीम विस्तार सतत प्रवाह और लयबद्ध संगीत से बांध लेती है। 

नदी के किनारे उगते सूर्य की लालिमा द्विगुणित होकर एक वितान रचती है जिसमें संपूर्ण प्रकृति अंगड़ाई लेकर जीवन के लिए तैयार हो जाती है तो दोपहर की चटकीली धूप इस जल की शीतलता चुरा कर खुद के ताप से मुक्ति पाने की राह ढूंढती है और इस क्रम में नदी के जल की शीतलता को और बढ़ा देती है। वहीं दिन भर की यात्रा के बाद थक कर विश्राम पाने के लिए सूर्यनारायण के लिए नदी की अतल गहराइयों से बेहतर स्थान भला कहाँ मिल सकता है? जाते-जाते सूर्य कृतज्ञता स्वरूप अपना सुनहरा रंग नदी को देकर उसके रूप को द्विगुणित कर देता है क्योंकि वह जानता है कि उसकी अग्नि कालांतर में इस जल को अपने बुझे हुए स्वरूप से कालिमा से भर देगी। नदी कहाँ इस बात का बुरा मानती है वह तो इस कालिमा को अपने वक्ष पर फैला कर आसमान में अठखेलियाँ करते चाँद और तारों के लिए दर्पण बन जाती है। नदी की इस विशाल ह्दयता की अनगिन कहानियाँ इसके किनारे बैठ कर देख सुन सकते हैं। इसके सीने में छुपे अनगिनत सीप शंख जीव जंतु के साथ यह इंसानी गलतियों को भी अपने सीने में छुपा लेती है। 

मनुष्य नदियों के इसी गुण से प्रभावित होकर उसे पूर्ण रूप से जानने के लिए उसके सीने पर चप्पू खेता उसके दूसरे किनारे तक पहुँचा होगा। नदी ने कुछ राज कुछ रहस्य बनाए रखने के लिए तेज धार से मनुष्य को रोका भी होगा लेकिन फिर बाल हठ समझकर हार गई और सुदूर किनारों को सहज बना दिया। इससे भी दिल नहीं भरा मनुष्य का और उसने दोनों किनारों को सेतु बनाकर जोड़ दिया सिर्फ जोड़ा ही नहीं दिन-रात उस पर इस पार से उस पार की दौड़ लगाते शायद खुद को उस विशाल अथाह विस्तार से बड़ा शक्तिशाली होने का भ्रम पाल बैठा। 

शक्ति एक ऐसा आकर्षण है जो एक बार प्रदर्शित हो जाये फिर उससे बचना मुश्किल है। इस खेल में सामने वाला अगर अपनी शक्तियों को समेट लेना चाहे तो वह भी खुद की तौहीन ही लगती है और शायद इसीलिए इंसानी गलतियों का बोझ ढोती दुर्बल होती नदियों को बांध बनाकर शक्ति संपन्न करने की कवायद की इंसान ने। न न नदियों के बहाने खुद की शक्ति का प्रदर्शन किया कि देखो अब तुम्हें हम पोषित करेंगे तुम्हें दुर्बल न होने देंगे। तुम्हें हम साल भर के लिए पुष्ट करेंगे लेकिन तुमसे तुम्हारी स्वतंत्रता छीन लेंगे। तुम्हें बहने देंगे लेकिन कब कहाँ कितना बहोगी वह हम निश्चित करेंगे। न ही तुम्हें मरने देंगे और न खुद की तरह से जीने देंगे। 

खलघाट में नर्मदा नदी मनुष्यों की इसी सोच के साथ अब एक विशाल वितान लेकर भी बेबस है। यहाँ सुबह का सूरज अपनी लालिमा फैलाते हुए अपनी कालिमा सौंपते विदा लेता है। नदी के फैलाव पर पंछी चहकते हैं शायद नदी अभी अपने दुखों को शब्द देना नहीं सीख पाई है या शायद स्वतंत्र उड़ान भरने वाले ये पखेरू अभी बंधन के दुखों की मूक भाषा को समझ पाने में असमर्थ हैं। वे नदी के तल से उठती ठंडी हवा में किलोल करते हुए अपने पंखों से उसे स्पर्श करते हैं उसमें से अपने लिये भोजन जुटाते हैं लेकिन उसके ह्रदय में छुपे हुए दुखों को न देख पाते हैं न सहला पाते हैं। 

नदी के विशाल फैलाव पर डोंगी लेकर अपने भोजन का प्रबंध करते मछुआरे हाथ घुमा कर दूर तक जाल फैलाते हैं उसमें ढेर सारी मछलियाँ पकड़ते हैं लेकिन अंतस के उस तल तक नहीं पहुंच पाते जहाँ नदी ने अपने दुखो को सहेज रखा है। वे गहरे जाकर भी दुखों की थाह नहीं पाते। पाएंगे भी कैसे वे तो खुद जीवन के सबसे बड़े दुख भूख से लड़ने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। 

नदी के भी कोई एक दो दुख हों तो कोई पूछे जाने समझे सहलाए उसके दुख तो असीम हैं। गंदगी समाने का दुख सीने में कांक्रीट भर कर पुल बनने के बावजूद दो किनारों के बीच फासले बढ़ने का दुख, इठलाती बलखाती कूदती फांदती अल्हड़ता को सायास गंभीरता में बदलने का दुख, भोले मासूम तल को गहन गंभीर बना देने का दुख, अपने विस्तार को जंगलों खेतों तक फैलाने की स्वतंत्रता को पत्थरों की दीवारों से बांधे जाने का दुख लेकिन फिर भी नदी का काम है बहते रहना और वह बह रही है। 

बहते बहते वह जीवन के अंतिम सत्य के दर्शन करवाने के लिये तत्पर होती है और शक्ति विहीन बेजान इंसानों को अपने किनारे से अंतिम यात्रा के प्रस्थान हेतु स्थान देकर भी शांत सौम्य बनी रहती है। 

यह सौम्यता यह गर्व विहीन विनम्रता नदी को नदी बनाती है। खुद पर किये अपराधों के बावजूद वह बेजान शरीर को अंतिम विश्राम स्थली प्रदान करती है वह जानती है हर शक्ति प्रदर्शन के बावजूद इंसान एक दिन परम लीन हो जाता है और वह भी एक दिन सागर में विलीन हो जाएगी। 

कविता वर्मा 


Tuesday, October 27, 2020

नई हैं साइकिल पर पुरानी सा मजा कहाँ

 हालाँकि दशहरा तो रविवार को ही मन गया था लेकिन सोमवार सुबह भी दशमी तिथि थी। सुबह मतलब पूरे ही दिन। कल शाम  मार्केट में किसी काम से रुके तो अचानक एक दुकान में और उसके सामने खूब ज्यादा भीड़ दिखी। कौतुहल हुआ कि कहाँ तो बाजार मंदी से जूझ रहा है और इस दुकान में ऐसा क्या है जो इतनी भीड़ जमा है? पहले लगा शायद किसी दुकान का उद्घाटन होगा लेकिन कहीं हार फूल नहीं दिखे और न नाश्ते खाने का इंतजाम। अब इंदौरी बिना खाने उद्घाटन तो नहीं कर सकते न। फिर ध्यान से देखा आखिर चल क्या रहा है? दरअसल दुकान दो मंजिला थी तो साइनबोर्ड काफी ऊँचा था इसलिए एकदम नजर नहीं जा रही थी और भीड़ के बीच क्या चल रहा है वह दूरी के कारण समझ नहीं आया ।फिर दुकान का नाम देखा साइकिल वर्ल्ड। ओह तो यह  साइकिल की दुकान है और लोग दशहरे के शुभ मुहूर्त में साइकिल खरीदने आये हैं। तभी कुछ लोग साइकिल का ट्रायल लेते नजर आये तो कुछ साइकिल के अस्थि पंजर कसवाते।

याद आया कि कुछ ही देर पहले उज्जैन रोड़ पर बने नये पुल पर बहुत सारे लोगों को साइकिल चलाते देखा था। 

आजकल इंदौर में साइकिल चलाने का क्रेज बढ़ता जा रहा है। बहुत सारे युवा प्रौढ़ साइकिल चलाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। आजकल साइकिल भी काले रंग पर पतली सी लाल सुनहरी लाइन और एक जैसे नक्शे के बजाय अलग-अलग रंग डिजाइन टायर के साइज मोटाई के रूप में मिल रही हैं और हाँ कीमत भी बहुत वैरायटी में हैं। इन डिजाइनर साइकिल की कीमत सामान्य वर्ग के हिसाब से बहुत ज्यादा हैं जिस पर कंट्रोल किये जाने की आवश्यकता है।

हालाँकि इंदौर में सड़कें साइकिल चलाने के लिये बिलकुल भी तैयार नहीं हैं न कोई अलग लेन है और न ही लोगों में साइकिलिस्ट के लिए कोई ट्रेफिक सेंस ही विकसित किया गया है लेकिन साइकिल से सफर को बढ़ावा जहाँ आयातित तेल पर निर्भरता कम कर रहा है प्रदूषण के स्तर में कमी कर सकता है और चलाने वाले के स्वास्थ्य को भी सकारात्मक अंजाम दे सकता है।

वैसे आजकल जो नई साइकिल आ रही हैं वे चाहे जितनी अच्छी दिखती हों उनमें बालबियरिंग हों या गियर हों उन्हें चलाना चाहे जितना आसान हो लेकिन मुझे उनकी बहुत छोटी और कठोर सीट बिलकुल पसंद नहीं आती। इस मामले में पुरानी काली साइकिल की चौड़ी और स्प्रिंग लगी सीट का कोई मुकाबला नहीं। अब आज के युवा कभी उस आरामदायक सीट पर बैठे ही नहीं हैं तो उसके लिए जो है सो है।

# cycling #cycle

Saturday, October 24, 2020

पड़ोसी हाय पड़ोसी

 करीब दो महीने से हाथ में तेज दर्द था। लगा कि लाॅकडाउन में सभी काम हाथ से करने के कारण शायद मसल्स में दर्द हो गया है लेकिन दर्द बढ़ता गया। यह समय बिटिया के अमेरिका जाने का भी था इसलिए थोड़ा टालते रहे कि अभी हास्पिटल डाक्टर के चक्करों में न पडें। बिटिया के जाने के बाद डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने फ्रोजन शोल्डर की आशंका जताते हुए एम आर आई करवाई ब्लड टेस्ट हुए। दवाइयाँ पहले ही लिख दी गई थीं साथ ही एक्सरसाइज का एक चार्ट था जिसे पहले तो खूब सीरियसली नहीं लिया लेकिन फिर लगा कि यह भी एक आवश्यक तत्व है तो उसे करना शुरू किया।

परसों डाक्टर को ब्लड रिपोर्ट और एमआरआई दिखाई तो उन्होंने शोल्डर में इंजेक्शन देने को कहा। चूँकि भाभी भी डाक्टर है उससे बात हुई तो उनने बताया कि इससे कंधे की साॅकेट में जो कैल्शियम डिपाजिशन होता है उसे डिजाल्व करके मूवमेंट को सरल बनाया जाता है इसलिए मैं तुरंत तैयार हो गई। ओटी में ले जाकर यह इंजेक्शन लगा कुछ आराम महसूस हुआ। अब रोज कंधे की गर्म पानी के नैपकिन से सिंकाई करके एक्सरसाइज करने में लगभग एक घंटा लग जाता है जो बुरी तरह थका देता है। इस सबके साथ दवाइयों के असर के कारण चक्कर से आने लगते हैं तेज नींद आती है। खैर यह तो हुई सामान्य सी बात शायद सभी के फ्रोजन शोल्डर में यही स्थिति होती होगी।

अब खास बात घर के सामने एक मकान बन रहा है जहाँ आजकल टाइल्स लगने का काम चल रहा है दिन भर टाइल्स कटने की किर्र किर्र कानों में अजीब झनझनाहट पैदा करती है लेकिन वह तो होगा ही इस आवाज को आप रोक नहीं सकते। असली परेशानी है इस मकान के मालिक की आवाज। वह व्यक्ति इतनी जोर से बात करता है कि मुझे मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक उसकी आवाज आती है। पहले वह हर संडे सारे दिन मकान का काम देखने आता था और फोन स्पीकर पर डालकर जोर जोर से बातें करता था। एक दिन अंततः मैंने उससे कहा कि भाईसाहब संडे को लोग दिन में आराम करते हैं।

अब वह यहीं एक किराये के मकान में शिफ्ट हो गया है और दिन भर इतनी जोर जोर से बोलता है कि मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक टाइल्स कटने की आवाज नहीं आती लेकिन उसके बोलने की आवाज आती है। दोपहर बाद वह आफिस चला जाता है तो उसका बेटा उसकी जगह संभाल लेता है। शाम को तरी करना हो या खेलना हो इतनी जोर जोर से चिल्लाता है कि आप घर के किसी कमरे में शांति से नहीं बैठ सकते।

चूंकि अब उसे जिंदगी भर इसी मकान में रहना है और कुछ कहने का मतलब जीवन भर की बुराई मोल लेना है और कुछ न कहना मतलब जिंदगी भर टार्चर होना। पता नहीं लोगों को अपनी खुद की आवाज सुनाई देती है या नहीं या वे बोलते ही इसलिये हैं कि आसपास वाले लोग सुनकर उन्हें स्मार्ट समझें। हालाँकि मुझे तो वे..... खैर छोड़िये।

#civic_sense #noisi_neigbbour #तुम_कहो_जग_सुने

Tuesday, August 25, 2020

दाँत दर्द का इलाज ढूँढते

 कोरोना काल में बहुत सारी अच्छी बुरी बातों की श्रृंखलाएं चलती जा रही हैं। यूँ तो अच्छी बुरी बातों से ही जीवन बना है लेकिन क्योंकि यह समय हमारे लिए सदियों में एक बार आने वाला, कभी देखा ना कभी सुना, ऐसा समय है इसलिए इस समय होने वाली सभी बातें बहुत ज्यादा  महत्वपूर्ण हो जाती हैं। 

इस दौरान हर व्यक्ति ने अपने आप को जिस तरह एक बंधन में एक कैद में पाया है उसने भी हमें झकझोर दिया है। आम तौर पर अपने आपको हर तरह से स्वतंत्र समझने वाला व्यक्ति भी जब यह करो वह ना करो यह कर सकते हैं वह नहीं कर सकते के दायरे में पाता है तो घबरा सा जाता है। सहज सुलभ चीजें जिन्हें आम दिनों में करते हुए न कभी कोई योजना बनानी पड़ती थी न कभी उनके बारे में सोचना पड़ता था इन दिनों में बहुत सोचने बहुत योजना बनाने के बाद ही की जा सकती हैं। जिसकी वजह से न सिर्फ एक पराधीनता का भाव पैदा होता है बल्कि अपनी विवशता जान कर मन बहुत खिन्न भी हो जाता है। 

ऐसा ही अचानक महसूस हुआ जब एक दिन सुबह सोकर उठी पानी पिया और पीते ही दांत में तेज दर्द हुआ। इतना तेज दर्द जो मैंने कभी जीवन में महसूस नहीं किया था।  ऐसा लगा मानों पानी मसूड़ों को चीरकर अंदर तक घुस गया है और उसने जबड़े के चेहरे के पूरे बाएं हिस्से को अपनी जकड़न में ले लिया है। उस ठंडक को उस तीखे दर्द को  सहन कर पाना बड़ा ही मुश्किल लगा। 

चूंकि लाॅकडाउन चल रहा था इसलिए कहीं भी किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं था। तुरंत अपने डेंटिस्ट डॉक्टर को फोन किया तो उन्होंने कुछ एंटीबायोटिक और दर्द से राहत के लिए कुछ गोलियाँ लिख दीं जिन्हें तुरंत ही मेडिकल स्टोर से मंगवा कर खाना शुरु कर दिया। दर्द में कुछ राहत जरूर मिली लेकिन कुछ भी खाने पीने पर ठंडे और गर्म का वह तीखा का एहसास पूरे चेहरे पर लगातार बना रहा। 

इंतजार के सिवा और कोई चारा नहीं था। पांच दिन के लिए दी गई एंटीबायोटिक का डोज दस दिन तक चलाया गया। कुछ राहत जरूर मिली लेकिन ज्यादा नहीं। एंटीबायोटिक बंद करने के कुछ ही दिनों बाद एक दिन फिर बहुत तेज दर्द हुआ जैसे किसी ने अंदर की सारी नसों को झकझोर दिया हो।

उस दिन सारे डर को ताक पर रखकर डॉक्टर के पास जाने का निश्चय कर लिया। डॉक्टर के क्लीनिक पर हैंड सैनिटाइजर लगा सिर पर कैप पहन ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन का लेबल चेक करवा कर जब अंदर पहुंची तो डॉ को पीपीई किट में खुद को सिर से पैर तक ढके हुए देखा। उन्हें देखकर एक अपराध बोध सा हुआ कि क्यों इस समय मैं यहाँ आ गई? लेकिन मजबूरी थी दिखाना बहुत जरूरी लग रहा था। 

डॉक्टर ने फार्सेप से दांतों में फंसा कुछ पुराना खाना निकाला और अंदर तक रोशनी डाल कर देखी तो पता चला एक बड़ी सी कैविटी है जिस में सड़न पैदा हो चुकी थी। उन्होंने कहा इसका तो रूट कैनाल ही करवाना होगा लेकिन इस समय कोई भी डॉक्टर रूट कैनाल करने के लिए तैयार नहीं होगा क्योंकि उसमें पानी के छींटे उड़ते हैं इसलिए  अभी आपको फिर कुछ दिन एंटीबायोटिक खाना पड़ेगी और एक ब्रश दे रहा हूँ जिससे आप दांतों के बीच की सफाई अच्छे से करते रहिए उससे दर्द में कुछ आराम होगा। 

रूट कैनाल सुनते ही दिल धक से हो गया। रूट  कैनाल मतलब दांतो के अंदर की नसों को पूरी तरह मार देना जिससे कि उसमें ठंडे गर्म का किसी भी तरह के दर्द का अहसास ही न हो। अपने शरीर के अंदर ऐसे किसी मृत अंग को रखना भला कोई कैसे चाहेगा? 

दवाई लेकर और वह तारों वाला आडा ब्रश लेकर हम घर आ गए। ब्रश का उपयोग तुरंत शुरू किया तब जाना कि अरे हमारे दांतो के बीच कितना सारा अन्न फँसा रह जाता है, जिसे हम सोचते हैं कि ब्रश करके निकाल दिया है। वही अंदर ही अंदर सड़न पैदा करता है। 

रूट कैनाल के डर ने अब तक के आलसी मन को  उकसाया और जो चीज मैं कभी नहीं करना चाहती यानी यूट्यूब पर देख कर नीम हकीम बनना मैंने वह भी करने का निश्चय किया। अभी कुछ समय से होम्योपैथी की दवा चल रही थी तो सोचा शायद दांत के दर्द के लिए भी होम्योपैथी की कोई दवा हो। लेकिन वह दवा अभी चल रही दवा के साथ मैच करेगी या नहीं यह चीज समझ में नहीं आई इसलिए उसे ड्रॉप कर दिया। 

इसके बाद आयुर्वेद में दांत दर्द के कुछ इलाज तलाशे गए। पता चला कि लौंग का तेल  दांत के दर्द में बेहद कारगर है। यह तो पहले ही पता था बचपन में दांत दर्द के लिए लौंग के तेल के उपयोग के बारे में बहुत सुना था लेकिन कभी आवश्यकता नहीं पड़ी इसलिए वह ध्यान से उतर गया। तुरंत  लौंग का तेल मंगवाया गया और रुई में उसे लगाकर दांत की उस कैविटी में फँसाया गया। उससे भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ क्योंकि रुई के दबाव की वजह से कैविटी पर जोर पड़ता और दर्द बढ जाता। दूसरे विकल्प की तलाश की गई जिसमें हल्दी नमक लौंग का तेल और थोड़ा नारियल का तेल का पेस्ट मिलाकर कैविटी में भरने की सलाह दी गई थी। वह भी करके देखा कैविटी में नमक और हल्दी का मिश्रण लौंग के तेल के साथ मिलाकर भरा गया जिससे कोई फौरी राहत जरूर मिलती लेकिन वह कितना अंदर जाता यह पता करना बेहद मुश्किल था। 

कुछ दिन करते उससे भी उकताहट हो गई इसलिए धीरे-धीरे वह बंद हो गया। इसके बाद सोचा कि क्यों न लौंग के तेल को सीधे उस केविटी के अंदर डाला जाए ताकि अंदर जो भी बैक्टीरियल इंफेक्शन है उस पर वह सीधे काम करे। एक ड्रॉपर ढूंढा और उसकी मदद से बिटिया से कहकर कैविटी के अंदर लौंग का तेल सीधा टपकाया गया, ताकि वहाँ जो भी इंफेक्शन है वह खत्म हो जाए। इसे जरूर फायदा मिला कुछ दर्द से और कुछ पानी भी लगने पर होने वाला तेज दर्द कुछ कम हुआ जिससे एक उम्मीद बंधी कि शायद यह धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। 

मौसम ठंडा होते ही कई बार कम पानी पीने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट कम होने की वजह से नसों में जकड़न ऐंठन होने लगती है। कई बार यह इतनी तेज होती है कि पैर सीधा रखना मुश्किल होता है। अंदर ही अंदर यह मरोड़ नीचे से ऊपर देर तक उठती रहती है जिससे किसी भी तरह कोई राहत नहीं मिलती, सिवाय इसके कि तुरंत नींबू नमक का घोल बनाकर पी लिया जाए। 

उस दिन अचानक पैर की नस बुरी तरह से ऐंठ गई दर्द इतना तेज था कि चीख निकल गई। नींबू काटने निचोड़ने की ताकत भी नहीं थी इसलिए तुरंत एक गिलास में थोड़ा सा नमक घोला और पीने लगी। 

जब नमक का पानी उस कैविटी में लगा तो अचानक ध्यान आया कि यह तो सबसे अच्छा तरीका है। क्यों न पानी में नमक घोलकर उसके कुल्ले किए जाएं कुछ इस तरह की पानी उस केविटी तक पहुंचे। पानी को तो कोई रोक नहीं सकता वह जहाँ दरार मिलेगी वहीं चला जाएगा और उसके साथ घुला हुआ नमक भी। नमक से बेहतर एंटीबैक्टीरियल दवा और कौन सी हो सकती है? 

बस फिर क्या था मुझे तो मानो इलाज मिल गया। करने गए थे पैर का इलाज मिल गया दांत के दर्द का इलाज। अगले ही दिन से दिन में चार-पांच बार खासकर सुबह कॉफी पीने के बाद खाना खाने के बाद रात में खाना खाने के बाद मुँह अच्छे से साफ करके नमक के पानी का एक घूँट मुँह में भरकर उसे देर तक मुँह के चारों तरफ घुमाना विशेष रूप से उस कैविटी के आसपास अंदर की तरफ। ताकि नमक का पानी उसके अंदर तक चला जाए और वहाँ जो भी इंफेक्शन है उसे खत्म करे। 

नतीजा यह हुआ कि पिछले 20 25 दिनों से जिस दाढ़ से एक कौर भी नहीं चबा पा रही थी उसी दाढ़ से कुछ ही दिनों बाद अच्छे से खाना चबाकर खाने लगी। हालांकि कैविटी अभी भी है उसे भरने में समय लगेगा पर रात में जब नमक का कुल्ला करके सुबह उठती हूँ तो वह कैविटी बहुत छोटी सी महसूस होती है। शायद रात भर में वह अपने आप हील होती है लेकिन दिन में फिर खाने पीने की वजह से वह थोड़ी बड़ी हो जाती है। 

इतना जरूर कहूँगी कि दर्द मैं बहुत हद तक कमी आई है  और न जाने क्यों यह उम्मीद है कि बहुत जल्द यह इंफेक्शन पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। उसके बाद दांत में जो कैविटी बचेगी उसे फिलिंग से बंद करवा लूँगी और शायद रूट कैनाल करने से भी बच जाऊँ।

आखिर हमारे बड़े बुजुर्ग भी तो हफ्ते में एक दिन सरसों के तेल और नमक से दाँत चमकाने के बहाने दाँतों को डिस्इंफेक्ट ही तो करते थे। 

कविता वर्मा

Wednesday, April 29, 2020

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ
गिरजा कुलश्रेष्ठ जी को उनके ब्लॉग के माध्यम से कई साल पहले से जानती हूँ लेकिन उनसे पहली मुलाकात इसी महीने फरवरी में इंदौर महिला साहित्य समागम में हुई। आपने आपका कहानी संग्रह कर्जा वसूली बहुत प्यार से भेंट किया और उसे तुरंत पढ़ना भी शुरू कर दिया लेकिन बीच-बीच में व्यवधान आते गये और वह टलता गया। तेरह कहानियों का यह संग्रह सन 2018 में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। गिरिजा की लेखनी में एक तरह का ठांठीपन है। अपने कैरियर और मध्यम वर्गीय जीवन से रोजमर्रा की बहुत छोटी छोटी घटनाओं को तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हुए आपने कहानियों में ढाला है और अपने पाठकों को हर कहानी से जोड़ लिया है। शिक्षण से जुड़ी गिरिजा जी सरकारी गलियारों की उठापटक से भी वाकिफ हैं और उसमें सामान्य आदमी को परेशान करने के तौर तरीकों से भी। ये ऐसी दुनिया है जहाँ आप गलत को देखते समझते भी गलत नहीं कह पाते और इसे कहानी में ढाल कर दुनिया को दिखाना सबसे बेहतर तरीका है जो गिरिजा जी ने अपनाया है।

कहानियों की बात करूँ तो संग्रह की पहली कहानी अपने अपने कारावास एक ऐसी लड़की की कहानी है जो म्यूजिक सीखना चाहती है। शादी के पहले उसके शौक को कोई तवज्जो नहीं दी जाती और शादी के बाद घर गृहस्थी के जंजाल में भी उसमें सीखने की ललक तो रहती है लेकिन क्या वह सीख पाती है यह उत्सुकता पाठकों के मन में अंत तक बनी रहती है। यह कहानी एक इच्छा के जीवित रहने की कहानी है।
साहब के यहाँ तो सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी उनके मौज मजे को दिखाते हुए एक मोड़ लेती है और अंत में जिसे मौज समझा जा रहा था उसकी हकीकत कुछ और ही निकलती है। कहानी में पात्रों के संवाद बुंदेलखंडी बोली में होने से कहानी का प्रभाव बढ जाता है।
शपथ-पत्र कहानी भी सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली को उजागर करती है।
कर्जा वसूली शीर्षक कथा गांव देहातों में साहूकारों के शोषण से इतर एक साहूकार की कहानी है। ऐसी कहानियाँ सिक्के का दूसरा पहलू उजागर करती हैं जो बरसों से अंधकार में गुम था।
उसके लायक कहानी एक सामान्य शक्ल सूरत की लड़की की कहानी है जो पढ़ना चाहती है लेकिन हमारे समाज में गुणों के बजाय रूप को किसी के सम्मान का मापक समझा जाता है। एक आम मानसिक धारणा पर प्रहार करती यह कहानी भी अच्छी बन पड़ी है हालांकि अंत के पहले कुछ कुछ अंदाजा हो जाता है कि कहानी किस ओर मुडेगी।
व्यर्थ ही एक छोटी कहानी है जो परिवारों में लेन देन की परंपराओं की मानसिक यंत्रणा को दर्शाती हैं।
पियक्कड ब्लण्डर मिस्टेक नामुराद पहली रचना कहानियाँ अपने आसपास से उठाई गई हैं। ये कहानियां समाज सरकारी विभागों के चलन की कहानियाँ हैं जो अपने प्रवाह से बांधे रखती हैं।
बोधि प्रकाशन से आये इस संग्रह की प्रिंटिंग और प्रूफ रीडिंग बेहतर है कवर पेज आकर्षक है। गिरिजा जी को इस संग्रह के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ।

कर्जा वसूली
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
बोधि प्रकाशन
मूल्य 175 /-

Monday, April 6, 2020

क्या है यह पंथ और वाद

बहुत दिनों से कई बातें दिमाग में उमड़ घुमड रही हैं आज कुछ कहना चाहती हूँ।

लाॅकडाउन शुरू होने के दूसरे ही दिन बेटी ने धीमे स्वर में बताया कि उसकी रूममेट बहुत पैनिक हो रही है कि कहीं उसे या परिवार में किसी को हो गया तो वे लोग आपस में मिल भी नहीं पाएंगे। सुनकर चिंता हुई जबकि जानती हूँ कि वह मानसिक रूप से बहुत स्ट्रांग है लेकिन जब चौबीस घंटे साथ रहने वाले का चित्त अस्थिर हो तो खुद को स्थिर रख पाना भी मुश्किल हो जाता है। उससे यही कहा कि काम के बीच भी उसे कंपनी देना म्यूजिक मूवी बातचीत करते रहना उसे सपोर्ट करना इस वक्त की जरूरत है।
बड़ी बेटी ने वियतनाम यात्रा की बुकिंग की तब कोरोना शुरू ही हुआ था और इसका कोई इलाज नहीं था। चीन से भयानक खबरें आ रही थीं। हम लोग उसे एक दो दिन में एकाध खबर की फोटो भेज रहे थे। मन ही मन मना रहे थे कि भारत सरकार ही सभी उड़ाने बंद कर दे या वीजा रद्द हो जाये लेकिन उससे नहीं कहा क्योंकि अगर वह जा रही है तो मन में आशंका लेकर न जाये। उसका मनोबल बनाए रखना जरूरी था ताकि वह ट्रिप एंजॉय करे और हर स्थिति का स्थिर मानसिकता के साथ सामना भी करे। जब वह वापस आई उसने स्टाफ बस लेना बंद कर खुद की कार से जाना शुरू किया ताकि कलीग के संपर्क में न आये और आफिस में भी सबसे दूरी बना कर रखी।

कोरोना वायरस के साथ ही व्हाट्स अप फेसबुक पर इससे निपटने के कई उपाय आये कपूर धूप-बत्ती काढ़ा दवाइयाँ वगैरह वगैरह। हमारे परिवार के ग्रुप पर भी बहुत सारे मैसेज आये मैंने शायद ही कोई पूरा पढा या देखा हो लेकिन कभी किसी को नहीं कहा कि ये सब बकवास है और इनका कोई फायदा नहीं है। कारण यह था कि धूप-दीप या काढ़ा पीने से  किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा था लेकिन अगर यह सब करने से उन्हें यह विश्वास होता है कि वे स्वस्थ रह सकते हैं तो यह विश्वास बनाये रखने में कोई अड़चन डालना ठीक नहीं है। फिर किसी भी काढे में कोई हानिकारक वस्तु का उपयोग नहीं है वही सब चीजें हैं जो सदियों से उपयोग की जा रही हैं।

इसके बाद देश में घटनाओं की बाढ़ आ गई इंदौर में जुलूस दिल्ली में लाखों लोगों का पलायन तबलीगी जमात हर घटना के साथ आक्रोश भी था बेबसी भी थी और यह उन लोगों की ज्यादा थी जो खुद को घरों में कैद किये हुए थे।
मुझे याद है जब हम कामाख्या देवी के दर्शन करने गये। किसी पंडित को दक्षिणा देकर पंद्रह बीस मिनट में दर्शन कर लेते लेकिन मेरी ही जिद थी कि लाइन में लगते हैं। वहाँ लाइन के लिये पच्चीस तीस फीट की बेंचो को जाली से घेर पिंजरा सा बनाया गया था। लगभग तीन घंटे बाद उसमें बैठे घुटन होने लगी और मैं दर्शन छोड़ कर बाहर आ गई। मुझे बचपन से ही अकेले रहने की आदत है और अभी भी मैं कई दिनों तक अकेले रहती हूँ लेकिन वह तीन घंटे बंद रहने का अहसास असहनीय था। ऐसे में वे लाखों लोग जो अकेले नहीं रह सकते या रहे हैं उनकी स्थिति समझ सकती हूँ। इस अवसाद को तोड़ने या जमीनी काम वालों को धन्यवाद करने के लिए जब थाली ताली बजाने की बात हुई तब भी इसके विरोध के नाम पर लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई। पता नहीं किसी के थाली बजाने से किसी व्यक्ति के पास धन्यवाद पहुंचा या नहीं लेकिन अडोसी पडोसियों ने एक-दूसरे की सूरत देखी और साथ के अहसास के साथ उनके अगले कुछ घंटे बेहतर गुजरे।
सेनेटाइजर कहीं नहीं मिला तभी एक ग्रुप पर मुफ्त सेनेटाइजर वितरित करने की बात हुई और मैंने कहा कि कितने का है कीमत लेकर मुझे भी दो दीजियेगा। तब किसी ने कहा कि मुफ्त मिल रहा है तो पैसे क्यों देना और मैंने कहा कि जो नहीं खरीद सकते उन्हें मुफ्त दें और जो खरीद सकत हैं खरीदें।
कल रश्मि ने स्टेटस डाला कि शहर में मेहनत कर कमाने वाले खाने का पैकेट लेते हुए नजरें नहीं मिला पा रहे हैं। समझ सकती हूँ हालांकि कुछ वर्षों से ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे लोग हैं जिनके लिए यह असहनीय स्थिति है।
हालांकि मेरा अनुभव इससे बिलकुल उलट रहा है और मैंने अच्छे खाते पीते लोगों को भी मुफ्त के लिए झूठ बोलते बेइमानी करते देखा है। बिजली बिल माफ करवाने के झूठे आवेदन लाने वाले तीस साल से देख रही हूँ लेकिन उस स्टेटस पर अपने अनुभव न लिखते हुए सिक्के के इस पहलू को देखा सराहा। कोई और समय होता तो मैं शायद अपने अनुभव वहाँ शेयर करती लेकिन फिर वही बात कि अभी यह वक्त नहीं है।

मुझसे एक वरिष्ठ लेखक ने कहा था कि हमेशा जनवादी रहना।

 न मुझे साहित्य का क ख ग आता है न ये वाद और पंथ ही कभी समझ आये। हाँ जमीनी काम करते हुए बहुत करीब से देखा है जब पापा दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में लंगोटधारी तीर कमान वाले आदिवासियों को बैंक में पैसा जमा करवाने और बैंक से कर्ज लेकर साहूकारों के चुंगल से बचाने जाते थे या पति को बाइक पर जंगल जंगल लाइन की पेट्रोलिंग करते या ट्रांसफार्मर लगाने जाते देखा। और जन का मतलब हर उस व्यक्ति से रहा जो जमीनी काम कर रहा है। ऐसे समय में जब पुलिस के जवान निगम कर्मचारी प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी जान हथेली पर लेकर काम कर रहे हैं तब इस जन के साथ भी मैं खुद को खड़े पाती हूँ।

याद है अट्ठाइस साल पहले जब बिजली चोरी का प्रकरण बनाने पर एक कंज्यूमर जिस पर हत्या के केस दर्ज थे पति को जंगी जीप में बैठा कर बिजली की मोटर वापस लाने के लिए रात में हेड आफिस लेकर गया था। वे तीन घंटे भगवान के आगे दीपक लगा कर टकटकी बांधे उनकी सलामती की प्रार्थना करती रही थी। उस दिन उनका जन्मदिन था और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया था। ऐसे में उन पुलिस वालों अधिकारियों कर्मचारियों और उनके परिवार वालों की दुश्चिंता को समझ पाती हूँ और ऐसे में अगर कोई वीडियो पुलिस जवान किसी को डंडे से पीटता है तब भी मेरा मन उस जन के साथ होता है जो घर परिवार को छोड़कर रात दिन ड्यूटी बजा रहा है।
बच्चे को किसी काम के लिए चार बार मना करने के बाद माता-पिता भी झुंझला जाते हैं फिर ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे हर समय संयम बनाए रखें।

दो दिन से सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है कि अचानक बिजली बंद होने से क्या कुछ नहीं हो सकता है। आशंकाओं को हवा दी जा रही है। आम जन जो इस विषय में कुछ नहीं जानता समझता बल्कि सच कहें तो ये अफवाह फैलाने वाले भी कुछ नहीं जानते समझते। वे बता रहे हैं कि सब कुछ कितना खतरनाक हो सकता है। दरअसल हमारे यहाँ लोग अपने आप को सभी आधुनिक तकनीक से तुरंत लैस कर लेते हैं लेकिन सरकारी तंत्र को लेकर उनकी सोच चालीस साल पुरानी ही है।
इस बात से भी कोई आपत्ति नहीं है कि लोग जो सोच रहे हैं वह बोलें लेकिन जब इसका असर विशाल जन समुदाय के मनोबल को तोड़ने और अफवाहों को जन्म देने के लिए होता है तब जवाब देना पड़ता है।
आम लोगों को तो पता ही नहीं है कि आजकल सारा सिस्टम कंप्यूटरीकृत हो चुका है और किस ग्रिड पर किस समय कितनी बिजली जा रही है कितनी खपत हो रही है उसका पल पल का ब्यौरा मौजूद है और हर सिस्टम के पिछले आठ दिन के डाटा की स्टडी करके पूरी योजना तैयार है। अब आप वह करिये जो आप करना चाहते हैं जिसमें आपको खुशी मिलती है।
आज एक सखी ने कहा यार मैं यह दीया जलाने की बात से कंविंस नहीं हूँ मैंने कहा कोई बात नहीं तुम वह करो जिससे तुम कंविंस हो। लेकिन किसी और को उस बात के लिए कंविंस करने की कोशिश मत करो जिससे वह अभी कंविंस नहीं है।

लब्बोलुआब यह है दोस्तों कि इस समय सभी को अपनी अपनी आस्था के साथ अपना मनोबल बनाए रखने की और दूसरे के मनोबल को संभाले रखने की जरूरत है।

आज ऐसी सास बनिये जो बहू से कहे दूध में जामन लगा दे, और बहू आकर बताए मने तो जामन में दूध डाल दियो, न सास कहे वा जाने दे दही तो जमीज जायेगो।
कविता वर्मा 

Thursday, March 12, 2020

यह सिर्फ एक थप्पड़ और तलाक नहीं है


थप्पड़ की गूंज इन दिनों पूरे देश में है। चर्चा पक्ष में भी है विपक्ष में भी। एक थप्पड़ मारे जाने पर क्या कोई तलाक ले लेता है? ये बुद्धिजीवी सोच है जो भारत की संस्कृति को बर्बाद करना चाहती है। इसीलिए शादियाँ टूट रही हैं तलाक हो रहे हैं। आजकल की पढी लिखी लडकियाँ निभाना नहीं जानती। परिवार को जोड़े रखने के लिए कुछ समझौते करना पडते हैं जैसी सतही प्रतिक्रिया भी हैं और कुछ एक्सट्रीम प्रतिक्रिया भी कि शादी जैसी संस्था सड गल चुकी है इसे खत्म किये जाने की जरूरत है।
थप्पड़ फिल्म देखी और चार अलग-अलग कपल के परिचय के साथ शुरू हुई फिल्म में इंतजार शुरू हुआ थप्पड़ का। एक खूबसूरत शादीशुदा जोड़ा पति से बेहद जुड़ी उसके सपने को अपना सपना बना चुकी अमृता यानी कि अमू। सुबह सबके उठने के पहले उठ कर रात सबके सोने के बाद तक घर की जिम्मेदारियों को निभाती हँसती मुस्कुराती मार्डन कपड़े पहनती खाना बनाना नहीं आता इसलिए हाउस हेल्प के साथ सब करवाती और खुद खाना बनाने की कोशिश करती। एक खूबसूरत घर में हैंडसम हसबैंड के साथ रहती पार्टी डिनर करती अमू। सास साथ रहती हैं लेकिन सास जैसी कोई किटकिट नहीं है और वह भी उनका अच्छे से ध्यान रखती है। उसके जीवन में क्या कमी है? यही तो चाहती है हर लड़की अपने जीवन में। 
लड़की अपने जीवन में क्या चाहती है यह उससे पूछ कर निश्चित नहीं किया गया है। यह तो समाज ने निर्धारित कर दिया है कि लड़की के जीवन में यह सब कुछ है तो उसका जीवन सफल है वह सुखी है संतुष्ट है।
इस हँसती खेलती जिंदगी में एक झटका तब लगता है जब अपनी नौकरी में इच्छित प्रमोशन न मिलने से बौखलाया पति उसे पार्टी में थप्पड़ मार देता है। यह थप्पड़ अमू को अपनी अब तक की जिंदगी के हर उस लम्हे की याद दिलाता है जो उसने पति और परिवार के लिए जिया है खुद की उपेक्षा करके खुद के सपनों को मारकर। यह थप्पड़ उसे बताता है कि वह पति की सुविधाओं का साधन मात्र है उसे सब कुछ देने की आड़ में खुद की महत्वाकांक्षाओं को जीता पति वास्तव में अपने किये से नाममात्र शर्मिंदा नहीं है और न उसके लिए कोई अफसोस है। पत्नी से माफी माँगने जैसा कोई विचार तो उसे आता ही नहीं है।
अमू बेहद संवेदनशील है और इस असंवेदनशीलता को बर्दाश्त नहीं कर पाती। बहुत सोच विचार के बाद वह तलाक लेने का निर्णय लेती है और इस बात पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। यहाँ फिल्म बताती है कि एक थप्पड़ मारे जाने के लिए हमारे यहाँ कानून में कोई प्रावधान ही नहीं है। इस ग्राउंड पर जो वास्तव में एक स्त्री के आत्मसम्मान की बात है न कोई केस बनता है और न ही इसकी कोई अहमियत है। दुनिया के सबसे बड़े संविधान में एक पत्नी को उसका पति एक थप्पड़ मार देता है तो उसे कहीं असामान्य नहीं माना जाता और न ही माना जाता है कि इसकी वजह से स्त्री को कोई चोट पहुंचती है और उसके मन में ऐसे पति के लिए प्यार खत्म हो सकता है जो शादी को खत्म करने का आधार बनता है।
प्रसिद्ध वकील उसे कानूनी विसंगतियों के बारे में बताती है और उसमें घरेलू हिंसा जोड़ने की सलाह देती है जिसे अमू मना कर देती है क्योंकि यह नियमित मारपीट नहीं है जिसे घरेलू हिंसा कहा जाये।
यहाँ फिल्म एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है कि क्यों पति-पत्नी के संबंधों में एक थप्पड़ या एक गाली जैसी बात के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इस तरह दहेज विरोधी कानून और घरेलू हिंसा के कानून के दुरुपयोग के बड़े कारण को इंगित किया जाता है। अमू झूठा केस दायर नहीं करना चाहती लेकिन ईमानदारी से केस दर्ज करना लड़ना और जीतना असंभव है और इस ईमानदारी को उसकी कमजोरी समझ कर उस पर अनर्गल आरोप लगाए जाते हैं। अब तक की उसकी सेवा समर्पण पर गंभीर आक्षेप लगाये जाते हैं। एक साधारण मध्यम वर्ग की लड़की की उच्च मध्यम वर्ग में शादी करने को भी उसकी धन पैसा स्टेटस हड़पने की योजना बता दिया जाता है। दरअसल जब कानून का एक प्रावधान कमजोर होता है तब उसे लागू करवाने के लिये अन्य प्रावधानों का किस तरह दुरुपयोग होता है यह वकीलों के कागजी खेल में खुल कर सामने आता है। तब मजबूरन अमू को घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करना पड़ती है।
फिल्म में तलाक की बात से तिलमिलाए पति द्वारा पत्नी पर लगाए झूठे आरोपों पर कोई आश्चर्य नहीं होता क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच सिर्फ जीतना चाहती है अपने अहं की तुष्टि चाहती है पत्नी को नीचा और गलत साबित करना इसका आसान तरीका है और वही तरीका अपनाया जाता है। 
इस फिल्म में तीन और जोड़े हैं जिनमें स्त्री घुट रही है। दरअसल इस बहाने जब फिल्म के सभी कैरेक्टर को देखा जाता है तो पता चलता है कि पति-पत्नी के इस रिश्ते में कहीं भी बराबरी या बराबर का स्पेस है ही नहीं। कहीं स्त्री अनावश्यक मार खा रही है क्योंकि मारना मर्दानगी है तो कहीं एक सफल वकील अपनी उपलब्धियों के लिए पति और ससुर के नाम के अहसान को सहने के लिए मजबूर है। वहीं एक अकेली महिला एक खूबसूरत शादीशुदा जिंदगी के बाद अपनी बेटी के साथ अकेली है और बेटी की खुशी के लिए एक साथी ढूंढती है लेकिन खुद को अकेले बेहतर पाती है। उसकी टीनएज बेटी जिसने माता-पिता को विवाह बंधन में नहीं देखा वह भी शादी के एक वीभत्स स्वरूप से रूबरू होती है।  अमू की सास उसकी माँ सभी जीवन को समझौते के रूप में जीती हैं जिसमें उनका स्थान दोयम है जिसे समाज ने बना दिया है स्त्रियों ने स्वीकार लिया है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसी को खुद की खुशी समझने के लिए विवश हैं। अमू इस विवशता को तोड़ना चाहती है और उसकी जद्दोजहद दर्शकों को भी बैचेन करती है। पारंपरिक विचार बार बार सिर उठाता है कि आखिर क्यों लेकिन इस क्यों का सामना करना ही पड़ेगा और इसके समाधान के लिए कदम उठाना ही पड़ेगा। 
फिल्म आजकल लड़के के माता-पिता की बड़ी चिंता कि आजकल की लडकियाँ शादी नहीं करना चाहतीं या निभाना नहीं जानतीं को प्रमुखता से उठाती है। हालाँकि फिल्म बहुत स्पष्ट यह संदेश नहीं देती कि शादी नहीं करना ही ठीक है बल्कि दर्शकों को लड़कियों के शादी नहीं करने के कारणों में से एक को मुखरता से उठाती है। 
क्या वाकई शादी में पति-पत्नी दोनों एक गाड़ी के दो पहिये हैं या एक बड़ा फोरव्हील है जिसके साथ दूसरा पहिया सिर्फ घिसटता चला जा रहा है यह प्रश्न विचारणीय है। इस प्रश्न का उत्तर शादी संस्था को समाप्त कर देना तो हरगिज नहीं है लेकिन इस पर विचार कर दोनों पहियों को एक बराबर एक गति से चलने की सोच विकसित करने की आवश्यकता जरूर है।
एक और जोड़ा है अमू की हाउस हेल्पर जिसका पति उसे रोज पीटता है वह रोज पिटती है और कह सुनकर अपना दुख भुलाने की कोशिश करती है। निम्न तबके में ये आम है लाखों औरतें हर रोज यह झेलती हैं और अगले दिन फिर सामान्य होकर घर बाहर के काम करती रहती हैं लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाये कि इनका अपना कोई स्वाभिमान नहीं है उन्हें कोई दुख नहीं होता चोट नहीं पहुंचती? दरअसल उन्हें इंसान ही नहीं समझा जाता वे सिर्फ बहू हैं पत्नी हैं और सब कुछ सहकर शादी बनाए रखना उनकी मजबूरी है क्योंकि न उनके परिवार में कोई उन्हें सपोर्ट करता है और न ही कानून।
दरअसल फिल्म के एक थप्पड़ पर तलाक को इतना प्रचारित किया गया है कि फिल्म के असली प्रश्न नजरअंदाज कर दिये गये हैं। फिल्म उस पुरुष वादी सोच को दर्शाती है कि शादी को बनाए रखने के लिए स्त्री को बहुत सारी कोशिशें करना पड़ती हैं परिवार को जोड़कर रखना स्त्री का काम है। फिल्म में अमू पूछती है कि जिसे जोड़े रखने की कोशिश करना पडे वह तो टूटा हुआ है न?
हमारे देश में महिलाओं की मानसिकता भी पुरुष सत्ता से इस कदर प्रभावित है कि एक पढी लिखी अपने पैरों पर खड़ी महिला भी बहुत सारे कड़वे घूंट पीते हुए शादी को निभाये जाती है क्यों वह खुद नहीं जानती। हाथ उठा कर उसे थप्पड़ नहीं मारा जाता लेकिन उसके आत्मसम्मान को आहत करने के लिए शब्दों के थप्पड़ वह हर दिन चुपचाप बर्दाश्त करती है और समझ नहीं पाती कि उसके लिए कैसे रिएक्ट करे उसे कैसे रोके?
फिल्म में छोटी छोटी डिटेलिंग बहुत खूबसूरत हैं और गहरे अर्थ लिये हुए हैं। कामवाली का बढा कर दिये हुए पैसे वापस करना वकील का अपने दोस्त के साथ घूमने जाना या सुबह जल्दी मिलने के लिए बुलाना अमू की पडोसी दोस्त का उसे हग करना उसकी सास की खामोशी एक समर्थन सी गूंजती है तो भाई का उसकी गर्लफ्रेंड से रिश्ता बिगड़ना। फिल्म का हर फ्रेम कुछ कहता है और दर्शक खामोशी से इसे सुनते हैं। 
भारतीय शादी सदियों से दुनिया का ध्यान खींचती आईं हैं खासतौर पर इनकी लंबाई बड़ी वाहवाही पाती है जबकि अधिकांश शादियों में एक पक्ष घुट रहा है उसकी आकांक्षाएं उसके सपने माता-पिता की दहलीज पार करते ही किसी संदूक में बंद कर दिए जाते हैं और किसी को कभी उसकी याद भी नहीं आती। कोई कभी नहीं पूछता कि तुम्हारे सपने क्या थे तुम क्या चाहती थीं? पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ बिताने वाले भी उम्र के आखिरी पड़ाव तक नहीं जान पाते कि सबके अपने अपने सपने चाहतें होती हैं।
फिल्म एक बार फिर भारतीय समाज में लड़कों की परवरिश को नये नजरिए के साथ करने की ओर ध्यान आकर्षित करती है। शादी में पति-पत्नी की बराबरी को अमली जामा पहनाने से हम कितने दूर हैं यह बात शिद्दत से उठाती है और अगर थप्पड़ और तलाक को परे रखकर देखें तो और भी बहुत कुछ देखने और सोचने पर मजबूर करती है। 
कविता वर्मा 

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं...