कल एक प्रायवेट बैंक में जाना पड़ा। पड़ा इसलिये क्योंकि मैं ज्यादातर बैंक जाना बिल भरना सब्जी खरीदने जैसे काम करना पसंद नहीं करती लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मुझे ये काम नहीं आते। आते भी हैं और जरूरत होने पर करती भी हूँ। अब चूँकि पतिदेव का प्रमोशन हो गया है और उनका वर्किंग डे में इंदौर आना कम ही होता है इसलिये काफी समय से पेंडिंग यह काम मैंने ही करने का सोचा।
Saturday, March 18, 2023
बैंक में एक दिन अनायास
Saturday, March 11, 2023
टेसू तेरे रंग अनेक
टेसू का नाम आते ही गहरे नारंगी लाल रंग के फूलों की तस्वीर आँखों में आ जाती है। होली के पहले ही इनकी आमद हो जाती है और ऐसा लगता है मानों जंगल में आग लगी हो।
खरगोन जाते हुए जंगल से भरी घाटियाँ पड़ती हैं। घाट सेक्शन में सफर मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है लेकिन फिर भी इस जंगल का मोह मुझे इसी रास्ते पर ले जाता है।
इस साल टेसू जी खोल कर फूला है। जंगल में दूर दूर तक लाल फूलों से लदे पेड़ बार बार रुकने को मजबूर करते हैं लेकिन रुक जाने भर से मन नहीं भरेगा और मंजिल तक पहुँचना मुश्किल हो जायेगा इसलिये बस चलते रहते हैं।
पतिदेव के प्रमोशन के साथ एक मुश्किल यह हुई कि अब उनका इंदौर आना जाना कम हो गया। हेडक्वार्टर न छोड़ने की मजबूरी लेकिन मुझे तो इंदौर खरगोन दोनों ही घर देखना है।
होली पर अकेले ही थी लेकिन रंगपंचमी साथ मनाने के लिए आज सुबह इंदौर से अकेले ही गाड़ी लेकर निकल पड़ी।
गाड़ी तो लेने आ भी जाती लेकिन सामने सीट पर सफर में इतने चक्कर आते हैं कि पीछे सीट पर बैठ कर सफर बिलकुल असंभव है।
तो हुआ यह कि गाड़ी तो अपनी पूरी रफ्तार में थी टेसू लाल रंग दिखा रोक रहे थे लेकिन मन कड़ा कर उन्हें बाय कहते बढ़ती जा रही थी। एक कारण और था रास्ते में न रुकने का। कई जगह साथ चलती गाड़ी ओवरटेक करते लोग गाड़ी में झांक कर सुनिश्चित कर रहे थे कि बयडी अकेली छे।
तभी अचानक ऐसा कुछ दिखा कि अस्सी की गति को झटके से विराम देना पड़ा।
अहा सड़क किनारे केसरिया रंग का टेसू।
टेसू या पलाश का एक और रंग है पीला यह तो पता था। घाटी में पीले रंग के टेसू के आठ दस पेड़ हैं जिन्हें पिछली बार भी देखा था और पिछले बरस भी। उनके बारे में लिखा नहीं क्योंकि फिर शायद वे फूल बच नहीं पाते लेकिन यह तो एक अनोखा रंग है।
गाड़ी तुरंत पीछे ली और दो चार फोटो लीं। अहा आज की यात्रा का प्रतिसाद। मन तो नहीं था कि इस दुर्लभ पेड़ के बारे में बताऊँ क्योंकि ज्यादा जानकारी पेड़ के लिए खतरा हो सकती है लेकिन दुर्लभ है इसलिए जानकारी देना जरूरी है ताकि संरक्षण किया जा सके।
अगर आपको सफर में यह पेड़ दिखे तो बस दूर से देखिये फोटो लीजिये फूल तोड़ने की कोशिश मत कीजिये क्योंकि एक पेड़ के फूलों पर ही बीज बनाने का और अपनी प्रजाति को बचाने का भार होता है।
फोटो में तीनों रंग के टेसू देखिये और प्रकृति द्वारा दी जा रही होली और रंगपंचमी की शुभकामनाओं को दिल से महसूस कीजिये।
Wednesday, December 14, 2022
नर्मदा यात्रा
परकम्मा 1
एक दिन में कितने किलोमीटर चल सकते हैं के विचार के साथ हिम्मत जुटाई गई थी यात्रा की। यात्रा जो की जा रही हैं सदियों से नदियों के किनारे की जंगलों की तीर्थ स्थलों की। हमारे मन में था इसका मूल भाव। यात्रा प्रकृति को निहारने की उसका हिस्सा बन जाने की उसमें समा जाने की उसे खुद में समाहित कर लेने की।
वर्ष 2022 के दूसरे महिने में औचक शुरू हुई यात्रा ने इतना उत्साहित कर दिया कि वर्ष की समाप्ति के दो महीने पहले फिर निकल पड़े नर्मदा और उसके किनारे के जंगलों में खो जाने को।
जहाँ पहले एक बड़े समूह की योजना थी जो बहुत सारी व्यवस्थाओं और खर्च को देखते हुए सीमित साथियों के साथ शुरू की गई। पिछली यात्रा से इतर इस बार खूब योजना बनीं खूब रिसर्च किये और अंततः तय हुई यात्रा की तिथि।
सुबह अपने अपने साधन से एक स्थान पर मिलना तय हुआ और तय हुआ जीवन को तय मानकों से इतर कुछ दिन बिताना।
जंगल के रास्ते केवडेश्वर महादेव पहुंचे तो वहाँ से नर्मदा का खूबसूरत प्रवाह दिखा लेकिन यह समझते देर न लगी कि यहाँ से बाकी साथियों का आना असंभव है। मोबाइल नेटवर्क नहीं था बडवाह शहर से मात्र दस किलोमीटर दूर मोबाइल नेटवर्क नहीं था तो न संपर्क कर सकते थे न गूगल महाराज की सेवा ले सकते थे। तय किया कि सुरतीपुरा तालाब के किनारे नाग मंदिर में रुक कर साथियों का इंतजार किया जाये।
सुदूर जंगल में एक मंदिर सेवा करने वाले चार छह लोग और मंदिर भी सड़क से बारह फीट नीचे उतर कर तालाब किनारे। जंगल में लकड़ी लेने आईं लडकियाँ औरतें जो ऊपर सड़क किनारे बैठे सुस्ता रही थीं बतिया रही थीं । न कोई परिचित न नेटवर्क लेकिन मन में भय का कोई विचार ही नहीं।
नर्मदे हर के अभिवादन के साथ ही आप इस में प्रवेश करने सुस्ताने और चाय पाने के अधिकारी हो जाते हैं। नाग देवता आदिवासियों के ईष्ट देव हैं और उनके मंदिर में सभी सुरक्षित। मैंने वहाँ रुकना निश्चित किया पतिदेव को आफिस जाना था वे चले गए।
मंदिर के बगल में बना हुआ है बड़ा हाॅल जो परकम्मा वालों की विश्राम स्थली है। आओ अपनी चादर बिछाओ और सोओ लेटो। हाल से उतर कर जाती हैं सीढियाँ तालाब किनारे जो पानी काई कमल के पत्रों से ढंकी हैं। तालाब के ऊपर फैले कमल के पत्ते उन पर गिरे सागौन के सूखे पत्ते उनके बीच सिर उठाए खड़े कमल के फूल और उन तक जाने के लिए एक डोंगी आसपास चहकते पंछी। सच कहूँ अगर साथियों का इंतजार नहीं होता न तो वहाँ दिन भर बैठकर एक कहानी तो बुन ही लेती।
चाय बनकर आ गई समय न खाने का था न नाश्ते का लेकिन अतिथि को कुछ तो देना चाहिए इसलिये सेवादार दो सेब लेकर आया दीदी खा लीजिये। बहुत आग्रह किया मान तो रखना था फिर चाय बनकर आ गई कड़क मीठी निमाडी चाय।
इस नीरवता में बाहर से आती लड़कियों पंछियों की चहकती आवाजें सेवादारों की भोजन की तैयारी की बातचीत भी शामिल थीं। थोड़ी देर में गाड़ी की आवाज के साथ इंतजार खत्म हुआ। बाहर आई तो पता चला गाड़ी तो आई है लेकिन साथी आधा किलोमीटर जंगल में चलने का प्रलोभन छोड़ नहीं पाए तो पैदल आ रहे हैं।
आते ही सब जुट गये अपने अपने पसंदीदा चीजों की फोटो लेने किसी को जंगल भाया किसी को तालाब तो कोई लड़कियों के सिर पर लकड़ियों की भारी के बावजूद उनकी उत्फुल्लता से रीझ गया तो किसी को आगे जाते रास्ते ने मोहा। फिर लगा जयकारा नर्मदे हर शुरू हुई यात्रा।
कविता वर्मा
Saturday, November 12, 2022
अब तो बेलि फैल गई
मेरी बात
दूसरी ओर अकेले पुरुष की स्थिति इतनी उपेक्षित है कि उसकी उपस्थिति की स्वीकार्यता ही नहीं दिखती। अगर वह लंपट है तो शायद घुसपैठ बना ले लेकिन शरीफ अकेला अपने अपराध बोध से ग्रस्त और जिम्मेदारियों से दबा पुरुष न खुद खुलकर समाज का हिस्सा हो पाता है और न ही समाज उसका बाँहें फैलाकर स्वागत करता है। वह या तो अपने जैसे अकेले साथियों को ढूँढे या अपने सुख-दुख और अकेलेपन के साथ खुद में सिमटा रहे।
भारतीय समाज में खून के रिश्ते हमेशा सर्वोपरि रहे हैं जबकि इनमें निरंतर हास देखा गया है। सुख दुख में कहीं ये सबसे बढ़कर हैं तो कहीं तटस्थ और कहीं इससे भी आगे बढ़कर स्वार्थ सिद्धि का साधन। फिर भी इन का कमजोर होना, टूटना दिल को दुख देता है। यह किसी भी व्यक्ति के जीवन का इतना गहरा आघात होता है कि इसके बाद किसी अन्य पर विश्वास होना तो कठिन होता ही है खुद पर से विश्वास खत्म हो सकता है। ऐसे लोगों की स्थिति समझना आम लोगों के लिए संभव नहीं होता। समाज में बदलाव आते आते भी पुरानी धारणाएँ मन को जकड़ती हैं। महानगर की विराटता में यह जकड़न भले शिथिल पड़े इसके पहले व्यक्ति लंबी प्रक्रिया से गुजरता है।
'अब तो बेलि फैल गई' ऐसे ही लोगों के जीवन की कहानी है जो अचानक मिले, अपनी और एक दूसरों की जरूरतों के चलते जुड़ते गए, इस जुड़ाव से उपजी जिम्मेदारी ने विश्वास पैदा किया जो दोस्ती में बदलते एक मुकाम पर पहुँचा।
Tuesday, September 13, 2022
बाल बाल बचे
#बाल_बाल_बचे
#गुस्से_के_गुड_इफेक्ट
मोबाइल हाथ में ही था जब एक मैसेज आया कि अकाउंट में तीन सौ रुपये आये हैं। एक बार देखा फिर सोचा आये होंगे और वापस अपने सर्फिंग में व्यस्त हो गई। वैसे भी यह विभाग मेरा नहीं है इसलिये कभी देखती भी नहीं हूँ हाँ पतिदेव को फारवर्ड कर देती हूँ तो कर दिया।
तभी एक अनजान नंबर से फोन आया "मैडम आपके अकाउंट में गलती से हमारे तीन सौ रुपये आ गये आप उसे उसी नंबर पर वापस कर दीजिए। हमसे गलती से चले गये।"
सुनते ही वह मैसेज दिमाग में कौंधा। लगा शायद किसी ने मोबाइल रिचार्ज किया होगा (क्योंकि मैं बस इतना ही करती हूँ तो इसके आगे सोच ही नहीं पाई) और एकाध डिजिट गलत दबा दी।
"हाँ तीन सौ रुपये तो आये हैं लेकिन उन्हें वापस कैसे करना है यह मुझे नहीं आता "मैंने असमर्थता जताई।
तभी पीछे से कोई दूसरा लड़का बोला "मैडम वो हम रास्ते में थे जल्दी जल्दी में गलत नंबर चला गया। हमारे लिये बहुत मुश्किल हो जायेगी आप उसे वापस कर दीजिए।"
"कहाँ से बोल रहे हो? "
"बड़ौद से हम बाहर जा रहे थे। "
अब तक मुझे उन पर दया आने लगी लेकिन तब भी मुझे सच में समझ नहीं आया कि उसके पैसे कैसे वापस करूँ।
" ऐसा करिये कि आप इंदौर आयें तो बता दें मैं कैश में आपके पैसे वापस कर दूँगी "
अब उसने पैंतरा बदला" मैडम हम बैंगलोर में हैं वहाँ से आने में ही हमें तीन हजार रुपये लग जाएंगे।"
"तो आपको ध्यान रखना चाहिए था। मैंने तो आपको कहा नहीं था पैसे डालने के लिए" बार बार एक ही बात दोहराते मेरा धैर्य जवाब देने लगा।
" मैडम प्लीज कर दीजिए न इंसानियत के लिए..."
अब तो मेरा पारा हाई हो गया।" इंसानियत के लिए का क्या मतलब? अगर मुझे पैसे वापस करना नहीं आता तो क्या मैं जानवर हो गई? क्या करूँगी मैं आपके तीन सौ रुपट्टी का? क्या बोल रहे हो कुछ समझ आ रहा है?"
अब पता नहीं मेरे गुस्से से या बातचीत से घबराकर उन्होंने कहा ठीक है मैडम और फोन बंद कर दिया।
फोन बंद करने के बाद मैंने थोड़ी देर सोचा फिर मुझे लगा कि फोन नंबर पर भी तो पे किया जा सकता है। बेचारे के लिए तीन सौ रुपये बड़ी रकम हो सकती है और मैं किसी के पैसे रखकर क्या करूँगी?
तो इंसानियत दिखाते हुए फोन नंबर पर पेमेंट करने का सोचा और एप खोलकर नंबर टाइप करने लगी। आधा नंबर टाइप करने के बाद अचानक न जाने कैसे दिमाग में कौंधा कि कहीं ये कोई फ्राड तो नहीं है? इतना ध्यान आते ही मैंने एप तुरंत बंद किया और हसबैंड को फोन लगाया।
जैसे ही उन्हें बताया वे तुरंत बोले कुछ मत करना यह फ्राड है अकाउंट डिटेल चली गई तो अकाउंट साफ हो जायेगा।
हे भगवान तो इंसानियत दिखाने की बात उकसाने के लिए थी वह तो भला हो जल्दी हाइपर होने की अपनी आदत का कि मैं भड़क गई और बाल बाल बची।
कविता वर्मा
Monday, February 28, 2022
प्रेस किये कपड़े
प्रेस किये कपड़े
पतिदेव की पोस्टिंग राजपुर में थी। घर के कुछ जरूरी सामान साथ लाये थे क्योंकि तब उस छोटे से कस्बे में इतना बड़ा घर मिलना ही मुश्किल था कि सभी सामान समा जाये। इन सामानों में कपड़े प्रेस करने वाली इस्त्री भी थी।
दरअसल हमारे पापाजी बहुत बढ़िया कपड़े प्रेस करते थे और उन्हें देखकर हमने सीखा। शादी के पहले पतिदेव खुद कपड़े प्रेस करते थे और बाद में धीरे धीरे यह काम हमने ले लिया। जिस दिन कपड़े धुलते उसी दिन प्रेस हो जाते और व्यवस्थित रखाते। एक के ऊपर एक रखने से निकालने में बिगड़ न जायें इसलिये कपड़े की एक जोड़ी छोटी तह में हैंगर पर टांग देती। राजपुर में शहर के व्यस्त चौराहे पर ही घर था और वहाँ एक चबूतरे पर एक प्रेस वाली बैठती थी। वह घर आकर बोल गई कि कपड़े भिजवा दिया करो मैं खुद आकर दे जाऊँगी। हालाँकि वह समय इतनी रईसी का नहीं था फिर भी कभी-कभी कपड़े भिजवा देती थी। लेकिन उसके प्रेस किये कपड़े पसंद ही नहीं आते थे। शोल्डर तक प्रेस न पहुंचती आस्तीन में पेंट में डबल क्रीज बन जाती आस्तीन मोड़ कर तह करने में उसमें ढेर सिलवटें आ जातीं। जब भी पतिदेव पहनते तब तब मैं भुनभुनाती और वे कहते ठीक है गरीब है हमसे उम्मीद है कभी-कभी भेज दिया करो।
एक दिन मैंने उसे तीन-चार जोड़ी कपड़े भेजे और घर में बेटी की यूनिफार्म और पतिदेव के कुछ कपड़े प्रेस किये। तभी उसने कपड़े भिजवाये और उन्हें अलमारी में टांगने के पहले उनकी प्रेस देखकर माथा भन्ना गया। मैंने बेटी को भेजकर उसे बुलवाया। वह आई तो मैंने उसकी प्रेस की शर्ट खोलकर उसे दिखाई साथ ही अपने हाथ की प्रेस किये कुछ कपड़े उसे दिखाये। उसे बताया कि शोल्डर आस्तीन और पेंट की प्रेस में क्या दिक्कतें हैं और यह भी कि ऐसे कपड़े पहन कर बड़े अधिकारियों के साथ मीटिंग करना ठीक नहीं लगता। उसे बताया कि बात पैसों की नहीं है लेकिन काम जिस तरह होना चाहिये वैसा ही चाहिये उससे कम बर्दाश्त नहीं है। अगर ऐसा काम कर सको तो मैं कपड़े भिजवा दिया करूंगी।
उसने कपड़े देखे और आश्चर्य से उसका मुँह खुला रह गया कि ये कपड़े मैंने नार्मल घरेलू प्रेस से बनाये हैं। उसने तीन-चार बार पूछ कर तसल्ली की फिर उसे एक शर्ट प्रेस करके दिखाई।
अब उसे कहने को कुछ नहीं रह गया था मैंने कहा कि मैं कपड़े भिजवाऊंगी लेकिन प्रेस ध्यान से करना।
यह पढ़कर शायद लगे कि गरीब महिला को काम देना चाहिए लेकिन पैसे देकर काम करवाने पर काम की क्वालिटी मिलना ही चाहिये और इसके लिए उन्हें आगाह करना उनके भले के लिए ही होता है कोई क्रूरता नहीं होती।
#यादें
Sunday, November 14, 2021
नाटक लेडीज संगीत
तुम सुंदर हो खुद को आइने में देखो और खुद को जानो।
तुम माधुरी नहीं मधु हो और मधु बनकर नाचो किसी और की तरह क्यों होना चाहती हो।
शादी में ये भारी लंहगे सांस रोकने वाले टाइट ब्लाउज क्यों पहनाए जाते हैं?
आपके और पापा के बीच क्या चल रहा है आप उनसे बात क्यों नहीं करतीं जाइये उनसे बात करिये।
मुझे अपना अधिकार चाहिये मुझे उससे मिलना है जिसने आपको मुझसे छीन लिया है।
सेक्स के लिए शादी करना क्यों जरूरी है?
एक दूसरे के अच्छे दोस्त बने रहने के लिए एक दूसरे का साथ देने के लिए शादी करना क्यों जरूरी है?
शास्त्रीय गायन की बंदिशों में नायिका गोरी खूबसूरत ही क्यों होती है वह साधारण क्यों नहीं हो सकती?
शादीशुदा महिलाएँ सेक्स करते हुए आर्गेज्म को महसूसती हैं?
क्या शादी सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए की जाती है?
ऐसे बहुत सारे प्रश्न उठाता नाटक #लेडीजसंगीत कल इंदौर में यूनिवर्सिटी आडिटोरियम में रसभारती के आयोजन में प्रस्तुत किया गया। मुंबई के बाइस कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस संगीतमयी प्रस्तुति में एक शादी के लेडीज संगीत की तैयारी के दौरान इन गंभीर प्रश्नों को उठाया गया।
रसभारती द्वारा आयोजित दिये गये समय से लगभग चालीस मिनट बाद शुरू हुए इस नाटक लेडीज संगीत में गीत संगीत हँसी मजाक के द्वारा मुख्यतः महिलाओं के प्रति समाज की सोच और उस सोच में ढली महिलाओं का खुद की सीमा तय कर एक खुशहाल जिंदगी जीने के पीछे छुपे दर्द और प्रश्नों को उभारने का प्रयास हुआ।
गाँव की हवेली में दादी की जिद के चलते पारंपरिक शादी में वेडिंग प्लानर द्वारा की गई व्यवस्था और उसके बीच उभरते इन प्रश्नों का सामना करते दर्शक कहीं कहीं अनावश्यक लंबे खींचे गये दृश्यों को शांति से देखते रहे। स्त्री शरीर के अंगों को मादकता और पुरुषों को लुभाने वाले हथियार के रूप में प्रयोग करने वाले कुछ दृश्य बाडी शेमिंग की तरफ कब बढ गये यह शायद कलाकार और डायरेक्टर समझ नहीं सके या शायद हास्य को अश्लील बनाकर परोसने के लोभ में उस हद को पार कर गये।
गीतों के साथ आगे बढ़ते इन प्रश्नों के जवाब पाने की कोशिश की गई। पुराना सभी अच्छा और नया सब खराब नहीं है इसे स्थापित करने का प्रयास कथावस्तु पर हावी रहा। हालाँकि दादी द्वारा शास्त्रीय संगीत की बंदिशों का गायन और पोती द्वारा उन्हें नये अंदाज में गाना और इस दौरान दादी का धैर्य पोती का अधैर्य बेहद रोचक रहा।
कोरोना काल के बाद संभवतः यह पहली नाट्य प्रस्तुति थी जिसे सराहा जाना चाहिए लेकिन कुछ मुद्दे इंदौर जैसे शहर के दर्शकों द्वारा हजम किये जाना मुश्किल ही था जैसे बेटी का माँ से सेक्स के आर्गेज्म तक पहुंचने बाबत पूछना या पच्चीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद पति का गे होना अविश्वसनीय परिस्थितियां बनाता गया और दर्शकों की रुचि कम करता गया।
नाटक में कुछ तथ्यात्मक गलतियाँ भी थीं जो अखरने वाली थीं।
नाटक के बीच मध्यांतर ने भी इस लय को तोड़ा। बहुत सारे मुद्दों को समेटने के कारण किसी एक को समग्रता से नहीं उठाया जा सका। बहरहाल कुछ संवादों गीतों और बंदिशों ने ध्यान आकर्षित किया।
मंच और लाइट का इस्तेमाल अच्छा हुआ। कलाकारों द्वारा लाइव गायन ने आकर्षित किया संगीत भी अच्छा था।
कविता वर्मा
#लेडीजसंगीत
#हिन्दी_नाटक
प्यार के दो बोल
म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...
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बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और ...
