Monday, February 28, 2022

प्रेस किये कपड़े

 प्रेस किये कपड़े

पतिदेव की पोस्टिंग राजपुर में थी। घर के कुछ जरूरी सामान साथ लाये थे क्योंकि तब उस छोटे से कस्बे में इतना बड़ा घर मिलना ही मुश्किल था कि सभी सामान समा जाये। इन सामानों में कपड़े प्रेस करने वाली इस्त्री भी थी।

दरअसल हमारे पापाजी बहुत बढ़िया कपड़े प्रेस करते थे और उन्हें देखकर हमने सीखा। शादी के पहले पतिदेव खुद कपड़े प्रेस करते थे और बाद में धीरे धीरे यह काम हमने ले लिया। जिस दिन कपड़े धुलते उसी दिन प्रेस हो जाते और व्यवस्थित रखाते। एक के ऊपर एक रखने से निकालने में बिगड़ न जायें इसलिये कपड़े की एक जोड़ी छोटी तह में हैंगर पर टांग देती। राजपुर में शहर के व्यस्त चौराहे पर ही घर था और वहाँ एक चबूतरे पर एक प्रेस वाली बैठती थी। वह घर आकर बोल गई कि कपड़े भिजवा दिया करो मैं खुद आकर दे जाऊँगी। हालाँकि वह समय इतनी रईसी का नहीं था फिर भी कभी-कभी कपड़े भिजवा देती थी। लेकिन उसके प्रेस किये कपड़े पसंद ही नहीं आते थे। शोल्डर तक प्रेस न पहुंचती आस्तीन में पेंट में डबल क्रीज बन जाती आस्तीन मोड़ कर तह करने में उसमें ढेर सिलवटें आ जातीं। जब भी पतिदेव पहनते तब तब मैं भुनभुनाती और वे कहते ठीक है गरीब है हमसे उम्मीद है कभी-कभी भेज दिया करो।

एक दिन मैंने उसे तीन-चार जोड़ी कपड़े भेजे और घर में बेटी की यूनिफार्म और पतिदेव के कुछ कपड़े प्रेस किये। तभी उसने कपड़े भिजवाये और उन्हें अलमारी में टांगने के पहले उनकी प्रेस देखकर माथा भन्ना गया। मैंने बेटी को भेजकर उसे बुलवाया। वह आई तो मैंने उसकी प्रेस की शर्ट खोलकर उसे दिखाई साथ ही अपने हाथ की प्रेस किये कुछ कपड़े उसे दिखाये। उसे बताया कि शोल्डर आस्तीन और पेंट की प्रेस में क्या दिक्कतें हैं और यह भी कि ऐसे कपड़े पहन कर बड़े अधिकारियों के साथ मीटिंग करना ठीक नहीं लगता। उसे बताया कि बात पैसों की नहीं है लेकिन काम जिस तरह होना चाहिये वैसा ही चाहिये उससे कम बर्दाश्त नहीं है। अगर ऐसा काम कर सको तो मैं कपड़े भिजवा दिया करूंगी।

उसने कपड़े देखे और आश्चर्य से उसका मुँह खुला रह गया कि ये कपड़े मैंने नार्मल घरेलू प्रेस से बनाये हैं। उसने तीन-चार बार पूछ कर तसल्ली की फिर उसे एक शर्ट प्रेस करके दिखाई।

अब उसे कहने को कुछ नहीं रह गया था मैंने कहा कि मैं कपड़े भिजवाऊंगी लेकिन प्रेस ध्यान से करना।

यह पढ़कर शायद लगे कि गरीब महिला को काम देना चाहिए लेकिन पैसे देकर काम करवाने पर काम की क्वालिटी मिलना ही चाहिये और इसके लिए उन्हें आगाह करना उनके भले के लिए ही होता है कोई क्रूरता नहीं होती।

#यादें

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (02-03-2022) को चर्चा मंच        "शंकर! मन का मैल मिटाओ"    (चर्चा अंक 4357)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. रोचक और प्रेरक प्रसंग

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  3. बढ़िया। गुणवत्ता के प्रति प्रेरित करना भी हमारा कर्तव्य है।

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प्रेस किये कपड़े

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