Saturday, November 12, 2022

अब तो बेलि फैल गई

 मेरी बात 


आम मध्यमवर्ग के पास जब कमाने खाने की चिंता कुछ कम होती है तब उनके जीवन में अलग तरह के दुख चिंता परेशानी अपनी पैठ बना लेते हैं। वे इतने चुपके से जीवन में रिसते हैं कि बाहर से दिखते नहीं है और अपनी सीलन से जीवन की उष्णता को बुझाते रहते हैं। हर दिन हर क्षण जीवन के उमंग उत्साह के कम होते रहने से जीवन में व्याप्त अंधेरी सीलन का एहसास तब होता है जब उसमें भावनाओं का कोई दीपक टिमटिमाने लगे। 
समाज में अकेली स्त्री का जीवन कठिन है उसके हर क्रियाकलाप पर नजरों की पहरेदारी रहती है। इन नजरों के बीच, बेचारगी और लांछनों को परे रख स्व को बचाए रखना एक कठिन और सतत प्रक्रिया है। जरा चूके और सम्मान आत्मभिमान दम तोड़ देगा। इसके बावजूद यह स्त्री का नैसर्गिक गुण है या समाज की सदाशयता वह इस अकेली स्त्री को अपने में शामिल कर लेता है। प्यार दोस्ती सहानुभूति बेचारगी लाँछना और मदद के जरिए उसके होने की स्वीकृति देता है। 

दूसरी ओर अकेले पुरुष की स्थिति इतनी उपेक्षित है कि उसकी उपस्थिति की स्वीकार्यता ही नहीं दिखती। अगर वह लंपट है तो शायद घुसपैठ बना ले लेकिन शरीफ अकेला अपने अपराध बोध से ग्रस्त और जिम्मेदारियों से दबा पुरुष न खुद खुलकर समाज का हिस्सा हो पाता है और न ही समाज उसका बाँहें फैलाकर स्वागत करता है। वह या तो अपने जैसे अकेले साथियों को ढूँढे या अपने सुख-दुख और अकेलेपन के साथ खुद में सिमटा रहे।

अकेले पुरुष को समाज में कोई महत्व ही नहीं दिया जाता वह भी कहाँ अपनी परेशानियाँ कह पाता है और कहे भी तो सुने कौन समझे कौन? इसका यह मतलब तो नहीं है कि सब बढ़िया है मजे में है। इस बढ़िया के तले देखने की कोशिश की है इस उपन्यास में। 
जीवन में प्रेम पाने की ललक युवावस्था में ज्यादा होती है एक लंबा जीवन जी कर सब कुछ पाकर बहुत कुछ खो देने वाले इंसान के लिए प्रेम करना इतना आसान भी नहीं है। बल्कि वह तो इस एहसास को जुबान पर लाते और महसूस करते भी कतराते हैं। उसे तो इसके पहले बचे हुए को समेटने की चिंता सताती है। रिश्तों पर विश्वास कर पाने की जद्दोजहद, दबाव, छलावा, छवि का तड़कना ऊपर से शांत दिखने वाले जीवन की तलहटी में हलचल मचाते हुए धुँधलापन फैलाते रहते हैं। ये जीवन के झंझावात की तरह होते हैं जिनसे बचना आसान नहीं है। 
खोकर पाने और पाकर खोने वालों के लिए जीवन को देखने की दृष्टि अलग-अलग होती है। जिसने सब कुछ पाकर खोया है वह बचे हुए की सार संभाल के लिए सतर्क होता है। कुछ और पाने की आकाँक्षा भले हो लेकिन बचे हुए को दाँव पर लगाने की हिम्मत नहीं होती। जीवन के हर कदम हर निर्णय पर इसका असर स्पष्ट नजर आता है। खो देने के बाद का खालीपन जीवन पर छाया रहता है। 
खोकर पाने वाले का जीवट शायद कुछ बड़ा होता है। वे खोने के दर्द को पीना सीख जाते हैं और फिर आगे बढ़ना भी। इन दोनों ही तरह के लोगों के परस्पर सामंजस्य से जिंदगी की मुश्किलें हल करने की दिशा मिलती है। यही दोस्ती के दायरे बनाती है तो इससे आगे बढ़कर प्रेम और विश्वास की राह भी। 

भारतीय समाज में खून के रिश्ते हमेशा सर्वोपरि रहे हैं जबकि इनमें निरंतर हास देखा गया है। सुख दुख में कहीं ये सबसे बढ़कर हैं तो कहीं तटस्थ और कहीं इससे भी आगे बढ़कर स्वार्थ सिद्धि का साधन। फिर भी इन का कमजोर होना, टूटना दिल को दुख देता है। यह किसी भी व्यक्ति के जीवन का इतना गहरा आघात होता है कि इसके बाद किसी अन्य पर विश्वास होना तो कठिन होता ही है खुद पर से विश्वास खत्म हो सकता है। ऐसे लोगों की स्थिति समझना आम लोगों के लिए संभव नहीं होता। समाज में बदलाव आते आते भी पुरानी धारणाएँ मन को जकड़ती हैं। महानगर की विराटता में यह जकड़न भले शिथिल पड़े इसके पहले व्यक्ति लंबी प्रक्रिया से गुजरता है।
 
वस्तुतः मानव का स्वभाव, निर्णय लेने की क्षमता उसके जीवन की इन्हीं घटनाओं और उसे मिलने वाले व्यवहार से प्रभावित होती हैं, जिसे जाने समझे बिना किसी को टैग करना हमारे समाज में बेहद आम है। घटनाएँ भले छोटी हों उनके प्रभाव गहरे और व्यापक होते हैं।

'अब तो बेलि फैल गई' ऐसे ही लोगों के जीवन की कहानी है जो अचानक मिले, अपनी और एक दूसरों की जरूरतों के चलते जुड़ते गए, इस जुड़ाव से उपजी जिम्मेदारी ने विश्वास पैदा किया जो दोस्ती में बदलते एक मुकाम पर पहुँचा।
 यह उपन्यास इन्हीं परिस्थितियों के दुख तनाव के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी लय पाता रहा है।  इसके पात्र हमारे आपके आसपास के छोटे कस्बे से महानगर तक विद्यमान हैं।
इस उपन्यास को लिखते पात्रो की बैचेनियों ने लिखने न दिया लेकिन डॉ सोनल ने लगातार हौसला बनाया तो आदरणीय सुनील चतुर्वेदी जी ने इसे पढ़कर आश्वस्त किया और इसे पूरा करने की राह प्रशस्त की। प्रिय छोटी बहन रक्षा दुबे चौबे जिन्होंने पुस्तक के कवर पेज को बनाने की जिम्मेदारी अपनी व्यस्तताओं के बाबजूद उठाई। उनकी बहुत आभारी हूँ।
इसे पढ़ते अगर आप अपने आसपास के लोगों को देखते और समझते हैं तो यह इस उपन्यास की सार्थकता होगी। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा। 

अत्यंत हर्ष के साथ सूचित किया जता है कि मेरा उपन्यास ‘अब तो बेलि फैल गई’, ‘अद्विक पब्लिकेशन’ (दिल्ली) से प्रकाशित हुआ है। जिसे पाठक अमेज़न से या सीधे ही प्रकाशक से सम्पर्क कर प्राप्त कर सकते हैं।

प्रकाशक अशोक गुप्ता जी से सम्पर्क कर पुस्तक मँगवाने पर प्रथम सौ पाठकों के लिए डाक-शुल्क ‘अद्विक पब्लिकेशन’ द्वारा वहन किया जाएगा।

अपनी प्रति प्राप्त करने के लिए कृति का मूल्य रु. 250/- (ढाई सौ मात्र) 9560397075 नंबर पर ‘पेटीएम’, ‘गूगल पे’ या ‘फोन पे’ द्वारा अदा करें और स्क्रीन-शॉट सहित अपना पूरा पता whatsapp कर दें।

कविता वर्मा 

No comments:

Post a Comment

आपकी टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती है।
सार्थक टिप्पणियों का सदा स्वागत रहेगा॥

नर्मदा यात्रा

  परकम्मा 1 एक दिन में कितने किलोमीटर चल सकते हैं के विचार के साथ हिम्मत जुटाई गई थी यात्रा की। यात्रा जो की जा रही हैं सदियों से नदियों के...