Tuesday, September 13, 2022

बाल बाल बचे

 

#बाल_बाल_बचे
#गुस्से_के_गुड_इफेक्ट
मोबाइल हाथ में ही था जब एक मैसेज आया कि अकाउंट में तीन सौ रुपये आये हैं। एक बार देखा फिर सोचा आये होंगे और वापस अपने सर्फिंग में व्यस्त हो गई। वैसे भी यह विभाग मेरा नहीं है इसलिये कभी देखती भी नहीं हूँ हाँ पतिदेव को फारवर्ड कर देती हूँ तो कर दिया।
तभी एक अनजान नंबर से फोन आया "मैडम आपके अकाउंट में गलती से हमारे तीन सौ रुपये आ गये आप उसे उसी नंबर पर वापस कर दीजिए। हमसे गलती से चले गये।"
सुनते ही वह मैसेज दिमाग में कौंधा। लगा शायद किसी ने मोबाइल रिचार्ज किया होगा (क्योंकि मैं बस इतना ही करती हूँ तो इसके आगे सोच ही नहीं पाई) और एकाध डिजिट गलत दबा दी।
"हाँ तीन सौ रुपये तो आये हैं लेकिन उन्हें वापस कैसे करना है यह मुझे नहीं आता "मैंने असमर्थता जताई।
तभी पीछे से कोई दूसरा लड़का बोला "मैडम वो हम रास्ते में थे जल्दी जल्दी में गलत नंबर चला गया। हमारे लिये बहुत मुश्किल हो जायेगी आप उसे वापस कर दीजिए।"
"कहाँ से बोल रहे हो? "
"बड़ौद से हम बाहर जा रहे थे। "
अब तक मुझे उन पर दया आने लगी लेकिन तब भी मुझे सच में समझ नहीं आया कि उसके पैसे कैसे वापस करूँ।
" ऐसा करिये कि आप इंदौर आयें तो बता दें मैं कैश में आपके पैसे वापस कर दूँगी "
अब उसने पैंतरा बदला" मैडम हम बैंगलोर में हैं वहाँ से आने में ही हमें तीन हजार रुपये लग जाएंगे।"
"तो आपको ध्यान रखना चाहिए था। मैंने तो आपको कहा नहीं था पैसे डालने के लिए" बार बार एक ही बात दोहराते मेरा धैर्य जवाब देने लगा।
" मैडम प्लीज कर दीजिए न इंसानियत के लिए..."
अब तो मेरा पारा हाई हो गया।" इंसानियत के लिए का क्या मतलब? अगर मुझे पैसे वापस करना नहीं आता तो क्या मैं जानवर हो गई? क्या करूँगी मैं आपके तीन सौ रुपट्टी का? क्या बोल रहे हो कुछ समझ आ रहा है?"
अब पता नहीं मेरे गुस्से से या बातचीत से घबराकर उन्होंने कहा ठीक है मैडम और फोन बंद कर दिया।
फोन बंद करने के बाद मैंने थोड़ी देर सोचा फिर मुझे लगा कि फोन नंबर पर भी तो पे किया जा सकता है। बेचारे के लिए तीन सौ रुपये बड़ी रकम हो सकती है और मैं किसी के पैसे रखकर क्या करूँगी?
तो इंसानियत दिखाते हुए फोन नंबर पर पेमेंट करने का सोचा और एप खोलकर नंबर टाइप करने लगी। आधा नंबर टाइप करने के बाद अचानक न जाने कैसे दिमाग में कौंधा कि कहीं ये कोई फ्राड तो नहीं है? इतना ध्यान आते ही मैंने एप तुरंत बंद किया और हसबैंड को फोन लगाया।
जैसे ही उन्हें बताया वे तुरंत बोले कुछ मत करना यह फ्राड है अकाउंट डिटेल चली गई तो अकाउंट साफ हो जायेगा।
हे भगवान तो इंसानियत दिखाने की बात उकसाने के लिए थी वह तो भला हो जल्दी हाइपर होने की अपनी आदत का कि मैं भड़क गई और बाल बाल बची।
कविता वर्मा

Monday, February 28, 2022

प्रेस किये कपड़े

 प्रेस किये कपड़े

पतिदेव की पोस्टिंग राजपुर में थी। घर के कुछ जरूरी सामान साथ लाये थे क्योंकि तब उस छोटे से कस्बे में इतना बड़ा घर मिलना ही मुश्किल था कि सभी सामान समा जाये। इन सामानों में कपड़े प्रेस करने वाली इस्त्री भी थी।

दरअसल हमारे पापाजी बहुत बढ़िया कपड़े प्रेस करते थे और उन्हें देखकर हमने सीखा। शादी के पहले पतिदेव खुद कपड़े प्रेस करते थे और बाद में धीरे धीरे यह काम हमने ले लिया। जिस दिन कपड़े धुलते उसी दिन प्रेस हो जाते और व्यवस्थित रखाते। एक के ऊपर एक रखने से निकालने में बिगड़ न जायें इसलिये कपड़े की एक जोड़ी छोटी तह में हैंगर पर टांग देती। राजपुर में शहर के व्यस्त चौराहे पर ही घर था और वहाँ एक चबूतरे पर एक प्रेस वाली बैठती थी। वह घर आकर बोल गई कि कपड़े भिजवा दिया करो मैं खुद आकर दे जाऊँगी। हालाँकि वह समय इतनी रईसी का नहीं था फिर भी कभी-कभी कपड़े भिजवा देती थी। लेकिन उसके प्रेस किये कपड़े पसंद ही नहीं आते थे। शोल्डर तक प्रेस न पहुंचती आस्तीन में पेंट में डबल क्रीज बन जाती आस्तीन मोड़ कर तह करने में उसमें ढेर सिलवटें आ जातीं। जब भी पतिदेव पहनते तब तब मैं भुनभुनाती और वे कहते ठीक है गरीब है हमसे उम्मीद है कभी-कभी भेज दिया करो।

एक दिन मैंने उसे तीन-चार जोड़ी कपड़े भेजे और घर में बेटी की यूनिफार्म और पतिदेव के कुछ कपड़े प्रेस किये। तभी उसने कपड़े भिजवाये और उन्हें अलमारी में टांगने के पहले उनकी प्रेस देखकर माथा भन्ना गया। मैंने बेटी को भेजकर उसे बुलवाया। वह आई तो मैंने उसकी प्रेस की शर्ट खोलकर उसे दिखाई साथ ही अपने हाथ की प्रेस किये कुछ कपड़े उसे दिखाये। उसे बताया कि शोल्डर आस्तीन और पेंट की प्रेस में क्या दिक्कतें हैं और यह भी कि ऐसे कपड़े पहन कर बड़े अधिकारियों के साथ मीटिंग करना ठीक नहीं लगता। उसे बताया कि बात पैसों की नहीं है लेकिन काम जिस तरह होना चाहिये वैसा ही चाहिये उससे कम बर्दाश्त नहीं है। अगर ऐसा काम कर सको तो मैं कपड़े भिजवा दिया करूंगी।

उसने कपड़े देखे और आश्चर्य से उसका मुँह खुला रह गया कि ये कपड़े मैंने नार्मल घरेलू प्रेस से बनाये हैं। उसने तीन-चार बार पूछ कर तसल्ली की फिर उसे एक शर्ट प्रेस करके दिखाई।

अब उसे कहने को कुछ नहीं रह गया था मैंने कहा कि मैं कपड़े भिजवाऊंगी लेकिन प्रेस ध्यान से करना।

यह पढ़कर शायद लगे कि गरीब महिला को काम देना चाहिए लेकिन पैसे देकर काम करवाने पर काम की क्वालिटी मिलना ही चाहिये और इसके लिए उन्हें आगाह करना उनके भले के लिए ही होता है कोई क्रूरता नहीं होती।

#यादें

Sunday, November 14, 2021

नाटक लेडीज संगीत

 तुम सुंदर हो खुद को आइने में देखो और खुद को जानो। 

तुम माधुरी नहीं मधु हो और मधु बनकर नाचो किसी और की तरह क्यों होना चाहती हो। 

शादी में ये भारी लंहगे सांस रोकने वाले टाइट ब्लाउज क्यों पहनाए जाते हैं?

आपके और पापा के बीच क्या चल रहा है आप उनसे बात क्यों नहीं करतीं जाइये उनसे बात करिये।

मुझे अपना अधिकार चाहिये मुझे उससे मिलना है जिसने आपको मुझसे छीन लिया है।

सेक्स के लिए शादी करना क्यों जरूरी है?

एक दूसरे के अच्छे दोस्त बने रहने के लिए एक दूसरे का साथ देने के लिए शादी करना क्यों जरूरी है?

शास्त्रीय गायन की बंदिशों में नायिका गोरी खूबसूरत ही क्यों होती है वह साधारण क्यों नहीं हो सकती?

शादीशुदा महिलाएँ सेक्स करते हुए आर्गेज्म को महसूसती हैं?

क्या शादी सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए की जाती है?

ऐसे बहुत सारे प्रश्न उठाता नाटक #लेडीजसंगीत कल इंदौर में यूनिवर्सिटी आडिटोरियम में रसभारती के आयोजन में प्रस्तुत किया गया। मुंबई के बाइस कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस संगीतमयी प्रस्तुति में एक शादी के लेडीज संगीत की तैयारी के दौरान इन गंभीर प्रश्नों को उठाया गया।

रसभारती द्वारा आयोजित दिये गये समय से लगभग चालीस मिनट बाद शुरू हुए इस नाटक लेडीज संगीत में गीत संगीत हँसी मजाक के द्वारा मुख्यतः महिलाओं के प्रति समाज की सोच और उस सोच में ढली महिलाओं का खुद की सीमा तय कर एक खुशहाल जिंदगी जीने के पीछे छुपे दर्द और प्रश्नों को उभारने का प्रयास हुआ।

गाँव की हवेली में दादी की जिद के चलते पारंपरिक शादी में वेडिंग प्लानर द्वारा की गई व्यवस्था और उसके बीच उभरते इन प्रश्नों का सामना करते दर्शक कहीं कहीं अनावश्यक लंबे खींचे गये दृश्यों को शांति से देखते रहे। स्त्री शरीर के अंगों को मादकता और पुरुषों को लुभाने वाले हथियार के रूप में प्रयोग करने वाले कुछ दृश्य बाडी शेमिंग की तरफ कब बढ गये यह शायद कलाकार और डायरेक्टर समझ नहीं सके या शायद हास्य को अश्लील बनाकर परोसने के लोभ में उस हद को पार कर गये।

गीतों के साथ आगे बढ़ते इन प्रश्नों के जवाब पाने की कोशिश की गई। पुराना सभी अच्छा और नया सब खराब नहीं है इसे स्थापित करने का प्रयास कथावस्तु पर हावी रहा। हालाँकि दादी द्वारा शास्त्रीय संगीत की बंदिशों का गायन और पोती द्वारा उन्हें नये अंदाज में गाना और इस दौरान दादी का धैर्य पोती का अधैर्य बेहद रोचक रहा।

कोरोना काल के बाद संभवतः यह पहली नाट्य प्रस्तुति थी जिसे सराहा जाना चाहिए लेकिन कुछ मुद्दे इंदौर जैसे शहर के दर्शकों द्वारा हजम किये जाना मुश्किल ही था जैसे बेटी का माँ से सेक्स के आर्गेज्म तक पहुंचने बाबत पूछना या पच्चीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद पति का गे होना अविश्वसनीय परिस्थितियां बनाता गया और दर्शकों की रुचि कम करता गया।

नाटक में कुछ तथ्यात्मक गलतियाँ भी थीं जो अखरने वाली थीं। 

नाटक के बीच मध्यांतर ने भी इस लय को तोड़ा। बहुत सारे मुद्दों को समेटने के कारण किसी एक को समग्रता से नहीं उठाया जा सका। बहरहाल कुछ संवादों गीतों और बंदिशों ने ध्यान आकर्षित किया।

मंच और लाइट का इस्तेमाल अच्छा हुआ। कलाकारों द्वारा लाइव गायन ने आकर्षित किया संगीत भी अच्छा था।

कविता वर्मा

#लेडीजसंगीत

#हिन्दी_नाटक 

Thursday, October 21, 2021

नवग्रह मंदिर खरगोन

 आज आपको दर्शन करवाते हैं खरगोन के प्राचीन नवग्रह मंदिर के। खरगोन नगर में प्रवेश करते ही बांई ओर कुन्दा नदी के किनारे एक प्राचीन मंदिर का शिखर दिखाई देता है। बगल से गुजरती अति व्यस्त सड़क के किनारे लेकिन उससे निस्पृह यह मंदिर पिछली यात्राओं में भी आकर्षित करता रहा लेकिन जाना नहीं हुआ।

आज सुबह मंदिर जाने का तय किया। मंदिर के बाहर काफी जगह है वहाँ गाड़ी खड़ी करके एक परकोटे से घिरे आंगन में पहुंचे जिसे काफी उम्रदराज नीम इमली के पेड़ अपनी छाया में लिये हुए थे।

मंदिर की सीढ़ियाँ चढकर ऊपर पहुँचे तब तक भी अंदाजा नहीं था कि कहाँ जा रहे हैं। एक छोटी सी दहलान जिसके बांई ओर छोटे छोटे मंदिर बने थे। मोटी दीवार छोटे दरवाजे वाले इन मंदिरों में अति प्राचीन पत्थर की मूर्तियाँ थीं।  महालक्ष्मी मंदिर शिव मंदिर जिसमें शिव की गोद में कार्तिकेय श्री राम परिवार राम सीता लक्ष्मण भरत और हनुमान की मूर्ति। इसके बाहर एक खूबसूरत कांस्य शिव मूर्ति थी। इन छोटे-छोटे मंदिर के सामने दांई ओर एकदम खड़ी सीढ़ियाँ नीचे उतर रही हैं। ये बारह सीढियाँ बारह राशी की प्रतीक हैं।

नीचे गर्भगृह में दीवार पर बने आले में आठ ग्रहों की मूर्तियाँ उनके नाम वाहन और मंडल की जानकारी के साथ उनके स्तुति श्लोक लिखे हैं।

बीच में सभी गृहों के स्वामी सूर्य और उनके पीछे उनकी अधिष्ठात्री बगलामुखी देवी की प्रतिमा थी। माँ बगलामुखी की यह पीताम्बरा पीठ है। सूर्य अपने रथ पर सवार हैं। इनके पीछे दीवार के ऊपरी सिरे पर एक तिरछा छेद है जिसमें से जून जुलाई में जब सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन होता है तब सूर्य की किरणें सूर्य रथ पर पड़ती हैं।

मंदिर से बाहर जाने का रास्ता दूसरी ओर है यहाँ भी बारह सीढियाँ हैं जो बारह मास चैत्र वैशाख.... फागुन की प्रतीक हैं।

ये सीढ़ियाँ एक और छोटे से कमरे में खुलती हैं जहाँ शनि राहू-केतु की मूर्तियाँ हैं जिन पर भक्त तेल तिल उडद चढ़ा सकते हैं। इसी कमरे के एक ओर छोटे झरोखे हैं जिनसे कुन्दा नदी के दर्शन होते हैं।

यहाँ मंदिर से संबंधित कई खबरों की पेपर कटिंग फोटो और मंदिर के इतिहास की जानकारी है। यह लगभग छह सौ साल पुराना मंदिर है। इस में प्रवेश के लिए सात सीढ़ियाँ हैं जो सात वार की प्रतीक हैं।

नवग्रह की हमारे सभी धार्मिक और प्रकृति के त्योहार में बड़ी मान्यता है। इस मंदिर में भी संक्राति शिवरात्रि शनि जयंती आदि पर भव्य आयोजन होता है।

सबसे अच्छी बात है कि मंदिर अभी भी अपने प्राचीन स्वरूप में है और यहाँ पर्यटक नहीं दर्शनार्थी आते हैं। मंदिर का वातावरण बेहद शांत है। आप दर्शन करते हैं उस शांति को अपने भीतर महसूस करते हैं और उन लोगों की परिकल्पना को सराहते हैं जिन्होंने छह सौ साल पहले इस मंदिर का निर्माण करवाया।

कविता वर्मा 








Wednesday, September 29, 2021

ठगी के तरीके

 #FraudAlert 

मेरे यहाँ अभी मकान खाली है जिसे किराये पर देना है इसके लिए एक एप पर प्रापर्टी डाली है। कुछ दिन पहले मेरे पास एक फोन आया कि मकान किराये पर लेना है।

क्या करते हैं?

आर्मी में हूँ। अभी दिल्ली से महू ट्रांसफर हुआ है।

कहाँ के रहने वाले हैं? फैमिली या सिंगल? 

उत्तराखंड का। फैमिली। मैम हमें तो महू में क्वार्टर मिलेगा लेकिन वहाँ फैमिली रखना ठीक नहीं है इसलिये फैमिली को इंदौर में रखेंगे। मैं रविवार को हाफ डे में आऊंगा।

तो इंदौर में इतनी दूर फैमिली क्यों रख रहे हैं महू या उसके आसपास की कालोनी में रखिये। यहाँ से तो महू बहुत दूर पडे़गा। आप यहाँ के लिये नये हैं आपकी पत्नी अकेले रहेगी तो ऐसी जगह फैमिली रखिये जहाँ आप आधे घंटे में पहुँच सकें।

नहीं मैम वह कोई इश्यू नहीं है मैं आ जाऊंगा। मैंने आपके मकान के फोटो देखे मुझे अच्छे लगे वाइफ को भी पसंद आये। मैं नौ तारीख को फैमिली को लेकर इंदौर आऊँगा तो आप आनलाइन पेमेंट के लिए अकाउंट नंबर दे दीजिए ।

आवाज से वह कम उम्र का ही लग रहा था फिर आर्मी में है तो उसकी मदद कर सुविधा पूर्ण जगह पर मकान लेने में मदद करना चाहती थी। मैंने कहा कि आप आ जाइये इंदौर मकान देख लीजिये यहाँ से महू की दूरी देख लीजिये पेमेंट भी हो जायेगा।

इस बीच उसने अपने आधार कार्ड मिलिट्री आई कार्ड कैंटीन कार्ड और खुद के भी दो तीन फोटो भेज दिये। वे फोटो मैंने हसबैंड को भेजे और उन्हें पूरी बात बताई। 

मैंने उससे कहा ऐसा करिये आप मेरे हसबैंड से बात कर लीजिये। मैंने सोचा कि शायद वे उसे समझा पाएं। हसबैंड ने कहा कि मुझे कुछ गड़बड़ लग रहा है।

कैसे?

कोई ऐसे ही अपने सभी आई कार्ड नहीं देता।

अरे कम उम्र का लड़का सा लग रहा है कोई सरल भी तो हो सकता है कि सहज ही आई कार्ड दे दिये। दुनिया में कहीं कहीं ऐसी सरलता भी बची हुई है। मेरे अंदर का लेखक सिर उठाने लगा। 😀😀

दूसरे दिन सुबह उसका फोन आया मैम उनका फोन नहीं लग रहा है। मुझे नौ तारीख को आना है आप अपना अकाउंट नंबर दे दीजिए ।

मैंने कहा कि फिर से फोन लगाइये जब तक उनसे बात नहीं होगी अकाउंट नंबर नहीं दूँगी। वह बोला ठीक है मैम मैं फिर ट्राई करता हूँ।

थोड़ी देर बाद हसबैंड ने बताया कि उससे बात हुई और उसे कहा कि आप इंदौर आ जाएं फिर पेमेंट भी हो जायेगा। 

थोड़ी देर बाद हसबैंड का फोन आया कि उसे अपने अकाउंट या बैंक की कोई डिटेल मत देना वह फ्राड है।

कैसे पता?

अभी एक फोन आया था कि महू से कर्नल बोल रहा हूँ हमारा एक जवान है उसे मकान चाहिए आपका मकान उसे पसंद आया है उसे अकाउंट नंबर दे दीजिए ताकि वह पेमेंट कर दे। उन्होंने कहा सेना में कर्नल रैंक का आदमी किसी जवान के लिए फोन नहीं करता ।फोन पर वह बहुत धीरे बोल रहा था और मुश्किल से आधा मिनट बात की।

कहना न होगा कि उसके बाद न उसका फोन आया और न ही नौ तारीख को वह खुद आया।


मकान अभी भी खाली है। कल शाम फिर एक फोन आया। मैम आपका मकान खाली है। मैंने वेबसाइट पर देखा था मैं एयरपोर्ट पर काम करता हूँ। छोटी सी फैमिली है पति पत्नी और छोटी बच्ची। मैंने कहा एयरपोर्ट तो यहाँ से काफी दूर है। इतनी दूर मकान क्यों ले रहे हैं वहीं आसपास लीजिये।

नहीं मैम कोई बात नहीं आप अपने मकान के फोटो भेज दीजिए।

फोटो तो वेबसाइट पर हैं वहीं से देख लीजिये अभी मैं खाना बना रही हूँ अभी फोटो नहीं भेज सकती।

ठीक है मैम मैं वाइफ को वहीं फोटो दिखा देता हूँ फिर आपको फोन करता हूँ।

फिर फोन नहीं आया मेरी तरह वह भी आवाज पहचान गया होगा।

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Monday, June 28, 2021

कहानी जो पढी जाना चाहिए

 अभी कुछ दिनों में दो कहानियाँ पढीं जिनके बारे में कहने से खुद को रोक नहीं पा रही। इत्तेफाक से दोनों कहानियाँ सोनल की हैं। सोनल की लेखनी से परिचय उनकी कविताओं के माध्यम से था।  ' देखन में छोटी लगें विचार दें गंभीर ' की तर्ज पर उनकी कविताएँ प्रभावित करती रही हैं। उनके गद्य से परिचय हुआ फिल्म बनती नहीं बनाती भी हैं से जो कालीचाट फिल्म के बनने की और इस दौरान गाँव के सीधे सादे सरल लोगों के बीच खुद को जानन समझने सीखने की संस्मरणात्मक कथा है। हाँ कथा ही है जो आगे क्या की उत्सुकता बनाए रखते चलती है। उनकी पुस्तक कोशिशों की डायरी को इस वर्ष म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा कथेतर गद्य का वागीश्वरी पुरस्कार मिला है। 

तो बात करते हैं कहानियों की। 

पहली कहानी है परीकथा में प्रकाशित चस्का। सोनल की लेखनी में खास बात यह है कि वे अपने आसपास को बेहद सजगता से देखती और विवेचन करती हैं। वे जीवन के छोटे छोटे उल्लास को भी पकड़ती हैं और हँसी के पीछे छुपे दुख और तकलीफों को भी। वे इनमें शामिल होकर उनकी तीव्रता को जैसे महसूस करती हैं वैसे ही शब्दों में उतारती भी हैं और इतनी सरल सहज भाषा में कि आप उसमें रम जाते हैं। वे लोकजीवन के परिवर्तनों को सूक्ष्मता से देखती हैं और उसे उजागर करती हैं। चस्का कहानी ऐसे ही सरोकारों की कहानी है जो आम तौर पर लोगों की नजरों से चूक जाती है। 

खजुराहो के मंदिरों के आसपास घूमने वाले गाइड जो पर्यटकों को घुमाने किताबें या सजावटी सामान बेचने दिन भर भटकते हैं और कभी झिड़के जाते हैं कभी नजरअंदाज किये जाते हैं। शायद ही कभी कोई इनसे व्यक्तिगत बातें करता होगा और जानकारी लेने की कोशिश करता होगा कि आखिर इनकी जिंदगी कैसी चल रही है। लेखिका के रूप में सोनल न सिर्फ एक ऐसे ही गाइड से बात करती हैं बल्कि विदेशी पर्यटकों द्वारा इन गरीब मजदूर वर्ग के युवाओं को दिये जाने वाले प्रलोभनों और खाने पीने के लगाए चस्के के कारण अन्य कोई कार्य न कर पाने की आदत को भी समझती हैं। वे देखती हैं कि काम न मिलने पर भी ये युवा अपने खुद के खेतों में काम नहीं करना चाहते। दरअसल कहानी उन पर्यटन स्थलों की एक बड़ी समस्या को इंगित करके सोचने पर मजबूर करती है जहाँ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। वास्तव में पर्यटन स्थलों के विकास के अलावा स्थानीय लोगों के रोजगार के बारे में भी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। 

कहानी आत्मकथ्य रूप से चलती है लेकिन लेखिका कहीं भी हावी नहीं होतीं बल्कि उस गाइड की निजी जिंदगी उसकी तकलीफ विवशता और उसकी क्षुब्धता को मुख्य रूप से सामने लाती हैं। कभी उस पर क्रोध आता है तो कभी तरस । विदेशी पर्यटकों द्वारा गाँव के इन भोले भाले युवाओं को कुछ पैसों के बदले नकारा बनाए जाने की यह कहानी विकसित चमकीले स्थलों के स्याह पक्ष की कहानी है। 

दूसरी कहानी जानकी पुल पर प्रकाशित कहानी है जात्रा। सोनल जिस तरह गाँवों जंगलों नदियों और लोक से जुड़ी हैं यह कहानी उसे बखूबी बताती है। विदेश से अपने मित्र के घर आये एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो बरसों बाद अपने देश के गांवों को देख रहा है। जबकि उसका वह मित्र जो इन्हीं जंगल नदी के बीच काम करता है इन सब से अनभिज्ञ सिर्फ काम में व्यस्त है। वह अपने दोस्त के साथ जिस तरह धीरे-धीरे अपने परिवेश को देखते उसमें शामिल होता जाता है पाठकों को अद्भुत खुशी से भर देता है। ग्रामीण जीवन में जात्रा नदियों की परिक्रमा भंडारा तीज-त्यौहार खेल जीवन को गति देते हैं। इन्हें शहरों ने या तो छोड़ दिया है या भुला दिया है। धीरे-धीरे ही सही इनमें जीवन का रस पहचान कर जब दोनों दोस्त उसमें रमते हैं तो अपने तनावों को भूलकर नई जीवनी शक्ति से भर जाते हैं। गाँव के मजदूर जो दुगने पैसे मिलने पर भी अपने त्योहार छोड़कर काम पर नहीं आना चाहते वे अपने साहब के प्रेमभाव के कारण कम समय में काम पूरा करने के लिए राजी हो जाते हैं। यह प्रसंग ही बताता है कि पैसों से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता और छोटी छोटी बातों से बड़ी बड़ी खुशियाँ पाई जा सकती हैं। 

दोनों ही कहानियाँ अपनी भाषा कथ्य और कहन में बेहद प्रभावित करती हैं। 

#कहानी #kahani 

कविता वर्मा

Wednesday, June 2, 2021

#कोरोना_कथा1

 कोरोना के उस वार्ड में एक दो या शायद तीन दिन कैसे बीते सिलसिलेवार कुछ भी याद नहीं है। कुछ छुटपुट बेतरतीब सी बातें गाहे-बगाहे याद आती भी हैं तो दिल धड़कने लगता है। हास्पिटल से आने के पंद्रह दिनों बाद भी वह वार्ड वहाँ का माहौल रात के सन्नाटे में अपनी रंगबिरंगी लाइट चमकाते बीप बीप करते मानिटर याद आते हैं तो पल्स बढ़ जाती है।

मेरे बेड के दो बेड छोड़कर थी वह। उसे बायपेप लगा था। वह मेरे पहले आई थी या बाद में यह भी नहीं पता। मोटे बेल्ट से पूरे चेहरे पर बंधा वह मास्क उस गर्मी में लगाये रहना बेहद मुश्किल था। लाल गाउन पहने वह लगातार बैठी रहती। कभी-कभी उसकी मास्क के अंदर से घुटी घुटी आवाज आती। उसके पास मोबाइल नहीं था। अक्सर वह हाउस कीपिंग वाली सफाई कर्मचारियों के मोबाइल पर अपने घर बात करती जिसमें उसकी बेबसी झुंझलाहट गुस्सा झलकता।

दो तीन दिन में जब मैं अपने आसपास को देखने की स्थिति में आई तब उसे बैठे या मोबाइल पर बात करते देखकर सोचती कि इस समय उसे काउंसलिंग की आवश्यकता है। कोई ऐसा आत्मीय या प्रोफेशनल जो उसे इस माहौल और इलाज के प्रति आश्वस्ति दे सके। इसके लिए मानसिक रूप से तैयार कर सके ताकि वह इलाज को पूरी तरह स्वीकार कर पाए। कभी-कभी मेरा मन होता कि पांच मिनट ही सही उससे बात करूँ।

यह बिल्कुल भी संभव नहीं था। आक्सीजन मास्क के साथ आप खूंटे पर बंधी गाय से ज्यादा नहीं रहते। तीन बाय छह का वह पलंग उस पर रखा सामान का थैला और बगल की टेबल पर रखी पानी की बाटल और दवाइयाँ। जबकि खाना खाते हुए भी मास्क उतारने की अनुमति न हो। बिस्तर पर मल-मूत्र विसर्जन मजबूरी हो ऐसे में हास्पिटल के बाहर आपके इंतजार में पल पल गिनते पति बच्चे माता-पिता भाई भाभी को नजरअंदाज कर आप एक अनजान के लिए आपके लिए बताये नियमों को नहीं तोड़ सकते।

हाउस कीपिंग वाली एक लड़की आशा से अच्छी बातचीत हो गई थी। वह सुबह मुझे व्हीलचेयर पर बैठा कर वाशरूम ले जाती और वहीं रुकती। मैं फ्रेश हो हाथ मुंह धोकर कपड़े बदलती और वापस आते हाँफने लगती। आते ही वह आक्सीजन मास्क लगाती और पलंग पर लेटने में मदद करती। चौबीस घंटे में वह दस बारह मिनिट ही होते जब मैं रिस्क लेती और अपना ध्यान रखने के एवज में उसकी मुठ्ठी गर्म करती। आशा से उसके बारे में पता चला कि वह अपने पति पर भडकती है उसे समझाते हैं लेकिन मानती नहीं है। 

हालांकि दिन में कई बार जूनियर डाक्टर नर्स हाउस कीपिंग स्टाफ के सदस्य उसे समझाते कि वह परेशान न हो और आराम करे। बाहर उसके पति उसकी चिंता कर रहे हैं। मैं अपने बेड पर बैठी लेटी सुनती देखती और ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसके चित्त को शांत करे उसे जल्दी ठीक करे। दिन गुजरते गये उसे कुछ अन्य तकलीफें होती गईं जिनके बारे में वह डाक्टर को बताती और उसे इलाज मिलता। कुछ आवाजें मुझ तक आतीं लेकिन अब उसकी फोन पर लंबी बातें बंद हो गई थीं या शायद अब उसे मोबाइल नहीं मिलता था। कभी-कभी वह बात करती लेकिन अपेक्षाकृत शांत रहती। मुझे भी सुकून लगता कि वह एडजस्ट हो रही है और जल्दी ठीक हो जायेगी।


लगभग आठ दिन बाद मेरा आक्सीजन मास्क निकल गया। उस दिन जिस असुरक्षा का अहसास हुआ उसके साथ रहना अन्य दिनों से ज्यादा मुश्किल था। उसी दिन बगल के बेड पर एक नया मरीज आया। पता नहीं उसे कितना इंफेक्शन है और मैं सिर्फ एक सर्जिकल मास्क लगाए पांच छह फीट दूर बैठी हूँ।

उस दिन भी उसे देखा। वह शांति से बैठी वार्ड के मरीजों को देख रही थी। आठ दिन वहाँ और उसके पहले चार दिन अन्य हास्पिटल में रहने के बाद घर जाने की उत्सुकता कोई भी अति उत्साही बेवकूफी करने की इजाजत नहीं दे रही थी। वैसे भी कमजोरी इतनी थी कि फोन पर दो मिनट बात करना दो मंजिल सीढियाँ चढ़ने जितना थका देता था। लगभग आधा दिन बिना मास्क शांति से गुजरा और उम्मीद बंधी कि जल्द ही छुट्टी मिलेगी।

अगले दिन सुबह से पतिदेव प्रोसेस में लगे डाक्टर के साइन फाइल मीटिंग करते करते दो बज गये । व्हीलचेयर पर अपने सामान लादे मैं उसके सामने से गुजरी लेकिन न कुछ कह पाई न कर पाई। नीचे पतिदेव इंतजार कर रहे हैं घर पर मम्मी पापा राह देख रहे हैं।

घर आकर जब तीन बाय छह के बिस्तर से नीचे कदम रखा तो जाना कि घर जो शरीर आया है उसमें पहले की तुलना में रत्ती भर ताकत ही बची है और अभी लंबा सफर तय करना है जिसमें न जाने कितना समय लगेगा। सच कहूँ तो घर आने के बाद के दस बारह दिन हास्पिटल के दस बारह दिनों के समान ही थे। हास्पिटल की याद आते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती पल्स बढ जाती। आधी रात में नींद खुलती तो लगता कि ढेरों मानिटर अपनी लाल हरी पीली लाइट चमकाते बीप बीप कर रहे हैं। मैं जोर से आंखें और कान बंद कर लेती और उसका चेहरा दिमाग के पर्दे पर कौंध जाता। वह ठीक हो गई होगी एक उम्मीद जागती और कहीं एक नाउम्मीदी भी। दिल और दिमाग के बीच इन दोनों के बीच जंग छिडती। वह ठीक हो गई होगी उसमें जिजीविषा नहीं थी नहीं हुई होगी। तो क्या अब तक हास्पिटल में होगी? और मैं दस पंद्रह फीट दूर लाल गाउन पहने उसे बायपेप लगाये बैठा हुआ देखने लगती। वह सपना होता या खुली आँखों का भ्रम समझ नहीं आता।

आखिर एक दिन इस जंग ने बैचेन कर दिया। मैंने आशा को फोन लगाया। कभी उसकी जरूरत पड़ेगी तो बुलाने के लिए उसका नंबर ले लिया था मैंने। हालचाल पूछने और बताने के बाद मैंने उससे पूछा कि उस लाल गाउन वाली का क्या हुआ वह ठीक हो गई न।

'नहीं दीदी वह नहीं रही। बहुत कोशिश की लेकिन बची नहीं। सबने उसे खूब समझाया कि वह खुश रहे लेकिन वह समझती ही नहीं थी। उसका पूरा शरीर सूज गया था। दो बच्चे हैं उसके एक साल और तीन साल के और पति मजदूरी करता है।'

रोना नहीं रोक पाई मैं क्या सच में मैनें गलती कर दी क्या मुझे उससे एक बार बात करना था अपने डर पर काबू करके थोड़ा रिस्क लेकर? क्या मैं नियति का लिखा बदल सकती थी या शायद कुछ उम्मीद जगा सकती थी। पता नहीं जो हुआ वह ठीक था या नहीं लेकिन उसकी मौत बार बार याद आती रहेगी। लाल गाउन पहने वह दो बेड दूर इतनी दूर क्यों थी बस यही सोच रही हूँ।

कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...