Saturday, October 24, 2020

पड़ोसी हाय पड़ोसी

 करीब दो महीने से हाथ में तेज दर्द था। लगा कि लाॅकडाउन में सभी काम हाथ से करने के कारण शायद मसल्स में दर्द हो गया है लेकिन दर्द बढ़ता गया। यह समय बिटिया के अमेरिका जाने का भी था इसलिए थोड़ा टालते रहे कि अभी हास्पिटल डाक्टर के चक्करों में न पडें। बिटिया के जाने के बाद डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने फ्रोजन शोल्डर की आशंका जताते हुए एम आर आई करवाई ब्लड टेस्ट हुए। दवाइयाँ पहले ही लिख दी गई थीं साथ ही एक्सरसाइज का एक चार्ट था जिसे पहले तो खूब सीरियसली नहीं लिया लेकिन फिर लगा कि यह भी एक आवश्यक तत्व है तो उसे करना शुरू किया।

परसों डाक्टर को ब्लड रिपोर्ट और एमआरआई दिखाई तो उन्होंने शोल्डर में इंजेक्शन देने को कहा। चूँकि भाभी भी डाक्टर है उससे बात हुई तो उनने बताया कि इससे कंधे की साॅकेट में जो कैल्शियम डिपाजिशन होता है उसे डिजाल्व करके मूवमेंट को सरल बनाया जाता है इसलिए मैं तुरंत तैयार हो गई। ओटी में ले जाकर यह इंजेक्शन लगा कुछ आराम महसूस हुआ। अब रोज कंधे की गर्म पानी के नैपकिन से सिंकाई करके एक्सरसाइज करने में लगभग एक घंटा लग जाता है जो बुरी तरह थका देता है। इस सबके साथ दवाइयों के असर के कारण चक्कर से आने लगते हैं तेज नींद आती है। खैर यह तो हुई सामान्य सी बात शायद सभी के फ्रोजन शोल्डर में यही स्थिति होती होगी।

अब खास बात घर के सामने एक मकान बन रहा है जहाँ आजकल टाइल्स लगने का काम चल रहा है दिन भर टाइल्स कटने की किर्र किर्र कानों में अजीब झनझनाहट पैदा करती है लेकिन वह तो होगा ही इस आवाज को आप रोक नहीं सकते। असली परेशानी है इस मकान के मालिक की आवाज। वह व्यक्ति इतनी जोर से बात करता है कि मुझे मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक उसकी आवाज आती है। पहले वह हर संडे सारे दिन मकान का काम देखने आता था और फोन स्पीकर पर डालकर जोर जोर से बातें करता था। एक दिन अंततः मैंने उससे कहा कि भाईसाहब संडे को लोग दिन में आराम करते हैं।

अब वह यहीं एक किराये के मकान में शिफ्ट हो गया है और दिन भर इतनी जोर जोर से बोलता है कि मेरे घर के सबसे अंदर के कमरे तक टाइल्स कटने की आवाज नहीं आती लेकिन उसके बोलने की आवाज आती है। दोपहर बाद वह आफिस चला जाता है तो उसका बेटा उसकी जगह संभाल लेता है। शाम को तरी करना हो या खेलना हो इतनी जोर जोर से चिल्लाता है कि आप घर के किसी कमरे में शांति से नहीं बैठ सकते।

चूंकि अब उसे जिंदगी भर इसी मकान में रहना है और कुछ कहने का मतलब जीवन भर की बुराई मोल लेना है और कुछ न कहना मतलब जिंदगी भर टार्चर होना। पता नहीं लोगों को अपनी खुद की आवाज सुनाई देती है या नहीं या वे बोलते ही इसलिये हैं कि आसपास वाले लोग सुनकर उन्हें स्मार्ट समझें। हालाँकि मुझे तो वे..... खैर छोड़िये।

#civic_sense #noisi_neigbbour #तुम_कहो_जग_सुने

Tuesday, August 25, 2020

दाँत दर्द का इलाज ढूँढते

 कोरोना काल में बहुत सारी अच्छी बुरी बातों की श्रृंखलाएं चलती जा रही हैं। यूँ तो अच्छी बुरी बातों से ही जीवन बना है लेकिन क्योंकि यह समय हमारे लिए सदियों में एक बार आने वाला, कभी देखा ना कभी सुना, ऐसा समय है इसलिए इस समय होने वाली सभी बातें बहुत ज्यादा  महत्वपूर्ण हो जाती हैं। 

इस दौरान हर व्यक्ति ने अपने आप को जिस तरह एक बंधन में एक कैद में पाया है उसने भी हमें झकझोर दिया है। आम तौर पर अपने आपको हर तरह से स्वतंत्र समझने वाला व्यक्ति भी जब यह करो वह ना करो यह कर सकते हैं वह नहीं कर सकते के दायरे में पाता है तो घबरा सा जाता है। सहज सुलभ चीजें जिन्हें आम दिनों में करते हुए न कभी कोई योजना बनानी पड़ती थी न कभी उनके बारे में सोचना पड़ता था इन दिनों में बहुत सोचने बहुत योजना बनाने के बाद ही की जा सकती हैं। जिसकी वजह से न सिर्फ एक पराधीनता का भाव पैदा होता है बल्कि अपनी विवशता जान कर मन बहुत खिन्न भी हो जाता है। 

ऐसा ही अचानक महसूस हुआ जब एक दिन सुबह सोकर उठी पानी पिया और पीते ही दांत में तेज दर्द हुआ। इतना तेज दर्द जो मैंने कभी जीवन में महसूस नहीं किया था।  ऐसा लगा मानों पानी मसूड़ों को चीरकर अंदर तक घुस गया है और उसने जबड़े के चेहरे के पूरे बाएं हिस्से को अपनी जकड़न में ले लिया है। उस ठंडक को उस तीखे दर्द को  सहन कर पाना बड़ा ही मुश्किल लगा। 

चूंकि लाॅकडाउन चल रहा था इसलिए कहीं भी किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं था। तुरंत अपने डेंटिस्ट डॉक्टर को फोन किया तो उन्होंने कुछ एंटीबायोटिक और दर्द से राहत के लिए कुछ गोलियाँ लिख दीं जिन्हें तुरंत ही मेडिकल स्टोर से मंगवा कर खाना शुरु कर दिया। दर्द में कुछ राहत जरूर मिली लेकिन कुछ भी खाने पीने पर ठंडे और गर्म का वह तीखा का एहसास पूरे चेहरे पर लगातार बना रहा। 

इंतजार के सिवा और कोई चारा नहीं था। पांच दिन के लिए दी गई एंटीबायोटिक का डोज दस दिन तक चलाया गया। कुछ राहत जरूर मिली लेकिन ज्यादा नहीं। एंटीबायोटिक बंद करने के कुछ ही दिनों बाद एक दिन फिर बहुत तेज दर्द हुआ जैसे किसी ने अंदर की सारी नसों को झकझोर दिया हो।

उस दिन सारे डर को ताक पर रखकर डॉक्टर के पास जाने का निश्चय कर लिया। डॉक्टर के क्लीनिक पर हैंड सैनिटाइजर लगा सिर पर कैप पहन ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन का लेबल चेक करवा कर जब अंदर पहुंची तो डॉ को पीपीई किट में खुद को सिर से पैर तक ढके हुए देखा। उन्हें देखकर एक अपराध बोध सा हुआ कि क्यों इस समय मैं यहाँ आ गई? लेकिन मजबूरी थी दिखाना बहुत जरूरी लग रहा था। 

डॉक्टर ने फार्सेप से दांतों में फंसा कुछ पुराना खाना निकाला और अंदर तक रोशनी डाल कर देखी तो पता चला एक बड़ी सी कैविटी है जिस में सड़न पैदा हो चुकी थी। उन्होंने कहा इसका तो रूट कैनाल ही करवाना होगा लेकिन इस समय कोई भी डॉक्टर रूट कैनाल करने के लिए तैयार नहीं होगा क्योंकि उसमें पानी के छींटे उड़ते हैं इसलिए  अभी आपको फिर कुछ दिन एंटीबायोटिक खाना पड़ेगी और एक ब्रश दे रहा हूँ जिससे आप दांतों के बीच की सफाई अच्छे से करते रहिए उससे दर्द में कुछ आराम होगा। 

रूट कैनाल सुनते ही दिल धक से हो गया। रूट  कैनाल मतलब दांतो के अंदर की नसों को पूरी तरह मार देना जिससे कि उसमें ठंडे गर्म का किसी भी तरह के दर्द का अहसास ही न हो। अपने शरीर के अंदर ऐसे किसी मृत अंग को रखना भला कोई कैसे चाहेगा? 

दवाई लेकर और वह तारों वाला आडा ब्रश लेकर हम घर आ गए। ब्रश का उपयोग तुरंत शुरू किया तब जाना कि अरे हमारे दांतो के बीच कितना सारा अन्न फँसा रह जाता है, जिसे हम सोचते हैं कि ब्रश करके निकाल दिया है। वही अंदर ही अंदर सड़न पैदा करता है। 

रूट कैनाल के डर ने अब तक के आलसी मन को  उकसाया और जो चीज मैं कभी नहीं करना चाहती यानी यूट्यूब पर देख कर नीम हकीम बनना मैंने वह भी करने का निश्चय किया। अभी कुछ समय से होम्योपैथी की दवा चल रही थी तो सोचा शायद दांत के दर्द के लिए भी होम्योपैथी की कोई दवा हो। लेकिन वह दवा अभी चल रही दवा के साथ मैच करेगी या नहीं यह चीज समझ में नहीं आई इसलिए उसे ड्रॉप कर दिया। 

इसके बाद आयुर्वेद में दांत दर्द के कुछ इलाज तलाशे गए। पता चला कि लौंग का तेल  दांत के दर्द में बेहद कारगर है। यह तो पहले ही पता था बचपन में दांत दर्द के लिए लौंग के तेल के उपयोग के बारे में बहुत सुना था लेकिन कभी आवश्यकता नहीं पड़ी इसलिए वह ध्यान से उतर गया। तुरंत  लौंग का तेल मंगवाया गया और रुई में उसे लगाकर दांत की उस कैविटी में फँसाया गया। उससे भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ क्योंकि रुई के दबाव की वजह से कैविटी पर जोर पड़ता और दर्द बढ जाता। दूसरे विकल्प की तलाश की गई जिसमें हल्दी नमक लौंग का तेल और थोड़ा नारियल का तेल का पेस्ट मिलाकर कैविटी में भरने की सलाह दी गई थी। वह भी करके देखा कैविटी में नमक और हल्दी का मिश्रण लौंग के तेल के साथ मिलाकर भरा गया जिससे कोई फौरी राहत जरूर मिलती लेकिन वह कितना अंदर जाता यह पता करना बेहद मुश्किल था। 

कुछ दिन करते उससे भी उकताहट हो गई इसलिए धीरे-धीरे वह बंद हो गया। इसके बाद सोचा कि क्यों न लौंग के तेल को सीधे उस केविटी के अंदर डाला जाए ताकि अंदर जो भी बैक्टीरियल इंफेक्शन है उस पर वह सीधे काम करे। एक ड्रॉपर ढूंढा और उसकी मदद से बिटिया से कहकर कैविटी के अंदर लौंग का तेल सीधा टपकाया गया, ताकि वहाँ जो भी इंफेक्शन है वह खत्म हो जाए। इसे जरूर फायदा मिला कुछ दर्द से और कुछ पानी भी लगने पर होने वाला तेज दर्द कुछ कम हुआ जिससे एक उम्मीद बंधी कि शायद यह धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। 

मौसम ठंडा होते ही कई बार कम पानी पीने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट कम होने की वजह से नसों में जकड़न ऐंठन होने लगती है। कई बार यह इतनी तेज होती है कि पैर सीधा रखना मुश्किल होता है। अंदर ही अंदर यह मरोड़ नीचे से ऊपर देर तक उठती रहती है जिससे किसी भी तरह कोई राहत नहीं मिलती, सिवाय इसके कि तुरंत नींबू नमक का घोल बनाकर पी लिया जाए। 

उस दिन अचानक पैर की नस बुरी तरह से ऐंठ गई दर्द इतना तेज था कि चीख निकल गई। नींबू काटने निचोड़ने की ताकत भी नहीं थी इसलिए तुरंत एक गिलास में थोड़ा सा नमक घोला और पीने लगी। 

जब नमक का पानी उस कैविटी में लगा तो अचानक ध्यान आया कि यह तो सबसे अच्छा तरीका है। क्यों न पानी में नमक घोलकर उसके कुल्ले किए जाएं कुछ इस तरह की पानी उस केविटी तक पहुंचे। पानी को तो कोई रोक नहीं सकता वह जहाँ दरार मिलेगी वहीं चला जाएगा और उसके साथ घुला हुआ नमक भी। नमक से बेहतर एंटीबैक्टीरियल दवा और कौन सी हो सकती है? 

बस फिर क्या था मुझे तो मानो इलाज मिल गया। करने गए थे पैर का इलाज मिल गया दांत के दर्द का इलाज। अगले ही दिन से दिन में चार-पांच बार खासकर सुबह कॉफी पीने के बाद खाना खाने के बाद रात में खाना खाने के बाद मुँह अच्छे से साफ करके नमक के पानी का एक घूँट मुँह में भरकर उसे देर तक मुँह के चारों तरफ घुमाना विशेष रूप से उस कैविटी के आसपास अंदर की तरफ। ताकि नमक का पानी उसके अंदर तक चला जाए और वहाँ जो भी इंफेक्शन है उसे खत्म करे। 

नतीजा यह हुआ कि पिछले 20 25 दिनों से जिस दाढ़ से एक कौर भी नहीं चबा पा रही थी उसी दाढ़ से कुछ ही दिनों बाद अच्छे से खाना चबाकर खाने लगी। हालांकि कैविटी अभी भी है उसे भरने में समय लगेगा पर रात में जब नमक का कुल्ला करके सुबह उठती हूँ तो वह कैविटी बहुत छोटी सी महसूस होती है। शायद रात भर में वह अपने आप हील होती है लेकिन दिन में फिर खाने पीने की वजह से वह थोड़ी बड़ी हो जाती है। 

इतना जरूर कहूँगी कि दर्द मैं बहुत हद तक कमी आई है  और न जाने क्यों यह उम्मीद है कि बहुत जल्द यह इंफेक्शन पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। उसके बाद दांत में जो कैविटी बचेगी उसे फिलिंग से बंद करवा लूँगी और शायद रूट कैनाल करने से भी बच जाऊँ।

आखिर हमारे बड़े बुजुर्ग भी तो हफ्ते में एक दिन सरसों के तेल और नमक से दाँत चमकाने के बहाने दाँतों को डिस्इंफेक्ट ही तो करते थे। 

कविता वर्मा

Wednesday, April 29, 2020

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ
गिरजा कुलश्रेष्ठ जी को उनके ब्लॉग के माध्यम से कई साल पहले से जानती हूँ लेकिन उनसे पहली मुलाकात इसी महीने फरवरी में इंदौर महिला साहित्य समागम में हुई। आपने आपका कहानी संग्रह कर्जा वसूली बहुत प्यार से भेंट किया और उसे तुरंत पढ़ना भी शुरू कर दिया लेकिन बीच-बीच में व्यवधान आते गये और वह टलता गया। तेरह कहानियों का यह संग्रह सन 2018 में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। गिरिजा की लेखनी में एक तरह का ठांठीपन है। अपने कैरियर और मध्यम वर्गीय जीवन से रोजमर्रा की बहुत छोटी छोटी घटनाओं को तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हुए आपने कहानियों में ढाला है और अपने पाठकों को हर कहानी से जोड़ लिया है। शिक्षण से जुड़ी गिरिजा जी सरकारी गलियारों की उठापटक से भी वाकिफ हैं और उसमें सामान्य आदमी को परेशान करने के तौर तरीकों से भी। ये ऐसी दुनिया है जहाँ आप गलत को देखते समझते भी गलत नहीं कह पाते और इसे कहानी में ढाल कर दुनिया को दिखाना सबसे बेहतर तरीका है जो गिरिजा जी ने अपनाया है।

कहानियों की बात करूँ तो संग्रह की पहली कहानी अपने अपने कारावास एक ऐसी लड़की की कहानी है जो म्यूजिक सीखना चाहती है। शादी के पहले उसके शौक को कोई तवज्जो नहीं दी जाती और शादी के बाद घर गृहस्थी के जंजाल में भी उसमें सीखने की ललक तो रहती है लेकिन क्या वह सीख पाती है यह उत्सुकता पाठकों के मन में अंत तक बनी रहती है। यह कहानी एक इच्छा के जीवित रहने की कहानी है।
साहब के यहाँ तो सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी उनके मौज मजे को दिखाते हुए एक मोड़ लेती है और अंत में जिसे मौज समझा जा रहा था उसकी हकीकत कुछ और ही निकलती है। कहानी में पात्रों के संवाद बुंदेलखंडी बोली में होने से कहानी का प्रभाव बढ जाता है।
शपथ-पत्र कहानी भी सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली को उजागर करती है।
कर्जा वसूली शीर्षक कथा गांव देहातों में साहूकारों के शोषण से इतर एक साहूकार की कहानी है। ऐसी कहानियाँ सिक्के का दूसरा पहलू उजागर करती हैं जो बरसों से अंधकार में गुम था।
उसके लायक कहानी एक सामान्य शक्ल सूरत की लड़की की कहानी है जो पढ़ना चाहती है लेकिन हमारे समाज में गुणों के बजाय रूप को किसी के सम्मान का मापक समझा जाता है। एक आम मानसिक धारणा पर प्रहार करती यह कहानी भी अच्छी बन पड़ी है हालांकि अंत के पहले कुछ कुछ अंदाजा हो जाता है कि कहानी किस ओर मुडेगी।
व्यर्थ ही एक छोटी कहानी है जो परिवारों में लेन देन की परंपराओं की मानसिक यंत्रणा को दर्शाती हैं।
पियक्कड ब्लण्डर मिस्टेक नामुराद पहली रचना कहानियाँ अपने आसपास से उठाई गई हैं। ये कहानियां समाज सरकारी विभागों के चलन की कहानियाँ हैं जो अपने प्रवाह से बांधे रखती हैं।
बोधि प्रकाशन से आये इस संग्रह की प्रिंटिंग और प्रूफ रीडिंग बेहतर है कवर पेज आकर्षक है। गिरिजा जी को इस संग्रह के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ।

कर्जा वसूली
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
बोधि प्रकाशन
मूल्य 175 /-

Monday, April 6, 2020

क्या है यह पंथ और वाद

बहुत दिनों से कई बातें दिमाग में उमड़ घुमड रही हैं आज कुछ कहना चाहती हूँ।

लाॅकडाउन शुरू होने के दूसरे ही दिन बेटी ने धीमे स्वर में बताया कि उसकी रूममेट बहुत पैनिक हो रही है कि कहीं उसे या परिवार में किसी को हो गया तो वे लोग आपस में मिल भी नहीं पाएंगे। सुनकर चिंता हुई जबकि जानती हूँ कि वह मानसिक रूप से बहुत स्ट्रांग है लेकिन जब चौबीस घंटे साथ रहने वाले का चित्त अस्थिर हो तो खुद को स्थिर रख पाना भी मुश्किल हो जाता है। उससे यही कहा कि काम के बीच भी उसे कंपनी देना म्यूजिक मूवी बातचीत करते रहना उसे सपोर्ट करना इस वक्त की जरूरत है।
बड़ी बेटी ने वियतनाम यात्रा की बुकिंग की तब कोरोना शुरू ही हुआ था और इसका कोई इलाज नहीं था। चीन से भयानक खबरें आ रही थीं। हम लोग उसे एक दो दिन में एकाध खबर की फोटो भेज रहे थे। मन ही मन मना रहे थे कि भारत सरकार ही सभी उड़ाने बंद कर दे या वीजा रद्द हो जाये लेकिन उससे नहीं कहा क्योंकि अगर वह जा रही है तो मन में आशंका लेकर न जाये। उसका मनोबल बनाए रखना जरूरी था ताकि वह ट्रिप एंजॉय करे और हर स्थिति का स्थिर मानसिकता के साथ सामना भी करे। जब वह वापस आई उसने स्टाफ बस लेना बंद कर खुद की कार से जाना शुरू किया ताकि कलीग के संपर्क में न आये और आफिस में भी सबसे दूरी बना कर रखी।

कोरोना वायरस के साथ ही व्हाट्स अप फेसबुक पर इससे निपटने के कई उपाय आये कपूर धूप-बत्ती काढ़ा दवाइयाँ वगैरह वगैरह। हमारे परिवार के ग्रुप पर भी बहुत सारे मैसेज आये मैंने शायद ही कोई पूरा पढा या देखा हो लेकिन कभी किसी को नहीं कहा कि ये सब बकवास है और इनका कोई फायदा नहीं है। कारण यह था कि धूप-दीप या काढ़ा पीने से  किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा था लेकिन अगर यह सब करने से उन्हें यह विश्वास होता है कि वे स्वस्थ रह सकते हैं तो यह विश्वास बनाये रखने में कोई अड़चन डालना ठीक नहीं है। फिर किसी भी काढे में कोई हानिकारक वस्तु का उपयोग नहीं है वही सब चीजें हैं जो सदियों से उपयोग की जा रही हैं।

इसके बाद देश में घटनाओं की बाढ़ आ गई इंदौर में जुलूस दिल्ली में लाखों लोगों का पलायन तबलीगी जमात हर घटना के साथ आक्रोश भी था बेबसी भी थी और यह उन लोगों की ज्यादा थी जो खुद को घरों में कैद किये हुए थे।
मुझे याद है जब हम कामाख्या देवी के दर्शन करने गये। किसी पंडित को दक्षिणा देकर पंद्रह बीस मिनट में दर्शन कर लेते लेकिन मेरी ही जिद थी कि लाइन में लगते हैं। वहाँ लाइन के लिये पच्चीस तीस फीट की बेंचो को जाली से घेर पिंजरा सा बनाया गया था। लगभग तीन घंटे बाद उसमें बैठे घुटन होने लगी और मैं दर्शन छोड़ कर बाहर आ गई। मुझे बचपन से ही अकेले रहने की आदत है और अभी भी मैं कई दिनों तक अकेले रहती हूँ लेकिन वह तीन घंटे बंद रहने का अहसास असहनीय था। ऐसे में वे लाखों लोग जो अकेले नहीं रह सकते या रहे हैं उनकी स्थिति समझ सकती हूँ। इस अवसाद को तोड़ने या जमीनी काम वालों को धन्यवाद करने के लिए जब थाली ताली बजाने की बात हुई तब भी इसके विरोध के नाम पर लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई। पता नहीं किसी के थाली बजाने से किसी व्यक्ति के पास धन्यवाद पहुंचा या नहीं लेकिन अडोसी पडोसियों ने एक-दूसरे की सूरत देखी और साथ के अहसास के साथ उनके अगले कुछ घंटे बेहतर गुजरे।
सेनेटाइजर कहीं नहीं मिला तभी एक ग्रुप पर मुफ्त सेनेटाइजर वितरित करने की बात हुई और मैंने कहा कि कितने का है कीमत लेकर मुझे भी दो दीजियेगा। तब किसी ने कहा कि मुफ्त मिल रहा है तो पैसे क्यों देना और मैंने कहा कि जो नहीं खरीद सकते उन्हें मुफ्त दें और जो खरीद सकत हैं खरीदें।
कल रश्मि ने स्टेटस डाला कि शहर में मेहनत कर कमाने वाले खाने का पैकेट लेते हुए नजरें नहीं मिला पा रहे हैं। समझ सकती हूँ हालांकि कुछ वर्षों से ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे लोग हैं जिनके लिए यह असहनीय स्थिति है।
हालांकि मेरा अनुभव इससे बिलकुल उलट रहा है और मैंने अच्छे खाते पीते लोगों को भी मुफ्त के लिए झूठ बोलते बेइमानी करते देखा है। बिजली बिल माफ करवाने के झूठे आवेदन लाने वाले तीस साल से देख रही हूँ लेकिन उस स्टेटस पर अपने अनुभव न लिखते हुए सिक्के के इस पहलू को देखा सराहा। कोई और समय होता तो मैं शायद अपने अनुभव वहाँ शेयर करती लेकिन फिर वही बात कि अभी यह वक्त नहीं है।

मुझसे एक वरिष्ठ लेखक ने कहा था कि हमेशा जनवादी रहना।

 न मुझे साहित्य का क ख ग आता है न ये वाद और पंथ ही कभी समझ आये। हाँ जमीनी काम करते हुए बहुत करीब से देखा है जब पापा दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में लंगोटधारी तीर कमान वाले आदिवासियों को बैंक में पैसा जमा करवाने और बैंक से कर्ज लेकर साहूकारों के चुंगल से बचाने जाते थे या पति को बाइक पर जंगल जंगल लाइन की पेट्रोलिंग करते या ट्रांसफार्मर लगाने जाते देखा। और जन का मतलब हर उस व्यक्ति से रहा जो जमीनी काम कर रहा है। ऐसे समय में जब पुलिस के जवान निगम कर्मचारी प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी जान हथेली पर लेकर काम कर रहे हैं तब इस जन के साथ भी मैं खुद को खड़े पाती हूँ।

याद है अट्ठाइस साल पहले जब बिजली चोरी का प्रकरण बनाने पर एक कंज्यूमर जिस पर हत्या के केस दर्ज थे पति को जंगी जीप में बैठा कर बिजली की मोटर वापस लाने के लिए रात में हेड आफिस लेकर गया था। वे तीन घंटे भगवान के आगे दीपक लगा कर टकटकी बांधे उनकी सलामती की प्रार्थना करती रही थी। उस दिन उनका जन्मदिन था और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया था। ऐसे में उन पुलिस वालों अधिकारियों कर्मचारियों और उनके परिवार वालों की दुश्चिंता को समझ पाती हूँ और ऐसे में अगर कोई वीडियो पुलिस जवान किसी को डंडे से पीटता है तब भी मेरा मन उस जन के साथ होता है जो घर परिवार को छोड़कर रात दिन ड्यूटी बजा रहा है।
बच्चे को किसी काम के लिए चार बार मना करने के बाद माता-पिता भी झुंझला जाते हैं फिर ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे हर समय संयम बनाए रखें।

दो दिन से सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है कि अचानक बिजली बंद होने से क्या कुछ नहीं हो सकता है। आशंकाओं को हवा दी जा रही है। आम जन जो इस विषय में कुछ नहीं जानता समझता बल्कि सच कहें तो ये अफवाह फैलाने वाले भी कुछ नहीं जानते समझते। वे बता रहे हैं कि सब कुछ कितना खतरनाक हो सकता है। दरअसल हमारे यहाँ लोग अपने आप को सभी आधुनिक तकनीक से तुरंत लैस कर लेते हैं लेकिन सरकारी तंत्र को लेकर उनकी सोच चालीस साल पुरानी ही है।
इस बात से भी कोई आपत्ति नहीं है कि लोग जो सोच रहे हैं वह बोलें लेकिन जब इसका असर विशाल जन समुदाय के मनोबल को तोड़ने और अफवाहों को जन्म देने के लिए होता है तब जवाब देना पड़ता है।
आम लोगों को तो पता ही नहीं है कि आजकल सारा सिस्टम कंप्यूटरीकृत हो चुका है और किस ग्रिड पर किस समय कितनी बिजली जा रही है कितनी खपत हो रही है उसका पल पल का ब्यौरा मौजूद है और हर सिस्टम के पिछले आठ दिन के डाटा की स्टडी करके पूरी योजना तैयार है। अब आप वह करिये जो आप करना चाहते हैं जिसमें आपको खुशी मिलती है।
आज एक सखी ने कहा यार मैं यह दीया जलाने की बात से कंविंस नहीं हूँ मैंने कहा कोई बात नहीं तुम वह करो जिससे तुम कंविंस हो। लेकिन किसी और को उस बात के लिए कंविंस करने की कोशिश मत करो जिससे वह अभी कंविंस नहीं है।

लब्बोलुआब यह है दोस्तों कि इस समय सभी को अपनी अपनी आस्था के साथ अपना मनोबल बनाए रखने की और दूसरे के मनोबल को संभाले रखने की जरूरत है।

आज ऐसी सास बनिये जो बहू से कहे दूध में जामन लगा दे, और बहू आकर बताए मने तो जामन में दूध डाल दियो, न सास कहे वा जाने दे दही तो जमीज जायेगो।
कविता वर्मा 

Thursday, March 12, 2020

यह सिर्फ एक थप्पड़ और तलाक नहीं है


थप्पड़ की गूंज इन दिनों पूरे देश में है। चर्चा पक्ष में भी है विपक्ष में भी। एक थप्पड़ मारे जाने पर क्या कोई तलाक ले लेता है? ये बुद्धिजीवी सोच है जो भारत की संस्कृति को बर्बाद करना चाहती है। इसीलिए शादियाँ टूट रही हैं तलाक हो रहे हैं। आजकल की पढी लिखी लडकियाँ निभाना नहीं जानती। परिवार को जोड़े रखने के लिए कुछ समझौते करना पडते हैं जैसी सतही प्रतिक्रिया भी हैं और कुछ एक्सट्रीम प्रतिक्रिया भी कि शादी जैसी संस्था सड गल चुकी है इसे खत्म किये जाने की जरूरत है।
थप्पड़ फिल्म देखी और चार अलग-अलग कपल के परिचय के साथ शुरू हुई फिल्म में इंतजार शुरू हुआ थप्पड़ का। एक खूबसूरत शादीशुदा जोड़ा पति से बेहद जुड़ी उसके सपने को अपना सपना बना चुकी अमृता यानी कि अमू। सुबह सबके उठने के पहले उठ कर रात सबके सोने के बाद तक घर की जिम्मेदारियों को निभाती हँसती मुस्कुराती मार्डन कपड़े पहनती खाना बनाना नहीं आता इसलिए हाउस हेल्प के साथ सब करवाती और खुद खाना बनाने की कोशिश करती। एक खूबसूरत घर में हैंडसम हसबैंड के साथ रहती पार्टी डिनर करती अमू। सास साथ रहती हैं लेकिन सास जैसी कोई किटकिट नहीं है और वह भी उनका अच्छे से ध्यान रखती है। उसके जीवन में क्या कमी है? यही तो चाहती है हर लड़की अपने जीवन में। 
लड़की अपने जीवन में क्या चाहती है यह उससे पूछ कर निश्चित नहीं किया गया है। यह तो समाज ने निर्धारित कर दिया है कि लड़की के जीवन में यह सब कुछ है तो उसका जीवन सफल है वह सुखी है संतुष्ट है।
इस हँसती खेलती जिंदगी में एक झटका तब लगता है जब अपनी नौकरी में इच्छित प्रमोशन न मिलने से बौखलाया पति उसे पार्टी में थप्पड़ मार देता है। यह थप्पड़ अमू को अपनी अब तक की जिंदगी के हर उस लम्हे की याद दिलाता है जो उसने पति और परिवार के लिए जिया है खुद की उपेक्षा करके खुद के सपनों को मारकर। यह थप्पड़ उसे बताता है कि वह पति की सुविधाओं का साधन मात्र है उसे सब कुछ देने की आड़ में खुद की महत्वाकांक्षाओं को जीता पति वास्तव में अपने किये से नाममात्र शर्मिंदा नहीं है और न उसके लिए कोई अफसोस है। पत्नी से माफी माँगने जैसा कोई विचार तो उसे आता ही नहीं है।
अमू बेहद संवेदनशील है और इस असंवेदनशीलता को बर्दाश्त नहीं कर पाती। बहुत सोच विचार के बाद वह तलाक लेने का निर्णय लेती है और इस बात पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। यहाँ फिल्म बताती है कि एक थप्पड़ मारे जाने के लिए हमारे यहाँ कानून में कोई प्रावधान ही नहीं है। इस ग्राउंड पर जो वास्तव में एक स्त्री के आत्मसम्मान की बात है न कोई केस बनता है और न ही इसकी कोई अहमियत है। दुनिया के सबसे बड़े संविधान में एक पत्नी को उसका पति एक थप्पड़ मार देता है तो उसे कहीं असामान्य नहीं माना जाता और न ही माना जाता है कि इसकी वजह से स्त्री को कोई चोट पहुंचती है और उसके मन में ऐसे पति के लिए प्यार खत्म हो सकता है जो शादी को खत्म करने का आधार बनता है।
प्रसिद्ध वकील उसे कानूनी विसंगतियों के बारे में बताती है और उसमें घरेलू हिंसा जोड़ने की सलाह देती है जिसे अमू मना कर देती है क्योंकि यह नियमित मारपीट नहीं है जिसे घरेलू हिंसा कहा जाये।
यहाँ फिल्म एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है कि क्यों पति-पत्नी के संबंधों में एक थप्पड़ या एक गाली जैसी बात के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इस तरह दहेज विरोधी कानून और घरेलू हिंसा के कानून के दुरुपयोग के बड़े कारण को इंगित किया जाता है। अमू झूठा केस दायर नहीं करना चाहती लेकिन ईमानदारी से केस दर्ज करना लड़ना और जीतना असंभव है और इस ईमानदारी को उसकी कमजोरी समझ कर उस पर अनर्गल आरोप लगाए जाते हैं। अब तक की उसकी सेवा समर्पण पर गंभीर आक्षेप लगाये जाते हैं। एक साधारण मध्यम वर्ग की लड़की की उच्च मध्यम वर्ग में शादी करने को भी उसकी धन पैसा स्टेटस हड़पने की योजना बता दिया जाता है। दरअसल जब कानून का एक प्रावधान कमजोर होता है तब उसे लागू करवाने के लिये अन्य प्रावधानों का किस तरह दुरुपयोग होता है यह वकीलों के कागजी खेल में खुल कर सामने आता है। तब मजबूरन अमू को घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करना पड़ती है।
फिल्म में तलाक की बात से तिलमिलाए पति द्वारा पत्नी पर लगाए झूठे आरोपों पर कोई आश्चर्य नहीं होता क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच सिर्फ जीतना चाहती है अपने अहं की तुष्टि चाहती है पत्नी को नीचा और गलत साबित करना इसका आसान तरीका है और वही तरीका अपनाया जाता है। 
इस फिल्म में तीन और जोड़े हैं जिनमें स्त्री घुट रही है। दरअसल इस बहाने जब फिल्म के सभी कैरेक्टर को देखा जाता है तो पता चलता है कि पति-पत्नी के इस रिश्ते में कहीं भी बराबरी या बराबर का स्पेस है ही नहीं। कहीं स्त्री अनावश्यक मार खा रही है क्योंकि मारना मर्दानगी है तो कहीं एक सफल वकील अपनी उपलब्धियों के लिए पति और ससुर के नाम के अहसान को सहने के लिए मजबूर है। वहीं एक अकेली महिला एक खूबसूरत शादीशुदा जिंदगी के बाद अपनी बेटी के साथ अकेली है और बेटी की खुशी के लिए एक साथी ढूंढती है लेकिन खुद को अकेले बेहतर पाती है। उसकी टीनएज बेटी जिसने माता-पिता को विवाह बंधन में नहीं देखा वह भी शादी के एक वीभत्स स्वरूप से रूबरू होती है।  अमू की सास उसकी माँ सभी जीवन को समझौते के रूप में जीती हैं जिसमें उनका स्थान दोयम है जिसे समाज ने बना दिया है स्त्रियों ने स्वीकार लिया है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसी को खुद की खुशी समझने के लिए विवश हैं। अमू इस विवशता को तोड़ना चाहती है और उसकी जद्दोजहद दर्शकों को भी बैचेन करती है। पारंपरिक विचार बार बार सिर उठाता है कि आखिर क्यों लेकिन इस क्यों का सामना करना ही पड़ेगा और इसके समाधान के लिए कदम उठाना ही पड़ेगा। 
फिल्म आजकल लड़के के माता-पिता की बड़ी चिंता कि आजकल की लडकियाँ शादी नहीं करना चाहतीं या निभाना नहीं जानतीं को प्रमुखता से उठाती है। हालाँकि फिल्म बहुत स्पष्ट यह संदेश नहीं देती कि शादी नहीं करना ही ठीक है बल्कि दर्शकों को लड़कियों के शादी नहीं करने के कारणों में से एक को मुखरता से उठाती है। 
क्या वाकई शादी में पति-पत्नी दोनों एक गाड़ी के दो पहिये हैं या एक बड़ा फोरव्हील है जिसके साथ दूसरा पहिया सिर्फ घिसटता चला जा रहा है यह प्रश्न विचारणीय है। इस प्रश्न का उत्तर शादी संस्था को समाप्त कर देना तो हरगिज नहीं है लेकिन इस पर विचार कर दोनों पहियों को एक बराबर एक गति से चलने की सोच विकसित करने की आवश्यकता जरूर है।
एक और जोड़ा है अमू की हाउस हेल्पर जिसका पति उसे रोज पीटता है वह रोज पिटती है और कह सुनकर अपना दुख भुलाने की कोशिश करती है। निम्न तबके में ये आम है लाखों औरतें हर रोज यह झेलती हैं और अगले दिन फिर सामान्य होकर घर बाहर के काम करती रहती हैं लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाये कि इनका अपना कोई स्वाभिमान नहीं है उन्हें कोई दुख नहीं होता चोट नहीं पहुंचती? दरअसल उन्हें इंसान ही नहीं समझा जाता वे सिर्फ बहू हैं पत्नी हैं और सब कुछ सहकर शादी बनाए रखना उनकी मजबूरी है क्योंकि न उनके परिवार में कोई उन्हें सपोर्ट करता है और न ही कानून।
दरअसल फिल्म के एक थप्पड़ पर तलाक को इतना प्रचारित किया गया है कि फिल्म के असली प्रश्न नजरअंदाज कर दिये गये हैं। फिल्म उस पुरुष वादी सोच को दर्शाती है कि शादी को बनाए रखने के लिए स्त्री को बहुत सारी कोशिशें करना पड़ती हैं परिवार को जोड़कर रखना स्त्री का काम है। फिल्म में अमू पूछती है कि जिसे जोड़े रखने की कोशिश करना पडे वह तो टूटा हुआ है न?
हमारे देश में महिलाओं की मानसिकता भी पुरुष सत्ता से इस कदर प्रभावित है कि एक पढी लिखी अपने पैरों पर खड़ी महिला भी बहुत सारे कड़वे घूंट पीते हुए शादी को निभाये जाती है क्यों वह खुद नहीं जानती। हाथ उठा कर उसे थप्पड़ नहीं मारा जाता लेकिन उसके आत्मसम्मान को आहत करने के लिए शब्दों के थप्पड़ वह हर दिन चुपचाप बर्दाश्त करती है और समझ नहीं पाती कि उसके लिए कैसे रिएक्ट करे उसे कैसे रोके?
फिल्म में छोटी छोटी डिटेलिंग बहुत खूबसूरत हैं और गहरे अर्थ लिये हुए हैं। कामवाली का बढा कर दिये हुए पैसे वापस करना वकील का अपने दोस्त के साथ घूमने जाना या सुबह जल्दी मिलने के लिए बुलाना अमू की पडोसी दोस्त का उसे हग करना उसकी सास की खामोशी एक समर्थन सी गूंजती है तो भाई का उसकी गर्लफ्रेंड से रिश्ता बिगड़ना। फिल्म का हर फ्रेम कुछ कहता है और दर्शक खामोशी से इसे सुनते हैं। 
भारतीय शादी सदियों से दुनिया का ध्यान खींचती आईं हैं खासतौर पर इनकी लंबाई बड़ी वाहवाही पाती है जबकि अधिकांश शादियों में एक पक्ष घुट रहा है उसकी आकांक्षाएं उसके सपने माता-पिता की दहलीज पार करते ही किसी संदूक में बंद कर दिए जाते हैं और किसी को कभी उसकी याद भी नहीं आती। कोई कभी नहीं पूछता कि तुम्हारे सपने क्या थे तुम क्या चाहती थीं? पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ बिताने वाले भी उम्र के आखिरी पड़ाव तक नहीं जान पाते कि सबके अपने अपने सपने चाहतें होती हैं।
फिल्म एक बार फिर भारतीय समाज में लड़कों की परवरिश को नये नजरिए के साथ करने की ओर ध्यान आकर्षित करती है। शादी में पति-पत्नी की बराबरी को अमली जामा पहनाने से हम कितने दूर हैं यह बात शिद्दत से उठाती है और अगर थप्पड़ और तलाक को परे रखकर देखें तो और भी बहुत कुछ देखने और सोचने पर मजबूर करती है। 
कविता वर्मा 

Friday, November 15, 2019

अंतस की नदी

हर स्त्री और पुरुष के भीतर बहती है अंतस की नदी
https://storymirror.com/read/story/hindi/25sskg1s/ants-kii-ndii/detail

Saturday, November 2, 2019

कछु अकथ कहानी समीक्षा शिवानी जयपुर

कलमकार मंच द्वारा प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह कछु अकथ कहानी के बारे में यहाँ पढिये और अच्छा लगे तो आर्डर भी यहीं कर दीजिए ।
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https://kalamkarmanch.in/archives/1250

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...