Sunday, May 20, 2012

अलीबाग यात्रा

इस साल छुट्टियों में घूमने जाने का कार्यक्रम बना अलीबाग का .वही समय की कमी इसलिए ज्यादा दूर जा नहीं सकते.अचानक के प्रोग्राम में रिजर्वेशन  नहीं मिलता इसलिए कार से ही जाना तय हुआ.(वैसे भी न रिजर्वेशन की कोशिश की न ट्रेन से जाने का सोचा).बस तय हुआ की शनिवार की शाम निकलेंगे रात नाशिक में रुकेंगे .फिर आगे का कार्यक्रम..
बच्चों ने ट्रेवल xp पर नासिक में सुला वाइनरी देखी थी और उन्हें वहां जाना था. रोमांच इस बात का की हम वो जगह देखेंगे जो ट्रेवल xp पर देखी है .वैसे तो वहा उनका रेसोर्ट भी है लेकिन वहां रुकना बहुत महंगा था. इसलिए नेट पर रुकने के लिए होटल्स ढूँढना शुरू हुआ.और जल्दी ही एक होटल मिल भी गया. फिर अलीबाग की व्यवस्था के लिए ट्रेवल एजेंट के पास गए उसने जो रेसोर्ट बताये वो बहुत ही महंगे थे .लौटते में पूना जाना था वहां कजिन सिस्टर रहती हैं और जिस दिन हमारा कार्यक्रम बना उसी दिन वो लोग भी अलीबाग में थे. जीजाजी ने कहा अरे आप लोगो की आराम से रुकने की व्यवस्था हो जाएगी में एक दो नंबर देता हूँ . बस फिर क्या था बात बन गयी.
तो शुक्रवार शाम हमने अपनी यात्रा शुरू की.नासिक ४३० किलोमीटर था सोचा था रात १२ बजे तक पहुँच जायेंगे. लेकिन AB रोड पर इतना ट्राफिक की गाड़ी की स्पीड  ही नहीं बन पा रही थी. एक तो वीक एंड का ट्राफिक भी था. बिना रुके चलते रहे तब भी रात के २ बज गए. अब होटल ढूंढना बड़ी टेढ़ी खीर थी इतनी रात कोई सड़क पर था भी नहीं .होटल में लगातार बात हो रही थी लेकिन न कोई साइन बोर्ड था न रास्ता सूझ रहा था.एक बार तो लगा की आज रात तो होटल मिलने से रहा. एक तो मराठी नाम इतने मुश्किल थे याद करना ,की बात करते समय हा हूँ कर देते और फिर सड़क गली के नाम भूल जाते.भगवन को याद किया ही था की लूना से एक आदमी आता दिखा. उसे  रोक कर होटल में बात करवाई और फिर उसके पीछे पीछे होटल पहुंचे.उस समय वह व्यक्ति सच में भगवन का भेजा दूत ही लगा.होटल में सब हमारा ही इंतजार कर रहे थे. रात १० बजे से बात हो रही थी और हम पहुंचे रात २:३० पर. लेकिन साफ सुथरा होटल देख कर तबियत खुश हो गयी. बस सामान रखा हाथ मुह धोया और लम्ब लेट हो गए. 
सुला  वाइनरी दिन के ११:३० बजे खुलती है शहर से दूर इस गर्मी में दूर दूर तक फैले अंगूर के बगीचों की हरियाली ने मन मोह लिया. साफ सुथरी क्यारियां तरतीब से फैली बेलें .सुला में पर पर्सन टूर का चार्ज था १५० रुपये जिसमे ४ किस्म की वाइन को टेस्ट करना शामिल था. यहाँ जनवरी  से मार्च के बीच हार्वेस्टिंग सीजन रहता है अभी तो खेत खाली थे.पूरे टूर में हमारे गाइड ने अंगूर तोड़ने उसके संग्रहण से लेकर विभिन्न तरह की वाइन  बनाने की पूरी प्रक्रिया हमें समझाई. उसके स्वाद और रंग के लिए किये जाने वाले ट्रीटमेंट से लेकर बोटलिंग तक सब हमने देखा. फिर हम पहुंचे टेस्टिंग रूम. वहां से बिना परमिट के २ लीटर और परमिट पर ९ लीटर वाइन खरीद सकते थे.जब सुला से बाहर निकले एक नयी जगह नयी चीज़ देखने की संतुष्टि थी. 
आगे का सफर था अलीबाग का जो यहाँ से करीब ३०० किलोमीटर था. खाना खा कर सफ़र शुरू हुआ. हालाँकि रास्ता अच्छा था लेकिन बिना डिवाइडर ओर वीक एंड के ट्राफिक में गाड़ी चलाना वाकई मुश्किल था.बहुत कोशिश करके भी एवरेज स्पीड ५५-६० से ज्यादा नहीं आ पा रही थी. रास्ते में होटल से फ़ोन आया की हम आ रहे है या नहीं?या हमारा रूम किसी को दे दिया जाये. हमने भरोसा दिलाया की नहीं हम आ रहे है और ९ बजे तक पहुंचेंगे. दरअसल अभी तक सिर्फ फोन पर बात हुई थी और हमने कोई डिपोसिट  नहीं दिया था.सारा काम विश्वास पर चल रहा था.वहां भी भाषा की समस्या सामने  आयी. रास्ते  में किसी और से फ़ोन पर बात करवाई तब ढूँढते हुए हम अपने रेसोर्ट पहुंचे. 
अलीबाग पुरानी बस्ती है और वहां के बीच अभी नए नए डेवेलप हो रहे है वहां के  रहवासी अपने पुराने घरों के ही एक हिस्से को तुडवा कर या रिनोवेट करवा कर उसे रेसोर्ट का रूप दे रहे है. ये लोग बहुत प्रोफेशनल नहीं हैं .उन्ही के किचन  में खाना बनता है, जब  हम पहुंचे तो वहां रेसोर्ट के मेनेजर के नानाजी आये हुए थे. वो कहने लगे आपने बहुत देर कर दी. आप लोगों ने कोई डिपोजिट भी नहीं किया था ऐसे कैसे भरोसे पर सामने आये कस्टमर को लौटा दें वगैरह वगैरह. हमारे दो रूम तो बुक थे लेकिन वो अगल बगल में न हो कर अलग अलग मंजिल पर लेकिन आमने सामने थे. खैर वहां का पूरा माहौल घरेलू था इसलिए चिंता नहीं हुई. बेटियों ने झट फर्स्ट फ्लोर  का रूम ले लिया . बस नहा के फ्रेश हुए तब तक खाना लग गया ओर खाना खा कर हम  अगले दिन की प्लानिंग के साथ सो गए . 
देर  रात तक गाड़ियों के शोर सुनाई देते रहे ओर सुबह चार बजे से फिर गाड़ियाँ. आखिर ६ बजे सब उठ ही गए बीच पर जाने को तैयार.समुद्र तो बच्चों ने पहले भी देखा था लेकिन इस बार तय्यारी  लहरों के साथ खेलने की थी. बच्चे तो तुरंत पानी में पहुँच गए और में किनारे पर खड़ी समुद्र की विशालता और उसके सामने इन्सान की...खैर विचार कहाँ पीछा छोड़ते है .
 नागांव बीच अलीबाग का नया विकसित हो रहा बीच है .साफ सुथरा रेतीला किनारा दूर दूर तक फैला है .यहाँ वाटर स्पोर्ट्स भी है तेज़ रफ़्तार से पानी में चलने वाली बाइक, बनाना राइड,वेलोसिटी राइड .अथाह पानी में इतनी तेज़ गति से जाना रोमांचक भी था और डराने वाला भी .थोड़ी देर तो में दूर खड़ी लहरों को देखती रही बच्चों के फोटो लेती रही लेकिन फिर सबने मिल कर मुझे भी पानी में खींच ही लिया. बड़ी छोटी लहरें उनमे डूबना उतराना.लहर आने पर जम्प लगाना .धूप तेज़ थी लेकिन पानी में महसूस नहीं हो रही थी. हम करीब दो घंटे पानी में रहे लेकिन ठण्ड भी नहीं लगी. इसकी बजाय अगर दो घंटे किसी नदी में रहते  तो सब ठिठुरने लगते. उस दिन बच्चों ने बाइकिंग  की जब तक वो पानी में रहे एक पल को नज़रें उन पर से नहीं हातीं.हालाँकि वो इतनी दूर थे की न तो उन तक आवाज़ पहुँच सकती थी न ही कोई मदद. 
nagao beech 
जब समय को पकड़ने की कोशिश न की जाये या उसे किसी सीमा में बांधा न जाये तो वह भी अपने पूरे विस्तार के साथ आपके साथ होता है. हमने जितना भी समय वहां गुजारा वह अपने पूरे विस्तार के साथ हमें मिला न कहीं जाने की हड़बड़ी न कोई काम ख़त्म करने की चिंता. इन २-३ घंटों में जैसे सिर्फ समुद्र का विस्तार लहरों की मौज हमारे साथ थी.जिसके सामने चिंता फिक्र काम सब लहरों के साथ रेत से बह गए थे. मन प्रफुल्लित था इसलिए कोई थकावट नहीं थी .
रेसोर्ट पहुँच कर नहाया नाश्ता किया उसके बाद क्या किया जाये? तभी याद आया आज तो सत्य मेव जयते आने वाला है .बहुत सालों बाद ऐसा लगा जैसे रामायण के युग में ( धारावाहिक ) पहुँच गए हैं. जब ९ बजते ही सब काम धाम छोड़ कर टीवी के सामने बैठ जाते थे. ब्रेक में दिन की प्लानिंग होने लगी. आते हुए हम कल्याण से निकले थे.वहां के मार्केट में खरीदी की बहुत इच्छा थी लेकिन अंजान जगह समय से पहुंचना ही ठीक है ये सोच कर नहीं रुके थे. इसलिए बच्चों का मन था मुंबई जा कर शौपिंग की जाये. लेकिन वहा से ४० कम दूर से फेरी मिलती और वहां तक जाना वो भी सन्डे के ट्राफिक में मन नहीं हुआ. जैसे तैसे उन्हें समझाया की पापा कब से ड्राइव कर रहे है आज उन्हें आराम करने दो  अभी पुणे जाना है वहां देखते हैं.

थकान कोई खास नहीं थी इसलिए ३ बजते बजते सब उठ गए.अब भूख लगी थी रेसोर्ट का मेस तो बंद हो गया था .अलीबाग के एक रेस्टारेंट में खाना खाया और वही से वर्सोली बीच चले गए सन सेट देखने .देर तक रेत में टहलते रहे ओर सन सेट के बाद भी देर तक वहीँ बैठे रहे. भूख कोई खास नहीं थी इसलिए मार्केट से कुछ हल्का फुल्का बेकरी आइटम ले लिया ताकि रात में जरूरत हो तो खाया जा सके. सन्डे  की रात रेसोर्ट पूरा खाली हो चूका था. सड़क बिलकुल शांत थी.थोड़ी देर गपशप करके टी वी देखा फिर अगले दिन किस किस राइड पर जाना है ये प्लानिंग करके सो गए. (क्रमश ) छुट्टी,अलीबाग,यात्रा ,समुद्र  

Thursday, April 26, 2012

खुशियों का खज़ाना.

आज एक शादी में अपनी एक कलीग की बेटी से मिली. नाम सुनते ही वह पहचान गयी अरे आप वही है ना जो ब्लॉग लिखती है.में आपको पढ़ती हूँ .सच कहूँ अभी कुछ समय से लेखन से खास कर ब्लॉग लेखन से एक दूरी सी बन गयी थी.वैसे लेखन जारी है .आजकल कुछ कहानियों पर काम कर रही हूँ.सोचती हु उन्हें ही धारावाहिक के रूप में ब्लॉग पर डालूँ लेकिन खैर ये सब समय की बात है .आज सच में मन हुआ की कुछ लिखू.पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ .जब भी लेखन की एक विधा छोड़ दूसरे पर जाती हूँ पहली विधा कहीं पीछे छूट जाती है. बहुत दिनों से कोई संस्मरण लिखने की सोच रही थी लेकिन क्या ??
कल अलमारी जमाते हुए एक पुरानी डिब्बी खोल के देखी तो उसमे एक छल्ला निकला.उसे उंगली में डालते मन २५ साल पीछे पहुँच गया .ये छल्ला मेरी बुआ की बेटी का था.बस यूं ही बात करते करते उसकी उंगली से निकाल लिया ओर कह दिया मुझे बहुत पसंद है उसने भी कह दिया तो आप रख लो. जिस प्यार ओर अपनेपन से उसने दे दिया था उसे उतने ही प्यार ओर सम्हाल के साथ मैंने बरसों उंगली में डाले रखा. यहाँ तक की जब उतार कर रखा तब भी उसे अपने प्यार में लपेट कर रख दिया. कल उसे उंगली में डालते हुए मन भीग सा गया. हमने अपनी बहुत सारी बातें एक दूसरे से शेयर की हैं.एक दूसरे को लम्बे लम्बे पत्र लिखते थे जिसमे अपने मन की सारी बाते उंडेल देते थे.मुझे याद है वह हमेशा लिखती थी "ह्रदय की अंतरिम गहराइयों से प्यार"उस समय तो उसे कभी नहीं कहा लेकिनये शब्द सच ह्रदय की उसी गहराई में जाकर उसके प्यार का एहसास करवाते थे.

कभी  कभी चीज़ें छोटी होते हुए भी उनका असर बहुत गहरा होता है. ऐसे ही एक बहुत पुराने डब्बे में एक छोटे से लाल कागज़ में लिपटी रखी है शमी की दो पत्तियां जिन्हें हायड्रोजन पर oxaid में सुनहरा बनाया था .ये मेरी उस सहेली की प्यार की निशानी है जिसके साथ लगभग हर शाम गुजरती थी.बस साथ साथ कहीं घूमना ओर ढेर सारी बाते करना उस साल दशहरे पर में शहर के बाहर थी जब लौटी उसने कहा ये ले तेरा सोना कब से संभाल के रखा है .आजकल के बच्चे जो बाते समस या चाट पर करते है हम वो बाते रूबरू करते थे .उन बातों का असर देखते थे.ओर क्या कहना है क्या नहीं ये सीख जाते थे.समस की बातों से बाते तो होती है लेकिन उससे किसी की भावनाओ को समझने में उतनी मदद नहीं मिलती है ऐसा मुझे लगता है. 
जब में १० वीं में थी मेरे छोटे भाई ने मुझे एक पेन गिफ्ट किया था .सालों लिखते लिखते उसकी निब घिस कर इतनी चिकनी हो गयी थी ओर उससे राइटिंग बहुत बढ़िया आती थी. कई बरसों वह पेन मेरे पास रहा फिर जाने कहाँ गुम हो गया. लेकिन अभी भी जब एक पेन लेने की सोचती हूँ ओर दुकान पर देखती हूँ हर पेन में वही ग्रिप ओर वही स्मूथ्नेस ढूंढती हूँ लेकिन नहीं मिलती तो पेन छोड़ कर बाहर आ जाती हूँ. लेकिन वह पेन मन से नहीं निकल पता ओर उसकी याद पर किसी ओर पेन को हावी नहीं होने देना चाहती. 
ऐसा ही एक तोहफा दिया था पति देव ने. शादी के बाद के वो दिन जब जेब खाली थी एक दिन ऐसे ही कह दिया था मैंने, मेरे पास नेल कटर नहीं है .पता नहीं कैसे जबकि मुझे पता था की एक एक पैसा हिसाब से खर्च करना जरूरी है एक शाम घर लौटते मेरे हाथ पर नेल कटर रख दिया था उन्होंने. कहने को जरूरत की एक छोटी सी चीज़ लेकिन कैसे किया होगा नहीं जानती.आज वो नेल कटर काम नहीं करता लेकिन अगर अपनी तय जगह से जरा इधर उधर हो जाये तो ऐसा लगता है मानों सब कुछ खो गया. इसके बाद अनगिनत उपहार उन्होंने दिए लेकिन वह एक नेल कटर आज भी हाथ में आते मन को भिगो देता है .

ऐसे ही कुछ उपहार बहुत भावनात्मक होते है जो ऐसे संभाल के नहीं रखे जाते लेकिन उनका एहसास कभी मरता नहीं. फिर वो चाहे पहली बार हाथों में हाथ लेना हो या फिर चेहरे पर आये बालों को पीछे कर माथे पर प्यार की मोहर अंकित करना एक छोटा सा हग हो या प्यार भरी पहली नज़र.
जिंदगी की आपाधापी में जब आप थक जाये या सब होते हुए भी मन कहीं उदासी की गलियों में पहुँच जाये एक छोटा सा छल्ला ,एक साड़ी पिन ,किसी के कहे कोई शब्द कोई स्पर्श घर का कोई एक खास कोना या मन के किसी खास कोने में जमा बहुत खास पल ,आपको उन उदासी की गलियों से खींच कर बाहर ले आते है ओर खुशियों की गलियों में मुस्कुराने को विवश कर देते हैं. 

खुशियों का खज़ाना. 

Thursday, April 12, 2012

आफरीन



में आई इस जहाँ में 
बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के 
अपनी जिजीविषा के दम पर 

सहा तुम्हारा हर जुल्म निशब्द 
पर तोड़ नहीं पाए तुम मुझे 
ये तुम्हारी हार थी.

अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम 
हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर 
दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो 
बल तुम्हारे पौरुष को 

माँ के आंसुओं ने विवश किया मुझे 
ओर में कर बैठी विद्रोह 
की क्यों दूं में अपनी मुस्कान तुम्हे 
क्यों रोशन करूँ तुम्हारी जिंदगी 
जो ना कम हो सकी सदियों में 
क्या इससे कम होगी तुम्हारी दरिंदगी 

में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे 
धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को 
मेरे जाने के बाद 
शायद तुम महसूस कर सको 
कितने आदिम हो तुम 

ओर रखो हमेशा याद 
आई थी में अपने दम पर ओर 
जा रही हूँ अपनी इच्छा से 
तुम जीवित रहोगे जब तक 
मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी 
पर में तुम्हारी नहीं 
अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ 
ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू 
बेहतरीन तोहफे की तरह .


दोस्ती


  आजकल इंडियन आइडल का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक कालेज का लड़का खुद शर्त लगा कर हारता है किसी ओर लडके की आर्थिक मदद के लिए. वैसे तो टी वी पर कई विज्ञापन रोज़ ही आते है लेकिन कुछ विज्ञापन दिल को छू जाते है.खास कर दोस्ती वाले विज्ञापन.अभी कुछ दिनों पहले एक मोबाईल कम्पनी का जिंगल हर एक फ्रेंड जरूरी होता है सबकी जुबान पर था. 
दोस्ती दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है एक ऐसा रिश्ता जिसमे एक दोस्त दूसरे दोस्त की भावनाओ को, मन की बातों को बिना कहे जान लेता है. जब दोस्त कहे मुझे अकेला छोड़ दो तब उसके कंधे से कन्धा मिला कर खड़ा हो जाता है.ओर जब दोस्त कहे सब ठीक है तब बता ना क्या बात है पूछ पूछ कर सब उगलवा लेता है.
 जब भी इस विज्ञापन को देखती हूँ मन २३ साल पीछे अपने कोलेज की लैब में पहुँच जाता है जब फ्री पीरियड में हम समोसे खाने का प्रोग्राम बनाते थे अब उस समय कोई भी इतना धन्ना सेठ तो था नहीं की सिर्फ अपनी अकेले की जेब से सबको खिला सके .इसलिए पैसे इकठ्ठे होते थे.हमारा एक साथी हमेशा दो लोगो के पैसे मिलता था एक खुद के ओर दुसरे उसके दोस्त जग्गू के .मजे की बात ये थी की हम में से कोई भी जग्गू से पैसे नहीं मांगता था.ओर विपिन के अलावा जग्गू के पैसे देने का किसी ओर को जैसे कोई अधिकार भी नहीं था.जग्गू के पिताजी नहीं थे वह अपनी माँ के साथ रहता था.गाँव में शायद कुछ खेती बारी थी.लेकिन कमाई का कोई ओर जरिया क्या था किसी को नहीं मालूम था. वैसे भी सब कुछ जैसे पहले से तय था.ओर सब इतनी सहजता से होता था की ना हममे से किसी को कुछ कहना होता ना कुछ पूछना. 
लेकिन दोस्ती तो जग्गू ओर विपिन की थी इस तरह की कोई बात उनके बीच नहीं आती थी ओर वो हमेशा बहुत सामान्य रहते थे. ना कभी जग्गू इसके कारण संकोच में रहता ना विपिन में  कोई गर्व की अनुभूति दिखाती.एक गहरी समझ दोनों के बीच थी. 
एक बार हमसे रहा ना गया.उस दिन जग्गू शायद कालेज नहीं आया था .हमने विपिन से पूछा तुम हमेशा जग्गू के लिए इतना करते हो तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से आते है.ओर वह जोर से हंसा मुझे पता है मेरे पेड़ पर कितने पैसे लगते है बस उतने ही तोड़ता हूँ. 
आज इतने सालों बाद साथ पढ़ने वाले अधिकतर साथी कहीं गुम हो गए हैं लेकिन जग्गू ओर विपिन की वह दोस्ती आज भी मन के किसी कोने में शीतल बयार जैसी है.दोस्ती की ऐसी निश्छल  भावना इतने सालों बाद भी अब तक याद है.आज ये विज्ञापन देख कर उस दोस्ती की याद आ गयी..  

Tuesday, April 10, 2012

मुस्कान से मुस्कान तक

गुलाब की पंखुरियों से होंठों पर
नन्ही किरण सी वह मुस्कान 
आई थी जन्म के साथ 
जन्म भर साथ रहने को.

अपनी मासूमियत के साथ 
बढ़ती रही वह मुस्कान 
पल पल खिलखिलाते इठलाती रही 
होंठों से आँखों तक 
ओर पहुंचती रही दिल तक.

समय के उतार चढ़ावों में 
सिमटती रही करती रही संघर्ष 
किसी तरह बचाने अपना अस्तित्व 

उम्र के तमाम पड़ावों पर 
यूं तो कभी ना छोड़ा साथ 
लेकिन भूली बिसरी किसी सखी ने 
याद किया कुछ इस तरह 
'वह 'जो बहुत हंसती थी 
अब वही चहरे ओर नाम के साथ 
पहचान नहीं आती. 

 पोपले मुंह ओर बिसरती याददाश्त के साथ 
फिर आ बैठी है अपने पुराने ठिकाने पर 
अपने उसी मासूमियत को पाने में 
तमाम उम्र गंवाकर. 

Wednesday, March 28, 2012

एहसास

उस पुरानी पेटी के तले में 
बिछे अख़बार के नीचे 
पीला पड़ चुका वह लिफाफा.

हर बरस अख़बार बदला 
लेकिन बरसों बरस
 वहीँ छुपा रखा रहा वह लिफाफा.

कभी जब मन होता है 
बहुत उदास 
कपड़ों कि तहों के नीचे 
उंगलियाँ टटोलती हैं उसे 

उसके होने का एहसास पा 
मुंद जाती है आँखे 
काँधे पर महसूस होता है 
एक कोमल स्पर्श
 कानों में गूंजती है एक आवाज़ 
में हूँ हमेशा तुम्हारे साथ 

बंद कर पेटी 
फिर छुपा दिया जाता है उसे 
दिल कि अतल गहराइयों में 
फिर कभी ना खोलने के लिए 
उसमे लिखा रखा है 
नाम पहले प्यार का. 

Sunday, March 18, 2012

यूं मन का बागी हो जाना...



आज सुबह स्कूल में टी टाइम में एक कलीग आये ओर कहने लगे मैडम प्रसार भारती तीन दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम कर रहा है वासांसि के नाम से जिसमे कई नामी साहित्यकार आ रहे है.अगर हो सके तो आप भी आइये.कई अच्छे रचनाकारों को सुनने का मौका मिलेगा. अभी दो दिन पहले ही तो मैंने अपनी एक कविता उन्हें सुनाई थी.स्कूल में काम के बीच में अपनी रची दो पंक्तियाँ कभी में कभी वो एक दूसरे को सुना देते है जिससे दिन भर काम के बाद सृजन का उत्साह बाकी बच रहता है. कहने लगे उसके पास तो में आज नहीं लाया लेकिन कल ला दूंगा पर आप आज भी जाइये .इंदौर में साहित्यिक कार्यक्रम होते रहते है जिनमे जाने कि इच्छा कभी अकेले होने के संकोच में तो कभी दूर ,रात का समय या किन्ही ओर कारणों से टल जाता है.फिर भी मैंने कहा जी सर में जरूर जाउंगी. हालाँकि ये भी पूछने का समय नहीं मिला कि कार्यक्रम का स्वरुप होगा कैसा?? बस यूंही कह दिया कि जाउंगी लेकिन तब भी ये ना मालूम था कि चली ही जाउंगी.   

शाम साढ़े छ बजे उन्हें फ़ोन करके पूछा कार्यक्रम कितने बजे से है?जवाब मिला ठीक सात बजे से ओर प्रसार भारती के कार्यक्रम समय से शुरू होते है तो आप ठीक टाइम से पहुँच जाइये.जल्दी से बच्चों को कुछ बना कर खिलाया ओर घर से रवानगी की.गाड़ी स्टार्ट करते ही समझ आ गया की कुछ तो प्रॉब्लम है सामने डेश बोर्ड पर बेटरी ,हैण्ड ब्रेक ,फ्यूल सभी के  सिग्नल आ रहे थे .सात बजने में सिर्फ ५ मिनिट बाकी थे ओर रास्ता लगभग आधा घंटे का था. इसलिए बाकी सब को नज़र अंदाज़ कर गाड़ी आगे बढा दी लेकिन ये क्या जाने कैसी कैसी आवाजें आ रही है हेंडल टाईट चल रहा है ओर कम स्पीड पर गाड़ी बार बार बंद हो रही है. कुछ समझ नहीं आया बस कार्यक्रम में पहुंचना है यही ख्याल दिमाग में था इसलिए ना तो गाड़ी रोकी ना जाने का इरादा टाला. ये अलग बात है की मेन रोड पर गाड़ी खुद ही कई बार रुकी आगे पीछे गाड़ियों के शोर के बीच भी बस एक ही बात कार्यक्रम में पहुंचना है. 
मन में जब कोई छवि अंकित होती है तो उसकी छाप कितनी गहरी होती है ये तो घर आ कर सोचने पर समझ आया. आज से लगभग ३० साल पहले आकाशवाणी इंदौर के एक हास्य कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला था. हमारे पडोसी आकाशवाणी  में थे उन्होंने ही निमंत्रित किया था.उस कार्यक्रम के कुछ अंश आज भी दिमाग में अटके पड़े हैं. शायद ये भी एक कारण था की दिमाग जिद्द पर था की जाना ही है. इंदौर की भीड़ भरी सडकों पर शाम के समय यूं एक बिगड़ी हुई गाड़ी चलाना ओर ये भी ना पता हो की उसमे खराबी क्या है या कितनी दूर इससे जा पाउंगी ,मन का बागी हो जाना ही तो था.जो हर तत्पर परिस्थिति को नज़र अंदाज़ कर बस अपने मन की किये जा रहा था जबकि ये भी नहीं पता था की वहां क्या मिलना है या पाना है. बस एक नाम आकाशवाणी ओर सपना किसी साहित्यिक कार्यक्रम में अच्छे वक्ताओं को रचनाकारों को सुनने का मौका. दोनों ही मन के कोने में दबे सपने के सामान है जिन्हें आज पूरा करना था. 
बहुत ज्यादा देर तो नहीं हुई होगी इंदौर के प्रसिध्ध चित्रकार रचनाकार प्रभु जोशी जी का संबोधन चल रहा था .फिर बारी आयी प्रसिध्ध लेखक आयजी की जिन्होंने अपनी कहानी पढ़ी ग्लोब्लाइज़ेशन .एक डायरी के पन्नो को पढ़ते हुए कहानी किस तरह अपने परिवेश तक पहुंची ओर फिर किस तरह अपने सरोकारों को परे झटकती मानसिकता को प्रकट कर गयी.सुनना बहुत अद्भुत अनुभव था. 
प्रसिध्ध कहानीकार महेश कटारे जी का उदबोधन बहुत प्रेरक था जिसमे नयी कहानी से उठते हुए सवाल ओर उन सवालों के जवाबों की ओर सोचने को बाध्य करती सोच की ओर अग्रसर करने की क्षमता होने की बात कही गयी. बहुत सरल शब्दों में उन्होंने कहा की भारतीय कहानी का इतिहास जो मात्र सवा सौ साल पुराना है वो इसका अर्जित  इतिहास है ओर इसके  पहले का इतिहास इसका संचित इतिहास है. जो सूत की कथाओं से शुरू होता है जिसमे कहानी के साथ सोच की वृत्ति को उकेरा गया है .इसीलिए सूत जी ना सिर्फ कहानी कहते हैं बल्कि सामने वाले के मन में प्रश्न भी जगाते है ओर उसका उत्तर ढूँढने को विवश भी करते है.मालवी में कहानी को बात कहते है उन्होंने बहुत खूबसूरत कहावत कही "बात वो जिसमे रात कटे".इसकी व्याख्या करते उन्होंने कहा की जिस बात को कहते सुनते अंधकार छट जाये ओर पो फट जाये उजाले की किरण दिखाई देने लगे वही बात है. उन्होंने कहानी में सही शब्दों के इस्तेमाल पर जोर दिया साथ ही भाषा की सरलता को भी एक आवश्यक अंग बताया. 
सुधा अरोराजी ने अपनी एक बहुत पुरानी कहानी पढ़ी सात सौ का कोट जो कभी धर्मयुग में छपी भी ओर काफी चर्चित रही थी. सुधा अरोराजी की कहानियां पोडकास्ट पर यदा कदा सुनती रहती हूँ ,आज पहली बार उनके मुंह से सुनी. 
फिर बारी आयी समीक्षक राकेश बिहारीजी की उन्होंने कुछ कहानियों का सन्दर्भ लेकर जिस तरह उनकी व्याख्या की कहानियों को पढ़ने समझने का एक नया नजरिया जैसे मिल गया हो. सत्यनारायण पटेलजी की लुगड़े का सपना ,जया जी की खारा पानी ,इन कहानियों में छुपे यथार्थ के साथ एक कसक जो मन में उठती है उसकी चर्चा करते हुए उन्होंने आधुनिक कहानियों में यथार्थ के चित्रण ओर विखंडन को चिन्हित करते हुए इस विखंडन को नयी सोच नयी पहचान का पर्याय बताया. एक कहानी सात फेरे का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी बात बहुत खूबसूरती से समझाई. सुधाजी ने अपने उदबोधन में उन्हें दूसरा प्रभु जोशी करार दिया था .उनकी भाषा विचारों पर पकड़ ओर उनका संयोजन अद्भुत है. 

अंत में प्रसिध्ध कहानीकार गोविन्द मिश्रजी ने अपने उदबोधन में कहानी में यथार्थ के साथ सुन्दरता की बात कही.उन्होंने कहा की वीभत्स यथार्थ की बजाय एक आवरण के साथ यथार्थ का चित्रण ज्यादा प्रभावशाली होता है क्योंकि कहानी पाठक के अंतःकरण से जुड़ती है.अपनी बात के समर्थन में उन्होंने मदर  टेरेसा से अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए कहा की मदर ने कहा था की आम आदमी इसलिए जीता है क्योंकि वो अपने आसपास सुन्दरता को देखता है.
कुल मिला कर आज के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाती अगर आज जरा भी किन्तु परन्तु सोचे गए होते.ओर अफ़सोस इस बात का रहता की क्या खोया इसका अफ़सोस भी नहीं कर पाती.कल इसी क्रम में उपन्यास पर चर्चा होने वाली है.उम्मीद है कल भी इसमें शामिल हो पाउंगी.ओर हो सका तो उसके बारे में आपको बताउंगी भी. 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...