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Saturday, August 4, 2012

असंवेदनशील आस्था

आज एक न्यूज़ चेनल पर शनि को प्रसन्न करने का एक उपाय बताया जा रहा था.१०८ मदार या आंकड़े के पत्तों कि माला बना कर हनुमानजी को चढ़ाई जाये जिससे शनि कि शांति होती है साथ ही हनुमानजी प्रसन्न होते हैं. हमारे देश में भगवान को प्रसन्न करके अपना काम निकलवाने कि मानसिकता बहुत आम है ओर इसके लिए भगवान को चढ़ावे के रूप में रूप में फल फूल,मिठाई मेवे पूजा कि अन्य सामग्री चढाने का आम रिवाज़ है.पता नहीं इस चढ़ावे से भगवान कितने खुश होते है लेकिन इस तरह के कर्मकांडों से प्रकृति को जो नुकसान होता है उसकी पूर्ति सालों में भी संभव नहीं हो पाती. 
समय समय पर इस तरह के नए नए कर्म काण्ड कि हवा चलती है ओर लोग बिना सोचे विचारे उन पर अमल करने लगते हैं फिर चाहे वह गणेशजी को दूध पिलाने कि बात हो या मदार के पत्तों कि माला बनाना ,श्री कृष्ण जी पर १००८ तुलसी पत्र चढ़ाना.
तुलसी के १०८ या १००८ पत्ते रोज़ श्रीकृष्ण जी को चढाने से मनोकामना पूरी होती हो या ना होती हो लेकिन ये तय है कि अगर एक मोहल्ले के ५-७ लोग इस तरह का संकल्प ले लें तो उस मोहल्ले या कालोनी के सभी तुलसी के पौधे उजड़ जाते हैं.क्योंकि पूजा के नाम पर या संबंधों के नाम पर कोई तुलसी तोड़ने को मना नहीं कर पाता .
आजकल जबसे लोग अपनी सेहत के लिए जागरूक हुए हैं और सुबह कि सैर पर जाने लगे हैं तब से फूलों कि तो जैसे शामत आ गयी है. लोग सैर कम करते हैं फूलों कि चोरी ज्यादा करते हैं ओर ये चोरी भी कोई ऐसी वैसी नहीं पूरा डाका डाला जाता है. जहाँ तक हाथ पहुंचे वहां तक से सारे फूल तोड़ लिए जाते हैं बेचारे पेड़ मालिक के भगवान के लिए एक दो भी नहीं छोड़े जाते.सैर के बाद सेहत पता नहीं कितनी बढ़ती है लेकिन थैली में फूलों का वजन लगातार बढ़ता जाता है.सैर के लिए उस रास्ते नहीं जाया जाता जहाँ शुद्ध हवा मिले बल्कि उस रास्ते जाया जाता है जहाँ ज्यादा फूल मिलें. फूलों पर जितना हक आपके भगवान का है उतना ही पक्षियों, तितलियों का भी है.जरा सोच कर देखिये कब से आपने अपने आसपास तितलियों को उड़ते नहीं देखा?ये तितलियाँ फूलों के पराग पर जीवित रहती हैं मधुमक्खियाँ इन्ही से पराग ले कर शहद बनाती हैं फूलों के उजड़ जाने से इनकी संख्या में चिंतनीय कमी आयी है.तितलियाँ तो आजकल देखने को भी नहीं मिलती मधुमक्खियाँ भी लगातार कम होती जा रही हैं.

मालवी में एक कहावत है एक शेत पाडो ना एक गाम उजाडो अर्थात अगर एक मधुमक्खी का छत्ता तोडा जाता है उससे फसलों के परागण में जो कमी आती है वह गाँव कि जरूरत जितने अनाज कि उपज कम कर देती है.   
अभी सावन के महिने में आक या मदार के फूल धतूरे जिस बेरहमी से तोड़े जाते हैं कि इनके फूलों से नए बीज बनने कि प्रक्रिया ही रुक जाती है.पेड़ पौधों पर फूल रहेंगे तब तो उनसे फल और बीज बनेंगे ओर इन बीजों के विकिरण से नए पौधे बनेंगे जिस तेज़ी से स्थानीय वनस्पति कम हो रही है इससे इनपर निर्भर छोटे छोटे जीव जंतु विलुप्त होते जा रहे हैं वो चिंता का विषय है. 
यहाँ तक कि पहले कहीं भी जड़ जमा लेने वाली बेशरम कि झाड़ियाँ (उनका नाम ही बेशर्म शायद इसलिए था कि वो हर जगह उग जाती थीं) भटकटैया,धतूरे,बेलपत्र,लटजीरा, प्याड के पीले फूल यहाँ तक कि बारीक वाली दूब आज दिखाई ही नहीं देते.बेशरम कि झाड़ियों से जो जलावन मिलता था वह अब मिलना बंद हो गया है नतीजा लोग पेड़ ज्यादा काट रहे हैं.
सावन के महिने में लाखों लीटर जल दूध अभिषेक के नाम पर पानी में बहा दिया जाता है ,बेल पत्र के पेड़ उजाड़ दिए जाते हैं. 
हमारे यहाँ धर्म के नाम पर जो ना हो सो कम है . धार्मिक रीती रिवाजों को प्रकृति से जोड़ने का आशय ही प्रकृति के प्रति लोगो को संवेदनशील बनाना था.लेकिन अब ज्यादा धर्म कर्म करने ज्यादा पुण्य पाने कि होड़ में ये संवेदनशीलता कहीं गुम हो गयी है .व्यावसायिकता आस्था पर भारी पड़ती जा रही है लोग ज्यादा पुण्य पाने के लिए ज्यादा चढ़ावे ज्यादा दिखावे कि मानसिकता ले कर पूजा अर्चना करते हैं जबकि भगवान तो भावना के भूखे हैं पूरी श्रद्धा से चढ़ाया गया एक फूल टोकनी भर फूल से कहीं ज्यादा है .तो जरा सोचिये कहीं आप भी तो धर्म के नाम पर प्रकृति के साथ जीव जंतुओं के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे हैं??   


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