Wednesday, February 19, 2014
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
अपने सारथी हम खुद
अपने सारथी हम खुद अगले दिन सुबह उठे तो कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं थी। आज हमें उन्हीं जगह पर जाना था जहाँ अपनी गाड़ी से जाया जा सकता था। कि...
-
खरगोन इंदौर के रास्ते में कुछ न कुछ ऐसा दिखता या होता ही है जो कभी मजेदार विचारणीय तो कभी हास्यापद होता है लेकिन एक ही ट्रिप में तीन चार ऐ...
-
बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और ...
-
बात सन 80 की है। पापाजी का झाबुआ जिले के राणापुर से इंदौर ट्रांसफर हुआ था। इंदौर में खुद का मकान था जिसमें कभी रहे नहीं थे। हम तो बहुत छोटे...

bahut bahut badhai kavita ji ..
ReplyDeletecngratsssssssss
ReplyDeletecongratulation.
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई ...!..कविता जी ....
ReplyDeleteRECENT POST - आँसुओं की कीमत.
बहुत बहुत बधाईया, शुभकामनाएं.
ReplyDeleteरामराम.
बधाईयाँ !!
ReplyDeleteखूबसूरत रचना...
ReplyDelete